हरियाणवी लोक कथा


एक बर एक जवान आपणी घरआळी नैं लेण गया। सवारी खातर उसनैं घोड़ी ले ली। वापसी म्हं दोनों घोड़ी पै सवार होकै चाल पड़े।

रास्ते म्हं एक गाम तै लिकडऱे थे तो उननैं देख कै लोग बोल्ले, ‘रै देखो, जुल्म। माड़ी सी घोड़ी अर दो-दो सवारी।’

उनकी बात सुणकै जवान घोड़ी की लगाम पकड़ कै पैरें पैरें चालण लाग्या।

आगले गाम तै लिकडऱे थे तो उननैं देख कै लोग हांसण लागै अर बोल्ले, ‘रै देखो, कै टेम आग्या। बन्नो तो घोड़ी पै बिठा राखी ए। अर, आप पैर तुड़ार्या।’

उनकी बात सुणकै जवान तो घोड़ी पै बैठग्या अर लगाम घरआळी तै पकड़ादी।

आगले गाम तै लिकड़ण लागै तो लोग जवान पर त्योरी चढ़ाकर बोल्ले, ‘देखो रै, जमांए शर्म तार कै बगादी। मुस्टंडा तो घोड़ी पै बैठ्या। अर, या बच्यारी बईयर तै लगाम पकड़ा राखी ए।’

उनकी बात सुणकै दोनों पैदल चलण लाग गे।

आगले गाम तै लिकडऱे थे तो उननैं देख कै लोग हांसण लागै अर बोल्ले, ‘रै देखो, अक्ल बिना ऊंट उबाणें फिरैं। जै पैरें ए मरणा था तो यो घोड़ी क्यांनै सिंगार राखी ए।’

लोगां की बात सुणकै दोनों सोच म्हं पडग़े। सोचण लागे कै जै लोगां के हिसाब तै चालण लागै तो इब दो काम कर सकां। चै तो घोड़ी नै दबाद्यां चै घोड़ी नै सिर पै ठाकै चालां।

दुखी तो बोत ओए फेर या बात समझ म्हं आगी। अक जिस्तरां मरजी करले दुनिया जीण कोनी दींदी। हरेक स्थिति की अलग व्याख्या संभव है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज-51

 

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