तय था हत्या होगी

                ‘हिन्दी के विमर्शवादी लेखन ने साहित्यिक रचनाओं के विषयों को बहुत सीमित कर दिया है।  … भारतीय किसानों में ज्यादातर लोग वही हैं जो इन साहित्यिक विमर्शों के पात्र हैं लेकिन विमर्शों की राजनीति के चलते किसान को किसान के रूप में या मजदूर को मजदूर के रूप में देखने के बजाय स्त्री, दलित, आदिवासी आदि के रूप में देखना जरूरी हो जाता है और यह भुला दिया जाता है कि साम्राज्यवाद किसी देश पर (प्रत्यक्ष या परोक्ष) आक्रमण करते समय वहाँ के लोगों की लिंग, जाति, धर्म, क्षेत्र जैसी पहचानें नहीं पूछता और अपने देश की सरकार अगर किसानों की दशा सुधारने के लिए भूमि सुधार जैसे उपाय करना चाहे, तो ऐसे उपाय इन अलग-अलग पहचानों के आधार पर नहीं किये जा सकते।’           रमेश उपाध्याय, कथन – 54

                तो क्या यह एक कारण है कि हिन्दी कहानी के अपूर्व उछाल के इस लकदक दौर में किसान नहीं है? प्रेमचंद, रेणु, शेखर जोशी, विद्यासागर नौटियाल, सुरेश कांटक या विजेन्द्र अनिल की कहानियों में आते रहे वे किसान कहानी में नहीं अखबार में एक या दो कॉलम की खबर में कैद हो गए जिसका शीर्षक हमेशा ‘आत्महत्या’ से मिलता जुलता होता है। भारत खेती किसानी करने वालों का देश है, यहीं ‘उत्तम खेती मध्यम बान, नीच नौकरी भीख निदान’ जैसी कहावत प्रचलित हो सकती थी और हमारे देखते-देखते किसानी से मुक्ति खोजता किसान जीवन से भी हार मानता जा रहा हैै। यह पूंजीवादी भूमण्डलीकरण की नीतियों का ही परिणाम है कि हमारे यहाँ किसानी पर सबसे ज्यादा मार पड़ी है और देश के सबसे सम्पन्न इलाकों के किसानों ने सबसे ज्यादा आत्महत्या की। आत्महत्या समस्या का निदान हरगिज नहीं है लेकिन इससे इन किसानों की निरुपायता और प्रतिरोध की बलवती इच्छा का परिचय तो मिलता ही है। शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी,1936 में प्रेमचंद ने विश्वसनीय ढंग से दिखा दिया था कि खेती अब मुनाफे का सौदा नहीं रही। होरी का बेटा गोबर शहर चला जाता है न लौट आने के लिए। इसके बाद आजादी की नयी बयार में हरित क्रांति, श्वेेत क्रांति जैसे कुछ पल तो आए लेकिन यह सब बहुत थोड़ी देर का दृश्य था। बीते दस-बीस वर्षों की बात की जाए तो कृषि संरचना में नये दबाव और ग्रामीण जीवन में धन की गैर जरूरी कृत्रिम भूख ने मिलकर तबाही का यह दृश्य निर्मित किया है। उपभोक्तावाद मध्यवर्ग का ही दुश्मन नहीं है बल्कि उसने छोटे किसानों-मजदूरों और बच्चों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। इस दौर की हिन्दी कहानी को देखें तो सीधे-सीधे और प्रकारान्तर भी दुर्दशा का दस्तावेज मिलता है जो किसानों के जीवन को बेहद बारीकी से देख रहा है।

                जयनन्दन के करीब दस-बारह वर्ष पहले आए अपने संग्रह ‘विश्व बाजार का ऊँट’ में ‘छोटा किसान’ शीर्षक से एक कहानी लिखी थी जिसमें दादू महतो के गाँव छोड़ जाने का वृत्तान्त बुना गया था। असल बात यह है कि गोबर के शहर जाने की प्रक्रिया कभी थमी नहीं लेकिन इसे नयी गति इन पिछले सालों में ही मिली जब किसान को यह पक्का विश्वास हो गया कि रात दिन करने पर भी फसल की लागत न निकलना तय है और खेती अब वाकई झूठी मरजाद है। इस दृष्टि से देखें तो शहर आकर रिक्शा चला रहे, होटलों पर काम पर रहे या कैसी भी मजदूरी कर रहे आदमी की कहानी दरअसल उस किसान की ही कहानी मालूम होती है जो अपने खेतों से निकाल दिया गया है। खेतों से चिपक कर गाँव में रह रहा किसान जब भी कहानी में आया तब उसने कोई प्रसन्न करने वाला समाचार नहीं दिया। क्या आश्चर्य कि इन ज्यादातर कहानियों का अंत भी दुखद और त्रास से भरा ही था। जयवंदन के दादू महतो गांव ऐसे छोड़ रहे हैं मानो जीवन से ही विदा ले रहे हों। कहानीकार भी उसके यहाँ खबर लेने पहुँचा तो साथ में बैंक या प्रशासन के वे अफसर थे जो उससे कर्जा वसूलने जा रहे थे। कैलाश बनवासी ने अपने दूसरे कहानी संग्रह ‘बाजार में रामधन’ (2004) में दो बातें स्पष्ट कर दी थी, पहली पारंपरिक कृषि की विदाई और दूसरी गाँव की उपजाऊ भूमि पर इण्डस्ट्री की नजर। इस संग्रह की शीर्षक कहानी बैलों की बिक्री के बहाने पारंपरिक किसानी का मर्सिया सुनाती है तो ‘एक गाँव फुलझर’ में लग रहा कारखाना गाँव के जीवन को किसी भी तरह उन्नत करने का संकेत नहीं दे रहा था। हाल में आए उनके नये संग्रह ‘पीले कागज की अगली इबारत (2008) की एक कहानी ‘झुका हुआ गाँव’ में वे बताते हैं – ‘गाँव में अजब सी उदासी पसरी थी। गली, घर, छप्पर-छानी सब ओर इसी उदासी का भूरा रंग था। परती जमीन का धूसर रंग।’ इन बीते चार सालों में यहाँ के ज्यादातर लोग बैंक के कर्जदार हो चुके हैं और अब बैंक के अफसर आए हैं जो ‘ऋण वसूली कैंप’ में बैठे हैं। और सब यही कह रहे थे –  छूटबो साहब… छूटबो मालिक! हर कोई कर्जे से मुक्त होना चाहता है लेकिन कहाँ से लाए वह धन जो उसे मुक्ति दे ? वरिष्ठ कथाकार पुन्नी सिंह को कहानी का शीर्षक भी ‘मुक्ति’ ही था जो ‘परिकथा’ के प्रवेशांक (मार्च-अप्रेल 2006) में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी किसानों की समस्या का दूसरा चित्र है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि खेती कर रहे एक तबके में संपन्नता भी आई। वे बड़े किसान, मझोले किसान या ऐसे किसान थे जिन्हें आय के दूसरे स्रोत भी हासिल थे। इस कहानी में कृषि में एम.एससी. की उपाधि प्राप्त एक युवा किसान रविंदर आत्महत्या कर लेता है और इसका एक ही कारण है भूख। यह भूख धन अकूत के लालच से पैदा हुई है। रातों रात अमीर बन जाने का लालच। कौन बनेगा करोड़पति। कहानी घर-घर की। चमचमाती कारें, झकाझक साडिय़ाँ और आलीशान मकान। रविंदर पढ़ा लिखा है और नये दौर का किसान है। उसे लगता है कि गेहूँ, मक्का या दूसरी पारंपरिक फसलों के दिन लद गए। वह नयी खेती करना चाहता है। सफेद मूसली की खेती। लाख-सवा लाख की लागत लगाकर बीस लाख रुपये कमाने की उसकी जिद इतना धन तो दे ही देती है कि वह सल्फास की गोलियां खरीद सके। यह कहानी बीज, खाद और कीटनाशक के धंधे में उतर आए देशी-विदेशी साहूकारों की असलियत भी खोलती है जो बड़े बड़े सपने दिखा रहे हैं। इन सपनों के चित्र महेश कटारे भी खींच लाते हैं। उनके हालिया संग्रह ‘छछिया भर छाछ’ (2008) में अधिकांश गांव की कहानियाँ होने पर भी एक कहानी ऐसी नहीं जिसमें किसान के सामने आत्महत्या की मजबूरी हो लेकिन उनकी कहानियाँ वह सत्य उद्घाटित करती ही है जो आगे जाकर रविंदर जैसे योग्य नौजवानों को अकाल मृत्यु की ओर धकेल देते हैं। संग्रह की एक कहानी ‘इकाई, दहाई…..’ का रामलखन एक संपन्न किसान है। सुखी और समृद्ध्र। लेकिन उसे दुख है कि खूब पैसा होने पर भी जीवन अच्छा नहीं है। क्यों? क्योंकि टीवी कहता है, अखबार कहते हैं, रोज रोज आ रही नई कारें- मोटर साइकिलें – पेकेज्ड फूड और मॉल्स सब कोई बता देते हैं कि तुम क्या खाक जीते हो? होता यही है कि भैंस-खेत और घर को देखने वाली पत्नी की ओर जब रामलखन का ध्यान गया तो ‘वह मन ही मन झुंझला उठा-बाजार एक से बढ़कर कई बालसफा क्रीमों से भरा पड़ा है, इसने एक भी तो कभी न आजमाई। सकल पदारथ है जग माही करमहीन नर पावत नाहीं।’ और फिर वह कैलकुलेटर दबाने लगा। रुपए खूब रुपए ढेर सारे। कटारे कहानी में नहीं बताते कि रामलखन को अंत में क्या मिला? मुकम्मल कहानी का एक लक्षण है कि वह समस्या की ओर इस ढंग से इशारा कर दे कि पाठक विचलित हो जाए और पता लगाए कि ऐसा क्यों हो गया? और क्या होगा अंतत: ? इसी से बदलाव का सवाल भी जुड़ जाता है। पाठक को बेचैन करने वाली रचनाएँ उसे रास्ते की तलाश का जुनून देने वाली होती हैं चाहे लेखक रास्ते की बात ही न करता हो। इस काम में कटारे तुलसीदास की इस लोक प्रच��ित उक्ति का ऐसा उपयोग करते हैं कि बाजारीकरण का कुरूप चेहरा बेपर्द हो जाता है। आखिर जब रामलखन को ढेर-ढेर धन चाहिए तो क्या वह गेहूँ बोएगा?

                हरीचरन प्रकाश की कहानी ‘चींटियों की आवाज’ इस प्रसंग में उल्लेखनीय है। दो स्तरों पर चल रही यह कहानी हमारे लोकतंत्र में गहरा चुके भ्रष्टाचार और उसमें एक गरीब किसान की ट्रेजडी को बिल्कुल नयी तरह से ला रखती है। कहानी एक सरकारी बाबू शुजात तल्हा के मार्फत गढ़ी गई है जिनके पास फुरकान अहमद उर्फ जिग्गन का प्रार्थना पत्र आया है। शुजात तल्हा जिलाधिकारी कार्यालय की चिट्ठी पत्री संभालते हैं। उनकी सरदर्दी यह कि जिग्गन की चिट्ठी हर दूसरे चौथे दिन आ जाए कि न्याय दिलाओ। हुआ यह था कि चपरासी की भर्ती में अपने लड़के को लगवाने के लिए जिग्गन ने रिश्वत दी, इधर कोर्ट का स्टे आ गया और भर्ती अटक गई। अब न भर्ती हो और न कोई रुपए लौटाए। जिग्गन ने ये रुपये खेत बेचकर जुटाए थे। अब वह क्या करे? हरीचरन प्रकाश ने इस ट्रेजडी की गंभीरता को दिखाने लिए एक चूहे का रूपक गढ़ा। एक चूहा शुजात तल्हा के घर में उधम मचाए और एक जिग्गन के घर में भी। शुजात के बेटे ने एअरगन का सहारा लिया और जिग्गन जूते से उसे मारता है। जिग्गन के चूहे को चींटियां खा जाती हैं। इधर जिग्गन टाइपशुदा नोटिस भेज रहा था जिसमें पैर के अंगूठे की छाप होती थी। ‘दरअसल जिग्गन मरना नहीं चाहता था। उसकी मारने की इच्छा हो रही थी। लेकिन वह मरने मारने दोनों से डरता था।’ और ‘एक दिन जिग्गन की लाश बिना किसी नोटिस के तालाब के किनारे मिली। चींटियाँ उसके आँख, कान और नाक में घुसी हुई थीं।’ कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अब शुजात तल्हा का प्रमोशन हो चुका है और एक दिन बगीचे में वह चौंक पड़ता है क्यों कि मुर्दाखोर चींटियां आ रही है, और वह उनकी आवाज सुन रहा है। क्या यह जादुई यथार्थवाद है? ये चींटियां कौन हैं जो जिग्गन को खा गईं? जिनसे शुजात भी चौंक रहा है? पाठक के लिए समझना मुश्किल नहीं। हरीचरन प्रकाश का कौशल यह है कि वे विडंबना का अद्भुत दृश्य रचते हैं। शुजात की बेटी फातिमा का बी.टेक. में एडमिशन हो गया है एक सिफारिश से और जिग्गन के बेटे की न नौकरी लगी, न पैसा मिला। ठगाए जाते रहने की यह किसान कथा अपने अंकन में जहां मार्मिक है वहीं चींटियों की आवाज हमारे दौर की विकट सचाई।

                ‘फंदा’ बसंत त्रिपाठी की कहानी है जो ‘परिकथा’ के जनवरी फरवरी 2009 अंक में आई है। विदर्भ के किसानों की कहानी। बसंत मूलत: कवि हैं और कुछ अरसे से कहानियां भी लिख रहे हैं। यह कहानी देवाजी सरोदे नामक किसान की आत्महत्या से उपजती है और इस हत्या का कारण तलाश करते हुए बसंत ठेठ वर्धा जिले के समुद्रपुर गांव पहुंचते हैं। कहानी का वाचक अमित किसानों की आत्महत्या पर एक प्रोजेक्ट कर रहा है और जब वह देवाजी तक पहुंचता है तो उसका सामना किसी अहा ग्राम्य जीवन वाले किसान से नहीं होता। देवाजी भिड़ते ही पूछते हैं- ‘क्यों साब, गांव के भीतर कोई सुराग नहीं मिल रहा है क्या?’ फिर यह जानकर कि वह ‘रिसर्च’ कर रहा है उनका सवाल सुनिए – ‘अच्छा, तो तुम कांट्रेक्टर हो। तुम्हारी पगार मासिक नहीं, सालाना बनती है। क्यों साब…  कितने में लिया है यह कांट्रेक्ट?’ समस्याओं का एनजीओकरण कर पैसा बनाने की प्रवृत्ति पर देहात का आदमी ही खरे ढंग से बोल सकता है। आगे और देखिए – ‘साब, गांव के भीतर जाओ। वहाँ पुलिस तुमको आत्महत्या करने वालों के बारे में कुछ बताएगी। उनकी घरवालियों से पूछो, वे भी रोते-धोते कुछ बताएंगी। बाप तो दोनों में से एक ही का जिन्दा है, वह भी कर्ज की रकम की कुछ मालूमात देगा। मरने वालों के बच्चों और परिवार का जिकर कर देना….. हो गया तुम्हारा कांट्रेक्ट पूरा। फिर दूसरी आत्महत्याओं का इंतजार करना। वैसे आजकल तुम लोगों को बहुत दौड़भाग करनी पड़ रही है न। क्या करें साब, कभी-कभी तो तुम लोगों को दौड़ाने का मौका मिलता है, वरना जिंदगी भर तो हम ही दौड़ते रहते हैं।’ आगे अमित के यह पूछने पर कि दलाल तो पहले भी थे फिर आत्महत्याएं क्यों? तो देवाजी का यह उत्तर हमारी व्यवस्था सही विवरण है – ‘बात तुम्हारी बरोबर है, साब। दलाल तो पहले भी थे। लेकिन उनके पास की ताकत से ज्यादा ताकत हमारे पास थी, जीने की ताकत। और चीजों पर उनकी पकड़ भी इतनी मजबूत नहीं थी। पहले हम उनसे कर्ज लेते थे और फसल अपनी उगाते थे। कर्ज हम अब भी उनसे ही लेते हैं, बैंकों में भी मुंह मार लिया करते हैं लेकिन फसल अपनी नहीं उगा पाते। अब तो हमउ न बीजों को बोते हैं जो बाजार में सरकार भेजती है। हमारी फसल और हमारे बीज दोनों की बाजार में अब कोई कीमत नहीं रह गई है। ये कपास देख रहे हो न! सफेदी फलों से झांकने लगी है। पहले इसे देखकर हमारे पुरखे नाचने लगते थे। बैल-बंडी दुरुस्त करने लगते थे। लेकिन अब इन्हें देखकर हमको कोई उत्साह नहीं होता। क्या कीमत रह गई है इनकी बाजार में? इस साल का कपास दीवाली तक सरकार की मंडियों में ठूंस दो तो होली तक पैसा मिलेगा, वह भी पहले से बहुत कम। सरकार के हाकिम कहते हैं, पैदावार बढ़ाओ। पैदावार बढ़ाते हैं तो कीमत कम कर देते हैं। आखिर हारा हुआ काश्तकार रोज-रोज मरने से एक बार मरने का रास्ता चुन लेता है। बोलो क्या गलत करता है? और देवाजी की आत्महत्या का समाचार अमित को पढऩा पड़ा।  देवाजी की आत्महत्या अमित को विचलित करती है क्योंकि देवाजी पढ़ा लिखा किसान था, अपने समय के यथार्थ को पहचानता और उससे जूझता हुआ किसान। यहीं नहीं अमित की महंगी सिगरेट छीन कर पी जाने में भी उसे कोई संकोच नहीं हुआ था। वह जानता था कि किसके पैसे से सिगरेट आ रही है। उसने कहा था – ‘साब, मेरा नाम तुम दैनिक के कोने में नहीं, बीच में देखोगे। लिखा होगा कि देवाजी गणपतराव सरोदे ने काश्तकारों के जीवन-वास्तव को बदलकर रख दिया।’ जीवन तो बदला किंतु देवाजी की पत्नी का, जो अब कर्ज ओढ़े बैठी विधवा है। बसंत की यह कहानी समस्या का चित्र ही नहीं खींच देती अपितु इसके वास्तविक कारण तलाश करती है। असल दुश्मन की तलाश। बसंत की मानें तो असल दुश्मन और कोई नहीं अमित है यानी किसानों पर रिसर्च करने वाला युवक। या कहें कि खाता पीता वह वर्ग जो अपने समय की सच्चाई को चुभला रहा है और मजे मार रहा है। कहानी के प्रारंभ में अमित से स्टडी रूम का चित्र और बेडरूम में पत्नी की उघड़ी जाँघें दरअसल अपना औचित्य कहानी के अंत में साबित करती हैं। विश्व बैंक के प्रोजेक्ट से अमित खोज कर रहा है कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं। क्या यह अपने आप में एक क्रूर सच्चाई नहीं है कि मरने वालों के अध्ययन के लिए हमारी व्यवस्था धन दे रही है लेकिन किसान आत्महत्या न करें इसके उपाय में व्यवस्था की दिलचस्पी कहाँ? किसानों की आत्महत्या पर हिंदी में यह पहली कहानी है जो कारणों की तलाश करती हुई ठेठ विदर्भ तक जाती है और खाली हाथ नहीं लौटती।

                कथादेश के फरवरी 2009 अंक में प्रियदर्शन मालवीय की कहानी ‘विकास पर्व में जग्गू, फग्गू की भूमिका’ में इस समस्या के एक और पक्ष को तलाशा गया है। यह कहानी बताती है कि किसान की जमीन से बड़ा कोई दोस्त नहीं और उसे मुआवजा देकर बेदखल करना दरअसल उसकी हत्या कर देना है। याद करें अरुन्धति राय ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘बहुजन हिताय’ में बांधों के बनने पर मुआवजे का यथार्थ बताकर चौंका दिया था। कहानी में जग्गू जमीन छिनने की एवज में मिली मुआवजे की राशि शेयर बाजार में होम कर देता है और चूहे मारने की दवाई से इस समस्या का निदान खोजता है। यह कथाकार की युक्ति है कि फग्गू उसका भाई है और वह सावधान किसान है जो आसानी से चक्कर में नहीं आता। ट्रेक्टर नहीं चाहिए। और उसे कोई प्रलोभन बांधने में सक्षम नहीं। जग्गू की मौत फग्गू को भी कर्ज में डूबो देती है और लेकिन फग्गू अंत में सूदखोर जगदीश नाटे की हत्या कर देता है। कथाकार का निष्कर्ष हे – ‘जिन्हें हमारी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था की सही समझ है उन्हें यह अहसास है कि फग्गू ने तो सिर्फ मच्छर मारा है, गिद्धों को मारना तो बाकी ही है और फग्गू की और कस्बे वालों की असली लड़ाई अब शुरू होगी।’ क्या सचमुच ऐसा होगा? कहानीकार को नहीं कहानी को सच मानें तो ऐसा होना सचमुच मुश्किल है। जब ‘लडऩा’ हमारे समाज में एक नकारात्मक मूल्य की तरह स्थापित किया जा रहा हो और व्यवस्था का आतंक लगातार सिर पर मंडरा रहा हो तब मरने से पहले कोई मारने का जोखिम भले उठा ले लेकिन इसे समाधान नहीं कहा जा सकता। हमारे दौर के महत्वपूर्ण कथाकार चंद्रकिशोर जयसवाल ने ‘कथाक्रम’ के जनवरी मार्च 2007 अंक में ‘समाधान’ लिखा था। अपनी इस कहानी में उन्होंने किसानों की आत्महत्या पर व्यवस्था का पक्ष लिखा था और यह पक्ष आज भी अधिक मजबूत दिखाई देता है। व्यवस्था ने इस संकट का अंतत: यह समाधान खोज लिया है – ‘पिछले चुनाव में हमने फिल्मी स्टारों को प्रचार करने के लिए पैसे दिए थे या नहीं? घण्टे के हिसाब से पैसे चुकाने पड़े थे। उनसे बहुत कम पैसों में साधु-महात्मा हमारा काम कर देंगे। उन्हें मुंहमांगा देंगे हम, श्रीमान! अगर उन्हें लगा कि उचित मजूरी नहीं मिल रही है, तो हम गच्चा खा जायेंगे। कम मजदूरी पर क्या वे बोलेंगे कि नरक में किसानों को देखकर आये हैं? किस्से गढ़ेंगे कि किस युग में कौन किसान आत्महत्या के कारण किस नरक में ठेला गया था? मरियल आवाज में उनके साधारण प्रवचन का कितना असर पड़ेगा किसानों पर?’ क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सबसे अधिक इस्तेमाल उन ताकतों ने किया है जो समाज की प्रगति में अवरोधक हैं। धार्मिक पाखण्ड ऐसे दिनों में भी अपने शबाब पर हैं जब किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूर छंटनी का विरोध करते हुए गोली खा रहे हैं या नंदीग्रामों में जमीन छीनी जा रही है। यह कहानी नव साम्राज्यवाद की भूमंडली ताकतों और दक्षिणपंथी पोगापंथ के गठजोड़ का उद्घाटन कर यह बताती है कि किसान के पक्ष में कम से कम ये तो नहीं ही होंगे। यह उद्घाटन जायसवाल जैसे अनुभव संपन्न कथाकार के बस की ही बात थी जो समस्या की जटिलता और अंतर्गुम्फन को जानता हो। हवाई बातें कर गांव और किसान की कहानी लिखना बड़ा आसान है लेकिन वह ठीक उसी तरह निष्प्राण है जैसे किसान के पक्ष में व्यवस्था का शोर। जायसवाल इस कहानी में तीखा व्यंग्य बार-बार करते है। जरा देखें-

                – ‘शिंगनापुर गांव के किसानों ने निर्णय लिया है कि वे किडनी बेचेंगे। जब जान नहीं बच रही है, तो किडनी को क्यों बचाना? उन्होंने गांव में बैनर लगा दिया है: ‘किसान किडनी बिक्री केन्द्र’। मैं तो कहता हूं, हुजूर, कि जहां चाह वहां राह।’

                – बिजली और डीजल की मार तो सब पर पड़ रही है। इनसे सिर्फ  किसान ही तो परेशान नहीं है। सबको मरना चाहिए था, सिर्फ किसान ही क्यों मर रहे हैं ? किसानों के पास तो खेत हैं, वे बिना बिजली-डीजल के घास उपजाकर भी खा सकते हैं। औरों को तो जिन्दा रहने के लिए घास का आसरा भी नहीं है।

                – हम अनुदान में कोई कटौती नहीं कर सकते, बिन्दा बाबू ! किसान मरते हैं, मरें ; इन संस्थाओं को हमें मरने नहीं देना है। ये हमारे हाथ पैर हैं। अगर किसी क्षेत्र में  दो-चार किसान मर गये, तो संस्था वाले संस्था को बन्द कर दाल-रोटी के जुगाड़ के लिए कोई और धन्धा पकड़ लेंगे। और फिर, यह क्यों नहीं सोचते कि बाहर का बखेड़ा हमारे घर के अन्दर आ जाएगा। इन संस्थाओं से हमारे कितने ही छोटे-बड़े नेता और कार्यकत्र्ता जुड़े हुए हैं। अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाइएगा ?

                खेत छोड़कर मजदूर बन गए किसान को भी मुक्ति नहीं मिल रही। ‘पहल 88’ में प्रकाशित लोकबाबू की कहानी ‘मुजरिम’ किसानी का वह शोक पत्र है जिस ने बांचना ‘कठोर करेजे’ का काम है। यह कहानी फूलझर गांव की है। याद कीजिए कैलाश बनवासी के यहां भी यही गांव आया है – ‘एक गांव फूलझर’ तब वहां फैक्ट्री बन रही थी। लोक बाबू बताते हैं – ‘ललित इसी फूलझर गांव का रहने वाला था। खेती किसानी थी। भाइयों के बंटवारे में खेत छोटे होते गए। व्यापारियों, उद्योगपतियों ने थोड़े अधिक रुपयों का लालच देकर वह जमीन भी कब्जा ली। बड़ा भाई दुर्ग से लगी इस्पात नगरी भिलाई में नौकरी करने चला गया। छोटा किसानी छूटने पर ट्रक ड्राइवर हो गया। मंझला यानी ललित फूलझर से दो किलोमीटर दूर एक डामर फैक्ट्री में काम करने लगा।’ यह ललित इधर अस्पताल में भर्ती है। वाचक बताता है कि ‘फैक्ट्री से साइकिल पर सवार वह निकल ही रहा था कि फैक्ट्री की ही एक ट्रक ने उसे दे मारा। वह उछला और जमीन पर एक पैर आ गिरा। एक मोटा राड उसके पैर में आ घुसा। हड्डी टूटी अलग फैक्ट्री के मालिक ने माह भर उसका राजनांदगांव के सरकारी अस्पताल में इलाज कराया। टूटी हड्डी तो लगभग जुड़ गयी, मगर राड वाला घाव नासूर बन गया। फैक्ट्री के मालिक ने नया वर्कर रख लिया। इधर ललित अपने बड़े भाई के रिश्तेदार के रूप में इस्पात संयंत्र के बड़े अस्पताल में भर्ती हो गया।’ आगे होता यह है कि जैसे तैसे आधा अधूरा इलाज करवा कर ललित काम पर लौटता है। पत्नी की मौत के बाद घर की जिम्मेदारी उसी पर है। नौकरी पर आधी तनख्वाह, टी.बी. की नयी बीमारी और बच्चे। भिलाई के अस्पताल से छूट कर ललित सोचता था कि वह अब सब ठीक कर लेगा लेकिन वह टूटता गया। उसकी हिम्मत जवाब देने लगी। उसे यह लगने लगा कि उसके मरने की नौबत आ गई है और उसके मरने के बाद बच्चों का क्या होगा?

                अब कहानी नया मोड़ लेती है जब ललित अग्रिम तनख्वाह लेकर अपने बच्चों को शहर घुमाने ले जाता है। नहा धोकर साफ  कपड़े पहने बच्चे और ललित शहर में रिक्शा किराये पर लेकर घूम रहे है। खा-पी रहे हैं। खूब मौज। ‘पिता को खाने पीने पर इतना खर्च करते बच्चों ने पहले कभी न देखा था। जूली खुश थी कि अब घर पर जाकर उसे खाना नहीं बनाना पड़ेगा।’ लेकिन तब ये बच्चे नहीं जानते थे कि पिता का इरादा क्या है? खैर। अभी तो बच्चों को ट्रेन देखनी थी। मंदिर के दर्शन करने थे और ‘प्रसाद’ चखना था। पिता उन्हें रेल की पटरियों के नजदीक ले जाते हैं और झोले में रखी बोतल का प्रसाद चखाते हैं। ‘पिता ने तीन प्लास्टिक के गिलासों में पेग बनाया। सबमें पानी भी बराबर-बराबर डाला। फिर ललित ने अपना गिलास उठाकर आंखें बंद की। प्रभु का स्मरण किया-हे प्रभु, मेरा मनोरथ पूरा कर। शक्ति दे।’ शक्ति वह जो सब संकटों से मुक्ति देने वाली हो। मुक्ति का मार्ग पहले कभी इतना आसान न था। एक ही उपाय अथवा निरुपाय? भगवान का घर यानी स्वर्ग। भगवान मुक्ति देने वाले हैं। उनके यहां किस बात का संकट ? कोई भेदभाव ऊंच-नीच नहीं। नशा बढ़ रहा है। शाम गहरा गई है और ‘इसी समय एक मालगाड़ी धड़धड़ाते हुए पटरियों पर दौड़ती हुई दिखाई दी।… ललित मौके की ताक में ही था। ललित ने भगवान का स्मरण किया और अचानक अश्वनी की छाती पर सवार हो गया। इसके पहले कि अश्वनी कुछ बोल पाता, ललित ने अपनी जेब से निकाल कर हाथ में धरे रूमाल से अश्वनी का गला घोंट दिया। थोड़ी देर दबाए रखा कहीं काम अधूरा न रह जाय। अश्वनी थोड़ी देर हाथ पैर मारता छटपटाता रहा, मगर अंगद के पांव की तरह जमे अपने पिता को छाती पर से डिगा न सका। उसकी सांस उखड़ गयी।’ फिर बड़ी बेटी जूली, छोटी सिमी… और ‘उसने अनिल की गर्दन पर भी रूमाल कस दिया।….. अब कोई मेरे परिवार का क्या बिगाड़ेगा! मैं ही सब ठीक किये जाता हूँ।’ लेकिन अभी सिमी ��ो ट्रेन दिखाने का वादा अधूरा था। ‘तब उसने अपनी बैसाखी सम्हाली। सिमी के छोटे से शरीर को किसी तरह कांधे पर उठा, लडख़ड़ाता हुआ रेलवे लाईन के पास पहुंच गया। अभी कोई रेलगाड़ी आती दिखायी नहीं दे रही थी। वह सिमी को लेकर रेल पटरी पर सो गया।’

आया उसने नाम पुकारा
हाथ तौल कर चाकू मारा
छूटा लोहू का फव्वारा
कहा नहीं था उसने आखिर उसकी हत्या होगी।   (रामदास)

                ज्ञानरंजन ने इस कहानी पर टिप्पणी में लिखा है ‘यह किसानी छूटने, जमीन छूटने की कहानी है। कफन के 70 साल बाद पाठक इस कहानी के मार्फत भारतीय किसान जीवन को देखें। इसे हम दलित जीवन की कहानी मानते हैं। सामाजिक जीवन में अर्थशास्त्र के दबंगों ने जीवन को जितना पद दलित किया है, वह लोकबाबू की कहानी में दिखता है।’ यहां आकर विमर्शवादी अस्मिताएं बौनी मालूम होती हैं जब हत्यारा छुरा लेकर हमारी छाती पर चढ़ आया है और वह केवल हमारे खेत से हमें बेदखल नहीं’ कर रहा अपितु उसकी रक्त पिपासा अदम्य है। कहानी इस हत्यारे की पहचान कर रही है। हाँ, यह स्वीकार करना होगा कि खेती किसानी पर कहानियां मात्रा और भार में कम हैं लेकिन इनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति भी अर्थवान है। बीते दिनों काशीनाथ सिंह और शिवमूर्ति के उपन्यास क्रमश: ‘रेहन पर रग्घू’ और ‘छलाँग’ अपने-अपने ढंग से गाँव की इन समस्याओं को देख रहे थे। वहीं राजू शर्मा का ‘हलफनामे’ पहला गंभीर उपन्यास था जो संपूर्णत: इस समस्या पर है। चरणसिंह पथिक का कहानी संग्रह ‘बात यह नहीं है’, सत्यनारायण का ‘सितम्बर में रात’ सत्यनारायण पटेल का ‘भेम का भेरू मांगता है कुल्हाड़ी ईमान’ और गौरीनाथ की कहानियाँ खेती किसानी के नये-नये संकटों का दस्तावेज हैं।

                कहना न होगा कि भारत की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ आज भी खेती किसानी है और नव साम्राज्यवाद ने ठीक इसी रीढ़ पर घात लगाई है। फूलझर गांव में ललित को भरपेट रोटी न मिली और शहर अपने दरवाजे पहले ही बंद कर चुका है। ललित, रामलखन, जग्गू, देवाजी, जिग्गन, रविंदर सबकी कहानी एक जैसी पीड़ा भरी है। क्या आश्चर्य कि किसान के दुर्भाग्य की यह कठोर कथा पहले ही लिखी जा चुकी है और दुर्भाग्य कि इसे फिर-फिर दुहराना पड़ रहा है। गोदान की पंक्तियों से यह चर्चा समाप्त करना उचित होगा – ‘थाना-पुलिस, कचहरी-अदालत सब है हमारी रक्षा के लिए, लेकिन रक्षा कोई नहीं करता। चारों तरफ  लूट है। जो गरीब है, बेकस है, उसकी गर्दन काटने के लिए सभी तैयार रहते हैं। भगवान ना करें, कोई बेईमानी करें। यह बड़ा पाप है, लेकिन अपने हक और न्याय के लिए न लडऩा उससे भी बड़ा पाप है।’

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज- 30-34

 

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