लोक कथा

एक आदमी कैदो मैंस थी। उसका छोरा उननै चराण जाया करदा। दोनू मैंस ब्यागी। एक नै दिया काटड़ा अर दूसरी नै दी काटड़ी। वो काटड़ा घणा ऊत था। वो उस काटड़ी नै सारा दिन तंग करदा। काटड़ी नै आपणी मां तै शकैत करी पर काटड़ा तै उसनै तंग करण तै हटाए कोनी। सारा दिन उसकै टाक्कर मारदा। काटड़ी की मां ने काटड़े की मां तै लाणा दीया- तेरा छोरा मेरी छोरी नै सारा दन तंग करै। वो उसकी मां नै भी समझाया- ना बेटा तम तै दोनू भाई अर बाहण सो, आपणी बाहण नै तंग नीं करया करदे। पर काटड़ा तोै काटड़ी कै टक्कर मारदा रहंदा। फेर एक दन दोनू मैसां नै कट होकै काटड़े तै घणाए समझाया-ना बेटा आपणी बाहण नै तंग नीं राख्या करदे। पर काटड़े कै नीं लागी अर बोल्या मेरे में हांगा ए ईतना  मैं के करूं? जड़ वो काटड़ा कोनी मान्या। वा काटड़ी उसके दुख में घणीए माड़ी होगी।

एक दन काटड़ी बिना मुंडेर के कूए धोरै चरै थी। काटड़े नै उसकै एक जोर की टाक्कर मारी।  लागदे ए टक्कर काटड़ी तो कूए में गिरगी।

जब काटड़ी नीं आई तै काटड़ी की मां नै होई सोच। वा काटड़े तै पूछण लागी कै बेटा तेरी बाहण कडै़। वो बोल्या पहला आपणा एक थण चुंघण दे फेर बताऊंगा। उसनै एक थण चुंघा दिया। फेर पूछया तै कह दिया दूसरा बी चुंघण दे। दूसरा बी चुंघा दिया। इस तरां च्यारों थण चुंघकै बोल्या – उसका पैर तिसळग्या अर कूए में गिरगी। या सूणकै काटड़ी की मां ने घणाए दुख ओया।

काटड़ा पहलां तो च्यार थणां का दूध पीया करदा ईब आठ थणां का दूध पीणं लागग्या। वा तो गिणेमिणे दिनांं में ए ठाढा झोटा होग्या।

उसे ईलाके में एक शेर ने चणे बो राखै थे अर  रूखाळ खातर एक बान्दर छोड़ राख्या था। जब वो चणे पाक कै कतई गरड़स हो रहे थे तो या झोटा उस खेत में जांदा अर चणे खायांदा। बान्दर उसनै देख के रूख पै जा कै लूकदा। झोटा रोज आंदा अर मजे सै चणे खाजणदा। चणां का खेत तो जमीं जाड़ दिया।

एक दन शेर आया अर देख्या खेत का हाल। बान्दर कानी करकै अैंख लाल बोल्या- किसेनै खेत म्हं ना बड़ण दीए। जै इब नुकसान होग्या तो मेरतै बुरा नीं होगा कोए।आगले दिन बान्दर नै हिम्मतसी करकै झोटे तै कह दीया-यूह मेरे मामा शेर का खेत सै ईसमें ना बडय़ा कर। झोटा तै बोल्या-

आठ थणां का दूध चुंघू खाऊं चणा की खेती,
कह दीये तेरे मामां नै लड़ूंगा सिर सेती।

या बात बान्दर नै शेर तै बता दी। शेर के छोह उठणाए था। आग्या शेर कै खेत धोरै। न्यूनै तै झोटा भी आग्या। अर दोनूवां की होई लड़ाई। कोए एक पहर तक दोनूं लड़े गए। आखरकार झोटे नै शेर भजा दीया।

ईस लड़ाई नै एक छोरा एक रूख पै चढय़ा देखै था। उसनै शेर भाजदा देख लीया। बान्दर नै बी वा छोरा देख लिया। बान्दर छोरा तै बोल्या-या बात किसे तै ना बताईये नहीं तो शेर तनै खाजैगा।

बात तै सारे कै बताण की थी- झोटे नै शेर हरा दीया। पर डर का मारया   किसे तै नीं बतावै। वा चिन्ता में सूककै माड़ा होग्या। एक दिन उसके बाप नै बात पूछी तो उसनै शेर हारण आली बात बता दी। बाबू बोल्या तों रूख पै चढ़कै खूब रूके मार-झोटे नै शेर हरा दीया। छोरै नै न्यूवैं करया।

सारे लाके में शेर के हारण का रूका पड़ग्या अर शेर ने छोरे पै घणा गुस्सा आया। वो उसनै खाण चाल्या। छोरे के बाप नै एक मंजी पै सण गेरकै ऊपर चादर ढकदी। शेर नै सोच्या कै वा छोरा सोवै।  खाट नै ठाके    जंगल चाल पड़्या। मंजी तोड़ण लाग्या।  इतनै म्ंह झोटा आग्या। वा शेर नै देखकै बोल्या –

आठ थणा का दूध चुंघू खाऊं चणां की खेती
खाट नै क्यूं  तोड़ै  आ लड़ले मेरी सेती।

शेर तो सरम के मारे उस ईलाके नै छोड़ कै भाजग्या।

(यह लोककथा सुमेर चंद ने भी ‘म्हारी दादी नानी वाली काहणी…’ पुस्तक में संकलित की है)

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर- अक्तूबर 2016), पेज- 51

 

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