आलेख

अफवाह की मारक शक्ति समाज को छिन्न-भिन्न कर सकती है, खून की नदियां बहा सकती है, तबाही का मन्जर और ना भरने वाले जख्मों को पैदा कर सकती है।हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन  से पनपी सामाजिक दरार को पाटने के उद्देश्य से गठित किये गए सद्भावना मंच के राज्य सयोंजक के नाते मार्च और अप्रैल 2016 के राज्य भर में घूमते हुए अफवाह के खतरनाक चरित्र के व्यवहारिक पक्ष को समझने का मौका मिला। समझ में आया कि एक सामान्य घटना को अफवाह के माध्यम से अतिरंजित रूप में फैलाया जा सकता है और और जिसके  भयंकर परिणाम निकल सकते हैं।

ऐसी क्या खास बात है जो एक सूचना खतरनाक हथियार में बदल जाती है।  अफवाह में परिवर्तित होने वाली सूचना का स्वरूप अतिरंजित बहुप्रसारित व असत्यापित होता है।

अभी फरवरी 2016 में हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के बहाने आगजनी और जातिगत हिंसा का एक खतरनाक खेल देखा गया। इस आंदोलन के दौरान अफवाहों ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई।

18 फरवरी 2016 को रोहतक के कॉलेजों में पुलिस ने छाँट छाँट कर जाट छात्रों को गोलियों से भून के लाशों के ढेर लगा दिए जबकि सच्चाई ये थी कि पुलिस ने हॉस्टल में घुसकर जो भी छात्र मिला उन सबकी निर्मम पिटाई की थी। वास्तविक स्थिति का अधिकारिक सूत्रों से जब तक इस मामले में सत्यापित सूचना दी जाती है, तब तक असत्यापित एवम् बहुप्रचारित अफवाह ने अपना खेल खेल लिया होता है।

अफवाह किसी विशेष प्रसंग में एक प्रभावी उपकरण का काम करती है। संवेदनशील माहौल में जब लोगों की बड़ी  संख्या एक विशेष मानसिक व्यग्रता के दौर से गुजर रही होती है तो उन्हें कुछ सवालों के जवाब की तलाश होती है और ऐसे में कोरे झूठे व सनसनीखेज जवाब अफवाह के रूप में अपना काम कर जाते हैं। चूंकि नाजुक  परिस्थितियों में प्रभावित समुदायों की एक सहज मानसिक व्यग्रता होती है कि वह स्थिति का मूल्यांकन करे और इसी छटपटाहट में अफवाह रिक्त स्थान को भरने का काम बखूबी कर देती है।

कोई भी वस्तु बिना धरातल के नहीं टिक पाती। अफवाहों के लिए भी एक विशेष मानसिक धरातल की आवश्यकता पड़ती है। जब वातावरण में किसी ऐसी वारदात के फलस्वरूप जिसका संभावित असर एक बड़ी संख्या के लोगों पर हो सकता है तो ऐसे अनिश्चय के माहौल में स्थिति को भाँपने के लिए सूचनाएं प्राप्त करने की एक नैसर्गिक उत्कुंठा होती है और ऐसा भी होता है कि प्रभावित समुदाय उस वक्त अपने मन माफिक सूचना की तलाश करता है या ऐसी सूचना गढऩे का प्रयास करता है जो उसे अपने हित में लगती हुई दिखाई देती है। ऐसे में अफवाहों का बाजार गर्म होने की पूरी पूरी संभावनाएं रहती है। जैसे कि रोहतक में ‘एक बुत को तोड़ दिया गया’ ये अफवाह एक विशेष भीड़ के बड़े हिस्से की आक्रामक कार्यवाही को वैध ठहरा देती है जबकि उस भीड़ की व्यग्रता के अनेक राजनैतिक-सामाजिक उत्प्रेरक पहले से मौजूद थे।

इस प्रकार अनिश्चय एवम् व्यग्रता के वातावरण में अफवाहों के लिए एक धरातल का निर्माण होता है और लोग अपनी आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक पैतरों के अनुरूप उस संवेदनशील माहौल में अपनी समझ पैदा करने या अपना दांव खेलने की प्रक्रिया में असत्यापित सूचना को या तो सही मान बैठते हैं या ऐसी बातों को सही ठहराने की चेष्टा करते हैं। इस विषय में शोध ये बताता है कि विशेष परिस्थिति में अधिक व्यग्रता के शिकार लोग अफवाहें फैलाने में अधिक सक्रिय पाए जाते हैं और ऐसे में ऐसी अफवाहें जिनके भयँकर दुष्परिणाम हो सकते हैं, अधिक तेजी से फैलती हैं जबकि इसका उल्टा कम होता है। यानी, ऐसी अफवाहें जिनका नतीजा कुछ अच्छे में निकल सकता है आमतौर पर तेजी नहीं पकड़ पाती।

18 फरवरी 2016 को रोहतक में कोर्ट परिसर में  धरने पर बैठे कुछ वकीलों और एक जलूस में शामिल कुछ कार्यकर्ताओं के बीच तनातनी और मार-पिटाई हुई जिसमें गैर जाट वकीलों को अधिक चोटें लगी। लेकिन इस घटना का जो संस्करण म द वि वि के सामने जाट आरक्षण के समर्थन में धरना स्थल पर  गया उसके अनुसार 35 बिरादरी वालों ने जाट वकीलों को पीट पीट कर अधमरा कर दिया है। फूस सूखा था और खाली एक दियासलाई की आवश्यकता थी उसे जलाने के लिए। बस वकीलों वाली घटना की अफवाह ने दियासलाई का काम कर दिया और इसके बाद से हिंसा, लूट, आगजनी, मौत का खेल इस प्रकार हुआ कि हरियाणा प्रदेश जल उठा। नई नई अफवाहें अपना गुल खिलाती रहीं और गाँवों से ट्रॉलियां भर भर के रोहतक, कलानौर, झज्जर, लड़सौली आदि इलाकों में पहुँचती रही। सारी लामबंदी अफवाहों के उत्प्रेरक के सहारे होती रही और प्रदेश बर्बरता का भुक्तभोगी बनता रहा।

अफवाहें ऐसी सूचना होती हैं जो किसी समुदाय विशेष की भावनात्मक आवश्यकता की पूर्ति करती हैं और इसका सबसे बड़ा माध्यम मुख से उच्चारित शब्द होते हैं। पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया का दुरूपयोग अफवाहों के तेज गति से प्रसार होने लगा है। ऑडियो, वीडियो क्लिप का व्हाट्सएप्प, फेस बुक आदि के माध्यम से प्रसार ने अफवाहों की मारक शक्ति को हज़ारों गुना बढ़ा दिया है। कितनी ही हिंसक घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनके पीछे ऐसी वीडियो क्लिप का सहारा लिया गया है जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था।

अफवाहें फैलाने में ऐसे तत्वों की खास भूमिका होती है जो विशेष सामाजिक राजनैतिक मंशा रखते हुए किसी घटनाक्रम को अंजाम देना चाहते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि अफवाहें तभी प्रभावी होती हैं जब कहीं ना कहीं सामाजिक-राजनैतिक परिस्थितियां इनके लिए ग्राह्य हों। डर और नफरत के बीज अफवाहों में होते हैं जो प्रस्फुटित होकर हमलों व सामाजिक बंटवारे का काम करते हैं। इस प्रक्रिया में एक ऐसी सामूहिक समझ की प्रक्रिया काम करती है जो झूठी परिकल्पनाओं पर आधारित होती है।

ऐसा भी होता है कि राज सत्ता अपने किसी मंसूबे को पूरा करने के लिए अत्यंत सुनियिजित तरीके से अफवाह फैलाने का कार्य करें। जैसा कि युद्ध के दौरान बहुत सी सूचनाएं एकदम झूठी होती है लेकिन देशभक्ति की भावना और कथित दुश्मन देश के विरुद्ध नफरत फैलाने के लिए ये जरुरी माना जाता है। उदाहरण के लिए 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में रयूमर प्रोजेक्ट ने अपना काम इसी उद्देश्य से किया।

अफवाह के चरित्र और इसकी मारक शक्ति को समझते हुए इस बात को हम बखूबी समझ सकते हैं कि किसी भी संवेदनशील माहौल को अगर बिगड़ने और बेकाबू होने से बचाना है तो सबसे जरुरी काम अफवाहों के तंत्र को ध्वस्त करना है। सरकार के लिए सत्यापित सूचनाओं को जनता तक पहुँचाने का कार्य सुनियोजित और तेज गति से करना आवश्यक है। सोशल मीडिया पर आधारहीन और नफरत फैलाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही भ्रांतियों को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने बहुत जरूरी है। नागरिक समूहों की भी संवेदनशील वातावरण में बड़ी जिम्मेवारी बन जाती है कि अफवाह तंत्र को कमजोर करने के लिए यथाशक्ति भरसक प्रयास करे।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज- 41-42

 

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