इकबाल सिंह – बदलते समाज का सूचक हरियाणवी पॉप गीत

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पॉप-कल्चर

पिछले पचास सालों में हरियाणवी समाज में सामाजिक-आर्थिक राजनैतिक परिवर्तनों के साथ-साथ सांस्कृतिक परिवर्तन हुए हैं। रागनियों व पॉप गीतों ने हमारी संस्कृति को काफी प्रभावित किया है।

हमारी सांस्कृतिक धरोहर समझे जाने वाले लोक गीतों का चलन पिछले कुछ समय से कम होता जा रहा है। जो लोकगीत अपनी सहजता, सरलता एवं अनुभूति की तीव्रता से लोक-मानस के हृदय की धड़कनों में राग भर देते थे। आज वे लोकगीत केवल परम्परा एवं शगुन के तौर पर ही गाए जाते हैं। अब शादी-ब्याह, छठी एवं अन्य उत्सवों में डीजे पर पॉप गीत ही बजते हैं और लोग पैरों को थिरकने से नहीं रोक पाते। हरियाणवी पॉप गीत  घर, बैठक, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, शादी, स्कूल, कालेज आदि के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सुनने को मिल जाते हैं।  हरियाणा ही नहीं, बल्कि दिल्ली का देहात, उत्तर प्रदेश का हरियाणा से लगते भाग एवं राजस्थान के कुछ भागों में भी खूब सुनने को मिलते हैं।

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‘इन हरियाणवी पॉप गीतों में हरियाणवी समाज एवं भाषा का जो रूप उभरकर हमारे सामने आता है, उसमें हरियाणवी समाज, मानसिकता सांस्कृतिक बहुलता, विभिन्न मुद्दे संघर्ष के साथ-साथ हमें यह भी पता चलता है कि हरियाणवी युवा वर्ग आज किसी ओर जा रहा है। अब यह पॉप गीत ग्रामीण युवाओं के साथ-साथ शहरी युवाओं की भी जुबान पर चढ़े हुए हैं।’1 जिनमें पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच अंतराल, संवाद-धर्मिता और टकराव को देखा जा सकता है। हरियाणवी पॉप गीतों से हरियाणवी समाज, संस्कृति, रहन-सहन, परम्पराओं में आ रहे बदलावों को समझा जा सकता है।

हरियाणवी समाज में स्त्री की स्थिति में अपेक्षित बदलाव देखने को नहीं मिलता। स्त्री को सम्पति और उपभोग की वस्तु माना जाता है। उसके लिए ‘गंडासा’, ‘माणस’, ‘माल’, ‘पटोला’ आदि शब्द प्रयोग किए जाते हैं। पितृसत्तात्मक ढांचे के अंतर्गत पुरुषवादी मानसिकता जिसमें स्त्री के प्रति पारम्परिक सोच को दिखाने वाले अनेक पॉप गीत सुनने को मिलते हैं।

‘दिख्या ना माणस आज कित्त सै तू
दिख्यै गाळ म्हं सारे कित्त गुम सै तू
गाळ म्हं आ जा रै तू मंढेर पर आ जा
मिलै ज्यै मोक्का घेर म्हं आ जा
तू किसै तै डार्लिंग घबरावै क्यू तू
दिख्यै गाळ म्हं ये सारे कित गुम सै तू’2

इस पॉप गीत में एक ही गांव के लड़का-लड़की आपस में प्रेम करते हैं, लेकिन हरियाणवी समाज में इस तरह के प्रेम-संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाता है। लड़का-लड़की को अवसर पाकर कहीं भी आकर मिलने को कह रहा है। वह लड़की को सभी सामाजिक बंधनों एवं परम्पराओं को तोड़ कर मिलने के लिए कह रहा है। उसे गली मुंढेर पर बुला रहा है।

‘म्हारी रै मंढेर पर तै ताकै मतना
तुड़वावैगा देही नै, तू हांसै मतना
घणे दिना म्हं लाग्या मौक्का तू नाटै मतना
बळ खावै जौबण तेरा, ढाटै मतना
भेद लाग जा घरवाळां नै हो जा गा रोळा
जग हंसाई करवागा तू होरा बोळा
कई दिना का हांडू ओळा-सोळा
मान ले तू बात नै काम बन जा गा तोळा
मीठी-मीठी बात नै इब काटै मतना’3

इस पॉप गाने में लड़की, लड़के को  कहती है। तेरा हमारी छत्त पर से देखना ठीक नहीं है। यदि मेरे घरवालों को पता चल गया तो वह तेरी पिटाई कर देंगे। लड़का कहता है कि बार-बार इस तरह का अवसर नहीं मिलता है। लड़की कहती है यदि हमारे संबंध के बारे में घरवालों को पता चल गया तो झगड़ा हो जाएगा।  लड़की भी लड़के को चाहती तो है, लेकिन समाज इस तरह के प्रेम संबंधों को कभी भी स्वीकार नहीं करता है। क्योंकि लड़की के सिर पर परिवार और समाज की इज्जत की गठरी लाद दी जाती है। वह परिवार और समाज के डर के कारण अपनी इच्छाओं को अपने अंदर दबाकर घुटी रहती है।

बोदका की बोतल बरगा रूप कसुत्ता लेरी सै
मीता बरोदा गट-गट पीजा याए इच्छा मेरी रै’4

यहां पुरुष मानसिकता दिखाई देती है, जो स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु समझती है। पॉप गीतों में स्त्री को कामोन्मादी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

हरियाणवी समाज में जाति की जड़ें बहुत गहरी हैं। जातिवाद की सबसे बड़ी विशेषता है – अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ मानते हुए दूसरी जाति को हीन मानना।  वर्चस्वी जातियां अपने को सांस्कृतिक तौर पर अन्य जातियों से श्रेष्ठ मानती हैं। जातिगत  श्रेष्ठता स्थापित करते पॉप गीतों की भरमार है।

‘जाट आपणी पै आ जा, रूकता ना यो रोकै तै’
ऊं तै ठण्डा होवै जाट, पर खून खोल जा धोखे तै

अपणी धुन म्हं रहवै जाट्, देख्य न्या दुनियादारी
जाट की चौधर न्यारी, जाट की चौधर न्यारी’5

इस पॉप गीत में जाट की छवि निर्मित की गई है। वह अपनी चौधर को सबसे न्यारी बता रहा है। चौधर को सत्ता और पावर से जोड़ कर देखा जाता है। इस चौधर के भुगतभोगी  स्त्री, गरीब और दलित बनते हैं।

जाट जिस किसी की जिद्द कर लेता है उसे पूरी करके ही हटता है। जाट अपनी चौधर के नशे में किसी छोटे-बड़े का कायदा नहीं रखता है। जो उसका मन करता है, वह वही करता है, उसे कोई नहीं रोक सकता।

‘पिस्टल, तलवार कुछ गाड़ी म्हं पड़े हैं
गैलां टांगे हथियार मेरे यार भी खड़े हैं
मेरी आंख न्या लड़ी है, किसे क्यूट हसीना तै
कब्जे करै सै हामनै जमीना पै।’6

‘जाट के हाथां टुटे जो भी, हाथ फिर वह जुडतै ना
पहले गलती करै नहीं, फिर पाच्छै मुड़तै ना’
जब मन आवै जब मारै लाठी, करता ना तैयारी
जाट की चौधर न्यारी, जाट की चौधर न्यारी।7

उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के बाद आए काले धन ने जमीनों के भाव आसमान पर पहुंचा दिए। अनेक किसानों ने अपनी जमीनें बेचना शुरू कर दिया। इन पैसों को वह गाडिय़ों, पिस्टल, हथियार, फैशन, रेस्तरां, बार डांस आदि में उड़ा रहा है। लंपट और उद्दंड वर्ग हथियार लेकर बार-रेस्तरां में महंगी शराब पीता है और दूसरों की जमीनों पर कब्जा करता है। चौधर के लिए वह किसी को भी पीट सकता है। हाथ-पैर तोड़ सकता है। इसके लिए किसी प्रकार की तैयारी की आवश्यकता नहीं होती।

‘जो भी रोकै गुज्जर ने, उसनै कोण बचा लै
जिसे नै मां का दूध पिया, वो आकै टकरा लै

सारे शहर म्हं मेरा सै रूक्का,
बचकै गया ना कोए भी सूखा
थोड़े अलग हैं मेरे शोक,
गुज्जर के छोरे नै लेवै कोण रोक’8

युवा की छवि गुंडे व बदमाश की बनाई जा रही है। इन गीतों में हिंसा व उन्माद को जाति गौरव के साथ शामिल कर दिया जाता है।

इसी प्रकार से ‘इन राजपूत के छोरे का पूरी दुनिया म्हं रूक्का सै’ जाटां का छोरा, बैरागी का छोरा, चमारां कै छोरे आदि अनेक हरियाणवी पॉप गीत सुनने को मिलते हैं। वर्चस्वी जाति का युवा वर्ग उत्तेजना, उन्माद, गुंडागर्दी एवं हिंसा के द्वारा समाज पर अपना दबदबा कायम रखना चाहता है। हमारा समाज जातिगत हिंसा से धधक रहा है। इन गीतों ने भी इसमें घी का काम किया है।

हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है। यहां की संस्कृति खेती से जुड़ी हुई है। पिछले ढाई दशक मेें खेती एक घाटे का सौदा बन गई है। आज किसान को दिन-रात की हाड तोड़ मेहनत के बाद केवल रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है। किसान पर सूदखोरों एवं बैंकों का करोड़ों रुपए का कर्ज बकाया है।  अनेक किसान एवं खेतिहर मजदूर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। पॉप गीतों में किसान की स्थिति को व्यक्त किया है।

‘तुम उठो दस बजे पाच्छै हाम खेत कमा कै आलै सैं’
तम जूस और फ्रूट लेवै तड़के, हाम गंठा रोटी खालै सैं
हाम घा कै माटी लालै सै, थोड़े म्हं काम चलालै सैं

ज्यै सुसाईड करण लागे तै किसान,
इतणी लाशां  नै कूकर ठाओगे
जै हामनै बोणा-बाणा छोड़ दिया तै,
कै तम बगण खाओ गए’9

हरियाणा के निर्माण के शुरुआती वर्षों में यहां विकास की गंगा गांवों से शहरों की ओर बही थी, लेकिन आज गांव एजेंडे से बाहर दिखते हैं। इस गीत में किसान सरकार और अफसरों को संंबोधित करते हुए कहता है। आज किसान के हालात इतने खराब हो चुके हैं कि सुसाईड करने पर मजबूर हो रहा है। यही हालात रहे तो तुम किसानों की लाशों को उठाते-उठाते थक जाओगे। जब तुम उठते हो, तब तक तो किसान खेत में काम करके वापिस आ लेता है। किसान को दिन-रात की हाडतोड़  मेहनत करने के बाद भी केवल गंठा रोटी ही नसीब होती है और तुम बिना मेहनत के सुबह जूस और फ्रूट लेते हो। यह कैसा विकास है।

आज किसान के पास अपने घाव का इलाज करवाने तक के पैसे नहीं है। उसे दिन-रात की मेहनत के बावजूद भूखा मरना पड़ रहा है। वह अपने परिवार का गुजारा बहुत कम पैसों में चलाने पर मजबूर है।

‘कदे जमीदारे न्य सेम मारजा,
कदे मार जा पाळा रै
कदे ओळे म्हं कड़ तोड़  देवै,
कदे बिजळी का चाळा रै
हाम होग्ये पागल ढाळा रै,
म्हारी कोए न्या सुनता साळा रै’10

आज राज्य के लाखों किसान गंभीर आर्थिक संकट में फंसे हुए हैं। जिन गांवों के किनारों से नहरें निकली हैं, वहां के हजारों किसानों के खेतों को सेम ने चौपट कर दिया है। या फिर अधिक वर्षा होने के कारण भी सेम से फसल बर्बाद हो जाती है, जहां पर पानी का अभाव है, वहां पर बिजली से ट्यूबवैल से सिंचाई की जाती है। लेकिन बिजली के बार-बार कट से किसान की फसल सूख जाती है। फसल पर प्राकृतिक आपदाओं के साथ-साथ व्यवस्था के संकट ने किसान को भूखा मरने पर मजबूर कर दिया है।  उसकी कोई सुनने वाला नहीं है।

भीतर कै म्हं मर्ज कसूती बैठा एक सवाल रै
सबका पेट भरणया आज क्यू होग्या कंगाल रै
कूकर अफसर बणजा बालक, खर्च चलाणा ओखा होर्या
जिंदगी कट गई माटी म्हं, मेरी मेहनत गेला धोखा होर्या’11

इस पॉप गीत में किसान समाज और सरकार से एक सवाल पूछ रहा है कि जो किसान दिन-रात, सर्दी-गर्मी में हाडतोड़ मेहनत करके सभी के लिए अनाज पैदा करता है। आज वही भूखा मरने पर मजबूर हो रहा है। किसान की पूरी जिंदगी मिट्टी से अन्न पैदा करने में गुजर जाती है। किसान के आक्रोश को इन गीतों में अभिव्यक्ति मिली है।

आज बहुत तेजी से समाज बदल रहा है। हमारे मूल्य बदल रहे हैं, जिस कारण पीढिय़ों से टकराव बढ़ रहा है। सामाजिक भाईचारे के पतन का एक नया दौर शुरू हो गया है। काम न करने की अपसंस्कृति तेजी से विकसित हुई है, तो खून के रिश्तों  में हत्याओं में वृद्धि हुई है। आज आर्थिक और भौतिक विकास के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक दिवालियापन लगातार बढ़ता जा रहा है।

‘ऐ ऊपर आळै तेरे तै बढ़ कै
मां-बाप का प्यार मनै
आपस म्हं भाई बैरी बणै,
क्यों बदले सोच-विचार तनै
पैसे की दुनिया होरी सै,
बिजनस तै मतलब राखैं लोग
छोड़ कै आपणी ब्याहाली नै,
दूसरे की औरत पाच्छै लोग
रिश्ते-नाते भूल कै
यह गहरी नींद म्हं सूत्ते
मां-बाप तो घर तै काढ दिये,
बेटे नै पाळ लिए कुत्ते’12

उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण परिवार का विघटन, मां-बाप की उपेक्षा, भाई-बहन मेंं आपस में बैर आदि अनेक समस्याएं पैदा हो गई हैं। प्रत्येक व्यक्ति पैसे के पीछे भाग रहा है। हर रिश्ता आज स्वार्थ की नींव पर टिका है। जब तक किसी को स्वार्थ होता है जब तक वह साथ रहता है। स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर वह रिश्तों को भूल जाता है।

समाज बहुत तीव्र गति से करवट बदल रहा है। आज की पीढ़ी की सोच, मां-बाप की सोच से मेल नहीं खा रही है। मां-बाप बच्चों पर बोझ बनते जा रहे हैं।ं अनेक वृद्धाश्रम खुल रहे हैं। व्यंग्य किया है कि मां-बाप को घर से निकाल कर कुत्ते पाल रहेे हैं।

‘इस फैशन के दौर म्हं,
बदल गया मेरा हरियाणा रै
बावन गज का था घूम घाघरा,
काला दामण रहहा नहीं
लांडी कुड़ती गात उघाड़ा,
न्या दूध दही का खाना रै
इस फैशन के दौर म्हं,
बदल गया मेरा हरियाणा रै’13

गत डेढ़ दशक में हरियाणा में व्यापक बदलाव आया है। धन की चकाचौंध में यहां का गंवईपन भी खो गया है। आज का युवा वर्ग शराब, चौम्मीन, बर्गर एवं फास्ट फूड का खाना पसंद करने लगा है। दूध-दही आज खाने की थाली से गायब है। आज हरियाणे के युवा शाम होते ही शराब के ठेके पर पाया जाता है। खानपान के साथ पहनावा भी बदला है। हरियाणवी समाज में स्त्री के पहनावे को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

आज हरियाणा का समाज  सामाजिक संकट के दुष्चक्र में फंसता जा रहा है। हर चीज पैसे से खरीदने और बेचने की दलाल संस्कृति विकसित हो रही है। काम न करने की कुसंस्कृति ने लाखों युवाओं को नशाखोर और अपराधी बना दिया है। सैंकड़ों युवा हर वर्ष अवसाद के शिकार होकर आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं।

युवाओं को आरक्षण के नाम पर इन्हें भविष्य का झूठा लालच दिखा कर उकसाया जा रहा है। जाट आरक्षण की मांग के नाम पर गत फरवरी में बलवाईयों और दंगाईयों ने खूब बवाला काटा है। रोहतक, सोनीपत, झज्जर, भिवानी और जींद में खुली गुंडागर्दी देखने को मिली। इसको रोकने में सरकार, पुलिस और हमारी आर्मी भी नाकाम रही। राजनीतिक दल सामाजिक वैमनस्य का माहौल पैदा करके अपने स्वार्थ की रोटी सेक रहे हैं। आज पूरा हरियाणवी समाज पैंतीस एक में बंट रहा है।

‘हाथ जोड़-जोड़ शुरु म्हं मांगे वोट
फेर आदे सरकार जाट कै म्हारी चोट
फदू मत लाओ हामनैं माटी म्हं मिला देंगे
कोम इसी जाट सारी धरती हिला देंगे
कै गलती करदी जाट्या न्य
जो ईतना बड्डा दोस दिया
यो पीएम बन गया और जात का
आरक्षण भी खोस लिया’14

जिन जिलों में विशेष आर्थिक क्षेत्रों के लिए जमीन गई है, वहां पर धन बहुत आया है। इन इलाकों में आलीशान कोठियों, महंगी गाडिय़ों, शराब और अपराध के साथ नेताओं की बाढ़ भी आ गई है। चौधर का जादू युवा चौधरियों के सिर चढ़कर बोल रहा है। वह सत्ता पाने के लिए शराब, पैसों का खुलकर प्रयोग करते हैं।

कुछ समय पहले हरियाणा में पंचायती चुनाव में देखने को मिला कि उम्मीदवार शराब व पैसों के बल पर सरपंची पाना चाहता है। सरपंची केवल चौधर का प्रतीक नहीं, बल्कि पैसे कमाने का जरिया भी बन गई है।

‘सरपंची थयागी तो रै चौधर आज्या गी
या दुनिया घणी साणी तनै लूट कै खाज्या गी
तेरा मोर बणा ज्या गी, क्यो करै जोरा-जोरी
सरपंची लैणी सै अब कै मनै रै गोरी’15

लोकगीतों और रागनियों के विकल्प के तौर पर शुरू हुए इन पॉप गीतों में मनोरंजन के साथ-साथ हरियाणवी समाज, संस्कृति व सत्ता-विमर्श सामने आते हैं। अक्सर देखने में आता है कि हमारा बुद्धिजीवी वर्ग इन पॉप गीतों पर अश्लीलता और असभ्य का आरोप लगाकर इन्हें खारिज कर देता है। इनकी भाषा और विषय वस्तु को लेकर भी सवाल किए जाते हैं। मनोरंजन की नई जमीन पैदा कर रहे पॉप गीत समाज में हो रहे बदलाव को सबसे पहले रेखांकित करते हैं। इनसे नाक-भौं सिकोड़ने की बजाए इनके गंभीर विश्लेषण की आवश्यकता है।

संदर्भ:

  1. ‘देस हरियाणा’ पत्रिका, सम्पादक-डा. सुभाष चंद्र, कुरुक्षेत्र, अंक, पृ. 71
  2. बोल-प्यारा माणस, लेखक व गायक-मन्जीत पांचाल
  3. बोल-मोक्का जौबन का, लेखक-देव कुमार देवा, गायक-देव कुमार व अनु कादायन http:/youtu.be/-
    b5LPlLPUlal
    http:/youtu.be/15Y15J91804
  1. बोल-म्हारे गाम का पानी, लेखक अजमेर सिंह, गायक राजू पंजाबी http:/youtu.be/8Z7ttFz68KQ
  2. बोल-जाट की चौधर, लेखक अनिल गोदारा, गायक अनिल गोदारा एवं नीपू नेफेवाला http:/youtu.be/
    vDeXtDJaHOQ
  3. वही
  4. वही
  5.  बोल-गुजर का छोरा, लेखक व गायक-राहुल दाइमा
  6. बोल-किसान गीत, लेखक व गायक राजेंद्र फौगाट
  7. बोल-किसान गीत, लेखक व गायक-गजेन्द्र फौगाट
  8. बोल-दर्द किसान का, लेखक-एमके लोध्रया गायक-अरूण अरूणा
  9. बोल-रिश्ते, गायक-गजेंद्र फौगाट, लेखक-राजीव राठी
  10. बोल-फैशन का दौर, गायक बबलू आलगलिया, लेखक कुमार संजीव http:/youtu.be/jXqVmVe10Ao
  11. बोल-जाट आरक्षण, लेखक एवं गायक-बिट्टू सोखी http:/youtu.be/TzgGCXH-o
  12. बोल-सरपंची लेनी सै, गायक-प्रवीन बस्सी, रस्मी यादव, लेखक प्रवीन एवं प्रदीप कादियान http:/
    youtu.be/5Zz-Sz9GT7W

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पेज – 117 से 119

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