हरित क्रान्ति से खेती की पैदावार में बढ़ोतरी हुई। इससे धान में 18 गुना और गेहूँ में 10 गुना वृद्धि दर्ज की गयी है । अब हरियाणा केन्द्रीय पूल में लगभग 17 प्रतिशत अनाज का योगदान दे कर पंजाब के बाद दूसरे नंबर पर है। जिसके प्रभाव से हरियाणा के किसानों के आर्थिक व सामाजिक जीवन में काफी बदलाव आया। हरित क्रान्ति के शुरूआती दौर में किसानों को खेती में बचत हुई और इससे उनके रहन-सहन में काफी सुधार हुआ। गांवों में पक्केे घर बन गए, ट्रैक्टर, मोटर साईकिल और गाडिय़ां आ गई, टेलीविजन, फ्रीज, आटा पीसने की चक्की, चारा काटने की मशीन व दूध बिलोने की मथनी आदि उपलब्ध हो गई। इस दौर में कुछ किसानों ने जमीन खरीदी और कुछ ने शहरों में जाकर सहायक धन्धे भी शुरू किये।

लेकिन पिछले लगभग 15-20 वर्षों से खेती की पैदावार में या तो ठहराव आ गया है या मामूली वृद्धि हुई, जबकि खेती का खर्च बढ़ गया है। इसके परिणामस्वरूप किसान की आर्थिक स्थिति निरंतर कमजोर होती जा रही है।

किसानों की स्थिति:-कर्जे का फंदा :

                वर्ष 1990-91 में नई आर्थिक नीतियां लागू करने के बाद खेती में निजी कम्पनियों की दखलन्दाजी ओर अधिक बढ़ती गई। किसानों को अधिक से अधिक पैदावार लेने के जाल में फंसा कर मंहगे बीज, खाद और दवाईयां का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया गया। किसानों को अन्धाधुन्ध मशीनीकरण के मकडज़ाल में फंसाया गया। ट्रैक्टर और अन्य कृषि यन्त्र खरीदने के लिये सरकार द्वारा ऋण देने की सुविधा उपलब्ध करवाई गई।  कुछ कृषि उपकरणों पर अनुदान भी दिया गया। इससे हरियाणा में ट्रैक्टरों की संख्या में अत्यधिक बढ़ोतरी हुई। अब हरियाणा में लगभग 2.70 लाख ट्रैक्टर हैं।

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एक ट्रैक्टर कम से कम 1000 घण्टे प्रति वर्ष चलने पर ही आर्थिक तौर से फायदेमन्द रहता है, जबकि राज्य में अधिकतर किसानों की बहुत छोटी जोतें हैं तथा औसतन उनके ट्रैक्टर लगभग 450 घण्टे प्रति वर्ष चलते हैं। अत: इतनी बड़ी संख्या में ट्रैक्टर आर्थिक तौर से लाभ की बजाए नुकसान कर रहे हैं। काफी किसान ऐसे है जो ट्रैक्टर को एक वर्ष के अन्दर ही बेचकर उसके पैसों से अपने अन्य खर्चे चलाते हैं। इस प्रकार से किसान ट्रैक्टर के कारण लम्बी अवधि तक कर्जे में फंस रहे हैं। ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी भारी मुनाफा कम रही हैं। दैनिक भास्कर के अनुसार देश की तीन प्रमुख ट्रैक्टर बनाने वाली कम्पनियों की कुल आय वर्ष 2016-17 में करीब 5300 करोड़ रही। इससे पहले वर्ष यह 4500 करोड़ थी। इस प्रकार आमदनी में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी ।

इसी प्रकार से, किसानों को ट्यूबवैल पर भी काफी खर्चा करना पड़ रहा है। अधिक पैदावार लेने के चक्कर में जमीन के नीचे के पानी दोहन के लिए, ट्यूबवैल की संख्या 60 के दशक में लगभग 40,000 से बढकर लगभग 7.52 लाख पहुंच चुकी है। इनमें से लगभग  2.50 लाख टयूबवल डीजल से चलते है और शेष 5 लाख बिजली से चलते हैं। ट्यूबवैलों द्वारा सिंचित क्षेत्र वर्ष 1966-67 में कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 20 प्रतिशत से बढकर 56.6 प्रतिशत हो गया है।

इस प्रकार भूजल के अत्याधिक दोहन से जमीन में पानी की गहराई बढ़ती जा रही है तथा किसानों को 1000 से 1200 फुट गहराई तक के ट्यूबवैल लगाने पड़ रहे हैं। इस प्रकार ट्यूबवैल द्वारा सिंचाई करने से किसानों का खेती खर्चा बढ़ गया है। पम्पसेट बनाने वाली देश की तीन प्रमुख कम्पनियों का वर्ष 2016-17 का शुद्ध लाभ 125.29 करोड़ हुआ है।

खेती के बीज, खाद और कीटनाशक दवाइयों पर खर्चें में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है। बी.टी. कपास का बीज केवल प्राईवेट कम्पनियों द्वारा ही तैयार किया जाता है। सब्जियों के हाईब्रीड बीज भी ज्यादातर प्राईवेट कम्पनियां ही सप्लाई कर रही है। सरकारी संस्थाओं द्वारा बीज उत्पादन साल दर साल घट रहा है। किसानों द्वारा अपने खेत में अपने लिए बीज तैयार करने की प्रक्रिया लगभग लुप्त हो गई है। इसप्रकार बीजों के लिए प्राईवेट कम्पनियों पर किसानों की निर्भरता बढ़ती जा रही है तथा वे किसानों से बीज की मनमानी कीमत वसूल रही हैं। कुछ सब्जियों के बीज तो 5.6 रूपये प्रति बीज बेचे जा रहे हैं। इससे किसानों की खेती का खर्चा बढ़ गया है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार देश की प्रमुख तीन बीज कम्पनियों को वर्ष 2015-16 में 85.47 करोड़ का मुनाफा हुआ है। बीज का कारोबार प्रति वर्ष 10 प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ रहा है। यह कारोबार लगभग 35000 करोड़ रूपये पहुंच गया है। सरकार बीज कम्पनियों को टैक्स में भारी छूट भी देती है।

                खाद के अंधाधुंध व असंतुलित उपयोग से खेती में खर्चा तो बहुत बढ़ गया है परन्तु 1966-67 में एक किलो एनपीके से होने वाला 18 किलो अनाज के उत्पादन की मात्रा घटकर मात्र 6 किलो अनाज प्रति किलो एनपीके रह गई है। दैनिक भास्कर के अनुसार खाद की तीन बड़ी कम्पनियों को साल 2016-17 में 1255.23 करोड़ का शुद्ध लाभ हुआ है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 37.45 प्रतिशत ज्यादा था। सरकार इन्हें भी बहुत अनुदान देती है।

खेती में कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। हरियाणा,1.6 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग से पंजाब के बाद दूसरे नम्बर पर है जबकि देश की औसत खपत 600 ग्राम प्रति हेक्टेयर है। दैनिक भास्कर के लेख के अनुसार 2016-17 में अकेले हरियाणा में ही पेस्टिसाइड का कारोबार करीब 1100 करोड़  रु पये तक पहुँच चुका है। इस रिपोर्ट के अनुसार पेस्टिसाइड टॉप की तीन कम्पनियों ने वर्ष 20166-17 में 895.98 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया है। यह पिछले वर्ष के मुकाबले 22.8 प्रतिशत अधिक था। देश में वर्ष 2014-15 में ही इसका कारोबार 28600 करोड़ पहुँच गया था जो कि 7.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। प्राइवेट कम्पनियां हर साल नई नई मंहगी दवाईयां बाजार में लाकर किसानों को लूट रही हैं। हरियाणा में हर साल लगभग 82000 क्विंटल पेस्टिसाइड फसलों में डाली जा रही है। इनमें से अनेक दवाइयां तो विकसित देशों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक करार देकर प्रतिबंधित की जा चुकी हैं।

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स्पष्ट है कि किसानों का केवल कीटनाशक दवाइयों पर ही खर्चा नहीं बढ रहा, बल्कि कीटनाशकों के अन्धाधुन्ध प्रयोग से प्रदूषित पर्यावरण में रहने व विषाक्त खाने का उपयोग करने के कारण कैंसर जैसी भंयकर बिमारियों के इलाज पर भी भारी खर्च करना पड़ रहा है। धीरे-धीरे एक अत्याधिक चिन्ताजनक स्थिति बन रही है जिसका खमियाजा सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि देश के सभी नागरिकों को उठाना पड़ रहा है। दैनिक भास्कर के लेख के अनुसार इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार तम्बाकू के बाद प्रदेश में कैंसर का सबसे बड़ा कारण पेस्टिसाइड बन गया है। हरियाणा में हर साल औसतन 29261 नए कैंसर के मरीज सामने आ रहे हैं। पिछले तीन साल में लगभग 1500 मौत कैंसर से हो चुकी हैं। इसके साथ हार्ट अटैक, बी पी, सुगर, दमा, स्किन एलर्जी के मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।

लगातार गम्भीर हो रही उक्त भयावह स्थिति के प्रति शासक वर्ग की लापरवाही के लिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि ‘जब रोम जल रहा था तो नीरो चैन की बंसुरी बजा रहा था।Ó

खेती घाटे का धन्धा

                अब खेती घाटे का धन्धा बन गई है। अभी इसी वर्र्ष हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार ने सर्वे किया है, जिसमें राज्य के दस जिलों में वर्ष 2015-16 में गेहूं की फसल से प्रति एकड़ बचत निकाली गई है। जो नीचे तालिका संख्या 1 में जा रही है :

तालिका 1

गेहूं उत्पादन से प्रति माह बचत का जिलावार आंकलन

जिला      खर्चा                    आमदनी            बचत           बचत प्रति एकड़
(रुपयों में)            (रुपयों में)          (रुपयों में)      प्रति माह

भिवानी    25330                  32762               7432       1238

फतेहाबाद  29535                  36697               7160       1193

हिसार      29839                  34087               4248       708

गुडगाँव    26584                  32296               5712       952

झझर      23375                  33115               9740       1623

कैथल      34958                  37397               2439       406

करनाल    35634                  37513               1879       313

महेंद्रगढ़    27076                  36310               9234       1539

रोहतक    27683                  24430               1747       291

पानीपत    34526                  35880               1354       225

औसत राज्य   29691             34490               4799       799

स्रोत :  दैनिक भास्कर

तालिका 1 का विश्लेषण करें तो हरियाणा में गेहूं से औसत अर्जित आमदनी 4799 रूपये प्रति एकड़ है। हरियाणा की मुख्य फसल गेहूं 6 महीने की फसल हैं। इसलिए प्रति एकड़ फसल की आमदनी को छह से भाग देने पर मात्र 800 रूपये प्रति माह प्रति एकड़ आमदनी होती है। जिन जिलों में हरित क्रान्ति की शुरुआत हुई थी (करनाल, पानीपत, कैथल तथा रोहतक) में यह आमदनी 225 रूपये से 400 रूपये प्रति एकड़ प्रति माह ही होती है।

                इसी प्रकार से दूसरी नकद फसल कपास से आमदनी की स्थिति इससे भी बुरी है। कृषि विभाग हिसार के बी.टी. कोटन की पैदावार के आँकड़े नीचे तालिका संख्या 2 में दिए गए हैं :

तालिका 2

वर्ष                    पैदावार कि.ग्रा.     औसत भाव          कीटनाशक के (हेक्टेयर) (प्रति कि.)                                                                                                                  स्प्रे की संख्या

2011                734                      4200                       2

2012                615                     4300                       3

2013                 502                    5300                       4

2014                 373                    4100                       5

2015                 276                   4000                       7.9

स्रोत : कृषि विभाग हरियाणा

तालिका 2 के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि कपास की पैदावार पिछले पांच वर्र्षों के दौरान हर साल घट रही है; जबकि इसमें कीटनाशक दवाईयों के स्प्रे की संख्या बढ़ रही है। हैरानी की बात है कि कपास की पैदावार अत्याधिक कम होने के बावजूद उसके बाजार भाव लगभग स्थिर रहे जिसके कारण किसानों को कपास में भारी नुकसान हो रहा है। यही स्थिति धान की फसल की भी है। इन्ही कारणों से खेती घाटे का धंधा बन गई है। इसके कारण किसानों पर कर्जे का बोझ बढ़ता जा रहा है। किसानों की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो गई है कि हरियाणा में किसानों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

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कृषि से सम्बन्धित सरकारी संस्थाओं की स्थिति :

                कृषि में शिक्षा, शोध और विस्तार के लिए, सरकार ने हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार और इसके अधीन राज्य में अन्य स्थानों पर अनुसन्धान केन्द्रों का गठन किया। किसानों को गांव स्तर पर कृषि संबंधी जानकारी देने के लिये कृषि विभाग के कृषि विकास अधिकारियों की गांवों में नियुक्तियां की। हरित क्रांति के शुरूआती दौर में विश्वविद्यालय और हरियाणा सरकार के कृषि विभाग का विस्तार किया गया। इनमें नये पद सृजित करके भर्ती की गई तथा अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई गई। इसके परिणाम स्वरूप कृषि में नई खोजें हुई और उनको किसानों तक पहुंचाया गया तथा राज्य में कृषि पैदावार बढ़ाने में बहुत योगदान रहा।

                पिछले लगभग 20 वर्षोंसे सरकारों द्वारा इन संस्थाओं के महत्व को धीरे-धीरे घटाने की नीतियां लागू की गई। योजनाबद्ध तरीके से इनमें नई भर्तियां बन्द कर दी गई। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार और इसके अन्तर्गत आने वाले शोध केन्द्रों पर लगभग 10-12 वर्र्षों तक कोई नई भर्ती नहीं की गई। इससे पहले भी, बहुत महत्त्वपूर्ण पदों पर असक्षम लोगों को बैठाकर उन पदों की गरिमा कम किया गया। नई भर्ती में योग्यता की बजाय राजनैतिक हस्तक्षेप ने स्थान ले लिया।

उक्त कारणों से विश्वविद्यालय में कृषि में नए शोध कार्य प्रभावित हुए। एक बार ऐसी स्थिति आ गई थी कि विश्वविद्यालय में सहायक वैज्ञानिकों की संख्या नगण्य हो गई थी तथा केवल वरिष्ठ प्राध्यापक/वैज्ञानिक ही बच गए थे। शोध के कार्य लम्बी अवधि तक (कई वर्र्षों) चलते है लेकिन वैज्ञानिकों की कमी के कारण वे नहीं चलाऐ जा सके। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार में 1500 से भी अधिक प्राध्यापक / वैज्ञानिकों की संख्या होती थी, जोकि अब लगभग 450 रह गई है।

                इसी प्रकार हरियाणा सरकार के कृषि विभाग और बागवानी विभाग में कृषि विकास अधिकारियों की संख्या वर्ष 1990 के बाद से घटती गई। गांव के स्तर पर कार्यरत कृषि विकास अधिकारियों/ कृषि निरीक्षकों/ग्राम विस्तार कार्यकर्ताओं की संख्या 2000 से घटकर लगभग 575 रह गई है। इसीप्रकार से हरियाणा बागवानी विभाग में उद्यान विकास अधिकारियों की संख्या 120 से घटकर मात्र 40 रह गई है। लगभग ऐसी ही स्थिति पशुपालन विभाग एवं मछली विभाग की है। इस प्रकार की सरकारी नीतियों के कारण विश्वविद्यालय और कृषि तथा बागवानी विभाग सिकुड़ते चले गए। किसानों के हित में किये जाने वाले कार्य भी कम होते गए और इनसे अपेक्षित परिणाम मिलने लगभग नगण्य हो गए। इससे किसानों में इनकी साख को धक्का लगा।

कुछ राजनैतिक लोगों और प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रचार करना शुरू कर दिया कि हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय और कृषि विभाग हरियाणा कोई कार्य नहीं हो रहा है। एक योजनाबद्ध व नीतिगत तरीके से इन संस्थाओं को जनता में बदनाम करने की मुहिम चलाई गई ताकि जनता स्वयं यह कहने लगे कि इनसे अब किसानों को कोई फायदा नहीं हो रहा है इसलिए इन्हें बंद कर दिया जाये। यह सब सरकार की नीजिकरण की नीतियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। इस दौरान कृषि में प्राईवेट कम्पनियों ने बीज, खाद, कीटनाशक दवाइयां और कृषि मशीनीकरण में पूरा जाल बिछा लिया। इन कम्पनियों ने किसानो से सीधा संपर्क बना लिया और किसानों को अनेक गैरजरूरी कृषि इनपुट प्रयोग करवाने शुरू करवा दिए। इस प्रकार किसानों की प्राईवेट कम्पनियों पर निर्भरता व उनकी लूट बढ़ती जा रही है।

किसानों की जमीनों की जोत का आकार लगातार घटता जा रहा है। खेती पर गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। किसानों का, गांवों से शहरों की तरफ पलायन हो रहा है। धीरे धीरे किसानों का आर्थिक संकट अब सामाजिक संकट में परिवर्तित हो रहा है। बेरोजगारी बढ़ रही है। किसान समाज में व्यक्तिवाद, उपभोक्तावाद, अपराध और नशे जैसी बुराईयां बढ़ रही है। सामाजिक भाईचारा और सामाजिक सुरक्षा खत्म होती जा रही है। किसानों में अकेलापन और असुरक्षा भावना बढऩे के कारण चारों और अंधेरा दिखाई देता है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( सितम्बर-अक्तूबर, 2017), पेज – 18 – 20

 

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