गजानन माधव मुक्तिबोध का नाम पिछले दशकों में शिद्दत से उभरा है। यह क्योंकर हुआ कि जिस कवि का अपने जीवन काल में एक संकलन भी प्रकाशित न हो पाया वह मृत्यु के दस-पंद्रह वर्षों बाद आजाद भारत के यथार्थ का साहित्यिक प्रतीक बना, और अचानक उससे प्रेरणा लेने वाले लेखकों की पूरी जमात, पूरी पीढ़ी बनकर तैयार हो गई? यह सवाल जितना जरूरी है, उतना ही व्याख्याकारी है।

लेखन कर्म आसान नहीं होता। उसमें कुछ ऐसी चीजें होती हैं जिनका सीधा ताल्लुक सादगी और ईमानदारी से होता है। ये चीजें कमोबेश सब व्यक्तियों में होती हैं, उसी तरह जैसे कल्पनाशीलता हर व्यक्ति में जन्मजात होती है। जिस चीज के लिए मेहनत करनी पड़ती है, उसका नाम नैतिक साहस है। यह निरंतर की जाने वाली जद्दोजहद से आता है। मुक्तिबोध के बारे में यह निश्चय ही कहा जा सकता है कि वह जीवन के अनेक पड़ावों के बीच से गुजरे, और हर पड़ाव ने उन्हें सोचने, समझने और सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया। खास तौर से इन पड़ावों ने मुक्तिबोध के सामने विचारधारात्मक मुद्दों से जुड़ी जिज्ञासाएं रखीं।

मुक्तिबोध ने कविता के माध्यम से समकालीन वैचारिक व्यवधानों को समझने का मुश्किल रास्ता चुना। यह प्राय: देखने में आता है कि विचार के लिए गद्य का इस्तेमाल होता है। लेकिन मुक्तिबोध यह न मानकर कविता के वितान में अपनी व्यापक विचारधारात्मक समस्या रखते हैं और वहां अपने समाज के गणित से दो-चार होते हैं। मुक्तिबोध वैचारिक को राजनीतिक से और राजनीतिक को समाज से जोडऩे के हामी थे। वे चाहते थे कि आजाद भारत की सांस्कृतिक तस्वीर का जायजा लेते हुए उसकी विकृतियों एवं मूलभूत समस्याओं को रेखांकित करें और वहां मौजूद संभावनाओं से अपनी भूमिका के लिए निर्देश लें।

मुक्तिबोध की कविता में हमें बीसवीं सदी के चालीस का दशक सुनाई-दिखाई पड़ता है। इस दशक में यद्यपि समाज का संभावित नक्शा नजऱ आने लगा था, जो मसलन तीस के दशक में प्रेमचंद को नजऱ न आया था, लेकिन उसके समकक्ष दूसरे और त्रासद पक्ष भी उजागर होने लगे थे। संभावित से मेरी मुराद सकारात्मक और आदर्श समाज-नियमों से है, जिनकी चालीस के दशक में हेठी होने लगी थी और जिस कारण मुक्तिबोध जैसे समर्थ और जागरूक कवि चिंतित और उद्विग्न थे। फिर चिंता का रूप निजी अहसास से आगे विचारधारात्मक था। हुआ शायद यह था कि गांधीवाद को लेकर चालीस के दशक से शुरू होने वाली निराशा सन 1945-46 के आस-पास अपना असर दिखाने लगी थी। यह वो वक्त था जब भारत की उच्चवर्गीय सोच के सामने जनतांत्रिक मूल्यों की चुनौती मूर्त रूप में उभरने लगी थी और नजर आता था कि जल्द ही समानता पर आधारित समाज की नींव डाली जा सकती है। उस वक्त ऐसे विचार अवाम की समझ के दायरे में आने भी लगे थे। उच्च वर्गीय लोगों के लिए यह खतरे की घंटी थी। बीस के दशक में उच्च वर्गों का समर्थन करने वाले संगठन अस्तित्व में आ चुके थे और चालीस के दशक में उनकी गतिविधि चरम पर थी। चूंकि जल्द ही सत्ता का हस्तांतरण संभव था, इसलिए देश के सब राजनीतिक संगठन हरकत में आ गए थे। आजादी पूर्व के निर्णायक क्षण में यह कठिन घड़ी थी, कि तब आजाद भारत का नक्शा तैयार होना था।

इतिहास में मुक्तिबोध की पर्याप्त रुचि थी। यह मनुष्य द्वारा निर्मित इतिहास तो था ही, साथ ही वह अन्य इतिहास भी था जो व्यक्ति को प्राक और पुरातत्व की तरफ ले जाता है। मुक्तिबोध को प्रकृति के अनेक रूपों में भी इतिहास नजर आता था। इसका गहरा साक्ष्य उनकी कविताओं में मिलता है। पुराने इतिहास और प्रकृति को मुक्तिबोध उनकी बदलती शक्ल में देखते हैं। वह पाते हैं कि अनजान प्रदेश के उस वातावरण में तत्कालीन मनुष्य कितनी ही तरह की हिंसा में शामिल होते थे, उस समय भी बाद के घटनाक्रम की तरह लूट-खसोट चलती थी, और वे तर्कविहीन झड़पें देखते-देखते असंख्य मौतों में बदल जाती थीं। वह प्रारंभिक वर्ग समाज का दौर था। इतिहास से जुड़े तर्क ने ही मुक्तिबोध को सामाजिक गतिकी और गतिशीलता से वाकिफ कराया। इसकी सूक्ष्म प्रक्रिया का रूप उनके सामने कवि की हैसियत से सोचने और कविता लिखने के दौरान हुआ।

अपनी कविता में मुक्तिबोध लगातार समाज और चिंतन के मुश्किल सवालों से मुखातिब हुए। उनकी कोई काव्य रचना ऐसी नहीं मिलेगी जिसमें मात्र प्रकृति या कला के किसी अमूर्त विषय पर नजऱ टिकी हो। वह समाज के ही संदर्भ में मनुष्य जीवन की समस्याओं का जायज़ा लेते थे। लेकिन उनकी राय थी कि जिसे हम जीवन कहते हैं वह असल में सामान्य जरूरतों और माहौल में सक्रिय मान्यताओं से परिचालित होता है। मसलन ज़रूरतें व्यक्ति को परंपरावादी बनने के लिए दबाव डालती हैं, इसके लिए उसे मज़बूर करती हैं ताकि विद्यमान समाज को उससे कोई विरोध या चुनौती न मिले, और दूसरी तरफ स्थापित मान्यताएं उसे प्रश्न पूछने और जिज्ञासु बनने से रोकती हैं। दोनों स्थितियों में जरूरत का तर्क मनुष्य के सोच पर हावी रहता और उसके व्यक्तित्व पर अपनी छाप छोड़ता है। प्रश्न है कि ऐसे में व्यक्ति क्या करें? गौर करें कि मुक्तिबोध की रचना मुख्य रूप से इस सवाल का पूरा-अधूरा जवाब बनती नजऱ आती है।

मुक्तिबोध का गंभीर रचना कर्म चालीस के दशक में शुरू हुआ। अपने चरित्र में चालीस का दशक राजनीतिक खींचतान और साथ ही वैचारिक जिज्ञासा और गहन विश्लेषण का साक्षी था। फिर उसकी पीठ पर बहुत महत्वपूर्ण अर्थ में तीस का दशक आसीन था जिसने स्थितियों में बदलाव की आकांक्षा और उससे जुड़ी चिंताओं को एकसाथ उभरते महसूस किया था। कल्पना करें कि किस प्रकार सोवियत रूस ने पूरे विश्व की जनता को सामाजिक न्याय और समानता का सपना दिखाया था। इससे भारत के आम लोगों में साहस का संचार हुआ था और फिर देश के साधनों पर काबिज़ होने जा रहे समाज के अन्य तबकों में परेशानी बढऩे लगी थी। उस समय कम लोग जानते थे कि संसाधनों के नियंत्रक तबके और देश के सामान्य लोग परस्पर विरोध की भूमिका अपनाने की सोचेंगे। लेकिन आजादी पाने और विभाजन की त्रासदी से गुजरने के बाद ऐसे सवाल उठ खड़े हुए, जिनका अहसास तीस और चालीस के दशक में बहुत कम लोगों को रहा होगा।

एक जगह शमशेर बहादुर सिंह कहते हैं– ‘मुक्तिबोध युग के उस चेहरे की तलाश करते हैं जो आज के मलबे के नीचे दब गया है, मगर मर नहीं गया है। बहुत नीचे की तहों से भी वह कहते हैं — कोशिश करो/ कोशिश करो/ कोशिश करो/ जीने की — ज़मीन में गड़ कर भी….!?’ (चांद काम मुंह टेढ़ा है, भूमिका, 22) इस टिप्पणी में शमशेर का आशय यहां दर्ज कई चीजों से व्यक्त होता है — मसलन, युग से जो मनुष्य-निर्मित है और किन्हीं लोगों के हित से परिचालित है। इस कारण युग आम जनता को आहत करता और उसे कुचलता भी है। यह सच मुक्तिबोध के लिए पहचानने और समझने का विषय है। लेकिन मुक्तिबोध अपना मंतव्य सीधे न व्यक्त करके अपने कल्पित पाठक और साथ ही दबे सामान्य आदमी को यह माकूल सलाह देकर कहते हैं कि वह कोशिश करें जीने की, और चूंकि यह कोशिश होगी इसलिए इसमें जीने की पद्धति का, उसके मारक चरित्र से वाकिफ होने कारण तरीका भी ईज़ाद करना होगा। देखें कि समझना आसान नहीं है, वह एक-साथ मुश्किल और जोखिम-भरा है, इस नाते उसके लिए जमीन में  गड़ कर भी कोशिश करनी पड़ सकती है। एक तरह यह सलाह मुक्तिबोध खुद को भी देते जान पड़ते हैं।

इससे पहले कि रचना से सम्बन्धित उपरोक्त सामान्य चर्चा को आगे बढ़ाएं, मुक्तिबोध की दो-एक कविताओं पर सीधे बात करना उपयोगी होगा। मुक्तिबोध ने अनेक छोटी कविताएं लिखी हैं। इनमें जीवन के सच पर संक्षिप्त लेकिन तीखी टिप्पणी मिलती है। एक चर्चित कविता का शीर्षक है ‘शून्य’। इस शब्द पर गौर करें तो पाते हैं कि मानी के नजरिए से यह गणित और दर्शन के बीच संदर्भों, क्रियाओं, और मानवीय इरादों की छवि से घिरा है। उदाहरण के लिए, यह शब्द ऊपरी पक्षों के विपरीत उनके अनुभव के सच को इंगित करता है। शीर्षक मात्र से पाठक को अनुमान हो जाता है कि कवि सीधे सीधे अपने माहौल के बारे में वक्तव्य देना चाहता है, और वह कवि अगर मुक्तिबोध है तो निश्चय ही सुचिंतित तर्क की मदद से अर्जित एक भरी-पूरी चीज़ रचना में व्यक्त होती नजऱ आएगी।

‘शून्य’ का केंद्रीय उद्देश्य साफ तौर पर समसामयिक ढांचे के खोखलेपन को उजागर करना है। यह एक अंधेरी कविता है, भयंकर और विनाशकारी। मुक्तिबोध ने इस तरह की दो-टूक शैली में प्राय: नहीं लिखा है। पढ़ें कि इस डेढ़ पृष्ठ की कविता में ‘शून्य’ को इंगित करने वाले और उसके समानार्थी शब्दों की झड़ी लगी है, और एक शब्द आगे आने वाले दूसरे शब्द से अधिक मारक है। उदाहरण के लिए जबड़ा, मांस काट खाने के दांत, खून का तालाब, एकदम काला, बर्बर, नग्न, विहीन, न्यून, अपने में मग्न, आदि शब्द जो अपनी तल्ख़ी से पाठक का ध्यान खींचते हैं। ‘विहीन’ और ‘न्यून’ की ध्वनि अचानक विचार में बदल जाती है जहां उसका असर अमूर्तन के कारण अतिरिक्त सन्नाटा पैदा करता है। पूछा जा सकता है कि इस दुहराव और अतिशय विस्तार का प्रयोजन क्या है? जिस जवाब को यह कविता तैयारशुदा शक्ल में पेश करती है वह वर्तमान जिंदगी का बाकी चीजों को बर्बाद करने वाला चरित्र तो है ही, उसकी खुद को नष्ट करने की प्रवृत्ति भी है। कविता के शुरू में ही शून्य को भीतर स्थित बतलाया गया है, वह व्यक्ति का आंतरिक स्वभाव है –‘भीतर का आदतन क्रोधी अभाव वह/ हमारा स्वभाव है’। इससे आगे कहा गया है कि शून्य के खतरनाक सूत्र मनुष्य शरीर की संरचना का हिस्सा बने हैं — ‘उस को मैं उत्तेजित/ शब्दों और कार्यों से बिखेरता रहता हूं/ बांटता फिरता हूं।’ अंत में शून्य को मौत कहा गया है जो ‘अब नये नये बच्चे जन रही है।’

‘शून्य’ बौद्धिक काव्य रचना है, यह अपने भीतर से एक विचार के इर्द-गिर्द घूमती है जो अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है, केवल बनने की प्रक्रिया में है। यह बनना शून्य को उसकी भीतरी परतों में दिखाता और समझाता है, साथ ही पाठक और स्वयं लेखक की विचारगत मदद के लिए जरूरी तर्क भी जुटाता है। इस कविता को दो-तीन बार पढ़ा जाए तो दिमाग में सामाजिक परिवेश की धुंधली और फिर साफ तस्वीर क्रमश: उभरती है। कविता के केंद्र में यह गतिकी-सिद्धांत सक्रिय दिखता है। पाठक महसूस करता है कि वह ऐसे रचनाधर्मी अभियान में शामिल हो रहा है जिसे देर-सवेर अभिव्यक्ति का नया तरीका ईजाद करना है। इसके लिए कविता के भीतर छोटे-छोटे वाक्य तैरते हुए देखे जा सकते हैं। मसलन, ‘ऐसा वह शून्य है’, ‘अपने में मग्न है’, ‘बहुत टिकाऊ है’, ‘जहां देखो वहां खूब मच रही है, खूब ठन रही है’, आदि, आदि। दिलचस्प है कि इन वाक्यों, वाक्यांशों में बनाया हुआ विचार नहीं, बन रहा विचार तारी है, उसी का सार्थक सिलसिला पाठक के सामने रू-ब-रू होने की खातिर शब्दों की शक्ल में मौजूद है।

यह बन रहा विचार क्या है और प्रक्रिया पूरी होने पर वह क्या रूप अख्तियार करेगा, यह कविता के भीतर तय नहीं है, कारण कि उसके लिए व्यक्ति-पाठक और उसके माध्यम से सामान्य लोगों के पूरे समाज को हरकत में आना होगा। अंतिम पंक्तियां हैं — ‘जगह-जगह दांतदार भूल,/ हथियार-बंद खोलती है,/ जिन्हें देख, दुनिया हाथ मलती हुई चलती है।’ अजीब तरह का यह वक्तव्य फिर से उस तर्क के लिए दरवाजा खोलता है जिसको सक्रिय अवाम के हाथों मनुष्य-सुलभ जिंदगी का आधार मिलेगा।

‘शून्य’ से अलग, बल्कि उसके लगभग विपरीत ‘मैं तुम लोगों से दूर हूं’ शीर्षक कविता है। जहां ‘शून्य’ में किसी चिंतन-सूत्र की प्रधानता थी, वहां इस कविता में मनुष्य मनुष्य के बीच रिश्ते का मसला है। अपने आप यहां समाज प्रवेश कर गया है और यह संकेत है कि वर्तमान जीवन में संभवत: भौगोलिक की निस्बत भावनात्मक दूरी की समस्या है — यदि व्यक्तियों के बीच निकटता हो तो खुशी का माहौल पैदा हो जाएगा। खतरे का भाव तो यहां है ही, अकेलापन ऐसा नासूर बना है कि वह पूरी जिंदगी के पोषक तत्वों, अर्थात मूल्यों और आदर्शों के लिए घातक सिद्ध हो रहा है। यह भी सोचें कि मसला आर्थिक या सीधे सीधे सामाजिक न्याय का न होकर मुख्यत: सांस्कृतिक है। इस तरह हम पाते हैं कि इस कविता में पाठक का ध्यान रचना और उसके साथ साथ लेखक के व्यवहार की तरफ भी खींचा जा रहा है।

‘मैं तुम लोगों से दूर हूं’ कविता में तीन विमर्श परस्पर टकराते हैं। वे हैं ऊंचे वर्ग का शोषणकारी सोच, शोषित निम्न वर्ग का सोच, और मध्य तबके का अनिश्चित यद्यपि कल्पनाशील और जिज्ञासापरक नजरिया। कविता में मुख्य रूप से उक्त तीसरे नज़रिये की मुश्किलों और चुनौतियों की समस्यामूलक तस्वीर उभर कर सामने आती है। साथ ही यह भी कि कविता का ‘मैं’ जिन लोगों को तुम कहता है वे अपने व्यवहार के दायरे में ‘अवास्तव, अयथार्थ, मिथ्या (और) भ्रम’ से निर्देश पाते हैं। इस कविता के खलनायक वे लोग हैं जो जिन्होंने पूरे होशो-हवास में काम करते हुए समाज की ऊर्जा और उत्पादन क्षमता को अपनी शोषणकारी योजना का लक्ष्य बनाया है। इस समझ ने कवि को दृष्टिकोण की स्पष्टता अर्जित करने में मदद की है। कवि इस ज़रूरत से भी वाकिफ है कि पूरी दुनिया को मौजूदा योजनाओं और नीतियों के विकृत तर्क से निजात पाना है, तभी समानता और सार्थक कामयाबी की मंजि़ल तक पहुंचा जा सकेगा। कविता का यह केंद्रीय संदेश पाठक को उस उक्ति तक ले जाता है, जिसके मुताबिक उसकी राय में ‘पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए।’

यहां जीवन की क्रियाओं को जिन प्रवृत्तियों से जोड़ा गया है उनमें ‘असफलता का धूल कचरा’, ‘छल-छद्म’, और ‘रक्तभरे महाकाव्यों के पन्ने’ प्रमुख हैं। देखें कि ऊपर से किंचित अलग दिखने वाले विषयों के बावजूद दोनों कविताओं में अद्भुत समानता है, और इसलिए वास्तविक जुड़ाव के पीछे कवि का सामाजिक नज़रिया सक्रिय नजऱ आता है। यह नज़रिया मुक्तिबोध की विभिन्न काव्य रचनाओं में संदर्भ और रूप के हिसाब से समाज के जटिल पक्षों पर टिप्पणी बनता है, और मानवीय सरोकारों की अहमियत को इस तरह उजागर करता है कि समाज के संदर्भ में निर्णायक बदलाव की पुख्ता जमीन तैयार हो सके।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2017, अंक-12), पेज-34

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