नारनौल के सतनामी

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इतिहास


◊ प्रो सूरजभान

Narnaul ke satnami

सतनामी सम्प्रदाय में जाट, चमार, खाती आदि छोटी जातियों के लोग शामिल थे। परन्तु उन्होंने अपने जातिगत भेद मिटा दिए थे। वे सादा भोजन करते और फकीरों जैसा बाना पहनते थे। सतनामी हर प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ थे। इसलिए अपने साथ हथियार लेकर चलते थे। दौलतमंदों की गुलामी करना उन्हें बुरा लगता  था। उनका उपदेश था कि गरीब को मत सताओ। जालिम बादशाह और बेईमान साहूकार से दूर रहो। दान लेना अच्छा नहीं। ईश्वर के सामने सब बराबर हैं। इन विचारों पर आधारित सिद्धांत बड़ा शक्तिशाली था। इससे कमजोर तबकों में आत्मसम्मान और हिम्मत जागी। उनमें जागीरदारों के उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा हुआ। दूसरी कई जगहों की तरह हरियाणा के नारनौल क्षेत्र में भी 17वीं सदी के सतनामियों ने एक शक्तिशाली विद्रोह किया। प्रशासन के उत्पीडऩ के खिलाफ पैदा हुए आंदोलन ने मुगल हुकूमत को हिलाकर रख दिया।

       सतनामी सम्प्रदाय

          हरियाणा के दक्षिण में नारनौल नाम का एक कस्बा है। आज यह महेंद्रगढ़ जिले में पड़ता है। इसके पास ही बीजासर नाम का गांव है। 16वीं सदी में इस गांव में बीरभान नाम का आदमी रहता था। वह किसान परिवार से था। वह बहुत सच्चा और भला आदमी था। भक्ति में उसकी बड़ी रुचि थी। लोग उसके भजन और उपदेश सुनने आते थे। धीरे-धीरे बीरभान भक्त कहलाने लगे। लोगों ने उन्हें गुरु मान लिया। बस बढऩे लगा उसके भक्तों का परिवार। जल्दी ही खड़ा हो गया एक सम्प्रदाय। इसे सतनामी सम्प्रदाय कहा गया। यह सन् 1657 में पैदा हुआ माना जाता है। सतनामी ईश्वर के नाम को ही सच मानते थे और उसी का ध्यान करते थे। ये लोग फकीरों की तरह रहते थे। इसीलिए ये साधु कहलाते थे। सतनामी आंदोलन का संबंध भक्ति आंदोलन के महान संत रैदास से था। रैदास का एक चेला उधा था। उधा का इस क्षेत्र में बड़ा प्रभाव था। यही बीरभान के गुरु थे

          सतनामी साधु भक्ति  आंदोलन के मुख्य सिद्धांतों को मानते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर एक है। वही सत्य है। इसलिए वे ईश्वर को सतनाम कहकर पुकारते थे। इसी से उनका नाम सतनामी पड़ा। वे अपने सारे बाल मुंडवाते थे। यहां तक कि भौहें भी साफ करवा डालते थे। बोलचाल की भाषा में लोग उन्हें मुंडिया भी कहते थे। उत्तर भारत  में यह पंथ कई जगह फैल गया, परन्तु 17वीं सदी में नारनौल सतनामियों का गढ़ बन गया। यह कस्बा दिल्ली के दक्षिण पश्चिम में 75 मील दूर स्थित है।

          गुरु बीरभान अंधश्विास और रूढि़वाद का खंडन करते थे। वे मूर्ति पूजा के विरोधी थे और जाति प्रथा का विरोध करते थे। शरीर और मन की शुद्धि पर उनका खास जोर था। वे सच और सदाचार को जीवन के लिए जरूरी मानते थे। धन और सम्पति से दूर रहने का उपदेश देते थे। वे सारे संसार को अपना घर और दुनियाभर के लोगों को अपना परिवार मानते थे। वे बड़े सरल स्वभाव के थे और साफ कहते थे कि धार्मिक कर्मकांड की बजाए अच्छे व्यवहार में ही धर्म का मर्म है। सतनामी अपने काम-धंधों से  लोभ, मोह और अहंकार को दूर रखते थे। पसीने की कमाई से गुजर-बसर करना उनका सिद्धांत था। वे हिन्दू और मुसलमाना में फर्क नहीं करते थे। वे मानते थे कि ईश्वर की कृपा से ही दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसलिए वे मनुष्य को धीरज रखने का उपदेश देते थे।

          सतनामी सम्प्रदाय में जाट, चमार, खाती आदि छोटी जातियों के लोग शामिल थे। परन्तु उन्होंने अपने जातिगत भेद मिटा दिए थे। वे सादा भोजन करते और फकीरों जैसा बाना पहनते थे। सतनामी हर प्रकार के उत्पीड़न के खिलाफ थे। इसलिए अपने साथ हथियार लेकर चलते थे। दौलतमंदों की गुलामी करना उन्हें बुरा लगता  था। उनका उपदेश था कि गरीब को मत सताओ। जालिम बादशाह और बेईमान साहूकार से दूर रहो। दान लेना अच्छा नहीं। ईश्वर के सामने सब बराबर हैं। इन विचारों पर आधारित सिद्धांत बड़ा शक्तिशाली था। इससे कमजोर तबकों में आत्मसम्मान और हिम्मत जागी। उनमें जागीरदारों के उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा हुआ। दूसरी कई जगहों की तरह हरियाणा के नारनौल क्षेत्र में भी 17वीं सदी के सतनामियों ने एक शक्तिशाली विद्रोह किया। प्रशासन के उत्पीडऩ के खिलाफ पैदा हुए आंदोलन ने मुगल हुकूमत को हिलाकर रख दिया।

सतनामियों का विद्रोह

          नारनौल के निकट सन् 1672 में एक प्यादे  और सतनामी किसान के बीच झगड़ा हो गया। प्यादे ने सतनामी के सिर में लाठी मार दी। किसान बुरी तरह जख्मी हो गया। कहते हैं कि दूसरे सिपाहियों ने सतनामियों की झोंपड़ी में आग लगा दी। सतनामी इस पर भड़क उठे। लोग इकट्ठे होने लगे। उन्होंने प्यादे को पीट-पीट कर मार डाला। दूसरे सिपाहियों को भी पीटा। उनके हथियार भी छीन लिए। बस, फिर क्या था, यह खबर आग की तरह फैल गई। नारनौल का फौजदार सुनकर आग-बबूला हो गया। सतनामियों को पाठ पढ़ाने और उनको गिरफ्तार करने के लिए उसने अपने घुड़सवार और प्यादे भेजे। परन्तु सतनामी केवल साधु नहीं थे। वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले वीर भी थे। बड़ी तादाद में इकट्ठे हो गए, फिर बोल दिया सरकारी फौज पर धावा। देखते ही देखते उन्हें मार गिराया। कुछ सिपाही जख्मी हो गए और पकड़ भी लिए गए। फौजदार के लिए यह अपमान सहन कर पाना मुश्किल था। उसने नए घुड़सवार और सिपाही भर्ती किए। आसपास के हिन्दू और मुसलमान जमींदारों और जागीरदारों से भी फौजें  मंगवाई। इस तरह पूरी तैयारी के साथ उसने सतनामियों के खिलाफ कूच किया। सतनामियों ने भी सरकारी फौज का डटकर मुकाबला किया। वे बड़ी बहादुरी से लड़े। वे क्यों डरते? उनके पास खोने के लिए था भी क्या? सरकारी फौज के बहुत से सिपाही मारे गए। फौजदार खुद लड़ाई में काम आया। उसकी फौजें भाग निकलीं। बस क्या था, सतनामियों ने नारनौल शहर पर कब्जा कर लिया। देहात में लगान वसूल करना शुरू कर दिया और कानून व्यवस्था लागू कर दी।

          सतनामियों की बगावत की खबर जल्दी ही दिल्ली के बादशाह औरंगजेब तक पहुंच गई। उन्होंने तुरंत एक के बाद दूसरी सेना सतनामियों पर काबू पाने के लिए भेजी। परन्तु सतनामियों ने इन फौजों को भी भगाया। राजस्थान के कई राजपूत सामंतों और दूसरे सरदारों को सतनामियों से मात खानी पड़ी। यह माना जाने लगा कि सतनामियों पर न तीर काम करता है न तलवार। न ही तोप के गोले उन पर कोई असर डालते हैं। बड़े-बड़े राजाओं और अमीरों को सतनामियों के खिलाफ लड़ने के लिए भेजा गया। उन्हें लड़ाई का बड़ा तजुर्बा था। फिर भी उन्हें कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई। सतनामी दिल्ली के निकट तक जा पहुंचे। राजधानी केवल सोलह मील दूर रह गई। शाही फौजों में उनसे लड़ने की हिम्मत नहीं थी।

          इस लड़ाई से सतनामियों के बारे में अनेक दंत कथाएं प्रचलित हो गई। उनकी बढ़ती ताकत को एक चमत्कार समझा जाने लगा। कहावत चल पड़ी कि सतनामियों के साथ एक माता मीनाक्षी नाम की बूढ़ी औरत है। वह फौज के आगे-आगे लकड़ी के घोड़े पर चलती है। उसके पास जादुई ताकत है। उसने लोगों को जुल्म के खिलाफ मजबूती से लड़ने का आह्वान किया। अनेक  ताबीज बनाए। उन्हें सतनामियों के झंडों पर बांध दिया गया।

          सतनामियों को विश्वास हो गया था कि उन्हें को��� ताकत हरा नहीं सकती। उनके पास जैसे भी हथियार थे, उन्होंने लड़ने के लिए उठा लिए। वे अपने-आपको लोगों का खादिम समझते थे। अपनी सर-जमीन पर इज्जत  से जीना चाहते थे। उन्होंने कसम खाई थी कि लड़ाई में प्राण त्याग देंगे, पर मैदान छोड़ कर नहीं भागेंगे।

          धीरे-धीरे युद्ध के फैल जाने और दिल्ली जीत लेने के इरादों ने इस लड़ाई की रंगत कुछ बदल सी दी। आसपास के दूसरे हिन्दू सामंतों  ने मौके का फायदा उठाया। उन्होंने बादशाह को लगान देना बंद कर दिया। प्रचार किया गया कि सतनामी हिन्दुओं की आजादी के लिए लड़ रहे हैं, जबकि हकीकत कुछ और थी।

          मुगल बादशाह औरंगजेब ने भी अपने प्रशासन के जोर-जुल्म को रोकने की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। उसे अपने शाही अहंकार को संतुष्ट करने की ही पड़ी थी। वह सतनामियों की बगावत के कारणों को जान कर इलाके में शांति स्थापित नहीं करना चाहता था। वह सतनामियों को सदा के लिए कुचल डालना चाहता था। लड़ाई जारी रही। दिल्ली में अनाज की कमी पड़ गई। नागरिकों में भय पैदा हो गया। सतनामियों के अटूट साहस और कुर्बानी से शाही फौज में भी दहशत फैल गई थी। वे आत्मविश्वास खो बैठे थे।

          औरंगजेब भी कोई मामूली बादशाह नहीं था। लोग उसे जिंदा पीर कहते थे। वह सूफियों की तरह सादगी में रहना पसंद करता था। अपने लिए शाही खजाने से एक पैसा लेना हराम समझता था और टोपियां सी-सीकर उनकी आमदनी से अपनी आजीविका चलाता था। ऐशोआराम उसे सुहाते नहीं थे। महलों की रंगरलियों से वह कोसों दूर था। औरंगजेब ने बड़ी चालाकी से  काम लिया। उसने अपनी फौजों  की हिम्मत बढ़ाने के लिए सतनामियों के जादू को  काटने की तरकीब निकाली। अपने हाथ से कुरान शरीफ की आयतें लिख-लिखकर झंडों पर सिलवा दीं। औरंगजेब का जादू काम कर गया। शाही फौजों में हिम्मत आ गई। उसने सतनामियों की बगावत को दबाने के लिए आखिरकार अपने शहजादे की कमान में दस हजार सिपाहियों की फौज भेजी। उसके साथ तोपखाना भी था। बादशाह की निजी अंगरक्षक फौज की एक टुकड़ी भी थी। सतनामियों की ताकत बहुत कम थी। वे इतनी ताकतवर मुगल फौजों  के मुकाबले भला कैसे टिक पाते। फिर भी उन्होंने बहादुरी से मुगल फौजों का मुकाबला किया। बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। सतनामियों के पास फौज कम थी। लड़ाई का सामान भी कम था, पर उनकी बहादुरी देखते ही बनती थी। उन्होंने असीम शाही ताकत और तोपखाने का डटकर मुकाबला किया।

          पर लड़ाई बराबरी की न थी। इसमें पांच हजार सतनामी मारे गए। कम ही जिंदा बच पाए। मैदान छोड़ कर भागना उनके उसूलों के खिलाफ था। वे आखिरी दम तक लड़ते रहे, जब तक कि मुगल फौजों ने उनकी बोटी-बोटी नहीं काट डाली। जानी नुक्सान मुगल फौजों का भी कम नहीं हुआ। दो सौ शाही अफसर मारे गए। शाही फौज का काफी बड़ा हिस्सा लड़ाई में खप गया। राजा विष्णु सिंह कछवाहा मुगल हुकूमत की तरफ से सतनामियों के विद्रोह को दबाने आया था। उसका हाथी भी बुरी तरह घायल हो गया। आखिरकार जीत मुगल फौजों के हाथ ही लगी।

          सतनामी सामंती उत्पीड़न के खिलाफ आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहे थे। वे बड़ी बहाुदरी से लड़े। उनके बलिदान बेमिसाल थे। हरियाणा के इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। चाहे सतनामी विद्रोह अपार शक्ति के बल पर कुचल दिया गया, परन्तु उनकी कुर्बानी ने  सामंती उत्पीड़न के खिलाफ एक दिशा दिखाई। मथुरा और आगरा के जाटों के लिए यह एक मिसाल बन गई। वे भी साम्राज्य के जुल्मों के खिलाफ उठ खड़े हुए। भरतपुर के राज्य की नींव भी मुगल हुकूमत की अपार ताकत के इस उत्पीड़न के खिलाफ किसानों के अथक संघर्ष पर पड़ी थी।

निश्चय ही भक्ति आंदोलन ने न्याय और समानता के मूल्यों को आगे बढ़ाया। उनकी शिक्षा ने दबे-चिथे लोगों में नई चेतना और आत्मविश्वास पैदा किया, लेकिन गरीब और दलित जनता का संगठन इतना ताकतवर और आधुनिक न था कि वे बराबरी और न्याय की लड़ाई को आखिरी मंजिल तक ले जाते। धार्मिक चेतना के घेरे में ही वे यह लड़ाई लड़ रहे थे। यही वजह थी कि साधन सम्पन्न वर्ग भक्ति आंदोलन पर फिर हावी हुआ, लेकिन क्षेत्रीय शक्तियों को संगठित करके भी भक्ति आंदोलन ने सामंतवाद के खिलाफ एक अहम भूमिका निभाई। भक्ति आंदोलन नि:संदेह हमारे इतिहास में गौरवमय स्थान रखता है।

लेखक ख्याति प्राप्त  इतिहासकार व पुरातत्त्वविद थे. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं  पुरातत्त्व विभाग में प्रोफेसर रहे।  हरियाणा राज्य संसाधन केंद्र, रोहतक ने ‘नारनोल के सतनामी ‘ नामक पुस्तिका प्रकाशित की है। उसका अंश यहां दिया गया है। 

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