सामाजिक न्याय

हरियाणा इस वर्ष अपनी स्वर्ण जयंती मना रहा है। ये 50 साल हर क्षेत्र में हुए बदलावों के गवाह हैं। हरित क्रांति के प्रभावों से कृषि पैदावार में गुणात्मक बढ़ोतरी हुई थी और  कृषक आबादी को बदहाली से उबरने मे कुछ राहत मिली थी। नब्बे के दशक तक प्रदेश की किसान-आबादी कृषि कार्यों में जी तोड़ मेहनत में जुटी दिखाई पड़ती है। नौकरीपेशा और स्कूली विद्यार्थी भी सीधे खेती से जुड़े रहे हैं। बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों तक भूमिहीन परिवारों का गुजर-बसर का मुख्य साधन भी खेती-बाड़ी से जुड़ा रहा है।

कृषि क्षेत्र में मशीन और तकनीक से आए बदलावों से खेत मजदूरों को खेती में मिलने वाले काम में तेजी से गिरावट आई। परिणामस्वरूप ग्रामीण मजदूरों ने शहरों व कस्बों में निर्माण कार्यों से जुड़ी मजदूरी,रेहड़ी-फेरी लगाने, सब्जी बेचने व दुकानों पर बोझा ढ़ोने जैसे अनेक फुटकर कार्यों को अपनाया।

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प्रदेश के ताने-बाने में मौजूद सामाजिक भेदभाव, वर्चस्ववादी तबकों द्वारा मजदूरों के स्वाभिमान को ठेस पंहुचाने वाले अपमानजनक व्यवहार और कृषि कार्यों पर कम दिहाड़ी मिलने जैसे कारणों के चलते भी रोजगार का स्वरूप बदल रहा है। शहरों में नकद दिहाड़ी और अपेक्षाकृत बेहतर मानवीय व्यवहार के चलते भी प्रदेश की भूमिहीन आबादी ने रोजगार की तलाश में शहरों का रूख किया है।

कृषि संबंधों में आए बदलावों को भी रोजगार के बदलते स्वरूप के संदर्भों में देखा जाना चाहिए। गांवों से निकलकर  कस्बों और शहरों में जाने वाले मजदूरों का यह भी मानना है कि शहरों में मानवीय गरिमा के साथ-साथ समय पर उपयुक्त दिहाड़ी के बेहतर अनुभव हैं। भूमिहीन  आबादी द्वारा खेती से जुड़े कम दिहाड़ी वाले कार्यों पर जाने से इंकार करने पर किसानों में मजदूरों के खिलाफ जमा रोष अनेक मसलों पर प्रतिक्रिया के रूप में सामने आता है। इन बदलते हालात में शारीरिक श्रम से जुड़े तमाम तरह के कार्यों में प्रवासी मजदूरों ने हरियाणा के सामाजिक ताने-बाने में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। प्रदेश में कई वर्षों से रह रहे प्रवासी मजदूरों ने यहां पर अपनी स्थायी रिहाइशें भी बना ली हैं।

हरियाणा,पंजाब,राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और इसके आस-पास के इलाकों में लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर सडक़,भवन निर्माण व कृषि से जुड़े कार्यों में कडी़ मेहनत करते हुए अपना गुजर-बसर करते हैं। अपने प्रदेश से कोसों दूर चलकर यहां पर आने वाले इन प्रवासी मजदूरों को भी अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अनेक तरह की सामाजिक-आर्थिक व सांस्कृतिक विषमताओं से गुजरते हुए तमाम तरह की पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है। पिछले 20-25 वर्षों में नव-उदारीकरण की नीतियों के परिणामस्वरूप हरियाणा और इसके साथ लगते एन.सी.आर. के इलाकों में जमीनों की खरीद-फरोख्त, बड़े प्रोजक्टों की ठेकेदारी और दलाली से उगाही गई भारी पूंजी की बदौलत एक हिस्सा तेजी से धनाढय़ हुआ है। यह तबका भव्य इमारतें बना रहा है और मंहगी जीवन शैली को अपनाने की ओर तेजी से दौड़ रहा है।

दूसरी सूरत यह है  कृषि व निर्माण कार्यों में अपने परिवार का पेट पालने में जुटे प्रवासी मजदूर तमाम तरह के भेदभाव, दमन और शोषण के लपेटे में फसते जा रहे है। सुबह होते ही साईकल पर झोला टागें सड़कों पर प्रवासी मजदूरों की कतारें अपने कार्यस्थलों की ओर जाती दिखाई पड़ती हैं। शहरों में मुख्य चौराहों पर सर्दी-गर्मी और बारिश में काम की तलाश में मजदूरों की टोलियां दूर से ही दिखाई पड़ती हैं।

हमारे प्रदेश में विशेषकर निर्माण उद्योग एवम् कृषि क्षेत्र से जुड़े कार्यों में प्रवासी मजदूरों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। धान की रोपाई-कटाई, ईख की छुलाई, चिणाई, रेहड़ी-पट्टी, अनाज व सब्जी मंडियों में अधिकतर कार्यों में प्रदेशभर में प्रवासी मजदूरों पर ही निर्भरता है। यह कहा जा सकता है कि हरियाणा के सकल घरेलू उत्पाद में प्रवासी मजदूरों का महत्वपूर्ण योगदान है।

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टूटे-फूटे कमरे व निर्माणाधीन बिल्डिंगों में ही प्रवासी मजदूरों का रैनबसेरा है। स्थानीय लोग प्रवासी मजदूरों को लक्षित करके कुछ गज जगह में कई-कई कमरों की कतारें बना देते  हैं। इनमें रोशनी, हवा और साफ पीने के पानी की न्यूनतम जरूरतों का अभाव बना रहता है । शौच,नहाना,कपड़े धोने जैसे तमाम कार्य खुले में करने पड़ते हैं। एक कमरे का किराया हजार रूपये तक वसूला जाता है और तीन-चार मजदूर एक ही कमरे में रहते हुए मिल जाएगें।

कड़ाके की ठंड में कमरे के अंदर ही कोयले की भट्ठी सुलगाने से निकलने वाला जहरीला धुंआ कई बार प्रवासी मजदूर परिवारों के लिए गंभीर दुर्घटनाओं का कारण बन जाता है। स्थानीय लोग इनके कमरों के साथ लगती परचून की दुकान भी बना लेते हैं जहां पर इन प्रवासी मजदूरों का जमकर शोषण होता है। प्रवासी मजदूरों की आबादी में घटिया स्तर का सामान बेचकर इनके साथ भारी ठगी की जाती है।

कृषि कार्यों के लिए आने वाले प्रवासी मजदूरों को खेतों में बने कोठड़ो में रहना पड़ता है। स्थानीय आबादी का रुख इन प्रवासी मजदूरों के प्रति आमतौर पर उपेक्षा का रहता है। इलाकावाद के वर्चस्ववादी अहं के चलते प्रवासी मजदूरों को कार्यस्थलों पर मालिकों की गाली-गलौच और मार-पिटाई भी सहन करनी पड़ती है। कई वर्षों से एक ही स्थान पर रहने वाले प्रवासी मजदूरों के परिवारों के राशनकार्ड, वोटरकार्ड बनवाने में भारी दिक्कतें आती हैं। स्थानीय परिवारों को इन प्रवासी मजदूरों के बच्चे फूटी आंख नहीं सुहाते। आमतौर पर देखा जाता है कि जब कभी इन मजदूरों के बच्चे कोठियों के सामने खेलने लगते हैं तो इनको धमका कर भगा दिया जाता है,साथ ही एक-आध चपाटा भी जड़ दिया जाता है।

प्रवासी मजदूरों के साथ निर्माण कार्य स्थलों पर अनेक जानलेवा दुर्घटनाएं होती रहती हैैं। दुर्घटना का शिकार हुए मजदूरों के पीडि़त परिवारों को मामूली राशि देकर ठेकेदार व मालिक आसानी से बच निकलते हैं।

हरियाणा में पिछले दिनों प्रवासी मजदूरों की कई ऐसी दर्दनाक मौत की घटनाएं घटी हैं जिनमें सामाजिक सुरक्षा की घोर अनदेखी व प्रशासन-मालिकों के मजदूर विरोधी रूख के चलते पीडि़त परिवार को पर्याप्त राहत नही मिल पाती है।  रोहतक में एक प्रवासी मजदूर महिला की सांप के काटने से मौत हो गई। जिस कमरे में यह महिला अपने परिवार के साथ सो रही थी,उसमें गोबर के उपले भरे थे और मुश्किल से कमरें में सोने की जगह बनाई गई थी। ऐसी घटनाओं में पीडि़त परिवार के पास स्थानीय राशनकार्ड या रिहायश का कोई सबूत न होने पर किसी प्रकार का कोई  मुआवजा नहीं मिल पाता।

स्थानीय मजदूरों की तुलना में प्रवासी मजदूरों को सामाजिक-आर्थिक दमन का सामना ज्यादा करना पड़ता है। कई मौकों पर दबंग लोगों द्वारा इन प्रवासी मजदूरों की दिहाड़ी मार ली जाती है। पलम्बर, घिसाई,पी.ओ.पी.,रंग-रोगन,पत्थर लगाने जैसे कार्य करने वाले इन प्रवासी मजदूरों की कई मौकों पर कोठी मालिकों और ठेकेदारों द्वारा यह कहकर हजारों रूपये मार लिए जातें हैं कि तुमने हमारा काम बिगाड़ दिया। पिटाई की जाती है और डर के मारे सब कुछ चुपचाप सहना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में भवन निर्माण कामगार संगठित हुए हैं जो एक सकारात्मक कदम है।

खतरनाक जगहों पर मजदूरों से कार्य करवाते हुए मालिक आमतौर पर सुरक्षा उपायों के समुचित प्रबंधों की अनदेखी करते हैं।

प्रदेश में आने वाले प्रवासी मजदूरों में एक हिस्सा अल्पसंख्यकों का है। इलाकाई भेदभाव के साथ अल्पसंखयक होने के खतरे भी सताते रहते हैं। पानीपत जैसे शहर में हैंडलूम व पावरलूम से जुड़े उद्योग में हजारों की संख्या में अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखने वाले परिवार अपने बेहतरीन हुनर से देश-विदेश में प्रदेश की प्रतिष्ठा को बढ़ा रहे हैं। दुर्गा पूजा, ईद और छठ जैसे अपने परम्परागत सांस्कृतिक उत्सवों के मौकों पर पूजा व झाकियां निकालते वक्त इन प्रवासी मजदूरों को अपने प्रवासी होने के एहसास के साथ ही सड़कों से गुजरना पड़ता है।

प्रवासी मजदूर महिलाओं को चौतरफा मुसीबतों से झुझना पड़ता है। ठेकेदारों के पास बंधी(नियमित) मजदूरी करने वाली महिला मजदूरों को पुरुषों से कम दिहाड़ी दी जाती है।  प्रवासी महिला मजदूरों का एक हिस्सा मध्यमवर्गीय घरों में झाड़ू,पौचा,सफाई और खाना बनाने का काम करता है जिनमें 10 से 17 साल के बीच की आयु की अनेक लड़कियां कम वेतन पर घरेलू कार्य करती हैं। ज्यादातर मजदूर महिलाओं में खून की कमी पाई जाती है। दूर-दराज के कार्य स्थलों पर होने वाली प्रसूति के समय किसी प्रकार की कोई समस्या आने पर मैडिकल या प्रशिक्षित दाई की सुविधा मिलना तो लगभग असम्भव ही रहता है। इन प्रवासी मजदूरों के कार्य स्थलों पर इनके बच्चों के लिए शिक्षा व ईलाज की सुविधाओं की बड़े पैमाने पर अनदेखी होती है।

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कार्य स्थलों के बदलते रहने के कारण इनके बच्चे नियमित स्कूल नहीं जा पाते।  प्रवासी मजदूरों के जो बच्चे सरकारी स्कूलों में जाना चाहते हैं उन्हें दाखिलों के समय जाति की पहचान के सबूत,आधार कार्ड,राशनकार्ड के अभाव में निराश ही होना पड़ता है। जाति प्रमाण पत्र जैसे कागजात उपलब्ध न होने की वजह से इन बच्चों को वजीफे से भी वंचित ही रहना पड़ता है। अक्सर देखने में आता है कि 14-15 वर्ष की उम्र में ही इनके बच्चे,रंग-रोगन बेलदारी,मिस्त्री,घिसाई जैसे कार्यों में जुट जाते हैं।

इन कठिन परिस्थितियों की सबसे ज्यादा मार प्रवासी मजदूरों की लड़कियों  पर पड़ती है। दस वर्ष की उम्र पार करते ही सुरक्षा के डर के मारे लड़कियों को स्कूल से हटा दिया जाता है और अपने गांव ले जाकर कम उम्र में ही इनकी शादी कर दी जाती है। रोहतक में एक प्रवासी बस्ती में रात को चलने वाले गांधी स्कूल में 8 वीं से 10 वीं कक्षा में पढऩे वाली छात्राओं का कहना है कि हम गांधी स्कूल से नहीं जुड़ते तो अब तक हमारी शादी हो चुकी होती।

प्रवासी मजदूरों का अपने मूल इलाके से पलायन का मुख्य कारण वहंा पर बारिश का अभाव व सस्ती मजदूरी का होना है। प्रवासी मजदूरों द्वारा अपने घर- परिवार में किए जाने वाले शादी व मृत्यु के मौकों पर किया जाने वाला खर्च सूद की ऊंची दरों पर कर्ज उठाकर किया जाता है।  साल में दो-तीन बार अपने गांव में घर पर खर्च व साहूकार के ब्याज का पैसा देने के लिए आना-जाना होता है। यहां पर मेहनत-मजदूरी करके जोड़ा गया थोड़ा-थोड़ा पैसा अपने घर जाते हुए कई बार रेलगाड़ी में ही लुटेरों की भेंट चढ़ जाता है।

असंगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले मजदूरों को श्रम कानूनों की अनदेखी के चलते अनेक तरह की पीड़ाओं का शिकार होना पड़ता है। उदारीकरण के इस दौर की सबसे बड़ी विशेषताएं जिम्मेदारीविहीन ठेकेदारी प्रथा के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर गरीबी,शोषण,बेरोजगारी और पहचान की इलाकाई संकीर्णताओं के रूप में सामने आती हैं। इन मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा से जुड़े श्रम कानूनों की व्यापक पैमाने पर घोर उल्लंघना हो रही है। न्यूनतम वेतन,हाजिरी रजिस्टर,पी.एफ .और पैंशन जैसे कानूनी प्रावधानों से बचने के लिए मालिकों ने ठेकेदारों के माध्यम से मजदूरों को काम पर रखने का तरीका निकाल लिया है।   गरीबों को जी तोड़ मेहनत करके अपनी रोजी-रोटी चलानी मुश्किल होती जा रही है।  ऐसे में वैकल्पिक नीतियों के आधार पर ही गरीब आबादी को राहत दी जा सकती है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 63

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