सिनेमा

हरियाणा प्रदेश के स्वर्ण जयंती वर्ष के पड़ाव पर यदि हरियाणवी सिनेमा की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करें तो निराशा ही हाथ लगती है। सन् 1984 मेंं प्रदर्शित हुई हरियाणवी फीचर फिल्म चंद्रावल ने सही मायने में प्रदेश के गीत-संगीत एवं संस्कृति की अमिट छाप छोड़ी तथा इस फिल्म ने आशातीत सफलता अर्जित की किंतु ‘चंद्रावल’ से पहले या बाद में कोई भी हरियाणवी फिल्म इस सफलता की राह पर नहीं टिकी। इस तरह हरियाणवी सिनेमा और ‘चंद्रावल’ एक दूसरे के पर्याय बनकर उभरे।

क्षेत्रीय सिनेमा की पहचान और साख बनाने में जो मूलतत्व निरंतरता से दिखने चाहिए वे हरियाणवी सिनेमा में नदारद रहे। यही कारण है कि फिल्मों के शौकीन भी हरियाणवी फिल्मों के इतिहास के नाम पर चंद्रावल के अलावा ‘बहूराणी’, ‘लाडो’, ‘गुलाबो’, ‘पनघट’, ‘जर-जोरू और जमीन’ आदि पांच-सात फिल्मों के नाम गिनवाकर इतिश्री कर लेते हैं किंतु हरियाणवी सिनेमा के चार दशकों से ज्यादा के सफर ने पांच दर्जन से अधिक फिल्में देकर कोई दूसरी चंद्रावल तक देने की सफलता अर्जित नहीं की। इससे प्रदेश के सिनेमा के सफर के गुणात्मक परिणाम का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

हरियाणा प्रदेश के गठन के सात साल बाद पहली हरियाणवी फिल्म के रूप में प्रेम-गाथा पर एक श्याम-श्वेत फिल्म ‘बीरा शेरा’ पदार्पित हुई तथा अगले ही साल ‘चौधरी हरफूल’ ने इस यात्रा को आगे बढ़ाया तथा फिर यह सिलसिला सन् 1984 तक जारी रहा तथा ‘चंद्रावल’ ने हरियाणवी सिनेमा की खनक व धमक को हरियाणा, दिल्ली, यूपी से दूर मायानगरी तक पहुंचाकर धूम मचायी। हरियाणा के देहात से पहली बार लोग टैक्टर-ट्राली भर-भर कर शहरी व कस्बाई सिनेमाघरों में टूट पड़ते दिखाई दिए। ‘जीजा मैं गौरी तू काळा घणा’ जैसे माटी के गीत लोक धुनों पर गांव नगर में गूंजने लगे। रूंडा-खुंडा जैसे हास्य पात्र जनमानस में रचते बसते चले गये।

गाडिय़ा लोहार एवं जमींदार परिवार की नव पीढ़ी के बीच जन्मी प्रेम कहानी के कथानक को हर कोई देखने पर विवश सा हो गया। हालांकि तकनीकी तौर तथा कुछ अन्य पक्षों को लेकर ‘चंद्रावल’ में भी अनेक खामियां थीं किंतु ‘चंद्रावल’ में माटी की सोंधी महक के रस घोलते गीत, संगीत, कथानक, अभिनय, हास्य, संवाद आदि वे बहुआयामी पक्ष थे जिसके चलते ढ़ाई लाख में बनी इस फिल्म ने न केवल ढ़ाई करोड़ कमाये अपितु हरियाणवी सिनेमा को नयी ऊंचाई दी। अनेक सिनेमाघरों में रजत जयंती तथा एक सिनेमाघर में स्वर्ण जयंती मनाई।

इस फिल्म के लेखन-निर्देशन से जुड़े कलाकारों को हरियाणी संस्कृति की अच्छी खासी समझ थी। प्रख्यात लोकमर्मज्ञ देवीशंकर प्रभाकर की कहानी, उनके पुत्र जयंत प्रभाकर की पटकथा व निर्देशन, लोकसंगीत के पारखी जेपी कौशिक का संगीत निर्देशन, आधा दर्जन माटी की सोंधी महक के गीत, रंगमंच के मंजे हुए कलाकारों का अभिनय जगत जाखड़, उषा शर्मा, अनूप लाठर, ओंकार तेवतिया, रेखा वर्मा, राजू मान, लीला सैनी हरियाणवी हास्य के चितेरे दरियाव सिंह मलिक, नसीब सिंह कुंडू के रूंडा-खुंडा की हंसोड जोड़ी ने हरियाणवी सिनेमा को पहली बार मौलिकता देकर नये कीर्तिमान स्थापित किए।

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ऐसा नहीं कि ‘चंद्रावल’ के बाद हरियाणवी पृष्ठभूमि पर अच्छी फिल्में नहीं बनी किंतु विभिन्न कारणों के चलते प्रदेश की जनता ने किसी भी प्रयास को ‘चंद्रावल’ की तरह हाथों हाथ नहीं लिया। चंद्रावल की करिश्माईसफलता को देखकर हरियाणवी फिल्मों की बाढ़ सी आने लगी। सन् 1973 से प्रारंभ हुई हरियाणवी सिनेमा की यात्रा में जहां चंद्रावल (1984) चौथी फिल्म ही थी वहीं सन् 1985 में पांच फिल्में ‘छैल गैल्या जांग्यी’, ‘लीलो चमन’, ‘प्रेमी रामफल’, ‘म्हारा पीहर सासरा’, ‘चंद्रकिरण’ रिलीज हुई। अगले वर्ष 1986 में इनकी संख्या एकदम दुगनी हो गयी तथा दस फिल्में एक साल के भीतर प्रदर्शित हुई, जिनमें उन्हीं जयंत प्रभाकर की ‘लाडो बसंती’, ‘गुलाबो’, ‘छोटी साली’ के अलावा अरविंद स्वामी की ‘छैल गाभरू’, ‘म्हारी धरती म्हारी मां’, ‘छोरा जाट का’ तथा अन्य की ‘भंवर चमेली’, ‘ले ज्यागा लणिहार’, ‘चंद्रकांता’, ‘भाभी का आशीर्वाद’ के नाम उल्लेखनीय हैं। इस तरह दो वर्ष में 15 फिल्में देने वाले हरियाणवी सिनेमा में कहानी, पटकथा, निर्देशन, अभिनय, गीत संगीत, वितरण, प्रसार जैसे पक्षों में वह गंभीरता एक मंच पर नहीं दिखी जिसमें उक्त सभी घटकों का उचित समावेश हो।

इनमें से कुछ फिल्मों ने संगीत में, कुछ ने कहानी में, कुछ ने निर्देशन में तो कुछ ने अभिनय में विशिष्ट पहचान बनायी, लेकिन फिल्में असफल ही रही। इन फिल्मों पर ‘जहां जाड़ थी वहां चने नहीं, और जहां चने थे वहां जाड़ नहीं’ वाली कहावत चरितार्थ हुई। फिर एक दौर चला हरियाणवी फिल्मों की सी.डी. बनाने का जिनमें हरियाणवी के नाम पर वह फूहड़ता व अश्लीलता परोसी गयी इससे हरियाणवी सिनेमा की छवि को भारी नुकसान पहुंचा।

हरियाणा प्रदेश के समृद्ध सैनिक इतिहास एवं प्रेरक शहादत परम्परा,  खेल व कृषि संस्कृति पर न के बराबर काम हुआ, जिन पर बालीवुड में निरंतर सफल प्रयोग होते रहे। हरियाणवी लोकगीतों को मायानगरी बड़ी चतुराई से फेरबदल कर मूल लोकधुनों के साथ इस्तेमाल करती रही। इतना ही नहीं करीब दो दर्जन चर्चित हिंदी फिल्मों व टी.वी. सीरियलों में ठेठ हरियाणवी बोली की ठसक व धमक को अपनाया गया तथा पिछले दिनों सुलतान ने तो न केवल बोली अपितु प्रदेश की प्रमुख खेल संस्कृति को केंद्र में रखकर वह सब कर दिखाया जिसके बारे में प्रदेश की सिनेमाई रचनाधर्मिता ने कभी सोचा ही नहीं। इस माटी के खेल कुश्ती को केंद्र में रखकर आमिर खान सरीखे बड़े अभिनेता की  फिल्म ‘दंगल’ भी निर्माण के अंतिम दौर में हैं।

चंद्रावल बाद आयी प्रेमगाथाओं को हरियाणा के दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। बम्बइया फिल्मों की नकल कर हरियाणवी के नाम से दर्शाए गये  प्रेम की स्वीकृति हरियाणा के परिवेश में नहीं थी।

फिल्म निर्माताओं की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की छिछली जानकारी व  प्रदेश सरकारों के घोर उपेक्षित रवैया हरियाणवी सिनेमा की बदहाली के प्रमुख कारण रहे। विभिन्न सरकारों ने भी हरियाणवी सिनेमा के लिए कोई ठोस व्यवहारिक प्रभावी नीति नहीं बनायी।  न ही हरियाणवी सिनेमा को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए खास योजनाओं को लागू किया गया। सरकार के प्रोत्साहन एवं संरक्षण के अभाव मेंं प्रदेश में सिनेमा संस्कृति धीरे धीरे दम तोड़ती चली गयी। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार हरियाणवी सिनेमा के विविध पक्षों को विकसित करने के लिए प्रेरक फिल्म नीति बनाये ताकि कला एवं संस्कृति के संरक्षण एवं संवद्र्धन में हरियाणवीं सिनेमा अपनी विशिष्ट पहचान बनाकर नये आयाम रच सके।

करीब एक दर्जन हिंदी एवं हरियाणवी फिल्मों में अभिनय के अलावा पटकथा एवं संवाद लेखन जैसी बहुआयामी निभा चुके अभिनेता विजय भाटोटिया का मानना है कि चंद्रावल उस दौर की फिल्म है जब सिनेमा हॉल की टिकट 12 आन्ने की थी, टीवी में सप्ताह में एक फिल्म व चित्रहार आता था जबकि आज नाखून (रिमोट) के नीचे सैंकड़ों स्टार तैयार खड़े रहते है। हिंदी फिल्में भी मात्र दस प्रतिशत ही चलती है। हरियाणवी क्षेत्र देश का दो फीसदी भी नहीं है। हरियाणवी फिल्मों ने अच्छी कहानी, अच्छा गीत-संगीत तथा बेहतर तकनीकी पक्ष भी दिया है, किंतु एक ओर महाराष्ट्र सरकार सब्सिडी के तौर पर वहां की क्षेत्रीय फिल्म को चालीस लाख रूपये देती है जिससे आधा रिस्क पहले ही दूर हो जाता है, किंतु हरियाणवी फिल्म बनाने का मतलब सौ प्रतिशत रिस्क लेना है। उनका मानना है कि मल्टीपलेक्स संस्कृति में प्रदेश सरकार को ठोस फिल्म नीति बनाकर सभी हरियाणवी फिल्मों को टेक्स फ्री करना चाहिए तथा मल्टीपलेक्स पर सप्ताह में एक शो क्षेत्रीय फिल्म का अनिवार्य तौर पर दिखाया जाना चाहिए।

चंद्रावल-2 तथा सुलतान जैसी चर्चित फिल्मों के अलावा अनेक टी.वी. सीरियल्स में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके झज्जर जिले के दुजाणा गांव निवासी अभिनेता एवं संगीतज्ञ दीपक कपूर का मानना है कि हरियाणवी कलाकरों ने सदा बॉलीवुड में अपनी प्रतिभा से तहलका मचाया है। नयी पीढ़ी में भी रणदीप हुड्डा, मेघना मलिक तथा यशपाल शर्मा जैसे फनकारों ने मायानगरी में अपनी खास पहचान बनाई है।

हरियाणवी सिनेमा को हरियाणवी कलाकारों की गुटबाजी ने ही डुबोया है। कलाकारों को एक दूसरे का सम्मान करते हुए टीमवर्क से हरियाणवी कला एवं संस्कृति पर आधारित कुछ नए एवं मौलिक प्रोजेक्ट बनाने होंगे। इतना ही नहीं सब कुछ बनाकर हमें बेचना नहीं आता, वस्तुत: मार्केटिंग के क्षेत्र में महारत हांसिल करनी होगी। ‘सतरंगी’ व ‘पगड़ी’ जैसी अच्छी फिल्मों को टैक्स फ्री करने के बावजूद अपेक्षित दर्शक नहीं मिलना चिंतनीय है। ‘पीहड़ की चुंदड़ी’ तथा ‘कुणबा’ जैसी हरियाणवी फिल्मों के अलावा रंगमंच से जुड़े ऋषि सिंहल का मानना है कि हरियाणवी में अब तक बनी अधिकांश फिल्में बॉलीवुड की फिल्मों से प्रेरित एवं प्रभावित रही हैं, जिसके चलते मसाला फिल्में ही ज्यादा बन पाई है। एक ओर हमें अपने प्रदेश की मूल संस्कृति, मिजाज एवं अंदाज के मौलिक स्वरूप को कहानी, संवाद, गीत एवं संगीत में परोसना होगा, वहीं दूसरी ओर प्रदेश सरकार को इस छोटे किंतु नई आशाओं से जुड़े प्रदेश के सिनेमा को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ ठोस नीतियां बनानी होगी।

प्रदेश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। आवश्यकता है उसे उचित मंच के साथ न्यायोचित प्रोत्साहन एवं मान सम्मान मिले। प्रदेश के जिन कलाकारों ने मुंबई तक अपनी छाप छोड़ी है, उन कलाकारों को एक दो बड़े हरियाणवी प्रोजेक्ट हरियाणवी सिनेमा में नयी जान फूंकने के उद्देश्य से करने होंगे।

फिल्म निर्माताओं, निर्देशकों, कलाकारों, रचनाकारों को चाहिए कि हरियाणा के स्वर्ण जयंती वर्ष में मौलिकता के साथ हरियाणवी सिनेमा की दिशा व दशा में व्यापक सुधार लाने के लिए अपना हरसंभव रचनात्मक योगदान दें।

इस रागनी में हरियाणवी फिल्मों के नाम ढूंढें...

हां, फिलम सैं ये हरियाणे की।
देख सलीमा बात नहीं सै या सरमाणे की।।

बीरा शेरा पहली म्हारी, जा सै फिलम बतायी रै।
हरियाणा था सात साल का, जब बणकै या आयी रै।
चौधरी हरफूल सिंह फेर्, अगले साल दिखायी रै।
नौ साल कै पाच्छै भाई, आयी थी बहूराणी वा।
चौक्खी-बढिया फिलम बतायी, आच्छी थी रै क्हाणी वा।
चन्द्रावल़ तै रूक्का पाट्या, लगी आग ज्यूं पाणी वा।

हां, फिलम थी न्यारे गाणे की।
रूंडा-खूंडा आळी जोड़ी, खूब हँसाणे की।।

के सुपने का जिकर करूं अर छैल गैल्यां आयी वा।
लीलो-चमन, भंवर-चमेली, चंद्रकिरण बतायी वा।
फेर गुलाबो पणघट ऊपर, थोड़ी न्यारी छायी वा।
प्रेमी रामफल, पीहर-सासरा, बीच-बीच म्हं आर्ही थी।
लाडो-बंसती, छैल-गाभरू, छोटी साळी प्यारी थी।
म्हारी धरती-म्हारी माँ अर चंद्रकांता नारी थी।

हां, बटेऊ, चंद्रो ल्याणे की।
घूंघट की फटकार लगी, बैरी समझाणे की।।

छोरा जाट का न्यूं बोल्या सुण, ले ज्यागा लणिहार दिखे।
झणकदार कंगणा कै गैल्यां, फूल बदन हुयी त्यार दिखे।
धन पराया फाग्गण आया, छोरा हरियाणा सार दिखे।
छोरी फेर सपेले की अर चंद्रो-छन्नो तीन रै।
जाट, जाटणी साथ छबीली, जर-जोरू जमीन रै।
छोरी नट की मुकलावा पै, यारी आळी बीन रै।

हां, वा लाडो थी पिया झाणे की।
चाँद-चकोरी साथ जनेत्ती सुण घर ल्याणे की।

खानदानी सरपंच गेल्यां, माटी वा हरियाणे की।
पीहर आळी फेर चूंदड़ी, काँच-चूडिय़ां भाणे की।
मुठभेड फेर चंद्रावळ तै, वादा फेर निभाणे की।
लंदन आळी छोरी गैल्यां, माटी करै पुकार रै।
फाइटर गैल्यां कुणबा बैठ्या, संग वो नम्बरदार रै।
सतरंगी पगड़ी का ऑनर, हुयी खूब तैयार रै।

हां, नाहडिय़ा, भाभी आसीस बताणे की।
मॉडर्न गर्ल अर देसी छोरा, दबंग छोरा धमकाणे की।।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 63

 

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