संस्मरण

Image result for harbhajan renu sirsaकविता उसके आसपास थी, आसपास कहीं भी नहीं थी। इस विरोधाभास की सच्चाई क्या है? घर-परिवार, वातावरण, व्यवसाय, सब कविताविहीन। कविता उसके लिए बावड़ी की तरह थी, जिसके शीतल जल तक पहुंचने के लिए कई सीढिय़ां नीचे उतरना पड़ता है। उसने यही किया-मन के भीतर कविता के जल-स्रोत तक पहुंचने के लिए वह बहुत सी सीढिय़ां उतरता गया – अध्ययन, मनन, चिंतन, संवेदना, कल्पना की दुनिया में बार-बार आना कहीं इतना आह्लादजनक हुआ कि उसे सृजन के द्वार तक ले गया। फिर ‘मेरे घर तो तेरे घर तक, तेरे घर तो मेरे घर तक’ की जो कविता यात्रा शुरू हुई, वह आज तक जारी है।

उसके भीतर था कविता का स्रोत, प्यार का सैलाब जो उसे बेचैन किए रहता था। चढ़ती उम्र का सैलाब ही है, जो मर्यादा-नियम-विधान के कुल-किनारों को तोड़ती है।

हरिभजन सिंह रेणु की पहली पुस्तक  ‘भूख’ में प्रेम की भूख मुखर है। प्रेम की भूख और पेट की भूख आदिम अवस्था से आज तक आदमी का पीछा कर रही है। या यह कि आदमी ताउम्र इस द्विधा भूख की तृप्ति के लिए न जाने क्या-क्या नहीं कर गुजरता।

भूख के ये दोनों रूप रेणु की कविता में पालथी मारे बैठे हुए हैं।

उसकी प्रेम कविताओं को अनावृत करके देखते हैं तो बात कविता के प्रेम संबंधों तक पहुंचती है। रेणु का मानना है कि आम आदमी लोक निंदा के भय से वर्जित संबंधों को खुले में नहीं कहता, जबकि किसी भी क्षेत्र में ख्याति की बुलंदी पर खड़ा व्यक्ति उस भय को झटक देता है। उस व्यक्ति विशेष की स्वीकारोक्तियां उसका गुण बन जाती हैं और उसे साफगोई, सच्चाई, ईमानदारी के अलंकारों से विभूषित करती हैं। रेणु अपनी बात की पुष्टि में अमृता प्रीतम तथा कमलादास के उदाहरण पेश करता है। तो क्या रेणु उस मुकाम तक पहुंच गया है कि अपने कमजोर या तथाकथित कमजोर क्षणों को सार्वजनिक कर सके। वह इन्कार में सिर हिलाता है। एक अंतरंग दायरे तक ही वह अपने भेद बांटता है या फिर उन अनुभवों पर कला की चाश्नी चढ़ाकर उन्हें कविता के रूप में परोसता है। यह कहते हुए कि वह इतना महान कहां हुआ है कि अपनी महानता की छतरी के नीचे बैठकर सब कुछ कह सके। महान होने की स्थिति में भी उन एकान्तिक क्षणों को सार्वजनिक करने का न कोई औचित्य है न उपादेयता। अपने तक सीमित रखने पर वे ऊर्जा के एक अजस्र स्रोत का काम करते रहते हैं।

रेणु को अपनी जन्म तिथि का सही ज्ञान नहीं है। अनुमानित तिथि 7 मई 1941 है। संयोगवश महीना और तिथि वही है, जो महाकवि रविन्द्रनाथ ठाकुर की है। अरजादा (जिला स्यालकोट अब पाकिस्तान) में जन्मा रेणु विभाजन के बाद परिवार के साथ सिरसा आ गया। अपने जन्म स्थान और निकट के रेलवे स्टेशन अलीपुर को रेणु भूल नहीं पाया, जहां रेलगाड़ी सुबह-शाम आती, रुकती, चली जाती। घर से परदेश जाने वाले और परदेश से घर आने वाले चढ़ते-उतरते। पशु चराते बच्चे कौतुक नजरेंं रेलगाड़ी और भीतर बैठे यात्रियों को देखते ऊंची आवाज में सासरीकाल कहते और रेल की सीटी के साथ सीटी मारते।

अरजादा एक छोटा-सा गांव था जहां रेणु का परिवार गांव की जरूरत के हल-पंजाली बनाता। परिवार के कुछ लोग दिहाड़ी पर दूर-निकट के गांवों में आते-जाते। पिता साधु सिंह अनपढ़ थे पर उन्हें हीर और कुछ किस्से जुबानी याद थे, जिन्हें वे गुनगुनाते रहते। चाचा प्यारा सिंह अपने हुनर में माहिर। रेणु ने कहा है कि ‘जब मैं कविता से बात नहीं कर रहा होता तो आधी धूप-आधी छांव में अपने पुश्तैनी काम में लगा किसी बंदूक का हत्था बना रहा होता हूं या किसी राइफल का घोड़ा तोड़ रहा होता हूं तो चाचाजी याद आते हैं जो कहा करते कि जब कुछ बने नहीं, तो तोड़ कर जोड़ने की कोशिश करो, नया बनाने का ढंग सीख जाओगे। मैं सोचता हूं कि कविता भी मेहनत से बनाई-शिंगारी जा सकती है। उसमें से भी अवांछनीय पुराना निकाल कर कुछ नया रखा जा सकता है।’ स्कूली पढ़ाई रेणु को रास नहीं आई। छटी कक्षा में ही उसने स्कूल छोड़ दिया और घर पर रहकर जद्दी काम करना शुरू कर दिया। सिरसा आने पर गांव के पुराने काम ने नया रूप ले लिया था-दरांती, रंबा, हल-पंजाली की जगह ट्रैक्टर-ट्राली और बंदूकों की मुरम्मत का काम काम शुरू हो गया था।

घर-दुकान के सामने शनिश्चर का मंदिर। पुजारी दिन में लोगों के हाथ देखता, राहू-केतु की दशा उतारने के उपाय बताता और रात वह भूत-प्रेतों के किस्से सुनाता, जिसमें रेणु भी रुचि लेता। पड़ौस में एक बुुुजुर्ग जुगल किशोर रहता था, जो भ_ी पर चने भूनता। उसके पास रूप वसंत, कादरयार का पूरन भगत, तुलसीदास की रामायण तथा वारिस की हीर आदि पुस्तकें थीं। रेणु ने हीर के सिवा सभी पुस्तकें पढ़ी। हीर पढऩे के लिए उस बुजुर्ग ने मना कर दिया था। घर पर चाचा जी ने जपुजी साहिब, साखियां, जिंदगी बिलास आदि पढऩे को दी थीं और इस तरह उसे पढऩे की चटक लग गई। कुछ साल बाद रेणु ने प्राइवेट मैट्रिक  की परीक्षा पास कर ज्ञानी की परीक्षा की तैयारी की, किंतु परीक्षा में नहीं बैठा। दुकान पर काम करना पड़ता था, परिवार की आर्थिक स्थिति को पटरी पर रखने के लिए भरसक सहयोग देना पड़ता।

रेणु अपनी वेशभूषा के प्रति निहायत लापरवाह है। स्वभाव में रूखापन इस हद तक कि उसे अक्खड़ कहा जा सकता है। उसने कभी गाली-गलौच नहीं किया, न हाथापाई, लेकिन उसकी सख्तकलामी हाथापाई का न्यौता देती प्रतीत होती है। सरकार-समाज की नुक्ताचीनी प्राय: सुनने में आती रहती है। किंतु रेणु उसमें अधिक मुखर हो जाता है, इतना कि लगता है कि वह जीवन के उज्जवल पक्ष की तरफ पीठ किए बैठा है। नकार का यह स्वर उसकी कविता का स्रोत भी और सीमा भी।

बातचीत के दौरान वह ‘अच्छा’ शब्द का प्रयोग इस ढंग से करता है कि इसका अर्थ ‘सब अच्छा’ नहीं होता। ‘अच्छा’ से वह व्यंग्य, उपेक्षा, घृणा, असहमति, आश्चर्य, उपहास आदि किस भाव को प्रकट कर रहा है श्रोता के लिए  जानना मुश्किल है, वह भौंचक्का होकर रेणु  के चेहरे से ‘अच्छा’ की जटिलता को समझने की नाकाम कोशिश करता है।

प्राचीन रूढिय़ों और आस्तिकता के विरोध में वह घंटों बहस करता है और याद नहीं आता कि इस बहस में वह कभी परास्त हुआ हो। ताश और शतरंज में अक्सर दोस्तों  से बाजी मार जाता है। इन्हीं ‘खूबियों’ के कारण उसके मित्र एक नजर शनिश्चर के मंदिर पर और दूसरी रेणु के चेहरे पर डालते हुए कहते कि शनिश्चर के सामने शनिश्चर रहता है।

रेणु ने 18-19 साल की उम्र में कविता लिखना शुरू किया। इस उम्र में आकाश से तारे तोड़ने की हिम्मत होती है। दिन में जागते हुए भी सपने देखने की उम्र। वर्जित फल की प्राप्ति के लिए बहिश्त तक छोड़ने को तत्पर। मिलने का सुख ब्रह्मानन्द सहोदर और विरह कहर की यातना सा। लेकिन मिलने से कविता नहीं उपजती, कविता का स्रोत तो विरह में है। रेणु की कविता का जन्म भी हिज्र की घडिय़ों में हुआ-

लूं-लूं अंदर यादां रोवण
रग रग अंदर पीड़ां हस्सण
तन हिज्र दे अंग साकां दा
वसदा इक संसार वे।

लिखना जब शुरू हुआ तो लिखने का भूत सवार हो गया। भले ही उस समय न शब्दों का सही ज्ञान, न भाषा अथवा छंद-अलंकार की समझ। धीरे-धीरे साहित्य के जानकार लोगों से मिलना हुआ। उनमें एक थे ज्ञानी हरभजन सिंह जो सूरजप्रकाश की कथा किया करते। वे प्रो. साहब सिंह के शिष्य रह चुके थे। उन्हीें से रेणु को शब्दों के गहन अर्थ और भावों की गहराई का ज्ञान हुआ। पंजाबी साहित्य का समसामयिक परिचय भी उन्हीं की बदौलत हुआ। करतार सिंह बलग्गण की ‘कविता’ और गुरबख्श सिंह की ‘प्रीतलड़ी’ ने कथ्य की नई जमीन और शिल्प की अधुनातन जानकारी दी।

रेणू को एक रास्ता मिल गया। उसी राह पर उसकी भेंट प्रो. छीना, प्रो. साकी, डा. गुरचरण सिंह, डा. जीत सिंह सीतल, डा. प्रेम सिंह आदि विख्यात साहित्यकारों से हुई। उसकी पहली कविता 1962 में अमृतसर से प्रकाशित ‘कहानी’ पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके बाद अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन का सिलसिला शुरू हो गया। कविता क्या है, यह रेणु को पता चल गया। उसने कहा-मन की कोमल, अतृप्त, अपूर्ण भावनाओं की वेगमयी अभिव्यक्ति और कल्पनाओं को यथार्थ होते देखने की प्रबल इच्छा ही कविता है।

अपनी रचना प्रक्रिया के विषय में रेणु का कहना है कि कोई भी भाषा इतनी गरीब नहीं होती कि वह किसी भाव को खूबसूरती से व्यक्त न कर सके। कवि नए शब्दों का निर्माण भी करता है। कहते हैं कि टैगोर ने दो हजार नए शब्द बंगला भाषा को दिए। इसलिए कमी भाषा में नहीं, लेखक के ज्ञानकोश में हो सकती है। हां, कई बार ऐसा होता है कि भावावेग इतना प्रबल होता है कि विचार प्रवाह को शब्द पकड़ नहीं पाते। अक्सर जो सोचा जाता है, वह सम्पूर्णत: लिखा नहीं जा सकता। विचार जिस प्रकार आते हैं, उसी तरह लिखे नहीं जा सकते। लिखते वक्त कुछ परिवर्तन जरूरी हंै। यह रचना प्रक्रिया का हिस्सा है न कि कवि की कमजोरी। कई साधारण शब्द भी गहरा अर्थ दे जाते हैं। निर्भर करता है शब्दों पर, शब्दों की यथास्थान जड़त पर। कई बार बीच में छोड़ी बात भी उंगली पकड़ कर दूर तक ले जाती है। कवि-मन तो वह वस्तु भंडार है, इसमें जितना जीवन अनुभव संग्रहीत किया जाए, उससे कई गुणा अधिक और कई रूपों में प्राप्त किया जा सकता है। हमारा लोक विरसा बहुत समृद्ध है।

कविता का अपना सच है। वास्तव  में वह कल्पना का सच होता है। कई बार कोई घटना इतनी अप्रत्याशित और त्रासद होती है कि उस क्षण कविता भी निष्प्राण हो जाती है। ऐसे ही क्षण को रेणू ने शब्द दिए-

मेरी कविता दस्सां किस थां गुम्मी है,
भीड़ां चौंक च मिद्धी है कमजोर तरहां।

(मेरी कविता कहां खो गई? उसे तो एक कमजोर व्यक्ति की तरह चौक में इकट्ठी हुई भीड़ ने कुचल दिया।)

सिरसा में एक बड़ी हवेली है, जिसके बीच में एक सार्वजनिक गली गुजरती है। गली चलते व्यक्ति को दोनों तरफ हवेली की दीवारों पर बने पौराणिक चित्र सहज ही दिख जाते हैं। भारतीय इतिहास के पात्रों और मिथकीय देवी-देवताओं संबंधी इन चित्रों ने रेणु के किशोर मन को प्रभावित किया था। उसने न केवल इनके विष्य में प्राचीन ग्रंथों से अधिक जानकारी प्राप्त की, अपितु इन मिथकीय पात्रों को अपनी कविता में नए अर्थ दिए।

उन मिथकों का सौंदर्य रेणु की निम्र कविताओं में देखा जा सकता है।

सेह का तकला, इतिहास बोलदा हां, वसीयत, किते गिया ही नहीं,
केहड़ी लीला है बुध फेर मुस्कराया है।

रेणु की पहली पुस्तक ‘भुक्ख’(भूख) 1970 में प्रकाशित हुई। उसकी कविता जिस परम्परा से होकर गुजरी, उसमें प्यार और विरह की जड़ें बहुत गहरी हैं। ‘भुक्ख’ में रेणु की कलम उसी रंग में डूबी हुई है-अमृता प्रीतम, शिव बटालवी और मोहन सिंह के रूमानी लेखन का प्रभाव उसकी कविता में स्पष्ट दिखाई देता है। किंतु उसकी परवर्ती रचनाओं में सामाजिक सरोकार हावी हुए हैं। प्रगतिशील विचारधारा से वह इस कदर आक्रांत हुआ कि कविता उसके लिए वैयक्तिक भावाभिव्यक्ति की बजाए लोकचिंतन में बदल गई। दूसरी पुस्तक ‘अगन पंखेरू’ भाषा विभाग हरियाणा द्वारा तथा तीसरी ‘मस्तक अंदर सूरज’ हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हुई। चौथी पुस्तक ‘अंटीने ते बैठी सोनचिड़ी’ (1990) को हरियाणा पंजाबी साहित्य अकादमी ने वर्ष 1999-2000 की श्रेष्ठ काव्य कृति का पुरस्कार प्रदान किया। विद्वान समीक्षकों तथा सामान्य पाठकों ने रेणु की विचार परिपक्वता तथा भावप्रवणता की एक स्वर में सराहना की। ‘अगन पंखेरू’ तक आकर जहां कविता धर्म की नकारात्मक भूमिका के प्रति सचेत हुई वहां रेणु भी धार्मिक पाखंडों-सामाजिक रूढिय़ों से मुक्त हो गया और खुदा की जात से मुनकिर।

जैसा कि कहा गया है ‘भुक्ख’ के बाद की कृतियों में रेणु का विचार पक्ष प्रबल रूप में प्रकट हुआ है। ‘अगन पंखेरू’ में वह विद्रोही और जुझारू हुआ है, लेकिन मानवीय मूल्यों के प्रति सचेत रहते हुए। देखा गया है कि विचार से लैस कविता का शिल्प शिथिल हो जाता है किंतु रेणु की कविता इस दोष से मुक्त है। कविता का स्वर कहीं भी उपदेशात्मक या प्रचारात्मक नहीं होता और इस तरह उसका कलात्मक पक्ष आहत होने से बचा रहता है। ‘मस्तक अंदर सूरज’ में सूरज का प्रतीक प्राय: सभी प्रगतिशील कवियों की तरह ऊर्जाधर्मा है और समाजार्थिक अंधकार के नकार के रूप में उभरता है। इंकलाब प्रगतिशील कवियों का सर्वस्वीकृत लक्ष्य रहा है, रेणु भी उसी दिशा में अग्रसर है। ‘अंटीने ते बैठी सोनचिड़ी’ में रेणु एक दृढ़ निश्चयी कवि के रूप में पाले के एक तरफ खड़ा हो जाता है। उसके सामने खड़ेे हैं समाज विरोधी तत्व, कविता को चुटकुलों में बदलते कवियों की भौंडी हरकतें, निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए पाले बदलते साहित्यकार, जनहित के मुद्दों का बहाना बनाकर जेबें भरते  राजनेता। कहा रेणु ने –

सच दे पहरेदार/झूठ की बोली बोलदे  ने
हुण गंगा तपदे ठारण लई नहीं
जहर  फैलावण लई ल्याई जांदी है। (अंटीने ते बैठी सोनचिड़ी से)

रेणु की रचना प्रक्रिया के विषय में एक माक्र्सवादी समीक्षक डा. सुखदेव सिंह ने लिखा – वह लकड़ी या लोहे के टुकड़े को मनचाहा रूप देते हुए शब्दों में भी मनचाहे  अर्थ निकालने का हुनर जानता है। अनुभव से तपकर लेखन में प्रवृत्त रेणु के हाथ में  कलम एक गर्म सरिए की तरह है: वह दांत नहीं पीसता, गर्म सरिये को पलोसता रहता है और जिस शब्द के पास तीर की नोक सी जीभ न हो उसे जंग लगी कील  की तरह कूड़ें में फैंक देता है।

एक सृजनशील पंजाबी आलोचक ने ‘अंटीने ते बैठी सोनचिड़ी’ संग्रह पर टिप्पणी करते हुए कहा है-महाभारत तथा रामायण के नायक-नायिकाओं की नई परिस्थितियों के अनुसार प्रस्तुति, सिख इतिहास के नायकों को नए अर्थ देने का कमाल, अछूते प्रतीक तथा बिम्बों का प्रयोग, सहज भाषा, नई शैली कवि को दूसरे कवियों से अलग ही नहीं करती, उसे मजबूती से पैर रखने की धरती प्रदान करती है। समग्र कविता अध्ययन के लिए नए मानदण्डों की मांग करती है। टिप्पणी का अंतिम वाक्य औपचारिक न होकर सारगर्भित है। इस विषय में हम आगे चर्चा करेंगे।

रेणु को पढ़ते हुए बेसाख्ता कबीर याद  आते हैं। देखें, रेणु को कबीर के साथ खड़ा करना कितना वाजिब है। कबीर एक-साथ निर्गुण भक्ति तथा सामाजिक प्रतिबद्धता की पक्षधर है। कबीर खड्डी पर कपड़ा बुनता है। रेणु लकड़ी-लोहे के औजारों का मिस्तरी है। यानी दोनों दिल, दिमाग और हाथ से काम करने वाले।

कबीर ने काशी के पंडितों से लोहा  लिया। उसने सख्त शब्दों में कहा-जो तू बाम्हन बाम्हनी जाया, आन बाट ते क्यों नहीं आया। रेणु ने सीधे तो नहीं, कविता के दायरे में रहते हुए सामाजिक-धार्मिक रूढिय़ों का खण्डन किया। अपनी कविता ‘वसीयत’ में  वह उच्च वर्ग को चेतावनी देता है-

लहू तां  साडा इको सी ना
ते  उस लहू की सौंह
असीं हुण तैथों / हर उत्तर मंगांगे।

(खूतन तो हमारा एक-सा ही था/ उसी खून की कसम/ हम तुझ से/ हर उत्तर मांगें���े।)

साहित्य के कुछ तथाकथित ‘डाक्टरों’ के पांडित्य को सार्वजनिक चुनौती देने में वह पीछे नहीं रहा। इसी वजह से वह उनका दुश्मन बन गया। कबीर की तरह रेणु ने उलटबासियां नहीं लिखीं, किंतु उसकी कुछ कविताओं का अर्थ कॉलेज-विश्वविद्यालयों के अध्यापकों को समझने में मगजपच्ची करनी पड़ती है। उसकी एक गजल के निम्न शे’र के अपनी-अपनी पसंद के अर्थ निकाले गए हैं-

जित्थे जाके मर गिया है, हौंसला इंसान दा
रब्ब पैदा हो गिया है, बंदगी दे वास्ते।

रेणु की प्रेम कविताएं (कबीर के भक्ति काव्य की तरह) शारीरिक वासना से ऊपर उठी हुई हैं। उन पर आध्यामिकता का लेबल तो नहीं लगाया जा सकता, किंतु उदात्त प्रेम की भावना से जरूर पूरित हैं। यह भी कि उन कविताओं की पृष्ठभूमि में देह नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता। कबीर के लिए प्रेम का घर ‘खाला का घर’ नहीं है, रेणु भी मिर्जा और फरहाद की तरह

मौसम की मार झेलना और पहाड़ काटने के कष्ट उठाना चाहता है।
सिखर दुपहरे जंड दे थल्ले ना सौवांगे,
तेसे नाल पहाड़ करांगे कणियां-कणियां।

रेणु जहां कबीर से अलग खड़ा है, उसका नास्तिक दर्शन में अटूट विश्वास। किंतु सोद्देश्य रचनाकर्म में आस्था तथा अग्निधर्मा सच की पक्षधरता उसे फिर कबीर के नजदीक ले जाती है।

एक कविता रेणु ने शष्ठि पूर्ति के अवसर पर एक अनौपचारिक गोष्ठी में सुनाई-‘मेरे नाल तुरो’ (मेरे साथ चलो)। इस छोटी सी कविता के आकलन के लिए क्या नए मापदंड दरकार नहीं, जिनकी तरफ ऊपर एक टिप्पणी में संकेत किया गया है। विवेच्य कविता अर्थों के इतने दरवाजे खोलती है कि उनमें प्रवेश करने पर साहस एक समारोह में बदल जाता है। अच्छी दुनिया के निर्माण की अदम्य इच्छा, अंधेरे के विरुद्ध लामबंदी और अन्याय के खिलाफ रणभेरी के स्वर सुनाई देते हैं। कविता की शुरुआती पंक्ति (मैंने कब कहा/ मेरे साथ चलो) और अंत में इसके दोहराव का व्यंग्य इतना ही चुनौती भरा है जितना कबीर का यह दोहा-

कबिरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ
जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।

(यहां ‘बाजार’ सार्वजनिक चुनौती का प्रतीक है तो ‘लुकाठी’ प्रकाश, जागरूकता, संघर्ष प्रहार, परिवर्तन आदि का बहुअर्थी प्रतीक है। दूसरी पंक्ति में है उद्देश्य की पूर्ति हेतु लामबंदी तथा  पूर्ण न्यौछावर भाव, आज  की भाषा में अटूट प्रतिबद्धता।)

‘मेरे नाल तुरो’ की समालोचना करते  समय उम्मीद है, पंजाबी समीक्षक इसकी वस्तु और कला का आकलन किसी घिसीपिटी शब्दावली और भोथरे औजारों से नहीं करेंगे। इसके मारक फैलाव और ऊर्जा के सैलाब को समेटने के लिए वे पश्चिम के, विशेषत: अंग्रेजी के आलोचक को ध्यान में रखेंगे जो कविता की गहराई तक जाने में अधिक अध्यवसायी रहा है। शेक्सपीयर, वर्ड्वर्थ, वायरन, शेली, कीट्स, टेनीसन आदि की कविता को क्लासिकी में बदलने का बड़ा श्रेय अंग्रेजी के समालोचकों को जाता है। (मैक्समूलर, गेटे  के बिना हमारा संस्कृत वाड्मय भी अपने प्राचीन वैभव को वर्तमान में प्रकट कर पाता)। कीट्स  की प्रसिद्ध कविता ‘ला बैले डेम सैंस मर्सी’ में चार शब्दों की एक पंक्ति-‘एंड नो बड्र्स सिंग’ के भाव सौंदर्य को आलोचकों ने सिर पर बिठा लिया। समालोचकों में इतनी सघन आत्मीयता भारतीय भाषाओं में कम देखने में आई है। हिन्दी कविता में, पंजाबी में भी यही स्थिति होगी, क्या किसी एक वजनदार पंक्ति को समालोचक ने रेखांकित किया, सिवाय अज्ञेय की एकाध पंक्ति के। जबकि विभिन्न रचनाओं में अनेक पंक्तियां नाना अर्थ-छवियों से भरपूर हैं।

‘मेरे नाल तुरो’ की ये पंक्तियां देखें-
जे हनेरा चीर के पार करना है
तां मैं मशाल जगां लवां
कुझ गीतां दिया धुनां बना लवां
तीरा दियां मुखियां लवा लवां
(यदि अंधेरा पार करना है
तो मैं मशाल जला लहूं
कुछ गीतों की धुनें बना लूं
तीरों को सान पर चढ़ा लूं)

पहली पंक्ति में ही एक बड़ी लड़ाई लड़ने का संकेत है। किसी व्यक्ति या देश के विरुद्ध नहीं, अपितु अंधेरे के खिलाफ। अंधेरा या अन्याय जहां कहीं भी है, उसके विरुद्ध एक बड़े पैमाने पर जद्दोजहद, एक बड़ी लड़ाई।

आगे की तीनों पंक्तियां इस लड़ाई को एक सांस्कृतिक उत्सव में बदलती हैं। मशाल जलाना, गीतों की धुनें बनाना, तीरों को सान पर चढ़ाना-ये सब प्रतीक और बिम्ब उतने ही बड़े अर्थों की तहें खोलते हैं जितनी बड़ी लड़ाई है। इसलिए यह युद्ध एक संस्कृति की पृष्ठिभूमि और सांस्कृतिक परम्परा की ऊर्जा के बिना नहीं लड़ा जा सकता। अंधेरे से लड़ाई आज, कल या बरस दो बरस की लड़ाई नहीं है। इसके लिए चिरस्थायी मानसिकता विकसित करने की जरूरत है। इस तरह की मानसिकता संस्कृति का हिस्सा बने बिना संभव नहीं। इन पंक्तियों में उत्साह, सृजन की ऊर्जा और युद्धोन्माद का अद्भुत सम्मिलन है। किसी महाकाव्य के युद्ध सर्ग का परिदृश्य – जहां अंधेरे के बिलमुकाबिल रोशनी की व्यूह रचना, प्रयाणगीत की धुन, युद्धघोष, कूच का ऐलान, नगारे-रणभेरी दिखाई-सुनाई पड़ते हैं। हां, दोहराना लाजिमी है कि उक्त तीन पंक्तियों में सांस्कृतिक उत्सव प्राणवान हुआ है। युद्ध के त्रि-आयामी चित्र पूरी तरह उभरने लगते हैं-हमारी कल्पना में आकार लेते हैं मां-बहन या पत्नी के हाथ में रोली-चावल-दीप सजे थाल और उनके सामने खड़े जिरहबख्तर पहने, ढाल-तलवार-तरकश की पारम्परिक वेशभूषा में सुसज्जित योद्धा, ऊंचे उठे मस्तक पर तिलक करवाते हुए। मशाल उठाए, युद्धगीत गाते रणबांकुरों की कतारें। युद्ध एक भरा पूरा पैनोरमा।

सृजन का स्वभाव है कि उसकी गहराई तक पहुंचने के लिए सच को आग में रूपांतरित करना पड़ता है – अग्नि के तीन गुण हैं-प्रकाश, उष्मा, ऊर्जा।

ऋग्वेद की दस हजार ऋचाओं अग्नि की स्तुति में ही की गई है। ऐसा अग्निधर्मा  सच कहने के लिए फक्कड़ होना लाजिम है। कबीर की तर्ज पर (जो घर जारै आपना चले हमारे साथ)। सच के प्रति रेणु की प्रतिबद्धता उसकी चारित्रिक विशिष्टता एवं सोद्देश्य रचनाधर्म में आस्था के कारण है, जिसका अहसास ‘मेरे नाल तुरो’ में पग-पग पर होता है।

रेणु को हरियाणा पंजाबी साहित्य अकादमी द्वारा कविता का सर्वोच्च सम्मान भाई संतोख सिंह पुरस्कार 2001 में मिल चुका है। उसकी कलम की यात्रा जारी है, क्योंकि उसने अपनी पहली पुस्तक ‘भुक्ख’ में स्वयं को संबोधित जो पंक्तियां कही थीं, वे आज भी सचेतक का काम करती हैं-

तुरदा रहु तूं पांधिया अजे रात बहुत है,
भुक्खां दे किस्से कहण नूं अजे बात बहुत है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज – 17 से 20

 

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