शहीद उधम सिंह की आत्मकथा

सेवा देश दी जिंदड़ीए बड़ी ओखी,
गल्लां करनियां ढेर सुखल्लियां ने।
जिन्नां देश सेवा विच पैर पाइया
उन्नां लख मुसीबतां झल्लियां ने।
ये पंक्तियां मेरी जेब में हमेशा ही रहती हैं। अपने करतार सिंह सराभा के गीत की हैं। सराभा ? साढ़े उन्नीस साल की उम्र में ही फांसी पर चढ़ाया गया था उसे। गदर पार्टी का हीरो था हीरो । क्रांतिकारियों का प्रेरणा-पुंज। शहीद भगतसिंह की जेब में तो सराभा की फोटो हमेशा रहती थी। गदर पार्टी का अखबार छापते थे सराभा। बड़ा दिलचस्प विज्ञापन छपता था उसमें। जरूरत है …. जोशीले …. बहादुर …. सैनिकों की
तनख्वाह – मौत
इनाम – शहादत
पेंशन – आजादी
कार्यक्षेत्र – हिंदोस्तान

मुझे जानते हो? शहर के चौक पे लगा बुत कुछ कुछ मेरी शक्ल से मिलता है और उस पर नाम लिखा रहता है – शहीद उधम सिंह। मेरी जिंदगी की दास्तान जानने की इच्छा है। कहां से शुरु करें। चलो शुरु से ही शुरु करता हूं।
उन्नीसवीं सदी खत्म होने और बीसवीं सदी शुरु होने में केवल पांच दिन बाकी थे जब जन्म हुआ। हिसाब किताब लगाने लगे। 26 दिसम्बर 1899। दिन था मंगलवार।
कोई भी शख्स अपने माहौल, अपने जमाने की हलचलों और अपनी परंपरा से ही बनता है। किसी शख्सियत को जानना हो तो उस माहौल को देखो जिसमें वो पला-बढ़ा।
जन्म हुआ सुनाम कस्बे में। उस समय पटियाला रियासत का भाग था अब पंजाब का एक जिला है। पंजाब गुरुओं की धरती है। गुरुओं की शहादत और त्याग के किस्से तो घुट्टी में मिलते हैं यहां। लैला-मजनूं, शीरीं-फरहाद, सोहनी-महिवाल के प्रेम किस्से बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं। ये किस्से भी त्याग से ही शुरु होते हैं और खत्म होते हैं शहादत पर।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी त्याग और बलिदान की दास्तान है। पंजाब में हथियारबंद आंदोलनों व शहादत की धारा खूब परवान चढ़ी। कूका-आंदोलन, गदर-पार्टी, बब्बर अकाली, नौजवान भारत सभा, किरती पार्टी और साम्यवादी ग्रुप सब हथियारों से हिचकिचाहट नहीं करते। इन हिरावल दस्तों में लड़ाके थे – किसानों और मजदूरों के बेटे। वो इसलिए कि अंग्रेजों के जमाने में सबसे ज्यादा दुर्गति इन्हीं की हुई थी। राजे-रजवाड़े, जागीरदार तो चांदी कूट रहे थे अंग्रेजों के साथ मिलकर। आप भी लूटो और लूट में साथ दो यही था इनका जीवन-सूत्र ।
मेरे पिता छोटे किसान थे। खेती करते। मिट्टी के साथ मिट्टी होना पड़ता तब चार दाने हाथ लगते। कितना ही पैदा कर लो। शोषण की चक्की में बचता ठन-ठन गोपाल। खाने के लाले पड़े रहते। जिस बंदे को दो टाइम की रोटी नसीब ना हो उसकी सामाजिक हैसियत का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल थोड़े ही है। बड़ा असर पड़ता है बंदे की पर्सनल्टी पर काम-धंधे का। परिवार की बैकराऊंड का। किसान को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। नेचर के साथ। खुले में। गर्मी-सर्दी-बरसात, अंधेरा-उजाला। कोई विंटर वेकेशन नहीं, कोई समर वेकेशन नहीं। भोलापन, सादगी, स्पष्टवादिता किसान के करेक्टर में रचे बसे होते हैं। एक ओर बड़ी खास बात होती है – घोर विपति भी जिंदगी का प्रसाद मानकर हंसते-हंसते खा लेना।
मां का नाम हरनाम कौर और बाप था श्री टहल सिंह। सुना है पहले मेरी मां का नाम था नरैणी था और बाप का चुहड़ राम। सोच में पड़ गए कि फिर ये नाम कैसे बदल गए। बताता हूं …
एक थे बाबू धन्ना सिंह। नीलोवाल नहर पर ओवससियर बन कर आए थे। उनका दफ्तर और घर सुनाम में था। बड़े धर्म-कर्म वाले आदमी थे। मेरे पिता उनके संपर्क में आ गए और उनसे प्रभावित होकर अमृतपान कर लिया। उस मौके पर मां नरैणी से हो गई हरनाम कौर और बापू चूहडऱाम हो गए टहलसिंह।
दरअसल खालसा पंथ की नींव रखते समय गुरु गोबिंद सिंह ने पानी के कड़ाहे में शक्कर घोली थी अपने खांडे की धार से। उसी कड़ाहे से मुंह लगाकर पिया था सबने। कोई झूठ-सूच नहीं थी। सब बराबर। कोई जात न पांत। ऊंच ना नीच। यही है अमृत छकना – अपने को समर्पित करने का भाव जगाने की एक क्रिया।
दरअसल बात ये थी कि बाबू धन्नासिंह ने नहर पे मेरे बापू की नौकरी भी लगवा दी थी – यही बेलदार वगैरह। कुछ लोग ये भी कहते हैं पिता जी उनके घरेलू नौकर थे। जो भी हो। एक बात पक्की है जब उनकी सुनाम से बदली हो गई तो पिता जी बेरोजगार हो गए थे।
बचपन को याद करना तो ऐसा है जैसे हथेली पे अंगारा रख दिया हो। मां की तो शक्ल भी याद नहीं। मैं जब तीन साल का भी नहीं हुआ था तो वो दुनिया से चलाणा कर गई। कहते हैं बुखार बिगड़ गया था। घर में बच गए तीन जीव। बापू, मैं और मेरा बड़ा भाई साधु सिंह। भाई मुझसे तीन साल बड़ा था।
मां गुजर गई और बापू के पास कोई रोजगार नहीं। सोचता हूं तो मैं थोड़ा भावुक हो जाता हूं। बापू पे क्या बीती होगी? दो छोटे-छोटे बच्चे रोजगार कुछ है नहीं। पर पेट तो खाने को मांगता है।
पिता जी ने रेलवे की नौकरी कर ली। उपाली गांव में डयूटी। नौकरी थी – फाटकमैन। काम कुछ खास नहीं था। दिन में एक-दो गाड़ी गुजरती। गाड़ी आई, फाटक बंद कर दिया। गाड़ी गई, फाटक खोल दिया। सारा दिन खाली। रेलवे क्वाटर में रहते। क्वाटर क्या वह कोठड़ी ही थी। पिता जी किसान तो थे ही। आस पास की जमीन ठीक कर ली। सब्जी उगा ली। दूध पीने के लिए बकरियां पाल ली। मैं छोटा सा ही था। पर मेरा भाई साधु सिंह उनकी मदद कर देता। टाइम ठीक गुजरने लगा।
एक दिन एक घटना घटी। याद करके रोमांच हो आता है। हुआ ये था कि एक दिन सवेरे-सवेरे मुंह अंधेरे पिता जी जंगलपानी के लिए चले गए। बकरियों के बाड़े में एक भेडिय़ा घुस आया। बकरियां मिमियायी। जानवर है तो क्या। जान तो सभी को प्यारी होती है। मेरी आंख खुल गई। मुझे इतनी अक्ल तो थी नहीं। पता नहीं कैसे हुआ। मैंने कुल्हाड़ी उठाई और भेडिय़े को दे मारी। इतने में शोर सुनकर पिता जी भी आ गए। गांव के भी कुछ लोग दौड़े दौड़े आ गए। आदमियों के आने की बीड़क सुनकर भेडिय़ा भाग गया। लोगों ने मेरे हाथ में कुल्हाड़ी देखी तो उन्होंने बड़ी शाबासी दी। मुझे बहादुर, निडऱ कहकर पीठ थपथपाने लगे। कहने लगे नाम ही शेरसिंह नहीं, बच्चे का दिल भी शेर का है।
औलाद की तारीफ सुनकर पिताजी को खुशी तो जरूर हुई होगी। लेकिन उनके मन में दहशत बैठ गई। पिता जी ने सोचा होगा किसी दिन भेडिय़ा फिर आ गया। बच्चों को खा गया तो इस नौकरी को क्या चाटूंगा? जान की सुरक्षा तो रोजगार की सुरक्षा से पहले चाहिए।
छ: महीने में ही नौकरी छोड़ दी। अपने टांडे-टिरे उठाकर चल दिए अमृतसर शहर की ओर। चल तो दिए लेकिन अमृतसर पहुंचे नहीं। रास्ते में ही उनके मौत हो गई। ये बात हैं 1907 की। आठ साल का था मैं।
धुंधली सी याद है। इतने सालों बाद भी वो दृश्य नहीं भूलता मुझे। जब पिता जी ने हमारे दोनों भाइयों के हाथ सरदार चंचल सिंह के हाथ में पकड़ा कर कहा था, मेरे बच्चों का ख्याल रखना। इससे आगे जुबान उनके तालू से चिपक गई थी।
असल में पिता जी थे बीमार। उपाली गांव से अमृतसर के लिए चले तो रास्ते में बीमारी बढ़ गई। भैंसावाले टोबे पर उदासी संन्यासी ठहरे हुए थे। हम भी वहीं ठहर गए। पिताजी बेहोश हो गए। पिता जी की हालत देखकर उन संन्यासियों को हम पर तरस आ गया। हमें खाना दिया। पिता जी को दवाई भी दी। लेकिन बीमारी में कोई फर्क नहीं पड़ा। संन्यासियों ने भांप लिया कि पिता जी बचेंगे नहीं। वे मुझे और मेरे भाई को अपने सम्प्रदाय में शामिल करने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने हमें पीला पटका भी हमें पहनाना शुरु कर दिया था।
एक दिन वहां से तरन तारन वाले सरदार छांगा सिंह का जत्था गुजर रहा था। उसमें सुनाम के रहने वाले सरदार चंचल सिंह भी थे। उन्होंने पिता जी को देखते ही पहचान लिया। पिता जी ने हम दोनों के हाथ सरदार चंचल सिंह के हाथ में पकड़ा दिए और बड़ी ही दीनता से कहा मेरे बेटों का ध्यान रखना। सरदार चंचल सिंह पिता जी को और हमें तांगे में ले गए। पिता जी को अस्पताल में दाखिल करवा दिया। वहां डाक्टर ने जांच की और आश्वासन दिया कि ठीक हो जायेंगे। चंचल सिंह जी हमें साथ लेकर घर चले गए। जब अगले दिन अस्पताल पहुंचे तो हमें अनाथ होने की सूचना मिली। मुझे सिर्फ इतना याद है कि साधूसिंह तो बुक्का फाड़ के रोये जा रहा था और सरदार चंचल सिंह हमारे सिर पर हाथ रखे हमें दिलासा दे रहे थे। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उनको देखकर मैं भी सुबकने लगा था।
जिंदगी का दूसरा अध्याय शुरु हो गया। हम पहुंच गए सेट्रल सिक्ख अनाथाश्रम, अमृतसर में।
वहां पहुंचने की कहानी ये है। सरदार चंचलसिंह थे – धर्म प्रचारक। उन्होंने जाना था अपने जत्थे के साथ बर्मा। घर पे कोई था नहीं जो हमारी देखभाल करता। उन्होंने सोचा कि हमारे लिए अनाथाश्रम ही ठीक है। 24 अक्तूबर 1907 को सरदार छांगा सिंह और किशन सिंह रागी ने हमें दाखिल करवा दिया। पूरा रिकार्ड है। अनाथाश्रम के दाखिल-खारिज रजिस्टर में मेरा नाम दर्ज है शेर सिंह और भाई का साधु सिंह।
आप कन्फूयज न हों? क्रांतिकारी के लिए नाम बदलना जरूरी सा हो जाता है कई बार। मेरे नामों की कहानी बड़ी दिलचस्प है। मां-बाप ने मेरा नाम रखा था – शेरसिंह। उधमसिंह नाम तो मेरा तब पड़ा जब मैं जिंदगी के चौंतीस साल बिता चुका था। 20 मार्च 1933 को लाहौर से उधम सिंह के नाम से मैंने पासपोर्ट बनवाया। तभी से उधमसिंह मेरा नाम है। ये इसलिए किया क्योंकि 1927 में मुझ पर मुकदमा बना। गदरी साहित्य और गैर-कानूनी हथियार रखने के जुर्म में। सजा हुई। मेरे सारे नाम फ्रेंक ब्राजील, उधे सिंह, उदय सिंह, शेर सिंह वगैरह सब पुलिस रिकार्ड में आ चुके थे। मुझे उन देशों का वीजा नहीं दिया जा रहा था जिनमें गदर पार्टी का असर था।
जब अनाथाश्रम में दाखिल हुआ तो मेरा नाम उधे सिंह कर दिया। मेरे भाई का नाम भी बदल दिया था। साधु सिंह से मुक्ता सिंह।
मेरा एक ओर नाम है … जिसे मैं बहुत पसंद करता हूं। यह मैने खुद ही रखा है। पता है क्या ? मोहम्मद सिंह आजाद। मैंने बाजू पर टैटू बनवाया हुआ है इस नाम का। जब कैक्सटन हाल में मैंने ओडवायर को गोली मारी तो मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से ही मैने पुलिस को बयान दिया था। मंैने कहा था कि मेरा नाम ना बदल देना। मेरा नाम है मोहम्मद सिंह आजाद।
मेरे जैसे वक्त के मारों के लिए वरदान था अनाथाश्रम। अनाथाश्रम में रहा दस साल। उस समय अनाथाश्रम के मैनेजर थे सरदार सोहनसिंह बाबू धन्ना सिंह के दामाद। वही ओवरसीयर बाबू धन्ना सिंह जिन्होंने मेरे बापू जी की नौकरी लगवाई थी। बाबू धन्नासिंह की बेटी सरदारनी मायादेवी ने साधूसिंह को पहचान लिया था।
अनाथाश्रम की जिंदगी बाहर जिंदगी से कुछ अलग थी। बंधा-बंधाया नीरस सा रूटीन। सुबह उठो। शौच जाओ। नहाओ। पाठ करो। नाश्ता करो। फिर दो तीन घंटे कुछ काम करो। दोपहर का खाना खाओ। शाम कुछ खेल लो। फिर खाना खाओ। पाठ करो। सो जाओ। हर रोज वही रूटीन।
जिंदगी के सबक यहीं सीखे। घूमने निकल जाते जिधर मन करता। रेलवे स्टेशन, रामबाग, हाल बाजार, सिविल लाइन। कहीं भी। जलसा-जुलूस निकलता तो लेते साथ साथ। बड़ा मजा आता जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने में। एक बात जिसने मुझे तोड़ दिया ये थी कि मेरे भाई साधु सिंह भी मुझे दुनिया में अकेला छोड़ गए। निमोनिया बिगड़ गया था। ये बात है 1917 की। मन बहुत ही उदास हो गया था। लगता था दुनिया ही उजड़ गई। मन में बुरे बुरे ख्याल आते।
अनाथाश्रम में सबको कुछ न कुछ काम करना पड़ता। मेरा मन पेचकस-प्लास में लगता। मशीनों के साथ मजा आता। नतीजा ये हुआ कि मैं मकैनिक बन गया। ये हुनर जिंदगी भर काम आया। दुनिया में कहीं भी गया इसी हुनर से अपनी जगह बना ली। साईकिल-मोटर साईकिल मैं ठीक कर देता। लकड़ी-लोहे का सारा काम मैं कर लेता। बिजली का काम मैं कर लेता। मेरा हाथ साफ था। दोस्त-मित्र मुझे इंजीनियर कहते। मजे की बात है अमेरिकी रिकार्ड में भी इंजीनियर लिखा है। औपचारिक शिक्षा की डिग्री कोई थी नहीं। हां उर्दू, गुरमुखी पढ़-लिख लेता और कामचलाऊ अंग्रेंजी भी। अंग्रेजी सरकार के रिकार्ड में भी मुझे कम पढ़ा लिखा यानी पुअर एजुकेटिड़ ही बताया है।

स्रोतः डा. सुभाष चंद्र, शहीद उधमसिंह की आत्मकथा, देस हरियाणा प्रकाशन, कुरुक्षेत्र

 

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.