बीजो ना इब बाजरी, बीजो हिवड़े आग।
क्रांति फसलां काटस्यां, किस्सा काती लाग।।

राजस्थानी साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने जब यह दोहा लिखा, तब राजस्थान का किसान नई सदी राह पर विरासत में मिले अकाल की परम्परा को जेहन में लिए खड़ा था। राजस्थान का नाम जुबान पर आते ही दूर-दूर तक पसरी धोरां धरती का बिम्ब बनता है। एक मंथर गति से चलता जीवन का सफर जहां अभाव गांव की कांकड़  से लेकर घर देहरी तक पसरा खूब खर्राटे मारता है।

युगों से विपरीत भौगोलिक परिस्थितियां, सदियों से कू्रर राज व्यवस्थाएं और इन सब पर आजादी के बाद अशिक्षा, अज्ञान व रूढि़वादी परम्पराएं। राजस्थान के किसान को विरासत में मिला तो अकाल पर अकाल। तभी तो यहां पर बसने वाले मिनख के लिए कहा जाता है कि लोग अकाल को मुश्किल से तोड़ते हैं, सहन करते हैं, मगर राजस्थानी अकाल को मात देने वाला मिनखा है। तभी तो कवि कहता है-

इण माटी में सो-सो पीढ़ी, मरगी भूखी प्यासी।
भाग भरोसै रैयो बावला, प्रीत अकासी।।
कदे तो पड़ग्यो काल अभागो, गिण-गिण काढय़ो दोरो।
कदे तो ठाकर लाटो लाट्यो, कदे लाटग्यो बोहरो।।
कदे तो बेरी दांवो पड़ग्यो, कदे आपगी रोली।

जीवटता की  मिसाल पूरी दुनिया में राजस्थान के किसान से बड़ी दी नहीं जा सकती। किसान लिखते हैं-

आगै खीचै घोनड़ी, लारै खीचैं डाग।
अेड़ी खींचाताण में, किरसो गावै राग।।

जापै सोई घीवड़ी, परग्योड़ी बीमार।
भीळी पास सूं डाग़ी, एळघट आई हार।।

बिजोलियो आंदोलन के अंगारे सीने में सेंजोए उस किसान ने आजादी से पहले और बाद में समय-समय पर अपने जिंदा व जीवित होने का प्रमाण दिया, मगर सामंतवाद के क्रूर पंजों ने उन्हें हर बार दबोच लिया। बेगू किसान आंदोलन (1921), मारवाड़ कृषक आंदोलन (1923), नीमूयाणा का कृषक आंदोलन (मेव किसान 1925), एकी (भील आंदोलन 1920), बूंदी किसान आंदोलन (1926) इसके पुख्ता प्रमाण हैं। 1946 में बीकानेर का किसान आंदोलन एक टिमटिमाता तारा-सा लगता है।

21वीं सदी की पहली किरण फूटते ही राजस्थान के किसान ने नगरियों की पटराणी जयपुर की कुर्सी पर बैठी सरकार की छाती पर पैर रख ‘किसान एकता जिंदाबाद’ का गगनभेदी उद्घोष किया तो पूरे देश का ध्यान युवक किसान की तनी हुई मुट्ठियों व भृकुटियों पर आ टिका। तब राजस्थान के कवि की कविता जिंदा हो गई कि-

हक द्यो म्हारो हाकना नीं तो लेस्या खोस।
ये देख्यो है रोढय़ो नीं, देख्यो ये रोस।।

नई सदी की शुरुआत राजस्थान के किसान की जागने की वेला कैसे हो गई। इसकी पड़ताल बहुत रोचक है। राजस्थान के सात संभागों में भिन्न-भिन्न कृषि तरीके हैं और भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियां भी। अरावली के इस पार और उस पार को अलग-अलग दृष्टि से भी देखा जा सकता है। बीकानेर, कोटा व शेखावटी संभाग में गत ढाई दशकों में किसान जिस तरह से बिजली, सिंचाई पानी व फसल बीमा पर लामबंद होकर सरकार को झुकाने के लिए विवश किया, वह अद्भुत बात है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि राजस्थान में जहां-जहां वाम धारा के संगठन व लोगों का वर्चस्व रहा, वहीं मध्यम वर्गीय किसान ने आंदोलन लडऩा सीखा। किसानों ने इतनी बड़ी लड़ाईयां लड़ी कि वो भारतीय किसान आंदोलन के लिए एक नजीर बन गई। लाठी, गोली, कफ्र्यू को धत्ता बताता किसान बिना कोई सशक्त नेतृत्व के राजसत्ता को ललकारना सीख गया।

रावला-घड़साना में जब किसान तबाह हो गए। खेती आधारित कल-कारखाने व मंडियां वीरान हो गई, तब किसान, व्यापारी, मजदूर संयुक्त रूप से मैदान में उतरे। जब विदर्भ का किसान निराश होकर मौत को गले लगा रहा था, तब राजस्थान का किसान एक नया संदेश दे रहा था कि आत्महत्या कर मरने की बजाए राज से लड़ते हुए मरना बहादुरी का काम है।

पूर्व विधायक व इस आंदोलन के अगुवा नेता कामरेड हेतराम बैनीवाल से बात की तो उन्होंने बताया कि सिंचाई पानी का ये आंदोलन हिन्दुस्तान के तमाम आंदोलनों से हटकर था। लाखों एकड़ भूमि को सरकार ने बरबाद करने की मंशा बना ली। छोटे-छोटे गांव व बिखरी हुई ढाणियों वाले इस इलाके में गरीब किसानों का बाहुल्य था। कृषि आधारित व्यापार 2004 में भयंकर अकाल से स्थिति और खराब हो गई। पशु धन मर गया तथा कृषि सयंत्र औने-पौने दामों में बेचने पड़े। लोगों ने पलायन शुरू कर दिया। आंदोलन विश्वास और ईमानदारी से बढ़ता ही गया। औरतों, बच्चों व बूढ़ों पर जुल्म ढाए गए। उम्र कैद व फांसी के झूठे मुकद्दमें बनाए गए, मगर तब तक किसान जाग उठे थे। जनता की पीड़ा को खुद की पीड़ा समझ ईमानदारी से कोई लड़ाई लड़े तो उनमें सरकारों को झुकना ही पड़ता है। लोगों को सही व सटीक मुद्दों की जानकारी देने से बिखरे हुए किसान  भी एक हो जाते हैं, होते रहेंगे।

अखिल भारतीय किसान सभा के प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व विधायक पेमाराम से  बातचीत हुई तो उन्होंने यही माना कि राजस्थान के किसान को आजादी से पहले तो बेगारी से ही फुर्सत नहीं थी। आजादी के बाद भी वह हाशिए पर रहा, क्योंकि बड़ी पार्टियों के राज की अदला-बदली में उन्हें धोखा ही दिया जाता रहा। जिन-जिन क्षेत्रों में ढाई दशकों में किसान सभा का वर्चस्व बढ़ा, लोगों ने लामबंद होना सीखा। जयपुर क्षेत्र व शेखावटी का बिजली का किसान आंदोलन एक ऐसी मिसाल है कि किसान को अगर ईमानदारी के साथ कोई बात समझा दे और धोखा न दे तो राजस्थान का किसान मुद्दे की बात जल्दी पकड़ता है और उसका पुरजोर समर्थन भी करता है।

किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरा राम का मानना है कि रजस्थान का किसान जितनी गहरी नींद सोता है, उतना ही सजगता से जगता भी है। यहां ढाई दशकों में किसानी व खेत को बचाने के लिए जिस गति से किसान की समझ विकसित हुई है वह संतोषजनक है। राजस्थान का किसान ऐतिहासिक दमन, शोषण व धोखेधड़ी का शिकार रहा है।  किसान सभा ने गांवों-गांवों में कमेटियां बनाकर उनको सुचारू रूप से संगठित रखने के लिए काम हुआ है। तभी आज बिजली, पानी जैसी बुनियादी सवालों पर सरकार को झुकाने में किसान सक्षम हुए हैं।

किसान आंदोलनों में गत ढाई दशकों से लगे युवा साथियों में बहुत से नाम महत्वपूर्ण हैं। श्री गंगानगर के श्योपत मेघवाल, फसल बीमा की चुरू में लंबी व कानूनी पेचीदगी से भरपूर लड़ाई लडऩे वाले निर्मल प्रजापत व बीकानेर संभाग के हर किसान आंदोलन में प्रमुखता से शिरकत करने वाले बलवान पूनिया की बातों का सार यही निकलता है कि राजस्थान ने नई सदी के किसान आंदोलनों को नई दिशा दी है। राजस्थान के तमाम मजबूत आंदोलन किसान सभा के नेतृत्व में हुए हैं और किसानों ने हजारों व लाखों की संख्या में उपस्थित होकर अपनी एकजुटता प्रदर्शित की है।

राजस्थान में किसान आंदोलन होने के कारण यह भी रहे हैं कि यहां खेती की नई तकनीक आई। जो प्रदेश शुष्क था, उसमें बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाएं आई। जहां पानी नहीं था, वहां पर नलकूप, बांध व तालाब बनाए गए। जोत बड़ी होने व शिक्षा का उल्लास तेज होने के साथ ही किसान की सोच ने भी करवट ली। सरकार की गलत नीतियों के कारण हाडतोड़ मेहनत के बावजूद भी कुछ पल्ले न पडऩे की स्थिति है।

बिना मजबूत राजनैतिक नेतृत्व के लड़ते देख यह बात स्पष्ट हो जाती है कि किसानों पर जोर-जुल्म और ज्यादा बढ़ा है, तभी तो यहां का किसान साधारण नेतृत्व पर बड़ी एकजुटता दिखा रहा है। अगर सरकारें नहीं चेती तो राजस्थान का किसान आंदोलन और तेज होगा। एक बुजुर्ग कवि लिख रहे हैं-

आछो पजातंत्र आयो, म्हनें आवैं हांसी।
बीस आदमी बुल्ला छांगे, अस्सी चढऱ्या फांसी।।
आजादी, गुलामी दोनूं किरसां भांऊ अेकसी।
ईगै तो डील में हरदम, गड़ती रैवे मेख-सी।।

राजस्थान का किसान भले ही भारत के लिए नजीर बन गया हो मगर  दूरदृष्टि रखने वाले लोगों का यह भी मानना है कि अभी वैचारिक स्तर पर किसान नहीं पहुंच पाया है। साथ ही साथ निम्न से निम्न स्तर के किसान, खेतीहर मजदूर अभी इस जन जागृति के दायरे से परे है। एक दोहे में शायद सब आ जाता है-

बदळै म्हीना बरस रूत, पण नी बदळै भाग।
बा ई सागण खोलड़ी, बा ई सागण डाग।।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर 2017, अंक-13), पेज -64

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