खेती-बाड़ी

भारतीय गणतन्त्र में, एक अलग राज्य के रूप में हरियाणा 1 नवम्बर 1966 को अस्तित्व में आया जो पंजाब प्रांत का भाग हुआ करता था। चाहे हरियाणा क्षेत्र समेत पूरे पंजाब को पंजाब प्रांत ही माना जाता था फिर भी हरियाणा क्षेत्र एवं इस धरती की सदियों से अलग पहचान थी। यह राज्य आरम्भ से ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता की विशिष्ट पहचान रहा है।

भूगोल की दृष्टि से हरियाणा उत्तर में शिवालिक और दक्षिण में अरावली पहाडिय़ों से घिरा हुआ, पूर्व में यमुना नदी और पश्चिम में मरूस्थल है। वर्तमान हरियाणा का कुल क्षेत्रफल 44212 वर्ग किलोमीटर है। कुल बोए गये क्षेत्र का सिंचिंत क्षेत्र 88.3 प्रतिशत है। हरियाणा में कुल जोत 16.17 लाख हैं। कुल साक्षरता की दर 76.6 प्रतिशत है।

हरियाणा कृषि के 50 साल

1966 में हरियाणा बनने के समय खेती और पशुपालन ही प्रदेश का मुख्य धन्धा था तो हरियाणा का विकास भी मुख्य रूप से इन्हीं पर निर्भर करता था। लगभग 70 प्रतिशत जनसंख्या  कृषि पर निर्भर करती थी। 1966-67 में करीब 60 प्रतिशत आय का हिस्सा कृषि ही था, जबकि भारत में कृषि का हिस्सा 41.81 प्रतिशत था। आजादी के बाद इस क्षेत्र में फसलें और पैदावार देखें तो आज के संदर्भ में काफी पिछड़ापन था। (देखें तालिका-1)

हरियाणा के खेती के पचास साल से थोड़ा और पीछे जाने की आवश्यकता है तभी आधार का पता चलेगा। जैसा कि तालिका से स्पष्ट है पिछड़ी कृषि के चलते 1950-51 में गेहूं का क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता 362 हजार हैक्टेर 294 हजार मिट्रिक टन और 812 कि.ग्रा. प्रति हैक्टयर रही। इसी प्रकार चावल में यह संख्याएं 75, 43, और 573 रही। कुल चना (886,398,449), बाजरा (927,330,356) कुल दालें 995, 420 और कुल खाद्यान 2751 हजार हैक्टयर और 1247 मिट्रिक टन रहा। यहीं संख्याएं सन 1960-61 में गेहूं (628,  814, 1296), चावल (155, 175, 1729), चना (1543, 1274, 826), बाजरा (802, 235, 203), कुल दालें (1606,1303) और कुल खाद्दान (3721, 2761) रहीं। 1950-51 में कपास अमरीकन (2, 0.36, 180) देसी (52, 9.50, 183) गन्ना (56, 184, 3286 गुड़), सरसों (108, 33.7, 312) 1960-61 में कपास अमरीकन (48, 12.34, 257), देसी (39, 8.5, 2271) गन्ना (130,  519,  3992), गुड़  और सरसों (153, 80.7, 527) रही। 10 साल में कुछ पैदावार बढ़ी। विभाजन के समय 1965-66 में सूखे की वजह से कुल खाद्यान का क्षेत्रफल  3021 हजार हैक्टयर था और उत्पादन 1985 हजार मीट्रिक टन रहे।

1950-51 में कुल सिंचित क्षेत्र 19 प्रतिशत ही था जो 1960-61 में बढ़कर 32 प्रतिशत और 1965-66 में 35.5 प्रतिशत हो गया। सिंचाई का मुख्य स्रोत नहरें ही थी। अच्छे बीज, खाद, पानी, कीटनाशक मशीनरी इत्यादि की कमी और पिछड़ी कृषि तकनीकों की वजह से काफी पिछड़ापन बना रहा।

1966 में हरियाणा बनने के बाद कृषि क्षेत्र में भारत व हरियाणा में हरित क्रांन्ति के चलते कृषि में आशातीत उन्नति की है। उन्नत पैदावार वाले बीज, विकसित कृषि तकनीक, सिंचाई, खाद, कीटनाशक, ऋण की व्यवस्था, मशीनीकरण, बिजली, ट्रैक्टर, ट्यूबवैल आदि के प्रयोग से कृषि उत्पादन व उत्पादकता में काफी उन्नति हुई है और खाद्यान में आत्मनिर्भरता हो गई है।

हरियाणा में खेती के बदलाव में शिक्षा अनुसंधान व विस्तार सेवाओं के जरिए हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की विशेष भूमिका रही है। कृषि विभाग के तालमेल के जरिये विश्वविद्यालय ने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देने के साथ प्रदेश में पैदावार को काफी हद तक बढ़ाया है। बीज, खाद, पानी, कीटनाशक  मशीनरी आदि का प्रयोग और खेती के चौतरफा जानकारी बढ़ी है।

जहां 1970-71 में हरियाणा में उच्च पैदावार वाली किस्मों गेहूं, चावल, मक्का, बाजरा का क्षेत्रफल  55.8, 11.1,12.2,27.3 प्रतिशत  ही था तो 2013-14 में इन्हीं का 95.1, 43.5,70, 93.8 प्रतिशत है। बोए गए निविल क्षेत्र का सिंचाई का क्षेत्रफल  जो 1966-67 में 37.8, 70-71 में 43 प्रतिशत था तो 2013-14 में 88.3 प्रतिशत से कुछ उपर ही है। कीटनाशक व दवाईयों का प्रयोग जो 1970-71 में जो 412 टन था 2013-14 में करीब 15 गुणा बढ़कर 4080 टन हो गया है। खाद का प्रयोग 1970 में 70060 टन से बढ़कर 2013-14 में 1164671 टन करीब 17 गुणा हो गया और 1970 में 15.23 कि. ग्राम प्रति हैक्टयर से बढ़कर 212 कि. ग्रा. प्रति हैक्टयर हो गया। ट्रैक्टरों की संख्या 1970 में 12312 से बढ़कर 2013-14 में करीब 271729 हो गई जो कि 57 गुणा बढ़ोतरी है। हरियाणा में माल बेचने के लिए 107 नियमित मंडियां और 174 छोटे उप-स्थल हैं।

कृषि उत्पादन

हरियाणा बनने के बाद कृषि उत्पादन में खासी प्रगति हुई है। 1970-71 में जहां कुल खाद्यान 47.71 लाख टन था बढ़कर 2000-2001 में 81.70 लाख टन हो गया। जो 2013-14 में बढ़कर 169.73 लाख टन हो गया है। इसी प्रकार से गन्ने, कपास और तिलहन, सरसों इत्यादि का उत्पादन 1970-71 में 70.70, 3.73, 0.99 लाख टन से बढ़कर 2013-14 में 71.69, 19.43, 7.43 लाख टन हो गया है। गेहूं और चाल जो प्रदेश की मुख्य फसलें हैं उत्पादकता प्रति हैक्टयर जो 1970-71 में 2074 कि.ग्रा. और 1697 कि.ग्रा. थी 2000-2001 में 4106 और 2557 कि. ग्रा. और 2013-14 में 4722 और 3248 कि.ग्रा. हो गई जो भारत की गेहूं और चावल के औसत उत्पादन 3075 और 2424 कि.ग्रा. से काफी अधिक है। जहां गेहूं, चावल, सरसों कपास का क्षेत्र बढ़ा है। वहीं चना, बाजरा, ज्वार दालें, मक्का आदि का क्षेत्रफल   काफी घटा है।

इसके साथ-साथ वर्तमान में करीब 6.5 प्रतिशत क्षेत्रफल फल व सब्जियों आदि के अंतर्गत है। 1966-67 में फलों का कुल क्षेत्रफल (7.86 हजार हैक्टयर), उत्पादन (27.53 हजार टन) उत्पादकता (3.5 टन प्रति हैक्टयर) थी जो 2010-11 में बढ़कर 46.25 हजार हैक्टयर उत्पादन 356.6 हजार टन और उत्पादकता 13.04 टन प्रति हैक्टयर रही। 2014-15 में फलों का क्षेत्रफल  60.450 हजार हैक्टयर और उत्पादन 703.675 हजार टन रहा। सब्जियों का कुल क्षेत्रफल 1966-67 में 11.30 हजार हैक्टयर और कुल उत्पादन 135.36 हजार टन रहा जो 2014-15 में बढ़कर 3.60 लाख हैक्टयर और उत्पादन बढ़कर 52.86 लाख टन हो गया। मसालों की खेती का क्षेत्रफल  12610 हैक्टयर हो गया और उत्पादन 81.190 हज़ार टन जो 1966-67 मेंं नगन्य था।

फूलों की खेती 2014-15 में 6110 हैैक्टर क्षेत्रफल के साथ कुल उत्पादन 62,865 टन रहा। औषधीय उत्पादन अलोविरा, अरण्डी, स्टिविया आदि का क्षेत्रफल 618 टन पैदावार के साथ 1040 हैक्टयर तक पहुंच गया है। मशरूम 2014-15 में 10,390 टन तक हो गया।

पशुधन, मछली व कुकुट पालन

हरियाणा में पशुधन का विशेष महत्व है। प्रदेश में कृषि जी.डी.पी. (सकल घरेलू उत्पाद) का 35 प्रतिशत पशुधन और डेरी उद्योग से ही आता है। हरियाणा में एक कहावत सदियों से मशहूर है ‘देसां म्हं देस हरयाणा जित दूध दही का खाणा’ यह काफी सही है। आज बढ़ी हुई आबादी के बावजूद दूध, घी की पैदावार संतोषजनक है। 1966-67 में दूध का उत्पादन 10.89 लाख टन था। जो चौतरफा सरकारी व गैरसरकारी प्रयासों के चलते 2000-2001 में 48.49 लाख टन 2010-11 में 62.67 लाख टन और 2013-14 और 2014-2015 में 74.42 लाख टन और 79.01 लाख टन हो गया है। प्रति व्यक्ति, प्रतिदिन दूध की उपलब्धता जो 1966-67 में 352 ग्राम थी। 2000-2001, 2010-2011, 2013-2014 और 2014.15 में क्रमश: 640, 680, 773 और 805 ग्राम तक जा पहुंची है। प्रदेश में 6 मिल्क प्लांट हैं। करीब 18 दूध द्रूतशीलन केन्द्र हैं। इनमें 2013-14 में 1472.31 लाख लीटर तक दूध की खरीद हुई। वर्ष 2012 में पशुुगणना के अनुसार प्रदेश में कुल 89.98 लाख पशु हैं। जिनमें 18.08 लाख गाय और 60.85 लाख भैंस हैं। हरियाणा की मुर्रा नस्ल की भैंस व साहीवाल गाय विख्यात है।

आज हरियाणा में हरित क्रांति, सफेद क्रांति के बाद नीली क्रांति भी चल रही है। हरियाणा में जो मछली उत्पादन 1966-67 में सिफऱ्  600 टन था। 2014-15 में बढ़कर 1,11,203 टन मछली उत्पादन हो गया है। पैदावार 6,800 किलो प्रति हैक्टयर प्रति वर्ष है। 2014-15 तक अण्डों का उत्पादन 45,790 लाख और ऊन का उत्पादन 14.28 लाख किलोग्राम तक जा पहुंचा है।

हरित क्रांति एवं विकास के चलते हरियाणा की अर्थव्यवस्था में बड़े भारी बदलाव हुए हैं। 2004-05 की कीमतों के आधार पर प्रति व्यक्ति आय 1966-67 (608 रुपये) की तुलना में 2014-15 में 117.6 गुणा 71493 रुपए बढ़ चुकी है।

विभिन्न क्षेत्रों का योगदान का अनुपात  कि कृषि, उद्योग और सेवाओं का 1966-67 में 60.1, 17.6 और 21.7 प्रतिशत था, जो बदलकर 2000-2001 में 32.6, 27.9, 39.5 प्रतिशत हो गया। 2010-11 में 16.8, 28.7, 54.5 प्रतिशत और 2014-15 में करीब 14.1, 27.0, 58.9 प्रतिशत हो गया। यानी सेवा क्षेत्र की आमदनी कृषि क्षेत्र से 4 गुणा से अधिक हो गई है, जो करीब एक तिहाई के करीब हुआ करती थी। लेकिन खेती पर निर्भर रहने वालों की संख्या इस अनुपात से कम नहीं हुई। राज्य की करीब आधी आबादी खेती पर ही निर्भर करती है। खेती के विकास के बलबूते पर बड़े-बड़े उद्योग धन्धों का भी हरियाणा में काफी विस्तार हो चुका है।

कृषि पर गहराता संकट

जैसा कि ऊपर बताया गया कि हरियाणा बनने के बाद कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों में काफी तीव्र गति से विकास हुआ। परिश्रमी किसानों व कृषक मजदूरों ने प्रदेश की आय बढ़ाने में भरपूर मदद की। अन्न भण्डारण में प्रदेश का विशेष योगदान है। केन्द्र द्वारा प्रदेश में गेहूं और चावल की खरीद 2015-16 में 67.78 और 26.61 लाख टन रही, जो केन्द्र द्वारा कुल खरीद का 24.13 और 8.37 प्रतिशत है।

आज खेती पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं। अधिकांश किसानों में खुशहाली नहीं बल्कि गहरा असंतोष है और लगातार आक्रोश बढ़ता जा रहा है। सैंकड़ों किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हुए हैं।   इन कारणों की खोजबीन जरूरी है। वैसे तो किसान प्रकृति की गोद में रहता है। प्राकृतिक कारण खूब असर डालते हैं, जैसे सूखा, अकाल, बाढ़, कीट आदि। लेकिन अन्य कारण भी हैं।

घटती जोत

किसानों के पास जोत लगातार घटती जा रही है। प्रदेश में कुल 16.17 लाख जोत हैं, जिसमें 48.1 प्रतिशत एक हैक्टेयर से कम के सीमांत किसान हैं, एक से दो हैक्टेयर के 19.5 प्रतिशत छोटे किसान हैं। 2 हैक्टेयर से ऊपर 32.4 प्रतिशत हैं। औसत जोत 2.25 हैक्टेयर हैं। करीब 67.6 प्रतिशत तो 2 हैक्टेयर से कम के किसान हैं। आज के युग में परिवार चलाने के लिए काफी छोटी जोत है। अपनी जमीन को बेहतर ढंग से प्रयोग करने पर भी थोड़ी राहत जरूर मिलेगी पर ईलाज नहीं है।

लागत

उत्पादन की लागतों में लगातार वृद्धि हो रही है। बीज, खाद, डीज़ल, कीटनाशक, मशीनरी, पानी इत्यादि मंहगी हो गए हैं। अब काफी खर्चे के साथ ही खेती सम्भव है। वर्ष 1975-76 और 2015-16 की खरीफ  और रबी कुल लागत की तुलना करें तो आश्चर्यजनक परिणाम सामने आएंगे। चावल की कुल लागत 2,794 रुपए प्रति हैक्टयर, बाजरा की 1,527 रुपए, ग्वार की 816 रुपए कपास अमरीकन की 2,093 रुपए प्रति हैक्टयर रही। 2015-16 में यही लागतें चावल 1,09,073 रुपए प्रति हैक्टयर, बाजरा 38,495 रुपए, ग्वार 39,700 रुपए और कपास बी. टी. 77,685 रुपए प्रति हैक्टयर रही। चावल, बाजरा, ग्वार और कपास में यह लागतें 39.02 गुणा, 25.21 गुणा, 48.65 और 37.13 गुणा बढ़ी।

इसी प्रकार से यह कुल लागत प्रति हैैक्टेयर गेहूं, चना, सरसों, गन्ना में जो 1975-76 में 2,556 रुपए, 924 रुपए, 924 रुपए, 1,285 रुपए, 3,833 रुपए प्रति हैक्टयर से 2015-16 में बढ़कर 74,228 रुपए, 45,995 रुपए, 51,088 रुपए और 2,36,058 रुपए प्रति हैक्टेयर हो गई। इस प्रकार क्रमश: 29, 49.79, 39.75, 61.68 गुणा बढ़ी।

अब कीमतों की बढ़ौतरी प्रति क्विंटल विश्लेषण से पता चलता है तो लागत के मुकाबले कम बढ़ी है।

1975-76 में औसतन गेहूं 104.19 रुपये, चना 99.59 रूपये, सरसों 175-29 रुपये, गन्ना 12.61 रुपये, चावल बौनी किस्म 76.10 रुपये, बाजरा संकर 114.44 रुपये, ग्वार 131 रुपये, कपास अमरीकन 255.91 रुपए प्रति क्विंटल बिके। इस प्रकार 2015-16 में रबी मेें गेहूं 14.63 गुणा, चना 52.34 गुणा, सरसों 20.64 गुणा, गन्ना 24.25 गुणा, चावल 19.05 गुणा, बाजरा 10.30 गुणा, ग्वार 26.67 गुणा, कपास बी.टी. 1975-76 के मुकाबले 16.63 गुणा बिकी, जबकि लागतों मेें बढ़ोतरी काफी ज़्यादा है। फसलों की कीमतों में वृद्धि 1975-76 से 2015-16 तक प्रति क्विंटल 13 से 25 गुणा तक सभी फसलों में है, जबकि चना और ग्वार में जिसका क्षेत्रफल काफी घटा हुआ है 26 से 53 गुणा तक है।

2015-16 में चावल बौनी किस्म 1450 रुपये, बाजरा 1224 रुपये, ग्वार 3494 रुपये, कपास बी.टी. 4256 रुपए प्रति क्विंटल बिके गेहूं, चना, सरसों क्रमश: 1525 रुपये, 5214 रुपये, 3618 रुपए और गन्ना 305 रुपए प्रति क्विंटल बिके।

यदि हम चालू लागत (जिसमें भूमि का लगान व कुछ अन्य मद शामिल नहीं होते हैं पर कुल आय 1975-76 के मुकाबले में गेहूं 37.42 गुणा, सरसों 57.68 गुणा, गन्ना 60 गुणा और चना 63.27 गुणा एवं चावल 33.2 गुणा कपास 22.25 गुणा, बाजरा 29.1 गुणा, ग्वार 20.57 गुणा बढ़े।

यदि कुल लागत जिसमें भूमि का लगान आदि शामिल हैं उस पर कुल आय देखें तो 1975-76 के मुकाबले 2015 खरीफ़ में चावल, बाजरा व कपास पर घटी है और गेहूं 13.17 गुणा,  चना 46.15 गुणा, सरसों 43.53 गुणा और गन्ना की आय 2015-16 में 8.39 गुणा ही बढ़ी है।

उसके मुकाबले सेवा क्षेत्र में नौकरी पेशा लोगों को 150, 200, 250 गुणा तक और कारपरेट जगत में 300 से 600 गुणा तक इन वर्षों में आय बढ़ी है। कारपोरेट जगत में धन्ना सेठों की तो बात ही छोडिय़े जिनकी हज़ारों गुणा तक आय और मुनाफे बढ़े हैं। यह किसानों के साथ घोर अन्याय और धोखा नहीं है तो क्या है ?

कृषि ऋण

आज खेती में बड़ा भारी ख़र्चा है। खतरे और अनिश्चिताएं बेशुमार हैं। पैदावार, कीमतों और आय की अनिश्चिताएं हैं। एक पुरानी कहावत है ‘किसान कर्ज में पैदा होता है और कर्ज में ही मर जाता है।’ पैदावार हो आमदनी बढ़े तो कर्ज का फायदा ही फायदा है। आमदनी नहीं हुई तो कर्ज के नीचे किसान दबता ही चला जाता है। सितम्बर 2015 तक कृषि क्षेत्र में वाणिज्य बैंकों, ग्रामीण बैंकों, सहकारी बैंकों और हरियाणा प्रदेश सहकारी कृषि एवं बैंक ग्रामीण विकास का क्रमश: कुल कर्ज 19719.06 करोड़, 5893.07 करोड़ और 82.66 करोड़ रुपए हैं एवं कुल ऋण 25964.79 करोड़ रुपए है।

मेरे खुद के सर्वेक्षण के अनुसार यदि 60 प्रतिशत कर्ज सरकारी बैंको का है तो 40 प्रतिशत आढ़तियों, महाजनों, मित्रों, रिश्तेदारों आदि का है। आप हैरान होंगे कि अकबर के जम़ाने से महाजनी ब्याज कम से कम डेढ़, दो और तीन रुपए सैंकड़ा तक है। पांच रुपए सैंकड़ा के भी कुछ उदाहरण हैं, जो 18, 24, 36 और 60 प्रतिशत हैं। जितना गरीब उतनी ही ब्याज की दर अधिक का सिद्धान्त है। अत: आज आढ़तियों, साहुकारों और महाजनी ऋण 17309.86 करोड़ रुपए के आस-पास है। इस ऋण में 26.42 प्रतिशत कर्ज, 24 प्रतिशत ब्याज पर 5.12 प्रतिशत ऋण 36 प्रतिशत ब्याज पर है। किसानों पर कुल ऋण 43274.65 करोड़ के आस-पास है। करीब 83 प्रतिशत किसान तो इस स्थिति में हैं कि कर्जा चुका ही नहीं सकते। कुल जोतों के क्षेत्रफल  3645805 हैक्टयर पर लगाएं, तो प्रति 2.5 एकड़ पर बैंकों का 71222 रुपए कर्ज है। कुछ लोगों ने कर्ज नहीं ले रखा है तो ऋणी लोगों पर प्रति एकड़ और ऋण बढ़ जाएगा। यदि कुल ऋण को देखें तो 118704 रुपए प्रति हैक्टयर पड़ता है।

पानी की समस्या

हरियाणा में जमीन के नीचे का 35 प्रतिशत पानी फसलों के लिए उचित हैै। 8 प्रतिशत काम चलाऊ है और 45 प्रतिशत खारा पानी है। महेन्द्रगढ़, रेवाड़ी, नारनौल में तो जमीन के नीचे का पानी 300-400 फुट से भी नीचे चला गया है और एक कुएं की लागत भी 3-4 लाख आती है। ऐसे में किसान क्या करे ? भारी खर्च वहन करना ही पड़ेगा अगर फसलें लेनी है तो। जहां नहरी पानी है उसका भी उचित वितरण नहीं है जो गांव टेल पर पड़ते है वहां बहुत कम पानी ही पहुंच पाता है। अनेक बार फसलों को जरूरत के समय पानी नहीं मिल पाता। पिछले तीस-चालीस साल से बराबर समस्या बनी हुई है।

सेम, क्षारिय और  लवणता

हरित क्रांंति के लिए खाद, कीटनाशकों और पानी के कारण हरियाणा में सेम (वाटर लागिंग) की काफी समस्या है। करीब 50 हजार हैक्टेयर में सेम की विकराल समस्या है। 380 हजार हैक्टेयर में नीचे का पानी का स्तर डेढ़ से तीन मीटर है जो सेम के आस-पास है और नाजुक स्थिति में है। रोहतक, झज्जर, भिवानी, हिसार, सोनीपत, जींद, फतेहाबाद, सिरसा और पलवल प्रभावित जिले हैं। 526000 हैक्टेयर भूमि में लवणता व क्षारिय है। इस सब के चलते फसल उत्पादन में काफी कमी आ रही है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव

बाजार में किसान के उत्पाद के बड़े भारी उतार-चढ़ाव हैं। किसान को उसकी कई बार लागत भी नहीं मिल पाती। उसे औने-पौने दामों में माल फेंकना ही पड़ता है। प्याज, टमाटर आदि के उदाहरण हमारे सामने हैं। सब्जियों और फलों के बिजनसमैन की भूमिका बड़ी भारी है। मान लीजिए कि टमाटर, घिया, प्याज आदि की खरीद 5 रुपए प्रति किलो ग्राम है तो वही सब्जी खुदरा व्यापारी रेहड़ी मार्किट में 15 और 20 रुपए तक बिकती है। आमतौर पर बीचोलिए 60 रुपए 75 प्रतिशत तक हिस्सा गटक जाते है।

अब ग्वार का उदाहरण हमारे सामने है। ग्वार किसान ने कुछ अर्सा पहले 3 और 4 हज़ार रुपए प्रति किंवटल बेचा और बड़े-बड़े व्यापारियों ने 35-40 हजार रुपए प्रति किंवटल तक बेचा और अरबों-खरबों रुपए कमा गए और माल किसान का, मेहनत किसान की। किसानों को बेचने के तौर तरीके ढ़ूंढऩे ही होंगे।

कपास, चना, सरसों आदि में किसान बड़े झटके खाते हैं, जो कपास की फसल 4-5 साल पहले बेची थी अब उसे डेढ और दो हज़ार प्रति किंवटल तक सस्ती बेचनी पड़ी।

एक तो सफेद मक्खी से फसल मारी गई, दूसरा कीमत गिर गई। यह घाटा किसान कैसे सहन करे। जिस किसान ने खासकर भूमि लगान पर ली और फसल मारी गई या बहुत घाटा हो गया उसे भरपाई करने का कोई जरिया नहीं।

अनाज का भण्डारण

हरियाणा में सरकारों के प्रयास के बावजूद सरकारी भण्डारण क्षमता 2013-14 में 71.76 लाख टन तक थी। कुछ निजी क्षेत्रों में भी गोदाम बने हैं। 1967-68 में तो कुल 38000 टन ही थी। हर साल करोड़ों का अनाज खास तौर पर गेहूं भीग जाता है। इसी प्रकार सस्ते दामों पर कोल्ड स्टोरेज की सुविधा न होने से सैंकड़ों करोड़ रुपए के हर साल फल, सब्जियां, दूध, अण्डे, मीट इत्यादि खऱाब हो जाते हैं। हरियाणा और भारत में एग्रोप्रोसेसिंग दूसरे देशों के मुकाबले बहुत ही कम है। इस समय  भारत में फल व सब्जियों की प्रोसेसिंग (प्रसंस्करण) 2.2 प्रतिशत, दूध की 37 प्रतिशत, मीट की 21 प्रतिशत और पोलट्री उत्पाद की 6 प्रतिशत है। जबकि हरियाणा में फल व सब्जियों की 1 प्रतिशत , दूध की 28 प्रतिशत, मीट व मछली 1 प्रतिशत, पोल्ट्री 2 प्रतिशत। इस समय हरियाणा में 250 कोल्ड स्टोरेज हैं जिनकी क्षमता 4 लाख टन है। भारत का प्रसंस्करण सिर्फ  12 प्रतिशत है। जबकि चीन (40 प्रतिशत), थाईलैंड (35 प्रतिशत) अमरीका (80 प्रतिशत) फिलिपाईन (78 प्रतिशत), मलेशिया (80 प्रतिशत) है। भारत सिर्फ  7 प्रतिशत तक कुल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) में वैल्यू एडिसन (मूल्य संवृद्धि) है जबकि चीन में 22 प्रतिशत तक, फिलीपीन में 45 प्रतिशत और ब्रिटेन में 88 प्रतिशत है। यही सब अरबों रुपए के खाद्य पदार्थों के नुकसान के लिए जिम्मेवार हैं जिसका खामियाजा किसान समाज को भुगताना पड़ता है।

आवारा पशुु

आज करीब 1.5 लाख आवारा गाय और सांड सड़कों पर, खेतों में घूमते हैं नील गाय का प्रकोप अलग से। यह सिर्फ किसानों की फसलों को बड़ा भारी नुकसान पहुंचाते हैं। यह समस्या सालों में लगातार बढ़ रही है। मेरे खुद के सर्वेक्षण में आवारा पशु औसत रूप से किसान को 5 प्रतिशत तक उत्पादन का नुकसान फसलों को पहुंचाते हैं।

अन्य कारण

अनेक और भी कारण हैं जैसे समय पर गुणवता वाला बीज नहीं मिलना, पूरी मात्रा में नहीं मिलना, नकली बीज, खाद, दवाई मिलना। ऋण पास करते समय कुछ कर्मचारियों द्वारा रिश्वत डकार जाना, दवा विक्रेताओं द्वारा किसानों को गलत दवा और कई दवाईयों का सम्मिश्रण छिड़कने के लिए प्रेरित करना, समय पर मुआवजा नहीं मिलना, त्रुटिपूर्ण बीमा पालिसी जबरदस्ती लागू करना। किसानों को सही जानकारी देने में काफी कमी होना। मशीनरी का काफी महंगा होना और सरकारी सब्सिडी समय पर घोषित नहीं करना।

कुछ  सुझाव

हरियाणा के किसान प्राय: सांस्कृतिक तौर से मेहनती एवं कर्मठ हैं। जैसा अवसर और ज्ञान मिलता है सब करते हैं। ऐसे में समस्याओं का समाधान करने के लिए सरकारों की जिम्मेवारी व लोगों के कार्य व फर्ज भी बढ़ जाते हैं।

भारत सरकार को कृषि विकास एवं संबंधित क्षेत्रों के विकास के माडल को बदलना होगा तभी प्रदेश की सरकारें अपने माडल में बदलाव कर सकती हैं। देश और प्रदेशों की आवश्यकता अनुसार अपना माडल विकसित करना होगा।

  1. हरियाणा में किसानों की गिरती आमदनी और बढ़ते खर्चों को ध्यान में रखकर ही अपनी नितियां बनानी होंगी। उदाहरण के तौर पर कृषि क्षेत्र में बड़े भारी निवेश की जरूरत है तो आमदनी बढ़ेगी।

किसानों को भारी भरकम सब्सिडी देकर  उत्पादन की लागत को कम करना तथा प्रति किंवटल उत्पादन की लागत का दो गुणा रेट तय करना। स्वामीनाथन रिपोर्ट में डेढ़ गुणा है 50 प्रतिशत मुनाफा। 4 से 6 महीने में एक बार फसल आती है तो मुनाफा उसी हिसाब से होना चाहिए। यह सभी फसलों, दूध, मीट, मछली सब पर लागू हो। किसानों को पूरी सामाजिक सुरक्षा की ज़रूरत है।

  1. उपरोक्त समस्याएं निवारण के साथ-साथ सरकारी नौकरियों का सर्जन करें। यह अपनाए गए विकास माडल का दिवालियापन ही है कि जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है और सरकारी नौकरियां घटती जा रही है। हर गांव में कृषि सरकारी कर्मचारी, पशु चिकित्सक डाक्टर व अन्य सहायक स्टाफ हो, सारे गांव का लेखा-जोखा रखने के लिए, गांव स्तर पर ही कार्य निपटाने के लिए गांव में रजिस्ट्रार की नियुक्ति हो आदि-आदि।
  2. भौगोलिक दृष्टि से दिल्ली हरियाणा के नजदीक और तीन ओर से घिरी हुई है और बहुत बड़ी खपत वाला बाज़ार है, उसका फायदा तभी हो सकता है, मांग के मुताबिक कृषि उत्पादों की पूर्ति हो। यह तब तक सम्भव नहीं है जब तक खाद प्रसंस्करण, कृषि उत्पाद प्रसंस्करण जोर से न हो यह कृषि उत्पादों का अगले दस सालों में कम से कम 30-40 प्रतिशत तक तो हो। इसीलिए ही भण्डारण और कोल्ड-स्टोरेज की सुविधाएं कमी पूरा करने तक बढ़ाने की जरूरत है।
  3. कुल सरकारी बैंकों का 25964.74 करोड़ का कम से कम आधा 12982.37 करोड़ तो योजनाबद्ध करके अगले तीन सालों तक माफ करना चाहिए।
  4. कृषि सफल घरेलू उत्पाद में पशुधन का 35 प्रतिशत तक योगदान है। यहां भारत में और हरियाणा में किताब प्रदर्शनी, कार प्रदर्शनी, हथकरघा उद्योग प्रदर्शनी एवं मेले उद्योग धन्धों सम्बन्धित वस्तुओं की प्रदर्शनी और मेले लगते हैं, तो पशु मेलों पर रोक क्यों? किसान के पशुधन की इज्जत करते हुए तुरन्त किसान मेले आरम्भ करने चाहिए। आवारा पशुओं पर तुरन्त रोक लगाने की जरूरत है।
  5. ज्ञान-विज्ञान देश-दुनिया में तीव्रता से आगे बढ़ रहा है। हर क्षेत्र में नई-नई तकनीक सामने आ रही है। सभी फसलों की कृषि सम्बन्धी पूरी और सही जानकारी किसानों तक पहुंचे। किसान सही और पूरी वैज्ञानिक जानकारी के बाद ही फसल लें। हालांकि रेडियो, टी. वी. पत्रिकाओं, कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विभाग काफी प्रयासरत है।
  6. आज पंजाब नशाखोरी का पर्यायवाची बन चुका है तो हरियाणा भी कम नहीं। कोई भी समाज जहां पर नशा हो असल रूप में कभी तरक्की नहीं कर सकता। मेरे करीब 250 गांवों के सर्वेक्षण के आधार पर हरियाणा में पिछले पंचायत, ब्लाक समिति एवं जिला परिषद के चुनाव में अकेली शराब पर करीब 650 करोड़ रुपए खर्च हुआ।
  7. किसान जाति-धर्म से ऊपर उठकर अपने ऐसे संगठनों में शामिल हों व बनायें जहां सामाजिक न्याय की गुहार हो, आर्थिक पीड़ा से उभरने के लिए संघर्ष हों और कोई वैज्ञानिक, धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक, विवेकपूर्ण एवं विद्वतापूर्ण सोच हो। भारत का भविष्य किसान और मजदूरों के आपसी ताल-मेल के साथ आर्थिक संकट से उबरने के लिए सामाजिक बदलाव के लिए जन आंदोलनों से तय होगा।

(यहां पर आंकड़े कृषि अर्थशास्त्र विभाग हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15, 2015-16 हरियाणा, सांख्यिकी सारांश हरियाणा 1965-66, 66-67, 2013-14 व खुद के सर्वेक्षण से लिए गये हैं। ईंटरनैट से भी विभिन्न लेखों द्वारा मदद ली गई है)।

 

तालिका-1

क्षेत्रफल (हजार हैक्टयर),  उत्पादन (हजार मिट्रिक टन) उत्पादकता कि.ग्रा. प्रति हैक्टयर

                1950-51                                                1960-61                                                1965-66

       क्षेत्रफल    उत्पादन  उत्पादकता       क्षेत्रफल    उत्पादन उत्पादकता            क्षेत्रफल   उत्पादन उत्पादकता

गेहूं    362         294         812              628         814         1296                       678         869         1282

मक्का  32        12           375               106         91           858                         88           92           1205

चना    886        398        449              1543       1274       826                         868         385         444

बाजरा 927       330         356             802         235         203                         780         208         267

चावल   75        43           573             155         175         1129                       193         205         1063

कु. दालें 995     420         –                  1606       1303         –                                  –              –              –

कुल खाद्यान2751       1247       –          3721       2761       –                                  3021       1985       –

 

कपास

अमरिकन   2     0.36       180               48          12.34     257                  113     30.59     215रूई कि.ग्रा.

देशी           52        9.50        183           39           8.85        227             83           21.98     213

गन्ना             56      184     3286 (कि.ग्रा. गुड़) 130    519      3992 (कि.ग्रा.गुड़) 181     717    3961 (गुड़)

सरसों    108     33.7      312                     153         80.7        527                       153         74.4        486

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 47 से 51

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