अफ्रीकी कहानी

उनका कहना है कि मेरा जन्म घाना के मध्यभाग में स्थित एक बड़े गांव हसोडजी में हुआ। वे ऐसा भी कहते हैं कि जब सारा अफ्रीका सूखा-ग्रस्त था, तो हमारा गांव उपजाऊ माने जाने वाले राज्य की उपजाऊ तलहटी में बसा था। इसलिए मैं जब खाने में से कुछ जूठन छोड़ देती थी तो मेरी नानी कहती कि एडजोआ तुम जिंदगी के बारे में क्या जानो। तुम जिंदगी की कठिनाइयों के बारे में कुछ नहीं जानती।

जहां तक मुझे याद है कि नानी और मां जिसे कठिनाई मानती थी उससे इसका कोई संबंध नहीं था। वे कहती हैं कि मैं सात साल की हूं। मेरे सामने कठिनाई यह है कि मैं सात साल की इस उम्र में कुछ बातों को सोच तो सकती हूं, लेकिन उनको सटीक शब्दों में बयान करना मेरे लिए एक समस्या है। यह निर्णय करना बड़ा मुश्किल है कि दिमाग में आने वाली बातों पर चुप्पी साध ली जाए या फिर उनको कहकर अपना मजाक बनवाया जाए। जब कोई गंभीर बात कहने का जोखिम उठाने का निश्चय करे तो कोई व्यक्ति उसे सुनना भी चाहेगा?

मुझे नानी को अपनी बात बताने के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ता। उनका ध्यान आकर्षित करने और उन्हें अपनी बात समझाने के लिए बहुत समय लगता। उनका ध्यान आकर्षित करने में कामयाब हो जाती तो पता है क्या होता था। वह जो काम कर रही होती उसे एकदम छोड़ देती और अपना मुंह बाए मेरी ओर एकटक देखती रहती।

अपना सिर एक ओर टेढ़ा करके अपना कान मेरी ओर करके वह कहती एडजोआ तुम क्या कह रही हो। मैं अपने कहे को फिर से दोहराती। फिर नानी उसी लहजे में मैं कहती कभी नहीं, कभी नहीं। इसे फिर कभी ना कहना। या फिर वह खिलखिलाते हुए इतना जोर से हंसने लगती कि उनके आंसू निकलकर गालों पर बहने लगते। अपने पल्लू से आंसू पोंछती और तब तक हंसती रहती, जब तक पूर्णत: थक न जाती। यदि कोई उस समय वहां आ जाता तो मेरे कही बात को दोहराती। तब वह बुजुर्ग भी उनके साथ खिलाखिलाकर हंसने लगता। कई बार तो यह सिलसिला चलता रहता और तीन-चार या इससे भी अधिक लोग खिलखिलाकर हंसने वाले हो जाते। यह सब क्या मेरे कुछ भी कहने मात्र से हो जाता मैं इसे आसानी से समझ नहीं पाती थी। किसी ने मुझे इसका कोई कारण नहीं बताया कि मुझे कुछ बातों को दोबारा क्यों नहीं कहना चाहिए। कई बार मेरी कही हुई सही बातों को मजाक समझकर लोगों के मनोरंजन के लिए बार-बार क्यों दोहराया जाता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इस तरह का रवैया अपने विचारों को प्रकट करने के लिए मुझे किस तरह से निरुत्साहित करता।

मैं अपनी मां व नानी को अपनी टांगों के बारे में भी कहना चाहती थी कि चिंता की कोई बात नहीं है। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी टांगें मेरे सबसे प्रिय दो लोगों के बीच विवाद का विषय बनें। अब मुझे पूरा विश्वास है कि जब मैं मां के गर्भ से इस शोर-शराबे वाली दुनिया में पैदा हुई थी तभी से मेरी टांगे लगातार उनकी चर्चा का विषय रही होंगी।

नानी चिंतातुर स्वर में कहती – काया, भगवान का शुक्रिया। तुम्हारी पहली संतान बेटी है, लेकिन मैं उसकी टांगों के बारे में आश्वस्त नही हूं।

मां कहती – मां तुम हमेशा एडजोया की टांगों के बारे में क्यों शिकायत करती हो। यदि मुझसे पूछो तो
नानी एक खास लहजे में डांटते हुए कहती – मैं तुमसे पूछ नहीं रही हूं वे पतली हैं
मेरी मां साहस बटोरकर जबाव देती – कुछ लोगों की तो टांगे होती ही नहीं

नानी जोर देकर कहती पर एडजोया की टांगें हैं, लेकिन बहुत पतली और औरतों के लिए बहुत लंबी भी। मां चुपचाप सुनती रहती। कभी-कभी प्रकृति किसी-किसी बच्चे को बिना टांगों-बाहों के पैदा करती है जो दुखद है। लेकिन इसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन किसी लड़की टांगें हैं तो वे टांगें लड़कियों जैसी हों।

कैसी टांगों के साथ। मैं जानती हूं इस क्षण मेरी मां अंदर से रो पड़ती। लेकिन नानी मेरी मां के इस क्रंदन को महसूस ना कर पाती। यदि नानी सुन भी लेती और कहना बंद कर देती तो मेरे लिए यह अचरज की बात होती। मेरी टांगों के बारे में पू्र्वाग्रह के अलावा मेरी नानी के विचार अच्छे थे। मैं अच्छे या बुरे व्यक्तियों के बारे में क्या जानूं। नानी अच्छी व्यक्ति कैसे हो सकती हैं जब मेरी टांगों के बारे में इतना कुछ कहती हैं। इस बात के अलावा नानी को मैं बहुत पसंद करती थी।

नानी कहती, यदि कोई औरत इस दुनिया में दो टांगों के साथ पैदा होती है। तो उसकी टांगे हृष्ट-पुष्ट पिंडलियों वाली व मांसल हों जो नितंबों को सहारा दे सकती हों। औरत के नितंब मजबूत हों ताकि वह बच्चे पैदा कर सके।

मेरी मां शांतचित से कहती – ओह मां। और इसतरह यह चर्चा समाप्त हो जाती और बातचीत किसी ओर विषय पर शुरु हो जाती।

कई बार नानी मेरे पिता के बारे में बोलने लगती। कि उस आदमी को देखो और स्वीकार करती कि सब भगवान के बच्चे हैं…इकलौती लड़की ने उस आदमी से विवाह करने की जिद्द की। भगवान का धन्यवाद। समस्या तो उसके बाद हुई जब दुबली-पतली व लंबी टांगों वाली ऐसी दोहती का जन्म हुआ जिसकी टांगें किसी काम नहीं आ सकती।

मेरे पिता के बारे में बोलती थी तो नानी सोचती थी कि मैं सुन नहीं रही हूं, लेकिन मैं हमेशा सुन रही होती। जब मैं नहीं भी सुन रही होती तो ये बातें मेरी मां को चुप करा देती। मेरी मां का साहस भी चुक जाता। मैं अंदाजा लगा सकती हूं कि नाना इसका जिक्र क्यों करती थी।

‘मांसल पिंडलियों वाली टांगें। मजबूत निंतबों को सहारा दे सकें ताकि बच्चे जने जा सकें।’

मैं किसी औरत की टांगे देखना चाहती थी, जिसने बच्चे पैदा किए हों। लेकिन गांव में यह संभव नहीं था। बूढ़ी औरतें तो सारा दिन साड़ी से पूरी टांगों को ढके रहती। यदि नदी पर जाने दिया जाता तो शायद मैं देख पाती, लेकिन मुझे इसका अवसर ही नहीं मिला। मुझे तो अपनी हमउम्र छोटी लड़कियों के साथ कम गहरे पानी को उछालने के लिए भी मिन्नतें करनी पड़ती थीं।  नहाने के लिए तो अपनी झोंपड़ी के पीछे बने एक छोटे से गुसलखाने का प्रयोग करते थे। मैंने नंगी टांगे देखी वो मेरी जैसी छोटी लड़कियों की या स्कूल में पढऩे वाली बड़ी लड़कियों की थी। स्वीकृत मापदण्डों पर खरी उतरने वाली दो जोड़ी टांगे थीं नानी और मां की। मेरी नानी ने मेरी मां को जन्म दिया था और मेरी मां ने मुझे। मेरी सहेलियों की टांगें मेरे जैसी ही थी,पर मैं नहीं जानती कि वे मांसल थी ताकि नितंबों को सहारा दे सकें।

बड़े लड़के-लड़कियों के अनुसार हमारे छोटे से गांव और कस्बे के बीच पांच किलोमीटर का फासला था। मुझे नहीं पता कि पांच किलोमीटर कितना होता है। वे हमेशा शिकायत करते कि स्कूल जाने-आने में कितना लंबा सफर तय करना पड़ता है। हम गांव में रहते थे किलोमीटरों को तय करने का कोई मसला ही नहीं था। स्कूल बहुत अच्छी जगह है।

स्कूल भी एक विषय था जिसके बारे में नानी और मां बातें करते थे और दोनों की राय अलग अलग थीं। नानी का मानना था कि यह समय की बरबादी है। मैं समझ नहीं पाई कि वो क्या कहना चाहती हैं। मेरी मां शायद उनके भाव को जानती थी और पर उससे इत्तेफाक नहीं रखती थी। वह अक्सर नानी से कहती कि वह (मेरी मां) अपने को अंधकार में बंद पाती हैं क्योंकि वे कभी स्कूल नहीं गई। इसलिए यदि उनकी बेटी कुछ लिख-पढ़ सकी, कागज पर जमा-घटा कर सकी तो बहुत अच्छा होगा। ���र बाद में मैं शादी भी कर सकती थी और शायद….

नानी हंसती – आह ऐसी टागों के साथ वह स्कूल भी जा सकती है।

खेल के छोटे से मैदान में अपने सहपाठियों के साथ दौड़ने और हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करने में मुझे अपने घर में बताने जैसा कुछ नहीं लगा। मुझे नहीं पता कि किसप्रकार अध्यापिकाओं ने यह निर्णय लिया कि जिला स्तर पर अपने स्कूल के जूनियर बच्चों की तरफ से मैं दौड़ूं। परंतु उन्होंने ऐसा किया।

जब मैंने घर जाकर नानी और मां को बताया तो पहले-पहल तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। फिर नाना ने खुद जाकर पूछताछ की। उसने मेरी मां को यह सच बताया कि मैं अपने स्कूल के धावकों में एक हूं।

मेरी मां आश्चर्यचकित थी, ‘क्या ऐसा है।’ उनकी मुख-मुद्रा ऐसी हो गई जैसे कि वो नानी को बताना चाहती है मेरे बारे में एक ऐसा रहस्य जो वो किसी के साथ साझा नहीं करना चाहती थी। परंतु उस समय नानी खुद भी इतनी खुश थी कि मेरी मां ने अपना मुंह बंद ही रखा। नानी ने जब यह खबर पहली बार सुनी तो मैंने नानी को मेरी टांगों की ओर अजनबी निगाह से देखते पाया, परंतु इस तरह जैसे वे न देखने का छल कर रही हों। इस हफ्ते मेरी स्कूल यूनिफार्म उन्होंने खुद धोई। यह आश्चर्य की बात थी। बल्कि वो श्रीमान मैनशा के घर से कोयले वाली इस्त्री मांगकर लाती। मेरी यूनिफार्म पर बार बार इस्त्री करती। यदि मैं यूनिफार्म होती तो मैं जोर से कहती कि बस, बहुत हो गया।

इस सप्ताह मुझे स्कूल यूनिफार्म पहनना अच्छा लगा। पहले दिन दोपहर की परेड में सूर्य की किरण मेरी यूनिफार्म पड़ी तो यह सबकी यूनिफार्म से अधिक चमक रही थी। मैं जानती थी कि नानी ने भी इसे देखा और उन्हें भी अच्छा लगा। इस जिला स्तर खेल सप्ताह में वह प्रतिदिन दोपहर को हमारे साथ कस्बे में आती। हर रोज दोपहर को पहनने के लिए एक तांबे के बक्से से पुराने कपड़ों जोड़ा निकालती। पूरे कपड़ों में कलफ इतनी अच्छी तरह लगा होता कि पास से गुजरने पर उनकी आवाज सुन सकते थे। वह हम बच्चों के पीछे चलती परंतु ऐसे जैसे कहीं अन्य जगह पर जा रही हो।

हां, मैने हर दौड़ को जीता। सर्वश्रेष्ठ आल राऊंडर खिलाड़ी का खिताब जीता। हां, नानी कहा करती, यदि ऐसा कुछ न होता तो इस सबकी उसे परवाह नहीं है। पर उसे इसकी परवाह थी। जानते हो उसने क्या किया? उसने चमचमाती ट्राफी को अपनी पीठ पर उठाया जैसे वे अपने बच्चे या किसी कीमती चीजों को उठाती है। और इसमें उसे खुद चलने में कोई असुविधा नहीं हुई।

जब हम अपने गांव पहुंचे तो हेडमास्टर को ट्राफी वापिस देने से पहले हमारे बरामदे में पहुंचकर मेरी मां को ट्राफी दिखाई।

ओह व्यक्ति कितने अप्रत्याशित होते हैं। अब नानी मुझे गोद में उठाए थी और सुबकते हुए बुदबुदा रही थी, ‘पतली टांगे भी लाभदायक हैं, पतली टांगे भी काम की हैं, कुछ टांगे मांसल नहीं होती ताकि वो नितंबों को सहारा दे सकें… पतली टांगों से दौड़ सकते हैं, तुम जानते हो’।

मैं इन सबके बारे में अधिक नहीं जानती, परंतु यह सब था जो मैं महसूस कर रही थी और सोच रही थी। यह तो निश्चित था कि टांगें जो नितंबों को सहारा देती हैं और बच्चे पैदा करती हैं उसके साथ-साथ कुछ ओर काम भी कर सकती हैं। बस मैं ऐसी बातों को जोर से कहने में डरती थी। क्योंकि कोई मुझे कह सकता था कि कभी नहीं ऐसी बात कभी दोबारा नहीं कहनी। और या फिर मेरे कहने पर वो रो पड़ने की हद तक हंसते।

ऐसा करना बहुत अच्छा था यद्यपि ऐसा कुछ भी करने की मैंने कोई योजना नहीं बनाई थी। ताकि उनको यह दिखा सकूं।

मेरी मां हमेशा की तरह इस बार भी चुप थी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016), पेज -12-13

 

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