बाल कविता

चिड़िया मेरे घर की छत पर
रोज फुदकती है रुक-रुक
अपनी भाषा में जाने क्या
बोला करती है टुक-टुक।

उसकी बोली को सुन-सुनकर
नन्हें चूजे आ जाते
आंगन में बिखरे दानों को
चीं-चीं करते खा जाते
शैतानी करते मनचाही
मां के पीछे लग जाते
पंक्ति बांध के चलते, जैसे
रेल का इंजन छुक-छुक-छुक।

तिनका कभी दबाए मुंह में
फुर्र-फुर्र उड़ती आती है
बड़े जतन से बना घोंसला
मुझे देख मुस्काती है।
सारा दिन उड़ती-गाती है
शाम ढले थक जाती है
अगली सुबह जगाती मुझको
खिड़की पर करके ठुक-ठुक

मुझसे कहतीं, पर्वत-नदियां
मैंने खूब निहारे हैं
दूर रेत के टीलों पर भी
अपने पंख पसारे हैं
भारत की धरती पर देखे
सब अनमोल नजारे हैं
पर सतलुज घाटी में उड़ते
मेरा मन करता धुक-धुक।

एक शाम चहककर बोली
क्या पढ़ती हो बहना?
मैंने कहा किताब, जो है
सबसे अच्छा गहना।
दीदी! मैंने तो सीखा है
बस उड़ते ही रहना
लेकिन जब देखूं स्कूल में
मन मेरा कहता रुक-रुक

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज – 69

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