शिक्षा

प्रतियोगिता की दौड़ में जकड़े और अंक हासिल करने के बचपन विरोधी माहौल में एक ऐसा स्कूल जिसमें परीक्षाएं नहीं होंगी, खेल खेल के लिए होंगे, मेल-जोल के लिए होंगे, खुशी के लिए होंगे प्रतियोगिता के लिए नहीं, जहां बच्चों को कड़े अनुशासन के डरावने साये से दूर रखा जाएगा, जहां बच्चे अपनी घरेलू भाषा में भी बात कर सकेंगे, जहां स्कूल के निर्णयों में बच्चे भी शामिल होंगे, जहां पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ सीखने पर जोर दिया जाएगा, इस तरह का स्कूल एक ऐसा सुनहरा सपना है, जिसे देखते तो सभी है किंतु उसकी हिमायत कोई कोई ही कर पाता है। ऐसे में उमंग जैसे स्कूल का सपना देखना साहस की बात है।

उमंग एक ऐसा स्कूल जहां बच्चों के चेहरों पर खुशी रहती है

जब उमंग स्कूल (गन्नोर, हरियाणा) की शुरूआत हुई तो मुझे इस बात की सबसे ज्यादा खुशी थी कि स्कूल के बच्चों में स्कूल में आने को लेकर एक अलग सा उत्साह था, बच्चों को ये रहता था कि कब सुबह हो, कब आठ बजे और कब हम इस अनोखे स्कूल की भयमुक्त दुनिया में प्रवेश करें। शुरूआती दिनों में ज्यादा अचरज तब होता था जब ज्यादातर बच्चे छुट्टी होने के बावजूद घर नहीं जाना चाहते थे। मुझे याद है पिछले साल अप्रैल के महीने में अक्सर बच्चे हमसे कहते भईया प्लीज कंचन जी से कहिये ना कि वो ऑटो वाले को एक घंटा लेट आने के लिए कहे । मतलब ढाई बजे स्कूल की छोटी होती और ऑटो वाला साथी भी ठीक टाईम पर आश्रम के द्वार पर पहुंच जाता लेकिन बच्चे चाहते थे कि वे साढ़े तीन बजे तक स्कूल में रहें।

Umang-5

 

मैं बचपन से यही सुनता आया था कि बच्चों को स्कूल की एक ही घंटी सबसे प्यारी लगती है और वो होती है पूरी छुट्टी वाली घंटी, जब बच्चे दौड़ लगाते हुए पूरी स्पीड से स्कूल के गेट से बाहर भागते हैं। लेकिन उमंग स्कूल में जब बच्चों को स्कूल से ना जाने की जिद्द करते हुए पाया तो दिल को तसल्ली सी हुई कि हां हम एक हद तक बच्चों के मन से स्कूल के प्रति डर दूर कर पाने में कुछ कामयाब हुए हैं।

शुरूआती दिनों में एक अलग सी बात ये भी हुई कि बच्चे स्कूल तो आ जाते थे लेकिन बस पढऩा नहीं चाहते थे। वे कुछ भी करें बस पढ़ाई नहीं।  कुछ लड़कियां तो बस सारा दिन अपने टीचर का हाथ पकड़े पकड़े घूमना चाहती थी, घूमती थी। कुछ खेलना चाहती थी, कुछ लड़कियां जी भर कर डांस कर लेना चाहती थी और पहली कक्षा की पूर्णिमा का तो बस एक ही काम था कि स्कूल आते ही जामुन के पेड़ पर चढ़ जाना और फिर उतरने का नाम ना लेना। टीचर और दूसरे बच्चे उससे नीचे आने की मिन्नतें करते रहते लेकिन पूर्णिमा का जब मन करता तब नीचे आती। वहीं कुछ बच्चों ने स्कूल के पहले महीने में खूब सारे कागज रंगीन किए, एक से एक बढिय़ा ड्राईंग बच्चे बनाते और अपने टीचर को दिखाते। उन्हें इसी बात की बहुत खुशी थी कि उनके बनाए हुए चित्रों में किसी ने कोई कमी नहीं निकाली बल्कि इसके बदले उन्हें खूब शाबाशी मिलती और चित्र की हमेशा प्रंशसा ही होती, इससे उन्हें ओर ज्यादा ड्राईंग बनाने का प्रोत्साहन भी मिलता। बच्चों को तब और भी ज्यादा खुशी मिलती जब उनके बनाए चित्रों को स्कूल के नोटिस बोर्डों पर लगा दिया जाता, तो बच्चे अक्सर अपने ही बनाए चित्रों को देर तक देखते रहते।

22554730_1330676190374521_2631270207663618741_n

मुझे धीरे धीरे ये सब समझ आने लगा था कि क्यों बच्चे सारा दिन अपने टीचर का हाथ पकड़े उनके साथ घूमना चाहते है? क्यों सारा दिन उन्हें छूना या उन्हें आलिंगन करना चाहते है या फिर डांस, ड्रार्इंग, खेल कूद के प्रति उनका इतना लगाव क्यूं था। बच्चे अपने मन की सब कर लेना चाहते थे। इन सवालों के जवाब मुझे तब मिले जब स्कूल के दूसरे महीने बच्चों ने कक्षाओं में ज्यादा देर के लिए बैठना शुरू किया। बच्चों और अध्यापकों में बैठ कर खूब सारी बातें होने लगी, घर की बाहर की, पुराने स्कूल की।

बच्चों ने अपने नए स्कूल की तुलना अपने पुराने स्कूलों से करनी शुरू की और जब बच्चों ने अपने पुराने स्कूल के और अध्यापकों के बारे में अपने अनुभव सांझा करना शुरू किए तो कुछ बच्चों के अनुभव सुन कर तो रोंगटे खड़े हो जाते थे कि जिन स्कूलों में ये पढ़ कर आए है, वहां इनके साथ किस तरह का बर्ताव होता था।

जहां टीचर बच्चों को हमेशा छड़ी से ही छूना जानते थे या फिर बच्चों ने अपने टीचर के स्पर्श का एहसास अपने गालों पर तमाचों, चांटों के रुप में ही किया था या टीचर उन्हें तभी छूते थे जब उनके कान उमेठने होते थे या सबक सिखाने के लिए कनपटी के बाल खींचने होते थे। टीचर मतलब डर…, अनुशासन मतलब डंडा.., सवाल पूछना मतलब आफत मोल लेना।

ऐसे में बच्चों को अगर एक ऐसा स्कूल मिले, जहां टीचर को दोस्त की तरह छूआ जा सकता है, जहां टीचर का प्यार  मिलता हो

बच्चों को उमंग स्कूल में अपने टीचर के साथ मस्ती करते हुए देखता था तो हमेशा अपने स्कूल की याद आती। उन सभी टीचरों की याद आती, जो अक्सर बिना बात के ही हमें मारते थे। टीचर का रौब और दबदबा बच्चों पर बना रहे बस लिए ही मारते थे। कुछ टीचर तो हमें सिर्फ इसलिए भी मारते थे, कि हमारे कपड़े अच्छे नहीं थे,  हमारी जाति अच्छी नहीं थी, हमारी शक्लें अच्छी नहीं थी। तब लगता कि काश हमें भी उमंग जैसा स्कूल मिला होता, काश कि हमें भी ऐसे ही प्यार करने वाले टीचर मिले होते।

बच्चों को पुराने स्कूलों में शायद कभी अपने मन का कुछ नहीं करने दिया गया होगा। इसलिए उमंग के माहौल में आजादी का अहसास होते ही बच्चों ने वो सब कुछ कर लेना चाहा, जो अभी तक वो नहीं कर पाए थे।

मुझे जब वक्त मिलता तो मैं बच्चों के पास बैठ जाता उनके पुराने स्कूलों के किस्से कहानियां सुनता। मजेदार बात ये होती कि एक तो सब बच्चे उचक-उचक कर अपनी बात कहने को आतुर होते थे और दूसरा मजेदार मामला ये कि जब कोई लडक़ी अपनी पिटाई की कोई घटना या तरीका बता रही होती थी तभी किसी दूसरे स्कूल में पढ़ी हुई लडकी भी उसकी बात में शामिल हो जाती। उनके स्कूल भले ही अलग अलग थे पर पिटने के अनुभव लगभग एक जैसे ही होते थे। मेरे लिए मुश्किल तब होती जब लड़कियां ये घटनाएं सुना रही होती थी तो मेरी हालत  होती कि शायद अब आंख से आंसू टपक पड़ें और ये लड़कियां हंसते हंसते खूब ठहाके लगाती हुई सब बात कह जाती थी।

चिटियां कलाइयां वे ..

उमंग स्कूल में जब धीरे धीरे दिन बीतने लगे तो घटनाएं और घटनाक्रम भी बदलने लगे….

उन दिनों एक फिल्मी गाना चिटियां कलाइयां वे.. बड़े जोर शोर से चारों तरफ बजता था। हमारे स्कूल में भी बजने लगा और लड़कियां साऊंड सिस्टम चला कर इस पर अक्सर डांस करती थी। गाने तो ओर भी बहुत से थे जिन पर बच्चे डांस करते थे लेकिन इस गाने को लेकर एक दिन स्कूल में अज़ीब सी घटना हुई। स्कूल के हॉल में ये गाना चल रहा था और कुछ लड़कियां इस पर पूरी मस्ती से डांस कर रही थी। तभी एक टीचर ने देखा कि कुछ लड़कियां अलग सी खड़ी है और उनके चेहरे के भाव कुछ अलग से हैं। टीचर को ये भी पता था कि ये लड़कियां भी अच्छा डांस करती हैं लेकिन आज मामला कुछ गड़बड़ है। टीचर ने जा कर उनसे पूछा कि तुम क्यों नहीं डांस कर रही हो …? तो जो जवाब उन लड़कियों ने दिया वो हम सब को चिंतित करने वाला था। लड़कियों ने कहा कि हम नी इस गाने पे डांस करती…, हमारी कलाइयां कहां है चिटियां..? हम तो काली हैँ.. और फिर उन्होंने अपनी कलाइयां टीचर के सामने फैला दी।

26113856_1981015515248730_821657852153455848_n

असल में वो लड़कियां सांवले रंग की थी और जो लड़कियां डांस कर रही थी उनका रंग उनके मुकाबले थोड़ा गोरा था। शायद उनके बीच इस फर्क को लेकर कुछ कहा सुनी हुई हो जिसके चलते ये चिट्टी कलाई और संवाली कलाई वालों के दो ग्रुप बन गए है। टीचर ने इस बात को नजऱअंदाज नहीं किया और अपने अन्य अध्यापक साथियों से इस बारे में बात की। तो जी बाद में पता चला कि हमारे बच्चों में वो सभी गलत समझदारियां थी जो इस समाज में हैं। बच्चे सिर्फ स्किन कलर या गोरे काले का ही भेद नहीं करते थे बल्कि जाति और धर्म के आधार पर भी एक दूसरे पर ताने कस देते थे। हालांकि उमंग में ज्यादातर बच्चे सामान्य गरीब परिवारों से ही आते थे, तब भी जिन परिवारों की लड़कियां बाल संवार कर, चोटी वगैरह सलीके से करके आती थी उनमें अनसुलझे बालों वाली लड़कियों के प्रति ज्यादा अपनापन नजर नहीं आता था। उमंग स्कूल के अध्यापकों ने इस विषय पर बात की और तय किया कि अब समय है कि हम इन विषयों पर बच्चों से बात करें। लेकिन सीधे-सीधे इन्हीं मुद्दों को उठाऐंगे तो वो कोरा भाषणबाजी जैसा ही लगेगा इसलिए कुछ खास तरीके से इस पर काम करने की योजना बनाई गई।

बच्चों से पहले तो ये पता लगाने की कोशिश की गई कि बच्चे किस तरह से एक दूसरे को जाति, धर्म और रंग भेद के आधार पर तंग करते हैं या फर्क करते हैं। तो पता चला जी कि लड़कियां धर्म के आधार पर एक दूसरे को कुछ कुछ बोल देती थी, जाति के आधार पर लड़कियों के ग्रुप बन गए थे, थोड़ा साफ से कपड़े पहनने वाली लड़कियों ने अलग से अपना एक ग्रुप बना लिया था। वहीं ढकौत समुदाय से आने वाली लड़कियां ज्यादातर अपने मुहल्ले की लड़कियों के साथ ही खेलती थी और खाना खाती थी। ये भी पता चला कि ऑटो में आने वाली लड़कियों ने कौन कहां बैठेगा इसके आधार पर भी जाति आधारित ग्रुप से बना लिए थे। हालांकि ये सभी घटनाएं स्वाभाविक ही थी लेकिन ये भी यहां कहना जरूरी है कि ये बहुत शुरूआती स्तर पर देखने सुनने को मिली, कभी किसी लडक़ी ने मुखर तरीके से किसी को कुछ गलत कहा हो या कोई बड़ा हंगामा हुआ हो, ऐसी घटना हमारे सामने नहीं आई। लेकिन अध्यापकों की राय थी कि हमें हमारे बच्चों को इन सामाजिक कुरीतियों से बचाना चाहिए और इसे गंभीरता से लेते हुए इन बुरे सामाजिक प्रभावों को कम करने के प्रयास करने चाहिए।

तय किया गया कि इस विषय पर बच्चों के साथ कुछ वर्कशॉप की जाएगी या कहें कि कुछ थियेटर एक्टिविटी के जरीये इन विषयों पर बच्चों की समझदारी बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

हमने एक दिन उमंग स्कूल में वर्कशॉप रखी। हम सब एक कमरे में बैठे गए (इसमें सात साल से छोटे बच्चे शामिल नहीं थे) हमने बिना किसी खास विषय पर केंद्रित किए बच्चों से बातचीत शुरू की और उनसे सवाल किए कि उन्हें अपने आस-पास के माहौल में क्या-क्या बुरा लगता है। फिर बातचीत को बंद करके हम एक खेल खेलने लगे। हमारी इस खेल का नाम था पावर गेम।

खेल कुछ यूं था कि हमने दो दो लड़कियों के ग्रुप बना दिए (इस खेल में सभी टीचर भी शामिल थे)। ग्रुप बनाने के बाद गु्रप में शामिल दो लड़कियों में से एक को ए और दूसरे को बी बना दिया गया। अब करना ये था कि ए अपने हाथ की हथेली को बी के सामने करेगा और बी अपने दोनों हाथ पीछे बांधे हुए अपना चेहरा ए की हथेली से लगभग एक फुट की दूरी पर रखेगा। मगर शर्त ये थी कि जहां जहां ए की हथेली जाएगी बी को अपना चेहरा उसके सामने एक फुट की दूरी पर ही रखना ही पड़ेगा। हुआ ये कि धीरे धीरे बच्चे इस गेम में मजे करने लगे। लेकिन धीरे-धीरे खेल और ज्यादा मुश्किल होने लगा और ए ने बी को तंग करना शुरू कर दिया। यानी ए बी के मजे लेने लगा और उसे अपनी हथेली के इशारों पर नचाने लगा। जब ए ने बी को खूब तंग कर लिया तो हमने गेम को बंद किया और फिर दोनों के काम एक दूसरे से बदल दिए। मतलब अब बी की हथेली थी और ए का चेहरा। तो अब बी ने ए से अपना पूरा बदला लिया और उसे उतना ही तंग किया।

जब बच्चे पूरी तरह से खेल का आंनद ले रहे थे तो अचानक हमने बोलना शुरू किया कि ये इस दुनिया का, हमारे समाज का पावर गेम है। जिसके पास पावर है वो दूसरे को ठीक इसी तरह नचाता है, जैसे अब हथेली वाली लडक़ी चेहरे वाली लडक़ी को नचा रही है। खेल के दौरान ही हमने बच्चों से सवाल किया कि उन्हें ये पावर गेम अपने घर में, मुहल्ले में, स्कूल में, समाज में, दुनिया में कहां कहां नजर आती है..?

अब खेल बंद किया जा चुका था सब अपनी-अपनी जगह बैठ गए थे और चेहरों पर एक अजीब सी उदासी छा गई थी। फिर धीरे धीरे बच्चों ने बोलना शुरू किया। एक लडक़ी ने बताया कि मेरे पापा सारा दिन शराब पीते है और शाम को आकर मां को पीटते है, हम बच्चों को भी पीटते है। दूसरी लडक़ी ने कहा कि लडक़ा-लडक़ी होने पर भी पावर का इस्तेमाल किया जाता है। घर में मैं सबसे छोटी हूं और मेरा भाई बड़ा है। वो सारा दिन घर के बाहर रहता है, खेलता है और घर का कोई काम नहीं करता। जबकि मैं घर का सारा काम करती हूं झाडू-पोंचा, बर्तन, कपड़े सब करती हूं लेकिन मुझे मेरी मर्जी से कभी बाहर नहीं जाने दिया जाता। मैं अपनी मर्जी से गली में नहीं खेल सकती। और भाई जब चाहे किसी भी बात पर मुझे मार देता है, पापा भी मारते हैं। मैं उनको खाना डाल के ना दूं तो मारते हैं, उनके सामने से झूठे बर्तन ना उठाऊं तो मारते हैं और अगर स्कूल से लेट हो जाऊं तो भी पिटाई हो जाती है। जो लडक़ी ये सब बता रही थी, उसकी आंखों में ये सारे सवाल भी थे कि ऐसा क्यूं होता है, मैं लडक़ी हूं और मेरी मां भी लडक़ी है तो इसमें ऐसा क्या है कि सब काम हमें ही करने पड़ते है और भाई पापा बिना कुछ किए भी हम पर अपनी पावर का इस्तेमाल करते हैं। फिर उसने थोड़ा अटक कर कहा कि वैसे पावर का इस्तेमाल तो मेरे पापा पर भी होता है, मेरे ताऊ जी कभी भी मेरे पापा को पीट देते है। हालांकि बोल एक लडक़ी रही थी किंतु ये सवाल वहां मौजूद सभी लडकियों के थे।

इसके बाद तो जैसे सब बच्चे अपनी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे कि कब उनकी बारी आए और वो अपनी बात बोले। धीरे-धीरे लड़कियों ने घर के बाद अपने मोहल्ले में पावर गेम को दिखाया और कुछ लड़कियां ने तो जींस ना पहनने देना, ज्यादा ना पढ़ाना, जल्दी शादी कर देने जैसे मुद्दों का का पावर गेम भी समझाने का प्रयास किया।

हमने कुछ देर बातचीत का सिलसिला जारी रखा और फिर एक दो छोटी-छोटी गेम के बाद एक नई गेम शुरू की। हमने सभी लड़कियों को एक-एक नींबू दे दिए, जो पहले से मंगवा लिए थे और कहा कि इस नींबू पर कोई भी एक ऐसा निशान बनाओ, अलग सा कि अगर इन सभी नींबुओ को मिला भी दिया जाए, सभी को एक साथ किसी टोकरी में रख दिया जाए तो तुम अपना नींबू झट से पहचान लो। लड़कियों के चेहरों पर अगले ही पल एक अजीब सी खुशी और आत्मश्विास था कि हम झट से अपना नींबू पहचान लेंगी।

चलो स्टार्ट….,

बस हमने इतना भर कहा और सभी लड़किया अपने नींबू पर निशान बनाने में जुट गई। सभी कुछ ना कुछ अलग सा बना देना चाहती थी। बीच बीच में वे ये भी देख लेती कि मेरे जैसे निशान कोई ओर तो नहीं बना रहा है। कुछ लड़कियों ने पैन से, कुछ ने स्कैच से कुछ कुछ लिख दिया। एक दो ने तो नींबू के उपरी भाग को खुरच कर कुछ कलाकारी भी कर दी थी। जब सबने अपने निशान बना दिए तो उन्हें इस बात का पूरा यकीन था कि वे तो अपना नींबू पहचान ही लेंगी। हमने एक टोकरी में सारे नींबू इकट्टे किए और कुछ देर के लिए बाहर भिजवा दिए।

इसके बाद भी कुछ कुछ बातें चलती रही। जब पांच मिनट हो गए तो बच्चों ने कह ही दिया कि भईया नींबू मंगवाओ भी अब। उनकी उत्सुकता को देखते हुए  कुछ देर बाद हमने नींबुओं की टोकरी म��गवा ली। अभी नींबुओं वाली टोकरी एक टीचर के सिर पर ही थी कि बच्चे जल्द से जल्द उसे देख लेना चाहते थे और अपना नींबू सबसे पहले पहचान कर उठा लेने के लिए आतुर थे। लेकिन उन्हें कह दिया गया था कि टोकरी तभी नीचे रखी जाएगी जब सब शांत हो कर एक दायरे में बैठ जायेंगे और पहले वही लडक़ी आएगी, जिसे बुलाया जाएगा, सभी के द्वारा एक साथ नींबू छूने पर पाबंदी लगा दी गई।

अब जब टोकरी गोल दायरे में सब के बीच रखी गई तो सब लड़कियों के चेहरे देखने वाले थे। सभी के चेहरों पर हैरानी के भाव आ जा रहे थे। बच्चे हैरान थे क्योंकि उन सभी नींबुओं का छिलका या कहें कि ऊपरी परत, जिस पर बच्चों ने अपने निशान बनाए थे उसे उतारा जा चुका था। अभी उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यूं किया गया। सभी सोच रही थीं कि अब हम कैसे पहचानें कि मेरा नींबू कौन सा था। अब तो ये सभी एक जैसे से ही दिख रहे हैं।

तभी उनसे कहा गया कि अपनी आंखें बंद करें और सोचे कि जिन आधारों पर हम अक्सर एक दूसरे से भेदभाव करते हैं क्या वो मात्र ऊपरी निशान नहीं है। अलग जातियां, धर्म, गोरा, काला, अमीर, गरीब आदि आदि, जिन भी कारणों से हम एक दूसरे से सामान्य व्यवहार नहीं करते, क्या ये सब ऊपरी मामला नहीं है और अंदर से हम सब एक जैसे ही हैं, जैसे ये नींबू है अभी हमारे सामने, जिन पर अलग-अलग पहचान के लिए निशान बना दिए गए थे हमारे द्वारा। क्या ये जात-मजहब के निशान भी सभी बाहरी निशान नहीं है जो हमारे समाज में लोगों ने ही बना दिए है इंसानों पर और क्या हमें इनके आधार पर एक दूसरे से भेदभाव करना चाहिए…? क्या ये सही…? क्या ये सही है कि हम किसी के साथ सिर्फ इसलिए ना खेलें कि वो किसी दूसरे धर्म को मानने वाले परिवार में पैदा हुई है या किसी के साथ हम इसलिए खाना नहीं खाते कि इस समाज में उसकी जाति को हमारी जाति से छोटा माना जाता है। अच्छा ये बताएं कि क्या हम या कोई भी ये तय कर सकता है कि वो किस धर्म या जाति में पैदा होगा, या उसकी चमड़ी का रंग गोरा होगा या काला …? इसी तरह के ओर भी बहुत से सवाल लगातार बातचीत का हिस्सा बनते गए।

अब लड़कियों के बोलने की बारी थी। कुछ देर कमरे में खामोशी छाई रही। फिर गोल दायरे में एक एक लडकी खड़ी हुई और बोली कि मुझे कुछ बोलना है।  वो खड़ी हुई और अपनी उंंगली से एक लडक़ी की तरफ इशारा करते हुए बोली कि मैंने एक दिन उसे –ऐ काली सी– बोला था…मैं उससे माफी मांगना चाहती हूंं। उसकी आंखें नम थी, आंसू बस छलकने ही वाले थे। तभी वो दूसरी लडक़ी भी खड़ी हो गई और दोनों  एक दूसरे के पास गई, कुछ पल भर के लिए दोनों ने बिना बोले एक दूसरे को देखा और फिर दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया…मैं सच कहूं तो मेरे लिए ये नजारा अद्भूत था, एक ऐसा पल था जब मैं उमंग के प्रयासों को सफल होते हुए देख रहा था।

22687523_1330676033707870_6947892005959867606_n

मैं इस घटना को उमंग स्कूल के नारे – शिक्षा एक बेहतर समाज के लिए – से जोडकऱ देख पा रहा था। साथ ही ये भी जेहन में आ रहा था कि कैसे शहर के बड़े-बड़े स्कूलों में नंबरों की दौड़ में बच्चों को इन अद्भुत मानवीय नजारों से महरूम रखा जाता है। स्कूल चलाने वाले क्यूं नहीं समझते कि बच्चों में ये समझदारियां विकसित करना भी शिक्षा का अहम हिस्सा है।

खैर..कमरे का माहौल एक दम शांत था। लड़कियां गुमसुम सी बैठी थी कि तभी एक अन्य लडकी खड़ी हुई और उसने एक  लडकी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि मैं इसे कई बार मुसल्ली कहती थी, जो गलत है? मुस्लिम लडक़ी के चेहरे पर एक मुस्कान उभर आई। …और फिर वही हुआ जिसकी हमें उम्मीद थी यानी दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया …। उसके बाद अपनी अपनी गलतियां बताने, गले लगने, खेद प्रकट करने का ये दौर कुछ देर तक यूं ही चलता रहा। हालांकि कुछ ऐसी लड़कियां भी थी, जिन्होंने किसी को जाति के आधार पर अपने साथ खेलने से मना कर दिया था, लेकिन अभी वे अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी और उन्होंने ना तो अपनी बात बताई और ना ही उन लड़कियों को गले लगाने या माफी-वाफी का कोई सीन किया। हमने बच्चों के इस भाईचारे में ना ही कोई अपना सुझाव दिया और ना ही उन्हें कुछ करने से रोका या कुछ करने के लिए कहा। फिर हमने इस पूरे खेल को एक फिल्मी गीत के साथ खत्म किया, जो गीत हम सब अक्सर स्कूल में गाते थे।

कहती हैं ये वादियां, बदलेगा मौसम..
ना कोई परवाह है, खुशियां हो या गम…
आंधियों से खेलेंगे, दर्द सारे झेलेंगे…
यूं ही कट जाएगा सफर साथ चलने से….
के मंजिल आएगी नजर साथ चलने से…

इस वर्कशॉप के बाद स्कूल का माहौल हमें बदला बदला सा नजर आया…अब खेलने वालों का ग्रुप बड़ा बनने लगा था…खाना खाने के लिए एक-दूसरे का आमंत्रित किया जाने लगा था …।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज- 64-67

 

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.