पठनीय पुस्तक

‘यह पृथ्वी मेरी और सब की है और यह हमारे अस्तित्व की पहली शर्त है। इस पृथ्वी को मोल तोल की एक वस्तु के रूप में तबदील करना स्वयं को मोलतोल की वस्तु में तबदील करने की ओर आखिरी कदम है।- एंगेल्स

आज विश्व के सामने पारिस्थितिक संकट एक गंभीर चुनौती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सम्मेलनों,  सेमिनारों और राजनेताओं की चर्चा परिचर्चा से यह जाहिर होता है कि पृथ्वी की सेहत खराब हो रही है। हम पर्यावरण संहार के नए दौर से गुजर रहे हैं। समय आ गया है कि अब हमें मानवीय प्रयासों और गतिविधियों के मूल्यांकन करने की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढिय़ां हमारे नजरिए पर उंगली न उठाएं। जीवन के अनिवार्य घटक हवा, पानी और मिट्टी का संतुलन इस कदर बिगड़ गया है कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वस्थ जीवन एक सपना बनकर रह गया है।

                अठाहरवीं शताब्दी के मध्य तक यह माना जाता था कि पृथ्वी पर मौजूद संसाधनों की कमी नहीं है। हम उत्पादन की दर बढ़ाकर मानवीय इतिहास में नई ऊंचाई को छू सकते हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जन्मेें पर्यावरण विज्ञान ने बताया कि पृथ्वी पर संसाधनों की सीमा है। हमारी हर इच्छा का भौतिकीय रूप संभव नहीं है। भौतिकीय समृद्धि पर खड़ी कोई सभ्यता इस गृह पर जीवन की उत्तरजीविता का संकट खड़ा कर सकती है। ऐसा नहीं है कि हम विकास के नाम पर पर्यावरण को तबाह करते जाएंगे। पर्यावरण संकट और विकास के मॉडल का सीधा सम्बन्ध है। ज्यों-ज्यों पर्यावरण संकट गहराता जाएगा, विकास के मॉडल पर उतना बड़ा सवाल खड़ा होता जाएगा। सवाल सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा नहीं है, बल्कि मनुष्य के साथ-साथ अन्य जीव जंतुओं के उत्तर जीवन से भी जुड़ा हुआ है।

                यह पुस्तक वर्तमान संकट को समझने की एक रूपरेखा प्रस्तुत करती है। इस संकट की जिम्मेवार पूंजीवादी व्यवस्था है, जिसका मूल तर्क अधिकतम लाभ कमाना है। मुनाफे के बिना पूंजीवाद नहीं चल सकता, चाहे इसके लिए पर्यावरण को ही दांव पर क्यों  न लगाना पड़े? वास्तविक शत्रु पंूजीवाद है और अब जीवन के हर क्षेत्र में इसकी पैठ बढ़ रही है। इस प्रभुत्वकारी शक्ति ने वैश्वीकरण के नाम पर सारी दुनिया में अपनी जगह बना ली है, फिर भी हमारे बहस मुहाबसों, विचार-विमर्श का केंद्र पूंजीवाद और उसका संरचनात्मक रूप नहीं, बल्कि औद्योगिकीकरण, आधुनिकता, विज्ञान और तकनीकी कारण है। पृथ्वी का संकट प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि समाज व्यवस्था के चरित्र का संकट है और आज यह व्यवस्था राजनीतिक विमर्श से गायब है।

                मानवीय इतिहास में यूरोपीय ज्ञानोदय एक उपलब्धि है। पहली बार आस्था पर तर्क की जीत हुई। मनुष्य आसपास के वातावरण को तर्क-वितर्क और ज्ञान के माध्यम से समझने लगा। कांट ने इसे मनुष्य के ज्ञान की प्रौढ़ावस्था कहा। समय के साथ-साथ ज्ञान और तर्क को पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा इस कद्र जज्ब कर लिया गया कि ये केवल आर्थिक गतिविधियों को सम्पन्न करने के साधन भर रह गए। इसी कारण हमारे समस्त मानवीय मूल्य आर्थिक गतिविधियों के दायरे में सम्पन्न होने लगे। पूंजीवाद को आधुनिकीकरण का पर्याय मान लिया गया और इसके नाम पर मुनाफे का कारोबार चल पड़ा। आज समस्त अर्थव्यवस्थाओं का एकीकरण मानवीय विकास के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की चाह में किया गया है।

                पारिस्थितिक संकट का खतरा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है और अब इसकी बहुत स्पष्ट जानकारी हमारे पास है। जल, भूमि और वायु का प्रदूषित होना है, ओजोन परत का पिघलना, अम्लीय वर्षा के खतरे, प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से रिक्तीकरण, वनों की समाप्ति और मरूस्थलीकरण का विस्तार, रेडियो एक्टिव पदार्थों और औद्योगिक कचरे से नदियों और समुद्रों में बढ़ते हुए प्रदूषण ने मनुष्य ही नहीं, बल्कि इस ग्रह पर मौजूद अन्य जीव जगत के जीवन पर संकट मंडारने लगा है तथा आहार श्रृंखला के टूटने से जीवों की प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। पिछली दो शताब्दियों में असंख्य मात्रा में वनस्पतियां विलुप्त हो चुकी हैं तथा प्रतिवर्ष 50000 जैविक प्रजातियां नष्ट हो रही हैं। हालिया रिपोर्ट और अध्ययन बताते हैं कि अगली शताब्दी तक विद्यमान प्रजातियों में से आधी विलुप्त हो जाएंगी। पारिस्थितिकी विशेषज्ञ विल्सन ने कहा कि संभावित विलुप्तीकरण एक शानदार होलोकास्ट है। इस व्यवस्था में हम सामूहिक वध के लिए अभिशप्त हैं।

                अमेजोन क्षेत्र के जंगल दुनिया के समस्त वनों के चौथाई हिस्से  का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा अपनी जैव विविधता, वनस्पति और जीव जंतुओं की विशिष्ट प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध हैं। ग्रीनपीस संस्था ने अनुमान लगाया है कि आने वाले 50 वर्षों में कुछ पेड़ ही बचेंगे, जंगल पूर्णत: नष्ट हो जाएंगे। पर्यावरण में कार्बन डाई-आक्साईड  के स्तर में  निरन्तर वृद्धि आगामी खतरे की सूचना दे रही है। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है तथा वर्ष 2100 तक समुद्र का जलस्तर 15 से 59 सेंटीमीटर तक बढऩे की आशंका है। पहाड़ी ग्लेशियर के पिछले से कुछ शहर और द्वीप समुद्र में समा जाएंगे। वर्ष 2025 तक तीन में से दो व्यक्तियों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ेगा।

                इस समस्या का सम्बन्ध तीन बातों से है-उपभोक्तावादी जीवन शैली और जनसंख्या वृद्धि, पर्यावरणवादी गैर सरकारी संस्थाएं और उत्तरजीवी विकास की अवधारणा। समकालीन पर्यावरण विध्वंस के लिए मनुष्य रूप से पहली दुनिया जिम्मेवार है। ‘इस्तेमाल करो और फैंक दो’ की संस्कृति ने पर्यावरण पर बोझ डाला है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इस जीवन शैली को बढ़ावा दिया गया। अमेरिका के खुदरा क्षेत्र के विशेषज्ञ विक्टर लोवान ने कहा-हमारी भीमकाय उत्पादन व्यवस्था मांग करती है कि हम अपनी जीवन शैली के अनुरूप उपभोग करें। यह कि चीजों  की खरीद फरोख्त को हम एक संस्कार/अनुष्ठान में तबदील कर दें। यह कि इससे हमें आध्यात्मिक किस्म की संतुष्टि प्राप्त हो या उपभोग से हमारे अहम् को संतुष्टि प्राप्त हो…हमको तीव्रता से चीजों की खपत की, उनके जलाए जाने की, उन्हें खराब करने की बदल देने की और नष्ट करने की प्रवृति विकसित करने की जरूरत है। उपभोक्ता शैली का जन्म अमेरिका में हुआ और अब इसे व्यापार के साथ पूरी दुनिया में परोसा जा रहा है। दुनिया की आबादी का 25 फीसदी हिस्सा रखने वाली पहली दुनिया कुल ऊर्जा का 80 फीसदी खर्च करती है तथा 75 फीसदी हिस्से वाली तीसरी दुनिया कुल वैश्विक ऊर्जा का मात्र 20 फीसदी प्रयोग करती है। पहली दुनिया के औद्योगिक देश वैश्विक स्तर पर उत्पन्न होने वाली कुल कार्बन-डाईक्साईड का दो तिहाई उत्सर्जन करते हैं तथा ओजोन परत को क्षरित होने वाली 90 फीसदी क्लोरोफ्यूरो कार्बन पहली दुनिया से उत्सर्जित होता है, जिसके परिणामस्वरूप दसियों लाख व्यक्ति आने वाले समय में कैंसर से पीडि़त हो जाएंगे। मोटे रूप से वैश्विक प्रदूषण के लिए 80 फीसदी हिस्सेदारी पहली दुनिया की है।

                कथित पहली दुनिया के जीवन स्तर को कायम रखने के लिए धरती के संसाधनों का जिस ढंग से दोहन किया जा रहा है, उसे धरती बर्दाश्त नहीं कर सकती। यह दुनिया टॉयलेट और पैकिंग पर इतना कागज इस्तेमाल करती है, जिससे कई देशों की स्कूली किताबें और अखबारों  का काम  चलाया जा सकता है। थर्ड वल्र्ड नेटवर्क के मार्टिन खोर फोक पेंग ने रेखांकित किया-‘न्य���यार्कवासी एक सप्ताह में जितनी ऊर्जा का प्रयोग करते हैं, अफ्रीकावासी उससे कहीं कम ऊर्जा का प्रयोग पूरे वर्ष में करते हैं।’

                पर्यावरण चेतना की अवधारणा का जन्म उन देशों में हुआ, जहां लंबे  समय तक विकास का प्रारूप गैर उत्तरदायी रहा। वे समकालीन संकट को अपनी जीवन शैली की बजाए दक्षिण देशों की अत्यधिक जनसंख्या के साथ जोड़ कर देखते हैं। माथल्सवादी विद्वानों का मत है कि संसाधनों की अपेक्षा जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार तेज है तथा इस संकट का समाधान जनसंख्या नियंत्रण से संभव है। वैश्विक जनसंख्या में लगभग 92 मिलियन प्रतिवर्ष की दर से बढ़ौतरी हो रही है, जिसमें से 88 मिलियन प्रतिवर्ष की दर विकासशील देशों की है। जनसंख्या वृद्धि पर रोकथाम जरूरी है, लेकिन इस विषय पर शोध करने वाले अन्य  विद्वानों का मत है कि मौजूदा व्यवस्था मे ंजनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण में गिरावट का कोई औपचारिक सम्बन्ध नहीं है। जैसा कि वैज्ञानिक बैरी कॉमोनेर ने कहा कि पर्यावरण का नुक्सान जनसंख्या वृद्धि द्वारा नहीं, बल्कि मौजूदा उत्पादन तकनीक द्वारा हो रहा है। मौजूदा उत्पादन पद्धति द्वारा पोषित उपभोक्तावादी जीवन शैली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तीसरी दुनिया की जनसंख्या वृद्धि पर जोर देकर उत्तर की उत्पादन व्यवस्था की गैर जीवनक्षमता को छिपाती है। जनसंख्या वृद्धि का सम्बन्ध गरीबी से है, जो पूंजीवाद का आधारभूत लक्षण है। यह केंद्र (पहली दुनिया) पर समृद्धि और परिधि (तीसरी दुनिया) पर गरीबी को जन्म देता है।  पहली दुनिया की समृद्धि तीसरी दुनिया के संसाधनों की लूट पर खड़ी है।

                इस समय दुनिया में आर्थिक साम्राज्यवाद के साथ-साथ पर्यावरण उपनिवेशवाद का उदय हो रहा है, जो विकास और तकनीक के नाम पर पैदा हो रहा है। विकास के नाम पर पहले इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को उदार बनाया गया और फिर प्रदूषण पैदा करने वाले कारखानों एवं जहरीले कचरे को यहां स्थानांतरित  किया गया। एक अनुमान के अनुसार विकसित देशों द्वारा प्रतिवर्ष 20 मिलियन जहरीला कूड़ा  कर्कट, परमाणु  कचरा और अपशिष्ट पदार्थ तीसरी दुनिया के देशों में भेजे जा रहे हैं। यह कचरे का साम्राज्यवाद है जो तीसरी दुनिया को डंपिंग प्लेस में तबदील कर रही है। जहां दो तिहाई से ज्यादा आबादी अद्र्ध मानवीय स्थिति में रह रही है। प्रदूषणकारी उद्योगों को तीसरी दुनिया में शिफ्ट करने से विश्वव्यापी लागत ही कम हीं होती, बल्कि तीसरी दुनिया में रहने वाले लोगों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। पहली दुनिया के लोगों का जीवन बहुमूल्य है। स्वच्छ वातावरण उसकी आवश्यकता है और उन्हें उपलब्ध होना जरूरी हे। ‘लेट देम इट पालियुशन’ के लेखक ललारेंस समर्स का मत है-‘प्रदूषण कारक उद्योगों को कम विकसित देशों में अधिक से अधिक स्थानांतरित करने के पक्ष में है, क्योंंकि वे अधिक प्रदूषण का अवशोषण कर सकते हैं। यहां जीवन प्र्रत्याशा और मजदूरी पहले से ही कम है। यदि यहां लोग युवावस्था मं ही मौत का शिकार होते हैं, तब  भी उनके पास खोने को कुछ नहीं है।

                वास्तविक अर्थों में पहली दुनिया अपनी जीवन शैली में किसी प्रकार के त्याग और संयम की जरूरत महसूस नहीं करती। उल्टा तीसरी दुनिया को पर्यावरण संकट के लिए जिम्मेवार मानती है। अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकसित देश प्रकृति पर आधारित इनकी जीवन शैली को इस समस्या के लिए चिह्नित करती है। गरीब लोगों का वनों पर आश्रित होना, लकड़ी भोजन और फल फूल प्राप्त करना अब एक वैश्विक मुद्दा हो गया है और अधिक ऊर्जा खपत वाली जीवन शैली हाशिए पर चली गई है। औद्योगिक  देशों की वजह से अगले 50 वर्षों में पर्यावरण में कार्बन डाइक्साईड की मात्रा दुगनी हो जाएगी तथा इस ग्रह पर जीवन के विकल्प और कम हो जाएंगे। क्या कभी इन देशों से पर्यावरण की कानूनी कीमत वसूली जाएगी, जिन्होंने हीरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराए, खाड़ी युद्ध में  नाटो  द्वारा यूरेनियम हथियारों का प्रयोग, वियतनाम युद्ध में एजेंट औरेंज का प्रयोग (एक घातक  रसायन, जिसका प्रयोग अमेरिका ने वियतनाम युद्ध में किया, इसके छिड़काव से 2 लाख लोगों की तत्काल मृत्यु, वियतनामी बच्चे अपंग पैदा होने लगे। वहां की वनस्पति और फसलों पर अब भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है।) ये युद्ध जितनी जनता के खिलाफ थे, उतने पर्यावरण के विरुद्ध भी। रासायनिक व जैविक हथियारों के प्रयोगकत्र्ता देशों से इस घृणित कार्य के लिए कानूनी वसूली तो दूर की बात है, अफसोस तक जाहिर नहीं किया है। यह धनी देशों की राजनीति है जो पूरी तरह भयानक और मानवविरोधी उपननिवेशवाद की समाप्ति के बावजूद भी तीसरी दुनिया के प्रति इनके नजरिए में कोई बदलाव नहीं आया। अपने हितों की रक्षा के लिए तीसरी दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप करना अपना विशेषाधिकार समझते हैं। यह हस्तक्षेप विकास के नाम पर किया जाता है। वैश्विक जनसंख्या समस्या का हल प्रस्तुत करते हुए लीडस विश्वविद्यालय के प्रो. मारिस किंग ने कहा कि गरीब देशों के लिए चिकित्सा और प्रतिरक्षण कार्यक्रमों पर खर्च कम करने की आवश्यकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के  भूतपूर्व डायरैक्टर जनरल हाफडॉन माइलेर ने कहा कि उत्तरजीवी जैव व्यवस्था को कायम रखने के लिए इन बच्चों को व्यापक सुख मृत्यु (यूथेंनेजिया) के हवाले किया जाए। इसमें हैरत की कोई बात नहीं है। यह पूंजीवाद का असली रूप है कि वह बहुसंख्यक आबादी का ना तो कल्याण कर सकता है और न ही उसकी बेहतरी के लिए उसके पास कोई कार्यक्रम है वह पहली दुनिया को समृद्ध करने के लिए तीसरी दुनिया से क्रूर और अमानवीय व्यवहार करता है।

                हाल ही के दिनों में कुछ लोगों और गैर सरकारी संस्थाओं में पर्यावरण बचाओ को लेकर अच्छा खासा उत्साह देखा गया है। वे लोगों से एक नैतिक क्रांति की अपेक्षा रखते हैं। हमें अपने पर्यावरण की रक्षा के लिए ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिएं। इस प्रयास से हम जीवन के यादगार पलों को अमर बना सकते हैं। अपने नायकों/महापुरुषों के नाम पर पौधारोपण करके हम उनके उद्देश्य और योजनाओं को जनता कं मनो-मस्तिष्क में पुन:स्थापित कर सकते हैं। इनकी सद्इच्छा सराहनीय है। ये हमारी चेतना को परिष्कृत और परिभाषित करते हैं, कुछ संभावनाओं को जन्म देते हैं। इनके मासूम और भोले प्रयास पर्यावरण संकट की चेतना से जनता को परिचित तो करवाता है लेकिन इस संकट के लिए जिम्मेवार व्यवस्था पर उंगली नहीं उठा पाता। इनका राजनीतिक चिंतन सीमित है और व्यवस्था  में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर पाता।

                इन प्रयासों की अपनी मूल्यवत्ता है। बहुत से लोग सच्चे मन से लगे हुए हैं। पर्यावरण के वैश्विक प्रश्न का हल स्थानीय स्तर पर कार्यरत इन कार्यकत्र्ताओं के पास नहीं है। ये ज्यादा से ज्यादा पूंजीवादी गतिविधियों का स्थानीय स्तर पर विरोध कर सकते हैं, लेकिन योजना स्थगित नहीं  होती, केवल उसका स्थान बदल जाता है। एक सीमा के बाद पर्यावरण रक्षक समूह की गतिविधियां वस्तुनिष्ठ परिवर्तन लाने में असमर्थ है।

                लोगों से आग्रह किया जाता है कि साधारण ढंग से जीवन व्यतीत करें। अपने आसपास के वातावरण के प्रति संवेदनशील बनें। हम उपभोक्तापूर्ण वस्तुओं का इस्तेमाल ना करें। जैसे परिवहन के लिए कारों का इस्तेमाल या तो बंद कर दें, या कम से कम सप्ताह में एक दिन इस सुविधा का इस्तेमाल ना करें। जनता बहुत बुद्धिमान और जागरूक हो तो भी वह कारों का इस्तेमाल तब तक बंद नहीं कर पाएग���, जब तक कोई बेहतर परिवहन व्यवस्था की मौजूदगी न हो। हम किसी भी समुदाय को विकल्प दिए बिना वस्तुओं को त्यागने या कम प्रयोग करने के लिए नहीं कर सकते। वैयक्तिक परिवर्तन और सामाजिक परिवर्तन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार हमारा संवेदनशील नजरिया और नैतिक आह्वान मौजूदा व्यवस्था को छिपाने में लग जाता है।

                कारपोरेट दुनिया अपनी योजना को आकर्षक शब्दावली में प्रस्तुत करने  में  माहिर है। अब उसने अपना नाम ग्रीन कार्पोरेट रखा है। उसके पैरोकारों का मत है कि समय के साथ-साथ बाजार के अदृश्य हाथ इस समस्या का समाधान खोज लेंगे। हमारे वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इस दिशा में कार्यरत हैं। हमें एक पर्यावरण क्रांति की आवश्यकता है, जो विज्ञान और तकनीक पर आधारित हो। यह भुला दिया जाता है कि यह मुद्दा वैज्ञानिक और तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक है।

                अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एनजीओ का जाल बिछा हुआ है। वे पर्यावरण के लिए चिंतित दिखाई देती हैं। एक तरफ वे साफ-सुथरे पर्यावरण की आवश्यकता पर जोर देती है, दूसरी और प्रदूषण फैलाने वाली बहुराष्ट्रीय निगमों से भारी अनुदान प्राप्त कर रही हैं। हाल ही में पर्यावरण रक्षक समूह और बहुराष्ट्रीय निगमों के बीच गठबंधन बढ़ रहा है। वे एक-दूसरे के एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं। ब्रिएन टोकर का अध्ययन बताता है कि वल्र्ड वाइल्ड लाइफ फंड जैसी कई जानी-मानी पर्यावरणवादी संस्थाओं के 23 निदेशक और कौंसिल सदस्य 19 कारपोरेशनों से जुड़े  हुए हैं जो सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की सूची में है। जैसे यूनियन कार्बाइड, एक्सोन, मोंसेटो, वेहरस्यूर और ड्यूपोंटे। डिस्कवर अंडरवारटर, ओनली वन अर्थ, नेशनल जियोग्राफिक जैसी पर्यावरणवादी संस्थाओं को कारपोरेट दुनिया वित्तीय सहायता मुहैया कराती है। हम शिनाख्त नहीं कर पाते कि इस ग्रह को बचाने वाले कौन हैं? प्रदूषण फैलाने वाले कौन?

                पंूजीवाद पर्यावरण के प्रति नहीं, संवृद्धि के प्रति चिंतित है। इसके लिए चाहे समस्या को खड़ा करना पड़े या फौरी तौर पर उसका समाधान प्रस्तुत करना पड़े। वह केवल पूंजी और पूंजी संचय करता है। अब वह अपने फैलाये सैन्य,नाभिकीय और औद्योगिक कचरे के प्रबंधन में जुट गया है। इस क्षेत्र में एक नया व्यवसाय खड़ा हो गया है, मित्सुविशी हैवी इंडस्ट्री, ड्यूपोंटे और ए.वी.सी. जैसी भीमकाय कम्पनी पर्यावरणीय तकनीक और सेवाओं को परोस रही हैं।

                दिन-प्रतिदिन यह समस्या बढ़ती जा रही है। इसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था जिम्मेवार है। इस व्यवस्था के रहते किसी भी प्रकार के रचनात्मक प्रयास पर्यावरण को बचाने में अधूरे हैं। उत्पादन की प्रकृति अर्थात् बिना आवश्यकता को उत्पादन करना ही इस समस्या की जड़ है।

                अर्थ पॉलसी इंस्टीच्यूट के अध्यक्ष लेस्टर ब्राउन ने कहा था-हमारे लिए वक्त बीत गया है और इस ग्रह को बचाने का युद्ध हार रहे हैं। जरूरत है इस व्यवस्था का प्रतिपक्ष रचने की जो लोभ और लालच से परे हो। मानवीय गुणों से भरपूर हो तथा प्रकृति को उपयोगी वस्तु की बजाए मनुष्य की सृजनशीलता की प्रयोगशाला मानती हो।

                हमें समझदारी से आगे बढऩे की आवश्यकता है। मानवीय समाज के सामने अब भी समाजवादी व्यवस्था एक विकल्प है, जो हमारी उत्तरजीविता के प्रश्न को हल कर सकती है। आधुनिक विश्व व्यवस्था में समाजवाद का पहला प्रयोग सोवियत संघ में शुरू हुआ, लेकिन शीतयुद्ध में पंूजीवाद को टक्कर देने के लिए अत्यधिक उत्पादन वाला रास्ता अपनाकर अपनी गरिमा गंवा बैठा। अपनी तमाम असफलताओं और निराशाओं के बावजूद समाजवाद हमें ऐसा वैचारिक ढांचा उपलब्ध करता है, जो हमें  सामूहिक विनाश से बचा सकता है। रोजा लग्जम्बर्ग ने कहा था-समाजवाद या बर्बरतावाद। विश्व व्यवस्था में पूंजीवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप यदि समाजवाद नहीं आता तो बर्बरतावाद आएगा। इस दुनिया को बदलने की आवश्यकता है, ताकि एक दुनिया बनी रहे। समाजवाद के पास वैज्ञानिक और मानवीय चिंतन है। हमें अपनी उत्तरजीविता को समाजवाद से नत्थी करने की आवश्यकता है, ताकि मनुष्य जाति के साथ-साथ अन्य जीव जंतुओं का जीवन बना रहे।

पुस्तक-प्रो. रणधीर सिंह, अनु. जितेन्द्र गुप्ता, ग्रंथ शिल्पी, 2014

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज – 71से 73

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