कविता

न जाने कब से रूढिय़ों में कै़द समाज
काला पानी की जेल लगने लगा है।

हमारा विश्वास है कि बंद कोठरियों के ताले
तड़ातड़ टूटने लगेंगे।

घायल हथेलियों से आकाश गंगा की
लाल धाराएं बहने लगेंगी।
नीली देह सार्थकता का अशनि-संकेत हो चलेगी।
परित्याग कर पिछड़ापन, अकादमियां, लाईब्रेरियां, गोष्ठियां तथा
नवल अस्पताल, कला-स्टूडियो, ब्यूटी पार्लर
इंटरनेट से बाहर हमें लिवाकर —
सुंदर, स्वच्छ, स्वच्छंद फैलाने लगेंगे।

सड़कों के दशकों से अंधेरे खंभे
एल.ई.डी. बल्बों से रोशन हो उठेंगे
कुरीतियां अपराध नहीं बनेंगी।।
लो अब हम बेहतर साथी, प्रेमी, सिरजनहार यार,
सामयिक साबित हो रहे हैं।

हमारे लक्ष्य बदल रहे हैं।।
अब हम ‘राम की शक्तिपूजा’, पाब्लो नेरुदा, मुक्तिबोध
का अनिवार्य पाठ पढ़ पढ़ा रहे हैं।

जीवन-विरोधों से लंबी लड़ाई ठानकर
कुर्बानी का हौसला जन्म ले रहा है।
दिल-दिमाग-कर्म एक होते जा रहे हैं।।

इस बलिदानी लड़ाई में
कबूतर की मोटी गर्दन
कौवे की कुटिलता
गरुड़ के गरूर को
हम पहचानने लगे हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016), पेज -30

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