गत वर्षों ने भारतीय किसानों के भीतर दर्शनीय जागृति एवं संगठन शक्ति की असाधारण बाढ़ देखी है। यही नहीं कि उसने देश के सभी सार्वजनिक तथा जनतांत्रिक आंदोलनों में पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा भाग लिया है; वरन एक श्रेणी की हैसियत से अपनी स्थिति को भी उसने समझा है। साथ ही, सामंतशाही और साम्राज्यशाही के सम्मिलित निर्दय शोषण के मुकाबले में अपनी हस्ती कायम रखने के लिए उसने अपने जानों की बाजी लगा दी। इसीलिए उनकी वर्ग संस्थाएं बहुत बड़ी हैं और शोषण के विरुद्ध उनके संघर्ष ऊँचे दर्जे को पहुँच गए हैं, जैसा कि उनकी देशव्यापी बहुतेरी फुटकर लड़ाइयों से स्पष्ट है। इस जागरण और इन संघर्षों के अनुभवों ने उसमें एक नवीन राजनीतिक चेतना ला दी है। वे किन ताकतों से लड़ रहे हैं इस असलियत का पता पा गए हैं। अपनी गरीबी एवं शोषण की वास्तविक दवा भी उसने जान ली है। उनकी दृष्टि अपनी प्रकृत्या अलग रहने की हालत एवं संकुचित स्थानीयता के साथ बँधी नहीं है। उनने जान लिया है कि अनेक गुप्त-प्रकट रूपों में उनके शोषण-दोहन के लिए ही जीवित तथा उसी के बल पर फलने-फूलनेवाले पूँजीवाद को मिटना होगा, सो भी प्रधानत: उन्हीं के प्रयत्नों एवं कामों से ही-ऐसे कामों से जिन्हें वे देश की पूँजीवाद-विरोधी अन्यान्य शक्तियों के साथ मिलकर करेंगे। उनने यह भी महसूस किया है कि कुछ तो भूतकालिक सामंत प्रथा के फलस्वरूप और कुछ साम्राज्यवाद एवं पूँजीवाद के गठबंधन के द्वारा जानबूझ कर किए गए प्रयत्नों के चलते दोहन की ऐसी प्रथा पैदा हो गई है जिसने उन्हें गुलाम एवं दरिद्र बना डाला है। उसे भी मिटाना होगा। फलत: वे इस निर्णय पर पहुँचे हैं कि हमारी आए दिन की लड़ाइयों का लाजिमी तनीजा होगा स्वयं पूँजीवाद के ऊपर जबर्दस्त क्रांतिकारी धावा तथा उसके फलस्वरूप उसका सत्यानाश। इस प्रकार के वे शासन-सत्ता को हथियाएँगे जिससे उन्हें जमीन मिलेगी, कर्ज के भार से फुर्सत होगी, शोषण उनका पिंड छोड़ेगा और उनके परिश्रम के फलों का पूर्ण उपभोग उनके लिए निरबाधा होगा। यह पहली बात है।

 दूसरी यह है कि हाल के वर्षों में प्रांतीय सरकारों की ओर से किसानों को नाममात्र की सुविधाएं देने का मायाजाल रचा गया है। इन सुविधाओं के ज्वलंत खोखलेपन ने, इन्हें प्राप्त करने में होनेवाली जबर्दस्त दिक्कतों ने और कृषि संबंधी किसी भी बुनियादी सवाल को हल करने में प्रांतीय सरकारों की प्रकट असमर्थता ने इस तथाकथित स्वराज्य का पर्दाफाश भलीभांति कर दिया है। इससे किसानों की यह धारणा और भी जबर्दस्त हो गई है कि वर्तमान आर्थिक तथा राजनीतिक प्रथा को मिटा कर उसकी जगह ऐसी प्रणाली को ला बिठाना होगा जिसका विधान स्वयं जनता ऐसे प्रतिनिधियों के द्वारा तैयार करेगी जिनका चुनाव व्यापक बालिग मताधिकार के आधार पर होगा। यही तो किसान-मजदूरों का पंचायती राज्य होगा जिसमें सब कुछ करने-धरने की शक्ति संपत्ति को उत्पादन करनेवाली जनता के हाथों में होगी। इस प्रकार संयुक्त किसान-सभा को कहने का गर्व है कि जमींदारों एवं पूँजीपतियों के सम्मिलित शोषणों से अपने आप को मुक्त करने तथा उसके लिए अपेक्षित बलिदान के लिए आज भारतीय किसानों का दृढ़ संकल्प पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा है।

किसान-मजूरों का मेल

 सभा को यह उल्लेेख करने में खुशी है कि मुल्क में और बाहर दूसरी भी जबर्दस्त शक्तियां और बातें हैं जो न सिर्फ किसानों को बल्कि भारतीय जनता को भी इन्हीं एवं ऐसे ही लक्ष्यों की ओर तेजी से खींच रही हैं। युद्ध में किसानों के साथी और क्रांति के अग्रदूत जो कारखानों के मजूर हैं उनके संगठन और संघर्ष उस हद को पहुँच गए हैं जहां पहले कभी पहुँचे न थे। मजूरों के संगठन आंदोलन में ज्यादा ताकत आई है और मजूरों की राजनीतिक चेतना बढ़ी है। सभा चाहती है कि मजूरों और किसानों के संगठनों एवं आंदोलनों के बीच निकटतर संबंध की लड़ी जुटें। …

किसान-सभा का लक्ष्य और काम

भारत में समाजवादी गणतांत्रिक राज्यों का ऐसा संघ स्थापित करना जिसमें सारी सत्ता श्रमजीवी शोषित जनता के हाथों में हो और इस तरह किसानों को आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा दूसरे शोषणों से पूर्ण छुटकारा दिलाना संयुक्त किसान आंदोलन का लक्ष्य है।

संयुक्त किसान आंदोलन का प्रधान काम है किसानों को संगठित करना ताकि वे अपनी तात्कालिक आर्थिक एवं राजनीतिक मांगों के लिए लड़ें और इस तरह श्रमजीवियों को हर तरह के शोषणों से छुटकारा दिलाने की अंतिम लड़ाई के लिए वे तैयार किए जाएं।

किसान-मजूर (मजूर-किसान) राज्य की स्थापना के लिए होनेवाली घमासान में सक्रिय भाग तथा नेतृत्व के द्वारा उत्पादनकारी जनता के हाथों में सर्वोपरि आर्थिक एवं राजनीतिक सत्ता सौंपने के लिए संयुक्त किसान आंदोलन कृत प्रतिज्ञ है।

किसानों का कार्यक्रम अनिवार्य राष्ट्रीय कायक्रम है

भारत के आर्थिक जीवन का ज्वलंत तथ्य है अपार किसान जनसमूह की अत्यंत विपन्नावस्था एवं दलनकारी गरीबी -उस जन समूह की जो हमारी जनसंख्या का 80 प्रतिशत है। फलत: कोई भी राजनीतिक या आर्थिक कार्यक्रम जो इन किसानों की जरूरतों तथा मांगों को भुलाने की धृष्टता करता है किसी भी खयाली दौड़ से राष्ट्रीय कार्यक्रम कहा नहीं जा सकता है। किसी संस्था को, जो भारतीय जनता के प्रतिनिधित्व का दावा करती है, दिवालिए एवं अत्यंत शोषित किसानों-रैयतों, टेनेंटों तथा खेत-मजदूरों-के स्वार्थों को अपने कार्यक्रम में अग्रस्थान देना ही होगा, यदि उसे अपने दावे को सत्य सिद्ध करना है।

किसान उपेक्षित दल है

भारतीय किसानों की भयंकर दशा ऐसी है कि उसे दुहराने की जरूरत नहीं है। जमींदार, ताल्लुकेदार, मालगुजार, इनामदार, जन्मी, खोत, पवाईदार तथा अन्य भूस्वामी एवं मध्यवत्र्ती लोग किसानों को हजारों तरह से सताते रहते हैं। भूस्वामी किसानों के कंधों पर अखरनेवाली मालगुजारी की प्रणाली का जुआ लदा हुआ है। खेत-मजूर अगर कुछ मजूरी पाते भी हैं तो वह पेट भरने के लिए पूरी नहीं होती। उन्हें गुलामों की सी दशा में रहना और काम करना पड़ता है। वे उन कानूनों से प्राय: वंचित ही रखे गए हैं जो उनकी दशा कुछ सुधार सकते थे और जिन्हें व्यवस्थापक सभाएँ इस मुद्दत के दरम्यान पास कर सकती थीं। इसका कारण सिर्फ यही है कि व्यवस्थापकों ने अब तक यह माना ही नहीं है कि किसानों को संतुष्ट करना उनका फर्ज है। यह भी इसीलिए कि इस देश में खुद राष्ट्रीय राजनीतिक आंदोलन ने किसानों की बुनियादी और तात्कालिक समस्याओं से कोई ताल्लुक ही नहीं रखा है।

किसान-मजूर राज्य क्यों ?

यह सब कुछ मिटा देना होगा। मौजूदा शासन-प्रणाली के भीतर हमारा लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकता। फिर भी, यदि किसानों को बर्बादी से बचना है तो उन्हें अपने लक्ष्य के लिए लडऩा और उसे प्राप्त करना ही होगा। यदि शासन-प्रणाली उनके रास्ते का रोड़ा बनती है जैसा कि वर्तमान प्रणाली बेशक है, तो इसे मिट जाना ही होगा। इसी तरह किसानों की लड़ाई किसान-मजूर (मजूर-किसान) राज्य की लड़ाई परिणत हो जाती और मिल जाती है। यही कारण है कि संयुक्त किसान-सभा ने किसान-मजूर (मजूर-किसान) राज्य की स्थापना के संबंध में अपने संकल्प की घोषणा की है। इसी ढंग से किसान आंदोलन समाजवादी आंदोलन का प्रधान अंग बन जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक है कि अब राजनीतिक आंदोलन के भीतर आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र भी लाए जाएँ और उसे इस देश में इस तरह विकसित किया जाए कि मजूरों और किसानों से इसे शक्ति और स्फूर्ति मिले। उन सभी बाधाओं को मिटाने की भी कोशिश इसे करनी होगी जो देश की संपत्ति के उत्पादक जन समूह की भरपूर भलाई की ओर ले जानेवाले सच्चे और स्थिर साधनों और कामों के रास्ते में आ खड़ी होती हैं। खेत और रोटी के लिए लड़ी जानेवाली लड़ाई का अटूट संबंध किसान-मजूर (मजूर-किसान) राज्य संबंधी उनकी लड़ाई से है।

संघर्ष करने का मार्ग

संयुक्त किसान-सभा के मानी हैं किसानों का एका। जो ताकतें किसानों को विपदा एवं दरिद्रता की गहराई में बेरहमी से घसीट रही है उनको परास्त करने के लिए सभी किसानों को मिल जाना होगा। किसान-सभा किसानों के संगठन के द्वारा उन्हें अपने पांवों पर खड़ा करके किसानों को सिर्फ इस योग्य नहीं बनाती कि वे जमींदारों, मालमुहकमे के अफसरों, साहूकारों तथा उनके दलालों के हाथों होनेवाली हजारों परेशानियों एवं जबर्दस्ती के व्यवहारों को मिटा दें, वरन भारत में समाजवादी प्रजा सत्तात्मक राष्ट्रों के संघ शासन की स्थापना रूपी उनके अंतिम लक्ष्य की ओर बहुत ज्यादा उन्हें अग्रसर करती है। और इस प्रकार उस लक्ष्य की प्राप्ति के आंदोलन को इतना दृढ़ करती है जितना और कुछ कर नहीं सकता।

सौभाग्य से देश में सर्वत्र किसान अपनी मौलिक समस्याओं के बारे में राजनीतिक एवं आर्थिक दृष्टि से अधिकाधिक जानकार होते जा रहे हैं। किसानों के इसी जागरण का प्रतीक यह अखिल भारतीय संयुक्त किसान-सभा है। उनने समझ लिया है कि यदि हमें अपने लक्ष्य की ओर मुस्तैदी से बढऩा है तो अपना जुझारू वर्ग संगठन तैयार करना ही होगा। किसान-सभा केवल रैयतों, काश्तकारों और भूमिहीन मजूरों का ही प्रतिनिधित्व नहीं करती, किंतु बहुत जगहों में टुँटुपुँजिए भूमिपतियों अर्थात भूस्वामी किसानों की भी नुमायंदगी करती है। शब्दांतर में यह सभा उन सबों का प्रतिनिधित्व करती, उनके बारे में बोलती और उनके लिए लड़ती है जो जमीन पर कमाई कर के खेती से जीविका चलाते हैं। पूँजीवाद, जमींदारी प्रथा और महाजनों ने जो जंजीरें उन पर कस रखी हैं उन्हें तोडऩे के लिए किसानों के इन विभिन्न दलों को परस्पर मिल जाना और लडऩा होगा। संक्षेप में उन्हें पूर्ण राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता के लिए युद्ध करना होगा जमींदारों तथा पूँजीपतियों के भारत का स्थान वह भारत लेगा जिसमें सारी शक्ति श्रमजीवी जनसमूह के हाथों में होगी। ऐसे भारत की स्थापना के लिए जो संघर्ष होगा यह अन्यान्य बातों के अलावे भारत के किसानों के अभाव अभियोगों एवं मांगों पर आधारित कार्यक्रम की बुनियाद पर ही सफलता से चलाया जा सकता है।

इन बुनियादी परिवर्तनों के लिए चालू लड़ाई के दौरान में ही किसानों को उन बातों के लिए भी जूझना होगा जो वर्तमान आर्थिक व्यवस्था के भीतर प्राप्त की जा सकती हैं। सिर्फ इसी ढंग से वे अपने आपको बड़ी जुझार के लिए तैयार कर सकते हैं जिसे उन्हें अपने दिमागों में हमेशा रखना होगा।

 

 

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