कविता


मैं उनका ही होता

मैं उनका ही होता, जिनमें
मैंने रूप-भाव पाये हैं।
वे मेरे ही हिये  बंधे हैं
जो मर्यादाएं लाये हैं।

मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा
मेरा अंत और अथ मेरा
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।

मैं ऊंचा होता चलता हूं
उनके ओछेपन से गिर-गिर कर
उनके छिछलेपन से खुद-खुद
मैं गहरा होता चलता हूं।

(संभावित रचनाकाल 1940-42। तारसप्तक में प्रकाशित)

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