कविता



लिख न सका हूं

लिख न सका हूं जोकि चाहता हूं मैं लिखना
बाहर की बातें ही घिर-घर
आ जाती हैं
सहज रोक देती हैं मन के
अंदर के स्वर
शब्द रोक देते भावों को
चित्र रोक देते स्वप्नों को
लेखन रोक चला अपने प्राणों के ही संवेदन को
सहज बाह्य में भटक भूल कर छूट चला जाता
धन मन का।

(अपूर्ण। सम्भावित रचनाकार 1940-42)

 

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