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[डॉ0 ब्रह्मदत्त (वरिष्ठ प्राध्यापक, इतिहास)का यह लेख विचारोत्तेजक है। इसकी स्थापनायें कुछ लोगों के लिए विवादास्पद भी हेा सकती हैं। हरियाणा की साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका जतन में प्रथम बार मई 1984 में प्रकाशित लेख की मूल प्रति। इस लेख पर पाठकों के विचारों, टीका-टिप्पणियों का स्वागत है -सम्पादक]

बुद्धिजीवी किसे कहें अथवा किसे न कहें—इस बारे में केवल किताबी बहस में उलझने या कोरी सैद्धान्तिक कसरत करने से ज्यादा जरूरी है कि समाज के एक चेतन तबके के तौर पर मौजूदा दौर में बुद्धिजीवी की वास्तविक और सही भूमिका क्या है इसे रेखांकित किया जाय।

अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध आजादी के संघर्षों के दौरान उठी वैचारिक नवजागरण की लहर ने आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवियों के एक बड़े तबके को जन्म दिया। ज्यों-ज्यों आजाादी की लड़ाई तेज होती गई त्यों-त्यों इस वैचारिक जागरण में भी तेजी आई और बुद्धिजीवी तबकों की वैचारिक प्रखरता और उनकी सामाजिक परिवर्तन में भूमिका भी इसके साथ विकसित हुई। वकील, अध्यापक, विद्यार्थी, डॉक्टर, कलाकार और लेखक सभी अपने समय के इस मूल संघर्ष से बड़ी तादाद में जुड़े। जात-पात, परदा, बाल-विवाह, सतीप्रथा, बेमेल विवाह और दूसरी कई कट्टर रूढ़ियों व अन्धविश्वासों के खिलाफ जन-चेतना जगाने का जबरदस्त वैचारिक संघर्ष इन बुद्धिजीवियों ने किया। ज्ञान-विज्ञान, तर्क, विवेक, समानता, स्वतंत्रता, जनतंत्र की साख जमी, कूपमण्डूकता व तुच्छ व्यक्तिवाद के ऊपर मानवतावाद और समाजहित के आदर्शों की विजय हुई।

लेकिन राजनैतिक आजादी मिलने के बाद कुछ ही वर्षों में पुराने और नये, प्रतिगामी व प्रगतिशील, बीमार और स्वस्थ मूल्यों का यह संघर्ष शिथिल होता दिखाई दिया और आजादी से पहले की इस विकासशील परम्परा को जड़-मूल से हीन करने की कोशिशें होने लगीं। मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी समाज और उसके संघर्षों से कट गये और अपनी स्वतंत्र दुनिया बनाने लगे। सुविधायें, दौलत, निजीहित की होड़ और दौड़ में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। दुनिया जाये भाड़ मेंं और खाओ -पिओ-मौज करों के उपभोक्तावादी आदर्श उनके आदर्श बने। उन्होंने पुराने और नये के बीच एक ऐसा अवसरवादी सन्तुलन बनाया और एक ऐसी मूल्यहीन बीमार उपभोक्तावादी संस्कृति को जन्म दिया जिसमें कूपमण्डूकता, अधिकारवाद, निरंकुशता, जड़ता, ऊंच-नीच, भाग्यवाद और जात-पात जैसे पुराने कीटाणु भी मजे से जिन्दा रह सकते थे। पिछले 37 सालों में ये तमाम बीमारियां इतना संक्रामक और उग्र रूप ले चुकी हैं कि आज जिन तबकों को हम बुद्धिजीवी के नाम से जानते हैं वे भी इनकी चपेट में हैं। बुद्धिजीवी एक मूल्यहीन, विचारहीन, अवसरवादी अैर आत्मग्रस्त जिन्दगी की गिरफ़्त में रहते हुए बुद्धिजीवी नहीं बना रह सकता। अपनी वास्तविक भूमिका से वह बिल्कुल कट जायेगा और उसकी बुद्धिजीवी उपाधि खुद उसके लिए हास्यास्पद बन जायेगी। हम इस लेख में उसी वास्तविक भूमिका को रेखंकित करना चाहते हैं और उन गुणों की ओर संकेत करना चाहते हैं जिन्हें अर्जित करके वह इस संकटग्रस्त समाज के गतिरोध को तोड़ने में महत्वपूर्ण भागीदारी कर सकता है। पिछले 15-20 वर्षों से बुद्धिजीवियों के बीच यह जागृति कमोवेश पैदा हुई है। इसी सिलसिले को हमें आगे बढ़ाना है। पिछले दिनों हरियाणा के सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य पर “प्रयास” में जो बहस चलती रही है उसमें भी यह चिन्ता बार-बार व्यक्त हुई है। इस बहस के क्रम से प्रयास-5 में श्री आर0पी0 राना ने सीधे-सीधे यह सवाल उठाया है कि कौन-सा बुद्धिजीवी इस बीमार संस्कृति को स्वस्थ बनाने का काम कर सकता है। इसी सवाल से जूझते हुए मैंने यह निष्कर्ष निकाला कि इस बीमार संस्कृति से लड़ने और रोगग्रस्त समाज-व्यवस्था को बदलने के लिए पहले बुद्धिजीवी को अपने भीतर की बीमारियों से लड़कर कुछ गुणों को हासिल करना होगा। आज के वक्त में जो बुद्धिजीवी नामधारी इन गुणों को हांसिल करने का संघर्ष नहीं करता उसे ठीक-ठीक अर्थों में बुद्धिजीवी नहीं कहा जा सकता। वह शासक वर्गों का दुमछल्ला और उनकी बीमर संस्कृति की रक्षा करने वाला पहरेदार तो बन सकता है, समाज की प्रगति और विकास में उसकी शायद ही कोई भूमिका हो।

बुद्धिजीवी कौन है?

आमतौर पर वे लोग जो बौद्धिक कार्य करते हैं या बुद्धि का इस्तेमाल से अपनी आजीविका चलाते हैं बुद्धिजीवी कहलाते हैं, परन्तु यह इसका शाब्दिक अर्थ ही कहा जा सकता है। मेरे खयाल से बौद्धिक कार्य के साथ-साथ अमल और व्यवहार से जुड़े लोगों के विचार कोरे कागजी पहलवानों से ज्यादा स्पष्ट, सही और गहरे हुआ करते हैं। इसी तरह यह भी कहना गलत है कि केवल असाधारण प्रतिभा रखने वाले व्यक्ति या केवल ऊंची-ऊंची डिगि्रयां, तमगे और उपाधियां रखने वाले व्यक्ति ही बुद्धिजीवी होते हैं। कबीर, नानक, रैदास जैसे लोग लगभग निरक्षर होने के बावजूद चिन्तन में काफी आगे बढ़े हुए लोग थे। यों तो अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ, कवि, कलाकार, वास्तुकार, योजनाकार, चिन्तक, दार्शनिक, समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, पत्रकार, शिक्षाविद् आदि बुद्धिजीवियों में गिने जाते हैं। ये शिक्षित समुदाय के विभिन्न तबके सामाजिक चेतना के गढ़ने में एक अहम् भूमिका निभाते हैं, यह ठीक है। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उक्त पेशों से जुड़ा हर व्यक्ति एक बुद्धिजीवी की वास्तविक भूमिका का निर्वाह अनिवार्यतः कर ही रहा है। बहुत संभव है कि वह सामाजिक चेतना और चिन्तन को आगे बढ़ाने की जगह पीछे ले जा रहा हो। बौद्धिक जड़ता पर चोट करने की जगह उसकी हिफाजत कर रहा हो, उसका औचित्य सिद्ध करने की कोशिश में हो और इससे भी बड़ी सम्भावना हो सकती है कि वह अपने काम के बौद्धिक पक्ष की नितान्त उपेक्षा करते हुए सिर्फ इसे रोजी-रोटी, सुख-सुविधा और धन-संपत्ति जुगाड़ने का जरिया समझता हो।

विचारशीलता और वास्तुनिष्ठता

सिर्फ अपना पेट भरने की और सुख-सुविधाएं जुगाड़ने की दौड़ में लगे विचारशून्य लोग वे चाहे किसी बौद्धिक पेशे से ही जुड़े क्यों न हों, बुद्धिजीवी नहीं कहे जा सकते। विचारों के उत्पादन में, विचारों के संघर्ष में और चिन्तन के विकास में इनकी भूमिका न के बराबर होती है। इसलिए विचारशील होना बुद्धिजीवी होने की न्यूनतम शर्त है। उसके मन में विचार-प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। पढ़ने लिखने, सोचने-विचारने और परस्पर विचार-विमर्श करने से उसका बराबर रिश्ता बना रहता है। उसके पास समय फालतू पड़ा नहीं रहता और वह जरूरत से ज्यादा आरामपरस्त नहीं हो सकता। वह समाज से कटा हुआ और अपने समय से ऊपर रहने वाला कोई फक्कड़ या मस्त मौला नहीं होता और न ही कोई फकीर, दरवेश या हिमालय की चोटी पर बैठा कोई संन्यासी। वह अपने समय और समाज की जिन्दा-धड़कती हुई और ठोस हकीकतों के बीचोबीच रहने वाला प्रबुद्ध, सचेत, संवेदनशील और जागरूक इंसान है और इसलिए वह पूरी तरह निष्कर्य नहीं हो सकता। समाज के भीतर घटित होने वाली प्रक्रियाओं और महतवपूर्ण घटनाओं की ओर उसकी आंख खुली होती है और उन पर कम से कम बौद्धिक प्रतिक्रिया वह जरूर करता है। वह ऐसा जीव नहीं होता जो कबूतर की तरह बिल्ली को अपनी ओर आते देख यह मानकर आंखें बन्द कर ले कि ऐसा करने से उसे वह दिखाई नहीं देगा या शुतुरमुर्ग की तरफ तूफान को आते देख यह मानकर बालू में गर्दन घुसा ले कि ऐसा करने से तूफान टल जाएगा। इसलिये वह हर महत्वपूर्ण सामाजिक घटना व ऐतिहासिक गतिविधि को तर्कपूर्ण ढंग से समझने की चेष्टा करता है और उनसे निकलने वाले नतीजों के किसी न किसी रूप में समझना चाहता है।

बुद्धिजीवी इसीलिए अज्ञान के अन्धकारपूर्ण आनन्दलोक में अधिक समय तक चैन से नहीं रह सकता। जिज्ञासा, जीवन और जगत के सभी महत्वपूर्ण मसलों को ज्यादा से ज्यादा करीब से, पूरी गहराई में समझने की प्यास उसके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा होती है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि हर व्यक्ति हर विषय का पारंगत हो सकता है और मानवजाति की अब तक की संचित अथाह ज्ञान राशि को आत्मसात करके समान अधिकार से ज्ञान की हर शाखा का विकास कर सकता है। फिर भी एक बुद्धिजीवी ज्यादा से ज्यादा विषयों के प्रति ग्रहणशील होता है और कम से कम अपने कार्यक्षेत्र में अधिकाधिक चीजों को बेहतर और स्पष्ट तौर पर समझना चाहता है। इसलिए वह ऐसा व्यक्ति तो नहीं हो सकता जो किसी भी क्षेत्र में साधारण व्यक्ति (layman) से आगे की समझ न रखता हो। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहीं लिखा था, कि जिस तरह एक दीपक जब तक स्वयं प्रज्वलित नहीं होता तब तक वह दूसरे दियों को प्रकशमान नहीं कर सकता, उसी तरह एक शिक्षक जब तक स्वयं सीखता नहीं रहता, तब तक दूसरों को शिक्षा नहीं दे सकता। बुद्धिजीवी के सन्दर्भ में भी यही सच है।

विस्तृत और आलोचनात्मक दृष्टिकोण

लेकिन अपनी इस भूमिका को ईमानदारी से निभाने के लिए सिर्फ पोथी-पण्डित बनना काफी नहीं। इसके लिए गहरे आत्मसंघर्ष की जरूरत है। सबसे पहली जरूरत अपने उन जड़ संस्कारों से लड़ने की है जो बुद्धिजीवी के सोच के दायरे को, उसके नज़रिये को संकीर्ण, सीमित, एकांगी, खण्डित और आत्मग्रस्त बनाते हैं। एक सच्चे बुद्धिजीवी से ये अपेक्षा की ही जायेगी कि वह विस्तृत दृष्टिकोण (broad outlook) अपनाए। बुद्धिजीवी के व्यक्तित्व से विशाल हृदयता और खुलेपन का भरपूर अहसास मिलना चाहिए। वह कूपमण्डूक नहीं हो सकता। वह इस कदर कट्टरपन्थी या अड़ियल नहीं होता कि बकरी की तीन टांग या वही ढाक के तीन पात करता रहे। वह हमेशा बुद्धि-विवेक और तर्क से चीजों को सोचता-विचारता है। तथ्यों की छानबीन करके सच्चाई तक पहुंचने का और कोई तरीका विश्वसनीय नहीं है यह उसे पता होता है। इसलिए हमेशा हर चीज की ओर उसका रुख खोजपूर्ण होता है। वह एक मसीहा या गद्दीधारी महन्त के दंभपूर्ण आडम्बर से कोसों दूर होता है। वह सर्वज्ञानीं की मुद्रा अपनाकर अपने अज्ञान को छुपाता नहीं है। उसे पता होता है कि निष्कर्ष हमेशा विवेचन-विश्लेषण से निकाले जाते हैं वे बने-बनाये, मनगढ़न्त और मनमाने नहीं होते। इसलिए वह कभी भी अपनी राय के प्रति अंधममता, पूर्वाग्रह और अंध आत्मविश्वास का शिकार नहीं होता, हमेशा उसके सही और ज्यादा सही होने के लिए जगह छोड़कर चलता है और किसी नए तर्क व युक्ति से कायल होने के बाद उसे बिना संकोच बदलने का साहस भी उसके पास होता है। रूखापन, अड़ियलपन, आत्ममोह, प्रतिपक्षी के प्रति द्वेष, चिढ़ और खीज, बौद्धिक निरंकुशता, झूठी श्रेष्ठता का दर्प या शेखीखोरी ये एक बुद्धिजीवी की खूबियां नहीं हैं। ये वे बीमारियां हैं जो उसे कूढ़मगज़ बनाती हैं। उसके दिमाग को तंग और बन्द कर देती है। इसीलिए सादगी, उन्मुक्त सरलता और विनम्रता सच्चे बुद्धिजीवी के जरूरी लक्षण हैं। यह विनम्रता दिखावे की और ओढ़ी हुई नहीं होती, न यह किसी व्यक्ति विशेष के प्रति होती है, बल्कि यह तथ्यों, तर्कों, युक्तियों व वैज्ञानिक पद्धति के प्रति व्यक्त होने वाली सच्चे खोजी की निष्ठा और सम्मान भावना है। यह किन्हीं व्यक्तियों य शास्त्रों या खुद अपने ही पूर्वाग्रही के प्रति रखी जाने वाली धार्मिक श्रद्धा और अंधपूजा की मनोवृति से बिलकुल अलग चीज है। बुद्धिजीवी अपनी आलोचनात्मक बुद्धि को ताक पर रख किसी बात को सिर्फ इसलिए नहीं मान लेता कि यह किसी बड़े आदमी, अमुक किताब या बी.बी.सी. द्वारा कही गई है।

सच्चा बुद्धिजीवी उदार ही नहीं संवेदनशील भी होता है, लेकिन वह राय बनाने में या निर्णय लेने में कभी भावुकता का शिकार नहीं होता। वह भावनाओं के उन्माद में नहीं बहता बल्कि ठण्डे दिमाग से समस्याओं, घटनाओं और तथ्यों का परीक्षण करता है। उनके सभी पक्षों को जोड़कर, सभी बाहरी-भीतरी रिश्तों की पहचान करते हुए कार्य-कारण का इत्मीनान के साथ अध्ययन-विश्लेषण करके ही अपने लिए नतीजे निकालता है। सामाजिक प्रक्रियाओं के सभी अल्प व दीर्घकालीन परिणामों को समझते हुए कार्य-कारण (cause and effect) सम्बन्ध के आधार समस्याओं का सही, व्यावहारिक और मानवीय पहलू से उचित सच्चा हल खोजने का ईमानदारी से प्रयत्न करता है। वह तथ्यों का सम्मान करता है और उन्हें न तो मनमाने ढंग से तोड़ता-मरोड़ता है और न ही उनकी उपेक्षा या अवहेलना करता है। लेकिन वह तथ्यों को ही उनके ऊपरी रूप-स्वरूप को ही सच्चाई समझकर बैठ नहीं जाता। वह तथ्यों के आर-पार की वास्तविकता को, उसके भीतर यथार्थ को पकड़ने और समझने का बौद्धिक श्रम जरूर करता है। वह समस्या के वास्तविक आधार और उसके ऊपरी तथ्यात्मक रूप को अलग-अलग करने की क्षमता रखता है। वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और वैज्ञानिक परीक्षण से वह मसलों की तह तक पहुंचने की कोशिशा करता है। इसके लिए वह तथ्यों को, उनके वास्तविक संदर्बों से जोड़कर उचित अर्थ और अनुपात में ही समझना चाहता है न कि उन्हें सन्दर्भ से उखाड़कर या तिल का ताड़ अथवा ताड़ का तिल बनाकर।

मसलन हमारे देश में अक्सर शीत लहर या लू (कड़ी गर्मी) के कारण लोगों के मरने की खबर सुनने को मिलती है। लेकिन एक बुद्धिजीवी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह साधारण व्यक्ति की तरह हर ऐसी गंभीर बात को यथातथ्य मानकर चुपचाप बैठ जायेगा। वह इन मौतों को प्राकृतिक प्रकोप की तरह ही नहीं देखेगा, जिस तरह कि इन्हें प्रचार माध्यम पेश करते हैं। वह अपनी आलोचनात्मक बुद्धि के औजार से इन तथ्यों का अवलोकन परीक्षण करेगा और यह जानना चाहेगा कि क्या साधन-सम्पन्न या अधिकार सम्पन्न श्रेणी के लोग भी इन्हीं क्षेत्रों में शीत लहर या लू से एक साथ इतनी बड़ी तादाद में कभी मरते हैं! यही नहीं, क्या इनसे ज्यादा सर्दी या गर्मी पड़ने वाले इलाकों में भी उच्च वर्ग के लोग कभी ऐसी मौतों के शिकार होते हैं? इन सवालों को उठाते हुए इनके उत्तर खोजते हुए वह इस नतीजे पर जरूर पहुंचेगा कि इन मौतों का असल कारण शीत लहर या लू नहीं है, वह तो बहाना है, मौका है। हर तरह के अभाव, तंगी और गुरबत जिसमें ये लोग जैसे-तैसे अपना गुजारा करते हैं, इन मौतों के ज्यादा बुनियादी कारण हैं।

सकारात्मक दृष्टिकोण

कहने का मतलब यह है कि बुद्धिजीवी किसी भी महत्वपूर्ण और अर्थपूर्ण तथ्य के प्रति कामचलाऊ, चालू और सतही रुख रख नहीं सकता। वह भाग्य के भरोसे पर चीजों को छोड़कर सहज तुष्ट हो रहने वाला निष्क्रिय दृष्टिकोण नहीं अपना सकता। क्या, क्यों, कैसे जैसे सवाल उठाकर वह हर जगह उंगली रखता है इसीलिए उसका दृष्टिकोण आलोचनात्मक होता है। लेकिन उसकी आलोचना आलोचना के लिए नहीं होती। डॉक्टर जो आप्रेशन करता है वह अपने दिलबहलाव के लिए कोई खेल नहीं खेलता और न ही मरीज की बस चीरफाड़ करके रख देना (वह भी मनमानी) उसका इरादा होता है। सच्चा बुद्धिजीवी एक गम्भीर सर्जन की जिम्मेदारी से ही तथ्यों की विवेचना करता है और जिस तरह एक सर्जन मरीज के अच्छा हो जाने के लक्ष्य को अपने लिए चुनौती समझकर चलता है उसी तरह बुद्धिजीवी भी समस्याओं के हल और समाज की बेहतरी के लक्ष्य को सामने रखकर अध्ययन-विश्लेषण करता है। जाहिर है कला-कला के लिए, मनोरंजन-मनोरंजन के लिए (चाहे वह कितना ही घटिया दर्जे का क्या न हो) की तर्ज पर तर्क के लिए तर्क करने वाले बातों के सूरमा कभी एक सुसंगत, जिम्मेदार और गम्भीर आलोचनात्मक दृष्टिकोण नहीं अपनाते। बुद्धिजीवी जिस आलोचनात्मक दृष्टि को अपनाता है वह विवेक पर आधारित हैं, क्रियात्मक है और सकारात्मक है। यह विवाद का मुद्दा हो सकता है कि सकारात्मक व नकारात्मक दृष्टिकोण किसे कहा जाये? यहां इतना ही कहना काफी होगा कि सकारात्मक दृष्टिकोण वही दृष्टिकोण हो सकता है जो वस्तुनिष्ठ, विवेक-सम्मत, प्रगतिशील व रचनात्मक हो। गणित में हम + (+) को जोड़ते हैं तथा —(—) को भी जोड़ते ही हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल सही बात को सही कहना ही सकारात्मक सोच नहीं है, बल्कि गलत बात को गलत कहना भी सकारात्मक दृष्टिकोण होता है। सच्चाई कभी अधूरी नहीं होती, उसके सभी पहलू जोड़कर देखने होते हैं। वह निर्द्वन्द, निरपेक्ष और तटस्थ भी नहीं होती। उसमें निहित अन्तर्विरोध, उसकी सापेक्षता, गति और दिशा को भी देखना होता है। इसलिए एक सच्चा बुद्धिजीवी समग्रता का कायल होता है। लेकिन वह ऐसा समन्वयवादी या संकलनकर्ता नहीं होता जो सियाह और सफेद, गलत और सही, धनात्मक और ऋणात्मक दोनों पक्षों का सम्बन्ध समझने के बजाय अच्छा खासा बुद्धिहरण घोलमठ्ठा या अमलगम तैयार कर दे और इस नतीजे पर पहुंच जाये “nothing is good or bad but thinking makes it so” वह सच्चाई की नोकें घिसकर उसे चपटा और भोंथरा नहीं बनाता और सच और झूठ, असली और नकली के भेद को झुठलाकर या उसका परस्पर मेल कराकर, उनके बीच अनुकूलन या मॉडरेशनं करके वास्तविक को बदरंग बनाने का काम नहीं करता। अकादमिक जगत की इस पाटाफेर तटस्थता से यह बरी होता है। मिसाल के लिए हमारे देश के कई विश्वविद्यालयों में राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थियों को फासीवाद (निरंकुश तानाशाही), लोकतन्त्र, समाजवाद सभी के लाभ-हानिं या गुण-दोषं इस तरह पढ़ाये जाते हैं, मानो सारी व्यवस्थाएं एक जैसी हैं—सभी की कुछ अच्छाइयां हैं तो कोई न कोई बुराई भी है, इसलिए कोऊ नृप होइ हमें का हानी।
बुद्धिजीवी के सकारात्मक दृष्टिकोण का एक पहलू यह भी है कि वह सिनिकी या संशयवादी नहीं हो सकता। वह सब कुछ के नकार का सनकी दृष्टिकोण अपना कर दुनिया को नहीं देखता। वास्तविकता की नंगी आंखों में झांकने से डरने वाले कमजोर और निकम्मे लोग ही ऐसा रुख अपनाते हैं। सच्चाई कितनी ही कड़वी अप्रिय या आपकी मनोवृत्ति के लिए कितनी ही प्रतिकूल और असुविधाजनक क्यों न हो, उसे झुठलाया नहीं जा सकता। कई बुद्धिजीवी नामक लोग अपने सर्वनिषेध या सनकी रवैये के माध्यम से यही रोना रोते रहते हैं कि चीजें उस श्क्ल में क्यों नहीं हैं जिसमें कि वे उन्हें देखना चाहते हैं या जैसा नक्शा ख़यालों में उन्होंने दुनिया का बना रखा है दुनिया ठीक-ठीक वैसी क्यों नहीं है। वे हर मुद्दे पर यह रवैया अपनाते हैं कि कहीं कुछ नहीं हो सकता, कहीं कुछ नहीं बदल सकता। जाहिर है संशयवाद भी भाग्यवाद की तरह हमें निष्क्रियता की ओर ले जााता है। सक्रिय और जिम्मेदार आलोचनात्मक दृष्टिकोण इन दोनों से ही अलग है।

बौद्धिक जड़ता के आधार

ऊपर जिस व्यापक, उन्मुक्त (खुले हुये), तर्क-सम्मत, वस्तनिष्ठ, रचनात्मक और समग्र दृष्टिकोण की चर्चा की गई है उसके निर्माण में सबसे बड़ी रुकावट वे रूढ़ संसार हैं, जो हमें बचपन से ही घुट्टी के साथ पिलाये जाते हैं। एक पिड़डे हुए समाज की तमाम बीमारियां हमें विरासत में मिलती हैं। पितृसत्तात्मक निरंकुशता, रक्तसम्बन्ध (कुल, गोत्र, जात, खाप से जुड़ी तंगजेहनी), भूमि या क्षेत्र से बंधी संकीर्ण सोच, फिरकापरस्ती हमारे चेतना पर पड़ी ऐसी बेड़ियां हैं जो हमें मुक्त नहीं होने देती। हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इसी पिछड़े हुए समाज के बीचोबीच बना और बन रहा है। शिक्षित समुदाय में जड़ें जमाये बैठी बौद्धिक जड़ता और संकीर्णता इस तरह के पिछड़ी हुई गलत-सोच से टकराकर ही टूट सकती है, चूंकि हमारे यहां का शिक्षित मध्यवर्ग प्रायः इससे टकराने के बजाय इसमें शरण लेता है और इसको तर्क की तरह इस्तेमाल करता है इसलिए जड़ता और संकीर्णता टूट नहीं पाती। कुछ मोटे उदाहरणों से इस तरह के बुद्धि विरोधी सोच के कुछ नमूने देखे जा सकते हैं—

हमारे पढ़े-लिखे लोगों में बहुतेरे भारतीय संस्कृति और सभ्यता की श्रेष्ठता और निरालेपन का गुणगान जिस तरह करते हैं, उससे इस संकीर्णता का रूप थोड़ा समझा जा सकता है। भारतीय संस्कृति से अक्सर उनका तात्पर्य प्राचीन आर्य संस्कृतिं से होता है। आर्यों को वे सर्वश्रेष्ठ नस्ल समझते हैं और हिन्दूजाति को उनकी एकमात्र वैध सन्तान। वे आध्यात्मिक चिन्तन को भारतीय संस्कृति की एकमात्र और अद्वितीय देन की तरह और उसके आधार की तरह पेश करते हैं, जबकि यह बहुत पहले ही साफ हो चुका है कि सभ्यता या संस्कृति किसी नस्ल का जैविक (biological) या प्राकृतिक और शाश्वत गुण-धर्म नहीं है अैर यह भी कि उसका सम्बन्ध मूलतः सामाजिक विकास क्रम के साथ ही है। संस्कृति कोई पुराना गोदाम नहीं है बल्कि लगातार विकासशील मूल्य-व्यवस्था है। ऐसे लोग श्रेष्ठता के दर्प में यह भी भूल जाते हैं कि प्राचीन सभ्यताओं में भारतवर्ष की सभ्यता एक है, एकमात्र नहीं। यूनान (ग्रीक), चीन, रोम और मिश्र की भी कम विकसित सभ्यताएं नहीं रही। हमारे ये तथाकथित बुद्धिजीवी नस्लपरस्ती के प्रभाव में इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य की बहुत आसानी से उपेक्षा कर देते हैं कि सभ्यता और कला-संस्कृति के विकास में हिन्दुस्तान में अनेक जातियों का योगदान रहा है, जिसे भूलकर हम अपने सांस्कृतिक-विकास को बहुत ओछा करके देखेंगे। क्या मुगलकाल में हुये संगीत, काव्य, भवननिर्माण और स्थापत्य कलाओं के विकास को नज़रअन्दाज किया जासकता है। और क्या उसे अभारतीय कहने की हिम्मत की जा सकती है? सभी जानते हैं कि प्राचीन भारतीय चिन्तन परम्परा में भाववादी-आध्यात्मवादी दर्शनों के साथ-साथ भौतिकवादी चिन्तन की भी एक मजबूत परम्परा रही है। छः मान्य दार्शनिक प्रणलियों में कम से कम तीन अनीश्वरवादी और पदार्थवादी रही हैं। फिर कैसे आध्यात्मवाद ही भारतीय संस्कृति का सार कहा जा सकता है। यह भी कहना कठिन है कि आध्यात्मिक चिन्तन भारतवर्ष की ही कोई नायाब देन है। दुनिया के हर कोने में आध्यात्मवादी और भौतिकवादी चिन्तन दोनों की ही समृद्ध दार्शनिक परम्पराएं मिलती है उन्हें पूर्वं और पश्चिम या भारतीय और अभारतीय में बांटना भ्रामक और विवेकहीन है। ऐसे ही लोग ज्ञान-विज्ञान और तमाम आधुनिक चिन्तन को भौतिकवादी और पाश्चात्य कहकर भारतीय जनता से दूर रखकर या तो हमें पिछड़ा हुआ बनाये हुए रखना चाहते हैं या हर आधुनिक चीज और खोज को वेदों से निकली बताकर पुनुरुत्थानवादी डोज देकर लोगों को झूठी शेखी में गर्क किये रखना चाहते हैं। वे बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारे पूर्वजों का तो अन्तरिक्ष में आना-जाना लगा ही रहता था, पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने कौ-सा नया तीर मार लिया। वे यह नहीं बताएंगे या मानेंगे कि ऐसा करने के लिए किसी वैज्ञानिक तकनीक की भी जरूरत हो सकती है।, वे कहेंगे कि उनके पास दिव्य-शक्ति थी गोया विज्ञान में तरक्की करने के बजाय दिव्य शक्तियां हासित करना ही प्रगति का एकमात्र उपाय बचा है।

ज्ञान-विज्ञान के प्रति ऐसा नस्लपरस्त रवैया रखने वाले लोग ज्ञान और कला की दुनिया को बांट कर देखते हैं। जाति, धर्म और क्षेत्र की बनावटी रेखायें खींचकर मानवजाति की इन उपलब्धियों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता है। एक खूबसूरत कलाकृति या चित्रकारी को देखने का एक नज़रिया उसकी विषयवस्तु, कलात्मक शक्ति, विचारधारा और उसके परिवेश को समझना भी हो सकता है और यह भी कि इसे किसी हिन्दू या मुसलमान या यहूदी या ब्राह्मण या शूद्र या शिया या सुन्नी किसने बनाया। जाहिर है, दूसरा दृष्टिकोण तंगज़ेहनी का शिकार एक कलाविरोधी मनुष्यता विरोधी दृष्टिकोण ही कहलायेगा। मैं यहां जोर देकर कहना चाहता हूं कि ज्ञानविज्ञान, चिन्तन और कला समूची मानव जाति के साझे संघर्ष की उपज है और सभी का उन पर समान अधिकार है। इस बौद्धिक छुआछूत से बुद्धिजीवियों को जमकर संघर्ष करना होगा। उन्हें एक अन्तर्राष्ट्रवादी और मानवतावादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। दकियानूसी और पुनुरुत्थानवादी सोच चाहे कितना ही उग्र राष्ट्रवादी प्रतीत होता हो सच्चे अर्थों में राष्ट्रवादी सोच भी नहीं है, वह तो टुच्चा अंध कबीलाई सोच है जो अन्ततः फिरके, जात, गोत, कुल और खुद अपने रक्त-सम्बन्धों में ही जाकर शरण लेता है। ऐसे ही लोग विस्तृत दृष्टिकोण रखने वाले और अपेक्षाकृत आधुनिक किसी भी व्यक्ति को विदेशी विचार, पाश्चात्य विचार रखने वाला, नासमझ, नास्तिक और अमुक-अमुकवादी जैसी उपाधियों से विभूषित कर अपनी कूपमण्डूकता, पिछडे़पन और जड़ता पर परदा डालने की हास्यास्पद कोशिशें करते हैं। एक बुद्धिजीवी की सोच जमीन से चिपके हुए उस किसान जैसी नहीं हो सकती जो चान्द तक आदमी की पहुंच को अस्वीकार करता हो। अपना मारै छां में गेरैंं जैसे कुतर्क के जाल में न तो वह फंसता है और न ऐसेे किसी कुतर्क का सहारा लेता है क्योंकि उसे पता है कि मार ही दिया (तो अपना क्या हुआ और मर ही गया) तो इस बात से क्या फर्क पड़ेगा कि धूप में डाला या छाया में।

इतिहास की गति व दिशा

इतिहास कभी प्रतिगामी शक्तियों का साथ नहीं देता अन्त: वह प्रगति और विकास की तरफ बढ़ता है। कोई चाहे भी तो इतिहास की इस गति की दिशा नहीं बदल सकता। लेकिन विकसित होने का अर्थ सीधे-सीधे (नाक की सीध में ही) आगे बढ़ना नहीं है और न ही कोल्हू के बैल की तरह एक ही जगह चक्र लगाने का नाम विकास है। विकास की गति घुमावदार होने के साथ आगे की ओर (अग्रगामी) और ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) होती है। पहले की गुणात्मक परिस्थितियों से दूसरी गुणात्मक परिस्थितियों तक संक्रमण का नाम विकास है। यानि विकास निम्न से ऊध्र्व की ओर, सरल से जटिल की ओर ही होता है।

मानव समाज ने अपने विकास के इतिहास में जो कामयाबियां हासिल की हैं, वे अपने पीछे के सभी अनुभ्वों को आत्मसात करके, उनसे सीखकर और उनके सकारात्मक पक्ष को आधार बनाकर हासिल की गई है। मनुष्य और पशु में यही बुनियादी अन्तर है। मसलन पिंजरे में बन्द पक्षी अगर किसी तरह आजाद भी हो जाए तो अपने पिंजरे का अनुभव या मुक्ति का राज अपने साथी पक्षियों को बता नहीं सकता। दूसरी तरफ हर छोटा बच्चा भी इस बात को जानता है कि कुछ सांप जहरीले भी हुआ करते हैं और उनके काटने से लोग मर भी जाया करते हैं भले ही उसे सांप ने कभी न काटा हो। यहां तक कि आरलैण्ड या न्यूजीलैण्ड—जहां पर्यावरण सम्बन्धी (Ecological) कारणों से सांप होते भी नहीं हैं वहां के भी लोग ज्यादातर इस बात को जानते हैं। इसलिए ज्ञान की परिधि वही नहीं है जितना हम खुद उसे सीधा अनुभव करके पा चुके हैं। ज्ञान और अनुभव का उतने बड़े पैमाने पर आदान-प्रदान न होता तो इंसान की हालत कोल्हू के बैल से ज्यादा बेहतर नहीं होती। ज्ञान-विज्ञान के आविष्कार और खोजें सार्वत्रिक (universal ) महतत्त्व की होती हैं। न्यूटन के गुरुत्वकर्षण के सिद्धान्त पर उसके बाद के कितने ही सिद्धान्त खोजे जा सके हैं। ये सिद्धान्त एक ही देश में लागू नहीं होते बल्कि धरती पर सब जगह लागू होते हैं। साइफन, पम्प, इंजन, वायुयान, अन्तरिक्ष यान, रेडियो, टेलिविजन, कम्प्यूटर आदि यदि बने हैं तो वे हिन्दुस्तान में भी ऐसे ही काम करेंगे और इंग्लैण्ड या सोवियत संघ में भी। अगर कैंसर या किसी दूसरे असाध्य रोग के कारगर इलाज की खोज किसी भी मुल्क में होती है तो कोई मूढ़मति ही यह कहेगा कि चूंकि यह खोज अमुक मुल्क में हुई है इसलिए विदेशी खोज है और हम इसे नहीं मानेंगे या अपनाएंगे। पाश्चात्य किस्म का ज्ञानं और भारतीय किस्म का ज्ञानं जैसी श्रेणियां बनाने वालों को चाहिए कि वे मशीनीकरण और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के फलों को त्याग कर हिमालय की कन्दराओं में कन्द-मूल फल खाकर तत्व चिन्तन करें।

इस तरह के दकियानूसी सोच के अपने खतरे हैं। फासिज्म, निरंकुश तानाशाही और फौजी हकूमतें अपनी बरबर्ता को छुपाने के लिए ऐसी ही कूपमण्डूकता का सहारा लेती हैं। हिटलर ने आर्य श्रेष्ठता के नस्लवादी उन्माद को जगाकर मानव-जाति की उत्कृष्ट उपलधियों, कलाकृतियों, ग्रन्थों, भवनों, चित्र को जलाकर खाक में मिलाया और मानव जाति के बड़े हिस्सों को मौत के घाट उतारा। पाकिस्तान के मौजूदा फौजी तानाशाह जिया-उल-हक हुत दिनों से कहते आ रहे हैं कि पश्चिमी ढंग का जनतन्त्रं (यानि दलगत राजनीति और चुनाव आदि) पाकिस्तान के मिज़ाज़ और इस्लामी उसूलों के अनुकूल नहीं है। इसलिए अव्वल तो चुनाव होने ही नहीं चाहिए और हों भी तो खुदा के (यानि उनके खुद के) नामजद एजेंट और जिन्हें वे सच्चा मुसलमान समझें, वे ही चुनाव में खड़े हो सकेंगे। हमारे देश में भी जनतन्त्र यहां चल नहीं सकतां या समाजवाद एक विदेशी पद्धति हैं इसलिए उसे आने नहीं देना चाहिए कहने वाले बन्द दिमाग लोग बहुतेरे हैं। ऐसे ही लोग कभी हिन्दू राज्यं का खवाब देखते हैं तो कभी सिख राज्य का। धर्म को राष्ट्रीयता का आधार मानकर वे खूंरेजी और दहशतगर्दी फैलाते हैं, एक ही मुल्क में साथ-साथ जीने-मरने वालों में नफरत जगाते हैं, दंगे करते हैं। यह पिछड़ी हुई सोच आज इतना उग्र रूप ले चुकी है कि देश की आजादी और एकता के लिए खतरा बन चुकी है। मसलन, मुसलमान जो इस मुल्क की धरती पर हजार साल से आबाद हैं बहुसंख्यक जनता में आज भी बेगाने माने जाते हैं। आजादी के 37 वर्ष बाद भी (भिवण्डी सामने हैं) हिन्दू-मुस्लिम एक दूसरे के खून के प्यासे कैसे हो जाते हैं? जो बुद्धिजीवी इस तरह के संकुचित और अमानुषिक सोच से लड़ता नहीं या इसे किसी तरह छूट देता है, औचित्य प्रदान करता है वह बुद्धिजीवियों के नाम को कलंकित ही करता है। पंजाब में पिछले दिनों से जो कुछ हो रहा है वह मौजूदा व्यवस्था के उग्र होते आर्थिक-सामाजिक संकट के बीच इस पिछड़े हुए सोच का वनैला रूप ही है। पंजाब या पंजाब के बाहर बेकसूर लोगों को ही जान से हाथ धोना पड़ा है। लेकिन जो लोग पंजाब की घटनाओं पर गुस्सा उगल रहे थे, वे हरियाणा में 14 फरवरी के बाद हुई वारदातों पर चुप्पी साधे हुए थे।जब इन लोगों से पूछा गया कि पंजाब में बेकसूर लोगों को मारा जाना उतना ही गलत नहीं है? कुछ लोगें ने कहा कि आतंकवादियों की शक्सियत ढ़ीली करने का यही अकेला तरीका है (सभी ने देखा इससे उन्माद भी बढ़ा और आतंकवादी हिंसा भी)। कुछ लोगों को बेबुनियाद तरीके से यह भी कहते पाया गया कि ऐसा करना कुछ ठीक भी है और कुछ गलत भी। इससे पंजाब में हुए नुकसान की कुछ तो क्षतिपूरती होगी। किसी भी मामूली समझ के आदमी की यह साफ समझ होनी चाहिए कि कोई बात कम या ज्यादा गलत या सही तो हो सकती है। लेकिन गलत और सही एक साथ नहीं हो सकती। लेकिन बेकसूर लोगों को मारने से ज्यादा गलत और नीचतापूर्ण काम दूसरा कौन हो सकता है? पंजाब में किसी सम्प्रदाय के माना 100 लोग मार दिये गए और दूसरे सम्प्रदाय के 50 लोग मार दिए गए तो इससे देश की मानवशक्ति का होने वाला कुल नुकसान बढ़ा या कम हुआ। एक अंधी आंखों और बन्ददिमाग वाला आदमी ही होगा जो कहेगा कि जो दाढ़ी और पगड़ी रखते हैं वे हरियाणा में दुश्मन हैं और जो दाढ़ी और पगड़ी नहीं रखते हैं वे पंजाब में दुश्मन हैं। क्या ये लोग कभी सोचते हैं कि ये कैसा जहर बो रहे हैं जो आने वाली पीढ़ियों तक से कीमत वसूल करेगा? क्या बेकसूर लोगों के साधारण विश्वासों को ठेस लगाकर उससे राष्ट्रीय एकता के लिए काम करने की उम्मीद की जा सकती है। यही लोग साम्प्रदायिकता फैलाते हैं और ये ही लोग कहते हैं कि हरिजन (या ढेड़) को तो प्रकृति ने मैला ढोने और बेगार करने के लिए बनाया है। ये ही लोग कहते हैं कि औरतें तो मर्द के पैर की जूती होती हैं या उनमें दिमाग नहीं होता। कहने की जरूरत नहीं कि एक सच्चे बुद्धिजीवी में इस फासीवादी नस्लपरस्त अहंकार का अगर थोड़ा भी अंश बचा हुआ है तो वह अपने बौद्धिक कार्य में ईमानदार नहीं हो सकता।

बौद्धिक ईमानदारी (Intellectual Honesty)

इस बौद्धिक ईमानदारी का भी अर्थ ठीक-ठीक समझने की जरूरत है। ईमानदारी का मतलब सिर्फ रूपये-पैसे की ईमानदारी नहीं होता। इसका एक अर्थ तो यही है कि बुद्धिजीवी से जिस उन्मुक्त, वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ पद्धति से चीजों को जानने-परखने की अपेक्षा की जाती है, उसमें उसकी ईमानदारी से निष्ठा हो और वह उसे अपना दृष्टिकोण बनाने का संघर्ष करे। अपने व्यक्तित्व में छिपे हुए अधकचरेपन, पिछड़ेपन से लड़कर ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण का खुलापन हासिल किया जा सकता है। बौद्धिक ईमानदारी का एक अर्थ यह भी है कि अपनी जानकारी और दृष्टि की सीमाओं को स्वीकार करने का न्यूनतम साहस उसके पास हो, उन सीमाओं के उजागर हो जाने के डर से हर क्षण वह व्याकुल न रहता हो। अपने अज्ञान को जानते-बूझते एक बुद्धिजीवी कभी उस पर पर्दा नहीं डालता, खोखला दिखावा या पाण्डित्य प्रदर्शन करके अपनी दरिद्रता को छुपाता नहीं, हेराफेरी नहीं करता (दूसरों के शोधकार्य का अन्वेषण को अपनाा बताने या अपने नाम से प्रकाशित करने की ओछी हरकत नहीं करता); किसी की बात या विचारों को तोड़ मरोड़ कर, सुविधानुसार अपने काम का बनाकर, घुमा-फिराकर सन्दर्भ से अलग करके, अर्थभ्रष्ट करके गलत ढंग से पेश नहीं करता और मनमर्जी से ऊटपटांग अर्थ या निष्कर्ष निकालकर उनकी अनाप-शनाप व्याख्या नहीं करता। अपने कार्यक्षेत्र में अपने कर्त्तव्य के प्रति न्यूनतम ईमानदारी वह जरूर बरतता है। डाक्टर, अध्यापक, वकील आदि सभी तबकों पर यह बात लागू होती है। ऐसे लोग जो हमेशा सफलता की हड़बड़ी में रहते हैं या ऐसे लोग स्वयं को परम बुद्धिमान या सर्वज्ञ समझते हैं और कुछ सीखने या अपनी आलोचना सुनने से इंकार करते हैं, बौद्धिक ईमानदारी का निर्वाह नहीं कर सकते।

जिन्दगी अपने आप में एक विशाल पाठशाला है जो सबके लिए खुली है और जहां पैदा होने से लेकर मरने तक इंसान के लिए यह मौका है कि एक विद्यार्थी की तरह सीखता रहे लेकिन इसके लिए सीखने की सच्ची-भावना होनी भी जरूरी है। सैंट पाल ने एक बार कहा था न ही यहां ऐसे दरवाजे हैं, क्योंकि यहां कोई दीवार ही नहीं है। लेकिन फिर भी लोग दीवारें खड़ी कर ही लेते हैं। संकटग्रस्त व रुढ़ि जर्जर समाज और उसमें निहित जड़-जंगम व्यक्तित्व खुद सबसे बड़ी दीवार है। इसे तो उखाड़ना ही होगा क्योंकि ज्ञान चारदीवारी में बन्द नहीं रहा सकता।

ऊपर जिस बौद्धिक ईमानदारी की चर्चा की गई है उसके एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और केन्द्रीय पहलू का जिक्र करना यहां जरूरी है। बौद्धिक ईमानदारी क्या सिर्फ अध्ययन-चिन्तन-विश्लेषण-लेखन की ईमानदारी है? नहीं, बौद्धिक ईमानदारी का अर्थ यह भी है कि बुद्धिजीवी अपने जीवन-व्यवहार को भी उन निष्कर्षों के अनुरूप ढालेगा जो उसने अर्जित किये हैं। एक बुद्धिजीवी से बौद्धिक आचरण की भी उम्मीद की जायेगी। अगर कोई कहे कि सोच और विचार तक तो वह बुद्धिसंगत रहेगा और बर्ताव व अमल में अबौद्धिक बने रहने की पूरी छूट उसे चाहिए तो उसे ठीक-ठाक अर्थ में बुद्धिजीवी नहीं कहा जा सकता। कथनी और करनी, चिन्तन और व्यवहार के बीच की सुविधाजनक दूरी को बनाये रखकर बुद्धिजीवी अपना बुनियादी विकास नहीं कर सकता। यह दोगलापन उसके चिन्तन को भी देर सबेर भ्रष्ट करेगा और फिर विचार कोई कहने, उपदेश करने या किताबों में लिख देने की चीज ही नहीं है, वे कर्म के पथ प्रदर्शक हैं, और इसी रूप में उनकी कोई सार्थकता है। दूसरे शब्दों में, एक बुद्धिजीवी केवल बयानबाजी में, लच्छेदार भाषणों में, शब्दों की कलाबाजी में या पहेलियों में हा बात करना नहीं चाहता। वह जो कुछ कहता है उसे जानता है, मनता है और उस पर अमल करने की पूरी कोशिश करता है।

निर्भीक अभिव्यक्ति

बुद्धिजीवी से यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि वह मौकापरस्ती के कारण या किसी बाहरी दबाव में आकर सच्चाई को लोगों के सामने रखने से नहीं हिचकिचायेगा। विचारों की निर्भिकता सच्चे बुद्धिजीवी का बुद्धमूल संस्कार होती है। वह कहीं भी नौकरी तो करता हो सकता है लेकिन इसके लिए वह अपने विचारों की स्वतन्त्रता को गिरवी नहीं रख देता। हमारे यहां के सत्ता-प्रतिष्ठान और पूंजी-प्रतिष्ठान बहुत से बुद्धिजीवियो को भाड़े के चाकर के रूप में रखते हैं व उनसे वही कहलवाते-लिखाते हैं जो उनकी कुर्सी या मुनाफे के लिए जरूरी हो। ऐसे बुद्धिजीवी “हिज मास्टर्स वायस” के (अक्सर घिसेपिटे) रिकार्ड जैसे होते हैं। वे खुद नहीं बोलते सिर्प बजाने से बजते हैं। बौद्धिक साहस से इस कदर खाली लोगों को बुद्धिजीवी नहीं कह सकते। बुद्धिजीवी से मौलिक अभिव्यक्ति की अपेक्षा होती है। वह न तो अपने को बन्धक बना सकता है और न विचारों को किराये पर या उधार लेकर अपना काम चला सकता है। वह अपनी मेहनत तो बेच सकता है, अपना दिमाग नहीं। वह “जी हजूरी” करने या करवाने का अभ्यस्त नहीं होता और न ही वह ऐसे दरबारी कवि या चाटुकार भाट जैसाा होता है, जो अपने बास या बादशाह की तारीफ में कसीदे ही काढ़ा करता है। यह अपने जमीर को मारना, अपनी राय को कुचलना, अपनी इन्सानी गरिमा (human dignity) का गला घोंटता है और यह चीज़ किसी भी बुद्धिजीवी के नैतिक और बौद्धिक दोनों स्तरों को गिराती है।

जहां तक बौद्धिक साहस और निर्भीक अभिव्यक्ति का सवाल है, अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो क्या सुकरात, आरकेमिडीज, मंसूर, गैलीलियो और ऐसे ही अनेक बुद्धिजीवियों व वैज्ञानिकों ने अपने विचारों और निष्कर्षों के लिए बड़ी से बड़ी कुरबानिया नहीं दी और यातनाएं नहीं सहीं। इनमें से कई को मदान्ध और बर्बर सत्ता केन्द्रों और धर्म के ठेकेदारों से टकराना पड़ा था। इटली के विश्व-विख्यात प्रतिभाशाली बुद्धिजीवी अन्तोनियो ग्राम्शी को मुसोलिनी जैसे आततायी की क्रूरता का शिकार बनना पड़ा था। लेकिन इन सभी ने सच्चाई की कीमत पर अपने जीवन को बचाने की कभी इच्छा नहीं की। किसी ने ठीक ही कहा है कि सच्चाई अपनी पूरी कीमत चाहती है, उसे चुका कर ही हम उससे ऋणमुक्त हो सकते हैं।

सामाजिक जिम्मेदारी की सजगता

बुद्धिजीवी की ईमानदारी और साहस सिर्फ आत्मतोष के लिए या अपनी व्यक्तिगत नैतिक मांग को पूरा करने भर के लिए नहीं होते। बुद्धिजीवी का एक बहुत बड़ा सामाजिक दायित्व है। अगर वह अपने कार्य को सामाजिक नवजागरण के मिशन का हिस्सा नहीं बनाता या बहुसंख्यक समाज की जरूरतों से नहीं जोड़ता तो वह हवाई या किताबी होकर रह जायेगा। एक जागरूक नागरिक होने के नाते उसकी सामाजिक जिम्मेदारियां बढ़ जाती है। उसे देश में तो और भी जहां दिमागी गुलमी, छुआछूत, जात-पात, फिरकापरस्ती, भाग्यवाद, परलोकवाद, मायावाद, क्षेत्रीयतावाद, निरक्षरता अज्ञान व अंधविश्वास जैसी बीमारियां तीन चौथाई से ज्यादा आबादी के खून में मिला दी गई हैं। बुद्धिजीवी वर्ग ने हमेशा नवजागरण का शंख फूंकने में अग्रिम भूमिका निभाई है। यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति के समय, नये-नये वैज्ञानिक आविष्कारों, तकनीकी खजों के साथ-साथ रूसो, वाल्तेयर और मान्तेस्क्यू जैसे फ्रांसीसी चिन्तकों ने सामन्तवाद, राजतन्त्र, पोपलीला, दमन, अत्याचार और अन्याय को चुनौती देते हुए फ्रांस की ढाई करोड़ जनता की मुक्ति के लिए स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व जैसे नारों का उद्घोष किया था। न्यूनाधिक रूप से इसी तरह का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक योगदान आजादी की लड़ाई के दौरान हमारे देश के बुद्धिजीवी वर्ग का रहा है। यह बात और है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वे सपने, वे सामाजिक लक्ष्य, वह जिम्मेदारी, लगन, प्रेरणा और मिशनरी उत्साह क्रमशः गायब होता होता गया और अपना पेट भरने-अपना नाम चमकाने-भुनाने की तुच्छ मानसिकता हावी होने लगी। सबकी मुक्तिं की जगह अपनी मुक्ति ने ले ली। सामाजिक नवजागरण का मोर्चा छोड़कर लोग सत्ता और पूंजी से जोड़-गांठ करने लगे। परिणाम सामने हैं—वैचारिक अवसरवाद और मूल्यहीनता की बाढ़ आई हुई है। नैतिक और मानवीय स्तर तेजी से गिरते जा रहे हैं। रोजाना सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार, अनाचर के नये-नये कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं, उच्च मान्यताओं और भावनाओं को अज्ञातवास देकर लोग उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं। ईमानदारी, सच्चाई, साहस, सहयोग, प्रेम जैसे जीवन मूल्यों को हमेशा-हमेशा के लिए अलविदा कहने की पूरी-पूरी तैयारी है। स्वतन्त्र विचर ढूंढने से कहीं दिखाई दे जाये तो हथकड़ी पहने, पसीने से तर किसी काल कोठरी के झरोखे से झांकता मिलेगा। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि ऐसा इन्तजाम किया जा रह है कि लोग तमाशबीन बने रहें और इस अरजकता से भी अपना दिल बहलायें। बुद्धिजीवी अगर ऐसी स्थिति में यह कहे कि मैं तो तटस्थ हूं। मैं न न्याय के साथ हूं और न ही अन्याय के; न सच के, न झूठ के; न इन्सानियत के, न हैवानियत के; (यानि मैं तो बस अपने साथ हूं।) तो उसे गैर-जिम्मेदार, पाखण्डी, धूर्त और मानवद्रोह के अलावा क्या कहा जा सकता है?

नैतिक और मानवीय स्तर

ऊपर के तमाम विश्लेषण से यह बात सहज स्पष्ट हो जानी चाहिए कि बुद्धिजीवी का बौद्धिक स्तर ही नहीं नैतिक और मानवीय स्तर भी काफी ऊंचा और प्रेरक होना चाहिए। स्वार्थी , आत्मकेन्दि्रत और परले दर्जे के अवसरवादी लोग सच्चे बुद्धिजीवी नहीं हो सकते। पशु की तरह उदर-भरण की लिप्सा, लालच, धूर्तता, व्यक्तिगत प्रतिशोधा की भावना, उत्पीड़क मनोवृति बुद्धिजीवी के लिए घातक है। दूसरों की टांग खींचना या दूसरों को बलि का बकरा बनाना उसकी आदत में नहीं होता। बुद्धिजीवी ऐस व्यक्ति नहीं होता जो दूसरों को संकट में फंसा देख आंख मींचकर निकल जाये या किसी तरह भंवर से निकल कर किनारे के पास पहुंचने लगे तो जरूरत से ज्यादा सहानुभूति दिखाते हुए दोनों हाथ आगे बढ़ा दे।

संक्षेप में ऐसा व्यक्ति जिस पर पशविक प्रवृत्तियां हावी हों [जनसाधारण की लोकभाषा का अगर सहारा लेने की इजाजत हो असभ्य-सा; अनाड़ी-सा, अस्पष्ट-सा; भ्रमित-सा; ओछा-सा; बेशर्म-सा; भगवां सन्त-सा; घमण्डी-सा; झूठा-सा; चापलूस-सा; चालबाज-सा; ढोंगी-सा; ड्रामेबाज-सा; मूंजी-सा; कटखाणा-सा तथा अपना पेट भरने वाला घोर स्वार्थी-सा] यानि मानवीय गुणों से विहीन व्यक्ति को मेरे विचार से बुद्धिजीवी नहीं कहा जा सकता।

बुद्धिजीवियों के बारे में जिन मुद्दों पर चर्चा की गई है, उसका यह मतलब कतई नहीं है कि जो तमाम वांछित गुणों को पूरी तरह साकार करके दिखा दे उसी को बुद्धिजीवी कह जाय। किसी को बुद्धिजीवी की उपाधि देने या न देने का मसला उतना नहीं जितना यह जानना जरूरी है कि बुद्धिजीवी अगर अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी को पूरी सामर्थ्य और दक्षता के साथ निभाना चाहता है तो उसे इन गुणों को अर्जित करना ही होग। इसके लिए उसे अपने भीतर और बाहर की तमम अविवेकपरक और गैर इन्सानी परम्पराओं से, मूल्याहीनता की सड़ांध से जमकर लड़ाई लड़नी होगी। वह भी अकेले-अकेले नहीं अपने जैसे अनेक लोगों को साथ लेकर। इसके लिए उसे अपने समय के ऐतिहासिक दौर की गहरी पड़ताल करके अपना एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण बनाना होगा, सामाजिक शक्तियों के चरित्र और परस्पर सम्बन्धों को समझना होगा और अपनी भूमिका निरधारित करनी होगी। अपने दौर की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिस्थिति के उचित मूल्यांकन के बिन इतिहास की गति-दिशा, जन-मुक्ति के रास्ते और खुद अपनी भूमिका को ठीक-ठाक पहचानना नामुमकिन है। गौरतलब बात यह है कि हालात विशेष याानि किसी समय की सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितियों तथा उनके पीछे कतारबद्ध क्रियाशील गुटों, तबकों व शक्तियों के सन्तुलन को समझे बिना-इन या उन नीतियों के आधार, उनकी अनिवार्य परिण्ति तथा सीमाओं को नहीं समझा जा सकता। सांप के ढ़ांचे और उसकी कार्यविधि (यानि उसके पूरे सिस्टम) को जने बिन इस बात को नहीं समझा जा सकता कि सांप के मुंह में छछून्दर के वस्तव में क्या मायने हैं।

मेरे इन विचारों में कुछ घटाया-बढ़ाया नहीं जा सकता—ऐसा मेरा ख़्याल नहीं है। ये विचार अन्तिम नहीं हैं। पाठक अगर इन विचारों पर अपनी खुली राय देकर बहस को आगे बढ़ाएंगे तो मुझे खुशी होगी।

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