आजकल युवाओं की किताबों व साहित्य में रूचि कम है, अधिकतर युवाओं का ध्यान सोशल नेटवर्किंग साईटस-फेसबुक, व्हाट्सअप, ट्वीटर, इंस्टाग्राम की तरफ अधिक है। एक सर्वे के दौरान पाया गया है कि अधिकतर युवा अपनी दैनिक दिनचर्या में से लगभग पांच से छह घंटे सोशल नेटवर्किंग साईटस पर बिताते हैं। सोशल मीडिया ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना पैदा कर सकते हैं। सोशल मीडिया एक सरल व सस्ता संसाधन है, जिसके द्वारा अपने विचारों को कुछ ही क्षणों  में संसार के एक कोने से किसी भी कोने में पहुंचा सकते हैं।

आजकल सोशल नेटवर्किंग माहौल खराब करने का काम कर रही है। लोग सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल कर भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर पूरे देश में कश्मीर की रिपोर्ट को इस तरह पेश कर रहे हैं जैसे कि सारे कश्मीर में आपातकाल की स्थिति लागू हो गई है, लेकिन वहां के स्थानीय लोगों से बात करते हैं, तो पता चलता है कि एक-दो इलाकों को छोड़कर बाकी सभी जगह परिस्थिति सामान्य है। ऐसा ही माहौल सहारनपुर का दिखाया जाता है। सोशल नेटवर्किंग पर सोशल पोस्ट कम राजनैतिक प्रचार व साम्प्रदायिक पोस्टों की भरमार दिखाई दे रही है।

लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं और अपनी फोटो डालते हैं और साथ ही किसी शायर की चार पंक्ति डालकर अपने शौर्य का गुणगान करते हैं। साधारणत: उनको उन पंक्तियों के लेखक का नाम भी पता नहीं होगा, लेकिन हजारों लाईक पाकर वह अपने आपको समाज सेवक व समाज सुधारक समझकर अपनी जिम्मेवारी पूरी समझते हैं।

सोशल मीडिया की पहुंच विश्वपटल पर स्थापित है, जिससे हम विभिन्न संस्कृतियों, सभ्यताओं, समाजों व वर्गों का अध्ययन करके, एक बेहतर समाज का निर्माण करने में सहायता कर सकते हैं।

देस हरियाणा पत्रिका के अंक-11 में रंगकर्मी कुलदीप कुणाल की कुछ पंक्तियां पढ़कर बहुत अच्छा लगा, उनके अनुसार- पढऩे-लिखने की आदत ही नहीं है, कोई बहस नहीं है, कोई आलोचना नहीं है, हमें एक-दूसरे की समीक्षा आलोचना पढऩे की आदत ही नहीं है। सोशल नेटवर्किंग फेसबुक पर सिर्फ वर्बल वोमिटिंग हो रही है, जिससे कोई सीरियस बात नहीं होगी, चाहे पचास हजार बात लिख लो, उससे कोई बदलाव आने वाला नहीं है। यह कथन रंगकर्मी कुलदीप कुणाल ने हरियाणा सृजन उत्सव में कहा था, जो आजकल यू-ट्यूब पर बहुत प्रचलित हो रहा है।

मैं देस हरियाणा पत्रिका की नियमित पाठक हूं। जो काम देस हरियाणा पत्रिका हमारे समाज में कर रही है, वह अतुलनीय है। हमें ऐसी पत्रिकाओं को बढ़ावा देना चाहिए। साथ ही इस तरह पांच-दस पत्रिकाएं अवश्य हों, ताकि एक विचारशील माहौल पैदा हो, क्योंकि विचारशीलता ही विकासशीलता की निशानी है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2017, अंक-12), पेज- 64

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