आलेख


आधुनिक काल में रंगमंच शब्द का प्रयोग व्यापक धरातल पर किया जाता है जिसमें रंगमंच के स्थूल तत्व, मंच, दृश्य-सज्जा, प्रकाश-व्यवस्थाओं, ध्वनि-संगीत योजना, नेपथ्य इत्यादि तो आते ही हैं ‘साथ ही नाटक-कृति, नाटककार, निर्देशन अभिनय नाटक कृति का भाव-बोध भी इसी के अन्तर्गत आ जाते हैं।’ इसप्रकार रंगमंच के द्वारा समस्त नाटकगत भावों की अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण होता है।

आधुनिक काल में रंगकर्मियों ने इस बात को तीव्रता से महसूस किया कि रंगमंच को केवल नाटक तक ही सीमित नहीं किया जा सकता बल्कि उसे साहित्य की अन्य विधाओं के सन्दर्भ में भी देखा जाना चाहिए। फलस्वरूप आधुनिक युग में नाटक के अतिरिक्त नाटकेतर विधाओं को लेकर नये-नये प्रयोग किये गए। जिनसे रंगमंच और साहित्य के नये रिश्ते का आरम्भ हुआ। कहानी का रंगमंच इसी प्रक्रिया की कड़ी है।

आधुनिक हिन्दी रंगमंच प्रयोगशीलता का रंगमंच है जिसमेें नित्य प्रति नये-नये प्रयोगों के द्वारा नई दिशाएं उद्घाटित होती रहती हैं। इन प्रयोगों के द्वारा नाटक और रंगमंच तो समृद्ध हुआ ही है साथ ही साहित्य की अन्य विधाओं को भी इस क्षेत्र में प्रतिष्ठा मिली है। इसी का परिणाम है – नाटकेतर विधाओं का मंचन। मंचन के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, कविता, व्यंग्य-रचनाएं, डायरी तथा पत्र इत्यादि साहित्यिक विधाओं को भी रंगमंच पर उतारने के लिए सफल प्रयास हुए हैं इसी श्रृंखला की कड़ी में 1975 में सर्वप्रथम देवेन्द्रराज अंकुर ने निर्मल वर्मा की तीन कहानियों की ‘तीन एकांत’ नाम से प्रस्तुति कर ‘कहानी का रंगमंच’ की शुरूआत की। अब तक लगभग तीन सौ कहानियां इस प्रयोग से गुजर चुकी हैं तथा इस प्रयोग की सार्थकता को घोषित कर रही हंै। तत्कालीन रंगमंचीय स्थिति को देखते हुए धर्मवीर भारती लिखते हैं, ”बहुत सी नाट्य परम्पराओं की लोकप्रियता की रवायतों से हमें ख्वाहमख्वाह आक्रांत होने की कोई जरूरत नहीं दिखती जैसे रंगमंच और उनसे सम्बद्ध नाट्य-लेखन हिन्दी मेंं नहीं है, यह हमारा दुभागर््य नहीं सौभाग्य है। हम एक स्वस्थ शुरूआत तो कर सकते हैं।1

कहानी के रंगमंच के साथ ही उपन्यासों के नाट्यान्तरण का मंचन भी विगत तीन-चार दशकों में हुआ है जिसमें प्रतिभा अग्रवाल की भूमिका सराहनीय रही है। उनके द्वारा प्रस्तुत का नाट्यान्तरण प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त महाश्वेता देवी का ‘हजार चौरासी की माँ’, कृष्णा सोबती का ‘डार से बिछुड़ी’, ‘मित्रो मरजानी’ मन्नू भण्डारी के ‘महाभोज’ जैसे- उपन्यासों की नाट्यान्तरित प्रस्तुतियाँ भी उल्लेखनीय रही। मंच पर स्वरूप ग्रहण करके ये कृतियाँ अधिकाधिक लोगों तक पहुँची ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है।

कहानी तथा उपन्यासों के मंचन के साथ ही कुछ लम्बी कविताओं की मंचीय प्रस्तुति ने भी हिन्दी रंग आन्दोलन के विकास में अपने स्तर पर योगदान दिया। प्रलय की छाया (जयशंकर प्रसाद), अंधेरे में (मुक्तिबोध), आत्महत्या के विरुद्ध (रघुवीर सहाय), बलदेव खटीक (लीलाधर जगूड़ी), कुआनो नदी (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना), कनुप्रिया (धर्मवीर भारती) इत्यादि कविताओं के मंचन द्वारा हिन्दी रंगमंच ने नई गति प्राप्त की। नटरंग में 1984 की नाट्य गतिविधियों पर परिचय 1996 के दीक्षान्त समारोह के अन्तर्गत एकल प्रस्तुतियों का कार्यक्रम रखा गया। इसमें ”राजधानी के जाने माने रंगकर्मी पीयूष मिश्रा ने विजयदान देथा की बहुचर्चित कहानी ‘दुविधा’ को अकेले सिर्फ एक हारमोनियम की मदद से जिस गतिशीलता के साथ प्रस्तुत किया उससे मणि कौल की फिल्म ‘दुविधा’ का दूसरा सीमान्त ही नहीं ‘एकल’ का एक नया आयाम भी उद्घाटित हुआ।’’2

नटरंग में 1984 की नाट्य गतिविधियों का परिचय देते हुए महेश आनंद लिखते हैं- ”अमाल अल्लाना द्वारा निर्देशित महाभोज को लम्बे चौड़े दृश्यबंध पर खेला गया और देवेन्द्र राज द्वारा परिकल्पित कहानियाँ बिना किसी ताम-झाम के नंगे मंच पर। नाटकीय अनुभव की दृष्टि से देवेन्द्र की कहानियाँ किसी भी यथार्थवादी प्रस्तुतीकरण की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण लगती थी।’’ 3

रंगमंच की प्रयोगशाला हिन्दी रंगमंच को विस्तार देने वाले रंग प्रयोगों और नाट्य-चिन्तन की सम्भावनाओं की खोज कहानी में समाविष्ट करते हुए सार्थक संवाद करने की है। न कि किसी निश्चित ढ़ाँचे या शास्त्र को गढऩे की।

हिन्दी रंगमंच पर संगीत नृत्य, चित्रकला, कथा साहित्य, आत्मकथा, रिपोर्ताज आदि को लेकर प्रयोग ही नहीं हो रहे हैं, बल्कि उनके आपसी संबंधों को भी नए ढंग से देखा-परखा जा रहा है।

उपन्यास-कहानी को मंचित करना मूलत: अतीत को वर्तमान में और श्रव्य को दृश्य में परिवर्तित करने की रचनात्मक प्रक्रिया है। कथा साहित्य अपने व्यापक घटना-फलक और स्थान, कार्य एवं समय के वैविध्यपूर्ण फैलाव के साथ-साथ संकेतों, सन्दर्भों, प्रतीकों और विवरणों के बिखराव के कारण (सिनेमा, टी.वी. अथवा रेडियो) के अधिक निकट पड़ता है उसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। संकलन त्रय और यथार्थवादी दृश्य-बंध की पारम्परिक सीमाओं को यदि आज के विकसित रंगमंच के संदर्भ में छोड़ भी दें तब भी किसी रचना को पाठक के मनोमंच से हटाकर दर्शक के समक्ष स्थूल मंच पर लाने के लिए संक्षिप्तीकरण सघनता प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है – उसे उपेक्षित नहीं किया जा सकता। लेखक के मंतव्य, रचना की आत्मा और कलात्मकता की रक्षा करते हुए कथ्य को समकालीन सार्थकता के साथ दर्शक तक सम्प्रेषित करना भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह कथा साहित्य के मंचन उद्देश्य को पूरा करते हुए अपनी प्रासंगिकता को भी साबित करता है।

आधुनिक भारतीय रंगमंच में साहित्य और अन्य कलाओं की अंतर्निर्भरता तथा पारस्परिक सम्बन्धों के अनेक पहलुओं को लेकर आज कई तरह के संवाद जारी हैं। देखा जाए तो भारतीय रंगमंच अपनी प्रकृति में थियेटर ही है, जिसमें साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाएं समाविष्ट है।

कथा साहित्य (कहानी व उपन्यास) के मंचन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रेष्ठ साहित्य का एक बहुत बड़ा क्षेत्र निर्देशकों के सामने खुल जाता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा अजीत कौर की तीन कहानियों ‘घोंघा समन्दर’, ‘सात नीमकश’ और ‘किस्सा एक कयामत का’ की प्रस्तुति की गई। इसमें लेखिका का मानसिक भटकाव पूरी गहराईयों के साथ साकार हुआ।

निश्चित रूप से ऐसी प्रस्तुतियाँ रंगमंच को समृद्ध ही नहीं बनाती वरन् साहित्य को भी नई अर्थवत्ता प्रदान करती हंै। एक ही लेखक की अलग-अलग कहानियाँ व उपन्यास या अलग-अलग लेखकों की कहानियों द्वारा एकाधिक पात्रों के मानसिक जगत की यात्रा अंत में एक ही व्यक्ति के लिए मांगे हुए यथार्थ को मूर्त करती हुई प्रतीत होती है।

इस प्रकार, इन प्रस्तुतियों से साहित्य व रंगमंच के क्षेत्र में नयी दिशाओं की सम्भावनाएँ खुलती हंै। जरूरत इसी बात की है कि निर्देशक सूझ-बूझ के साथ ऐसे प्रयोग करें। स्वतंत्रतापूर्व से लेकर स्वतंत्रता के पश्चात् तक हिन्दी रंगमंच की विकास यात्रा में निरन्तर चलते आ रहे रूपों का वर्णन करते हुए कथा साहित्य का मंचन की भूमिका को हिन्दी रंगमंच की विकास-यात्रा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव घोषित किया है। एक साहित्यिक प्रकाश स्तम्भ बनकर साहित्यिक क्षेत्र में व ज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकेगा।

हिन्दी रंगमंच के सन्दर्भ में कहानी के अंशों को नाट्यांरित किए बिना सीधे खेलने की जो परम्परा शुरू हुई, वह देश की अन्य भाषाओं के रंगमंच में नहीं मिलती। यह हिन्दी रंगमंच की खास स्थिति के कारण सम्भव हुआ। ”छठे-सातवें दशकों में इब्राहिम अल्काजी द्वारा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में रंगमंच को लेकर जिस काम की शुरूआत हुई। वह एक ऐसी ‘तकनीकी क्रांति’ थी जिसने पहली बार नाटक को अखिल भारतीय स्तर पर एक विकासशील और जीवंत रंगमंच का व्यापक सन्दर्भ दिया।

कहानी का नाट्यांतरण किए बिना उसे रंगमंचीय रूप में प्रस्तुत करना अपने आप में कई प्रश्न खड़े करता है। कई आलोचक हिन्दी रंगमंच को अनुवादों और रूपान्तरों का रंगमंच कहते हैं।

इसप्रकार विभिन्न साहित्यकारों के कथा-साहित्य को रंगमंचीयता प्रदान करने की विपुल संभावना देखी जा सकती है और प्रयोगशीलता के नये आयाम में जोड़कर हिन्दी साहित्य को संवर्धित किया जा सकता है। उपन्यास व कहानी का रंगमंच ठेठ हमारा भारतीय रंगमंच है। जिसमें कई सम्भावनाएँ छिपी हैं। जरूरत है उन पर काम करने की और दूर कस्बों, देहातों तक इसे प्रसारित व प्रचारित करने की।

जैसा कि विदित है हर व्यक्ति की जिन्दगी स्वयं में एक नाटक है और उसकी जीवनी एक रंगमंचीय धरातल, ग्राम्य जीवन के परिवेश से लेकर महानगरीय जीवन की विभिन्न शैलियों पर दृष्टिपात करें तो विभिन्न मनोवैज्ञानिक पहलू देखने को अनायास ही मिल जाते हैं। उसे बेशक कोई साहित्यिविज्ञ अपनी लेखनी से शब्द चित्रात्मकता देने की कोशिश करता है, पर वह सफलतम रूप मंच पर ही सामने आ पाता है।

विभिन्न मुहावरों में कहीं-न-कहीं कोई घटना जुड़ी होती है जो हमारे नित प्रतिदिन के जीवन में उपयुक्त होती रहती है। यथा – नाच न जाने आंगन टेढ़ा। खेत खाए गधा, मार खाए जुलाहा आदि का विभिन्न बृहद फलकों में देखकर उसको अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को उजागर किया जा सकता है।

संदर्भ:

  1. पशयन्ती, धर्मवीर, भारती, पृष्ठ 124-25
  2. जयदेव तनेजा, फिल्मी सितारों का एक अभिनय, हिन्दुस्तान, 1 अप्रैल, 1996
  3. नटरंग, 1984
  4. कहानी का रंगमंच, महेश आनंद

सम्पर्क-शोधार्थी, पीएच.डी. (हिन्दी) जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( जुलाई-अगस्त 2017, अंक 12), पेज – 39

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