लेख


हरियाणा का नाम आते ही कृषि व किसान पर आधारित प्रदेश की छवि आँखों में उभर आती है। जो हरा भरा व सम्पन्न है, पर सच्चाईयाँ कुछ इससे इतर भी है।

हरियाणा का निर्माण हुए 51 साल बीत गये हैं। इन वर्षों में कृषि में अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। हरियाणा केे सन्दर्भ में इस कालखण्ड को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम भाग हरित क्रान्ति का उद्भव, दूसरे कालखण्ड में हरित क्रान्ति का प्रभाव व तीसरा यानी वर्तमान कालखण्ड जो हरित क्रान्ति के दुष्परिणाम की उपज है।

आजादी केे बाद यकीनन देश की जनता को अन्न उपलब्ध कराना जरूरी था। इसके लिये ठोस कृषि नीति की आवश्यकता थी। इसके परिणामस्वरूप हरित क्रान्ति का प्रादुर्भाव हुआ। विदेश में तैयार किये गये उन्नत बीज, उपज बढ़ाने केे लिए तैयार किये गये रासायनिक उर्वरक, सस्ते ब्याज पर उपलब्ध कृषि उपकरण आदि चीजों की शुरूआत हो गई। यहां हरियाणा की कृषि में एक टर्निंग प्वाईंट आया – टै्रक्टरों का आगमन और बैलों की विदाई। फसलों की बम्पर पैदावार होने लगी। परम्परागत सिंचाई के साधनों की जगह अब कृषि भूमिगत जल पर आधारित थी। सो सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने पर तीन-तीन फसलें ली जाने लगी। एकबारगी लगा कि किसान का जीवन सम्पन्न हो गया। कच्चे घरों की जगह पक्के मकान, मोटरसाईकिल, फ्रिज, टेलीविजन, कृषि उपकरण गांवों के किसानों के घर की शोभा बढ़ाने लगे। यह दौर 1990 केे दशक तक बरकरार रहा और हरियाणा नेेे कृषि विकास के अनेक नये कीर्तिमान में स्थापित किये। हरियाणा देश ही नही विदेशों में एक चर्चित राज्य बन गया।

इसके बाद नब्बे का दशक बीतते-बीतते इस विकास में ठहराव दिखाई देने लगा। इसका कारण यह है कि हरियाणा में अस्सी प्रतिशत किसानों के पास जोत की जमीन पांच एकड़ या उससे कम है। अब तक ये किसान बैलों पर निर्भर थे तो गुजारा ठीक हो जाता था। मगर उन्होंने भी बड़े जमीदारों की नकल करके ट्रैक्टर खरीद लिये। जिन्होंने टै्रक्टर नही खरीदे वे ट्रैक्टर वालों से किराये पर अपनी जमीनें जुतवाने लगे। इस तरह  खेती करना महंगा होता गया।

विदेशी बीज और विदेशी उर्वरकों ने जमीन की स्वाभाविक उर्वरता को नष्ट करना आरम्भ कर दिया। परिणामस्वरूप फसलों में बीमारी आने लगी। कई बार तो आन्ध्रप्रदेश में कपास, उत्तरप्रदेश में गन्ना और हरियाणा में धान की पूरी की पूरी फसल ही तबाह हो गई। इसका तोड़ ढूूंढने में मोन्सेटो, कारगिल जैसी कम्पनियां सक्रिय हो गई। लेकिन इसकी मार अभी तक बड़े किसानों तक नही पहुंची थी। छोटा किसान ही इस दुश्चक्र का शिकार हुआ था।

तीसरे कालखण्ड में विश्व व्यापार संगठन और डंकल प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करके तत्कालीन सरकारों ने भारतीय किसान व कृषि की कमर तोड़ दी। सरकार ने किसानों को हर चीज के ऋण देना शुरू कर दिया। शायद सरकार को यही एकमात्र समाधान दिखाई दिया। पहले कृषि उपकरणों के लिये कर्ज, फिर बीज के लिये कर्ज, खाद के लिये कर्ज, फिर फसल बचाने के लिये पेस्टीसाईड खरीदने के लिये कर्ज, बैंक की लिमिट खत्म हो जाये तो साहूकार या आढ़ती का कर्ज।  मर खप कर फसल पैदा कर ली तो भाव तय नही। मण्डी में आढ़ती, बनिये, बिचौलों की लूट का शिकार बनते हुए किसान का सफर कई बार सल्फास की गोली या फांसी का फंदे पर लटक कर तय होता है। इस दुष्चक्रमें हरियाणा ही नहीं पूरे देश का किसान फंस गया है। समाधान कुछ दिखाई नही देता। यद्यपि सरकारों ने किसानों के ऋण माफ किये है। मगर किसान को जरा जरा सी बात पर ऋण न लेना पड़े। ऐसी नीति अभी तक नहीं बनी। हरियाणा में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े बढ़ रहे है।

इन तीनों कालखण्ड़ों के घटनाक्रम को देखें तो सवाल उठता है जो हरित क्रान्ति किसान के हित को देखते हुए शुरू की गई थी वह इस तरह असफल क्यों हो गई।

हरित क्रान्ति या कृषि का विकास समय की जरूरत थी। लेकिन इस को लागू करते समय अपने परम्परागत साधनों, कुदरती उर्वरकों एवं सिंचाई के स्रोतों को एकदम दरनिकार किया गया। फलस्वरूप तालाब, जोहड़, छोटी नदियां  उपेक्षित होकर बर्बाद हो गई। इसकी दोहरी चोट खेती किसान पर पड़ी। बोरवेल का खर्चा बढ़ा। भू-जलस्तर गिरता चला गया। मोटरें नीचे जाती गई हर वर्ष बोरवेल में ओर पाईप डालने पड़े जिस पर इतना खर्चा होता है कि पूरी फसल बेचकर भी चुकता नही होता।

ऐसा करना मजबूरी बन गया है क्योंकि परम्परागत साधनों की पूरी तरह बर्बादी के कारण उनके पास कोई विकल्प बचा ही नही। यदि बोरवेलों के साथ अपनी परम्परागत विरासत को भी बचाया जाता तो स्थिति इतनी बदतर नही होती। संतुलित समन्वय बना कर विकास का माडल तैयार किया जाना चाहिए था। हरियाणा के कई क्षेत्र ‘डार्क जोनÓ में आ चुके है।

इस कारण खेती व किसानों की कमर तोडऩे में टै्रक्टरों का भी बहुत योगदान है। टै्रक्टर केे लिये पांच लाख और उसके साथ लगते उपकरणों का भी पांच से छ: लाख लगभग ग्यारह बारह लाख का कर्ज किसान को उम्रभर के लिये बंधुआ बना देता है।

                तीसरा कारण है ऊटपटांग बीज जिन्हें टरमीनेटर कहा जाता है। उन्होंने भी कृषि व किसान की कमर तोडऩे में कोई कसर नही छोड़ी है। इस तरह के बीज हर फसल के लिये खरीदने पड़ते है। किसान अपना बीज तैयार नही कर सकता। बीज की प्रजाति के अनुसार रसायनिक उर्वरक, पानी व पेस्टीसाईड भी अलग से खरीदने को बेबस है किसान। बड़ी-बड़ी कम्पनियां मोटा मुनाफा कूटने के लिए किसान की जेब पर  कैंची चला रही हैं। चाहे वे उर्वरक कम्पनी हो या टै्रक्टर, कृषि उपकरण बनाने वाली कम्पनी हो या पेस्टीसाईड बेचने वाली कम्पनी।

                इस स्थिति से उबरने के लिए ऋण माफी काफी नहीं, बल्कि एक स्थायी नीति बनानी चाहिए जिससे किसान को छोटी-छोटी जरूरतों केे लिए ऋण न लेना पड़े। दलहन व तिलहन की फसलों पर जोर देकर गन्ना व चावल का क्षेत्र सीमित किया जा सकता है। जिससे हमारा भूमिगत जल भण्डार बर्बाद होने से बच सके। बैलों से खेती करने वाले किसानों को प्रोत्साहन के रूप में सब्सिडी दी जानी चाहिए।

                एक बात जिसकी ओर ध्यान देना जरूरी है कि किसान का दो रूपये में बिकने वाला आलू अंकल चिप्स के पास जाकर 200 रूपये किलो क्यों हो जाता है। टमाटर का भाव 125 रूपये किलो क्यों हो जाता है। इस भारी मुनाफे में किसान का हिस्सा तय होना चाहिए। स्वदेशी बीजों को भी वैज्ञानिक विधि से उन्नत करने के प्रयास किये जाये। डा. वंदना शिवा ‘बीज बचाओ अभियान के तहत इसी काम में जुटी हुई है। मूल्य तय करते समय किसान की लागत व मेहनत मिलाकर ही मूल्य तय किया जाना चाहिये। तभी हमारी कृषि भी बचेगी और हमारे किसान भी। इससे केवल हरियाणा का ही नही पूरे राष्ट्र का किसान समृद्ध होगा। कृषि प्रधान देश में कृषि का विकास ही राष्ट्रीय विकास की गारंटी होता है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 25 -26

 

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