कहानी

छोटे कद, सांवली रंगत और पेज कट बालों वाली उस लड़की में सेवेन्टी एमएम दिमाग था और दिमाग में ईस्टमैन कलर का एक सपना! सपना कोई स्थिर चित्र नहीं था कि वह खुद या कोई और उसे अंतिम रूप से एक ही बार में बयान कर सकता। वो एक फिल्म की मानिंद था- बहते हुए दृश्य, एक के बाद एक होती घटनाएं। इस स्वप्न-प्रवाह का कोई अंत नहीं था। इसमें रोज कुछ दृश्यों और घटनाओं, पात्रों और संवादों का इजाफा होता जाता। वह पुराने दृश्यों के डिटेल्स  बदल कर, पात्रों के हेयर स्टाइल और पहरावे इत्यादि में तबदीलियां कर उन्हें लगातार ‘अप-टू-डेट’ करती रहती।

हां, मुख्य पात्र फाइनल हो चुके थे। यह वह खुद, दूसरा उसका नायक – सफेद दूधियां दांतों, चमकीली आंखों वाला एक लंबा, आकर्षक पुरुष। यूं वह उस पुरुष का नाम-पता पक्के तौर पर नहीं जानती थी। अनेक रूपों में अनेक जगह उसे दिखता रहा था – कभी सूटिंग-शर्टिंंग के विज्ञापनों में, कभी कनाट प्लेस के बरामदों में, कभी उन नए बसते ‘विहारों’ में जहां वह ट्यूशनें पढ़ाने जाया करती थी। एक दफा कुवैत से आए किसी रिश्तेदार-परिवार के साथ घूमने के लिए वह सांझ को इंडिया-गेट गई थी तो वह उसे सर्दियों की धुंध और उतरती रात के सांवलेपन में लिपटा कई बार दिखाई पड़ा था – किसी पेड़ के नीचे जाने किसके साथ सट कर बैठा हुआ, किसी के हाथ में हाथ डाले सड़क के इर्द-गिर्द की धुंधली, पीली रोशनी से लॉन्स के अंधेरे की ओर सधे कदमों से बढ़ता हुआ, जानें किसकी कमर को अपनी बांह से घेरे अंधेरे की चट्टान से बाहर निकल सड़क की रोशनी के मटमैले, निस्पंद पोखर में उतरता हुआ…

उम्र के किस मोड़ पर कैसे इस सपने का मुहूर्त हुआ था – लड़की को नहीं मालूम। जानें कितने बरसों से वह इस पुरुष और अपने चारों ओर जलती-बुझती, रंग-बिरंगी नियोन-लाइटों-सी रहस्यमय, झिलमिल दुनिया रचती रही थी। उसे कहीं कोई दृश्य भा जाता, कोई स्थिति पसंद आ जाती, कोई चीज रच जाती, तो पता नहीं कब अपने-आप उस दुनिया में शामिल हो जाती। वह कब इस दुनिया के भीतर होती, कब बाहर-कह पाना मुश्किल है। शायद वह एक साथ बाहर भी होती और भीतर भी।

टिन…इंग! शाम को पुरुष अपने काम से घर लौटा है। वह कभी डॉक्टर होता, कभी इलैक्ट्रोनिक्स इंजीनियर, कभी फ्लाइट लेफ्टीनेंट, कभी मैनेजर, कभी आईएएस आफिसर…कभी-कभी बिजनेसमेन।…उसके गोरे, ग्रीक चेहरे पर हल्की सी थकान है, लाल होठों पर धुली-सफेद मुस्कान, चौड़े माथे पर  झूलती हुई नरम बालों की एक काली लट। लड़की बड़े मोहक अंदाज में चाय लाती है। सपने में ट्रे , क्राकरी, चाय का ब्राण्ड, पर्दे, पेंटिग्स, मेज, सोफा, टीवी, एयर कन्डीश्नर, वीडियो, स्टीरियो बदलते रहते थे – लड़की के इन चीजों से संबंधित ज्ञान के बढ़ते जाने के साथ-साथ। पुरुष मुग्ध-सा उसकी ओर देखता हुआ उठता है, उसकी आंखों में शरारत भरी है, वह टाई की नॉट ढीली करता है, लड़की को अपनी बांहों में उठा कई बार एडिय़ों पर घूम जाता है, वे दोनों खिलखिलाते हुए गुदगुदे पर्शियन कालीन में ढेर हो जाते हैं। टिन् न् न-ई ग् ग!!

                ट्रिन ईग! वे दोनों अपनी नई मारूति में शापिंग करने निकले हैं। पुरुष की कद-काठी, वेश-भूषा, चेहरे और आंखों में दपदपाता रौब-दाब देख कीड़े-मकोड़ों-सी खदबदाती भीड़ रास्ता छोड़ती जाती है। वह उसकी छाया में सॉफ्टी कुतरती एक जगमग स्टोर से निकल दूसरे, फिर तीसरे…में घुसती चली जाती है, एक-एक चीज को पारखी की तरह परखती है, खूब मोल-भाव करती है, अंत में दुकानदार के बताए भाव से कुछ कम पर ही चीजों को खरीदती है। पहले पुरुष की बाहें पैक्ड डिब्बों से भरती हंै, फिर लड़की की। हर डिब्बे के साथ वे जमीन से थोड़ा ऊपर उठते जाते हैं। संतुष्टि, सुरक्षा, आत्मविश्वास से भरते जाते हैं। उस रात उनका प्यार ज्यादा घनाता है, खूब गहरा जाता है।…पहले शापिंग वेस्पा पर होती थी, फिर एक सेकेण्ड-हैंड एम्बेसेडर आई। उसे बेचकर और इस दौरान की बचत मिलाकर  पद्मिनी-प्रीमियर ली। शुक्र है कि उसने जिद्द करके मारूति की रजिस्ट्रेशन करवा दी थी, वरना ब्लैक में लेनी पड़ती। दिन-ब-दिन बढ़ती ब्लैक और अपनी कोठी के पोर्च में बाजार भाव पर आ खड़ी हुई मारूति को देख पुरुष भावुक हो जाता है-‘ओह आरती! यू आर टू वाईज। टू फार साइटेड! मैं तो सिर्फ पैसा कमाना जानता हूं, उसका सही इस्तेमाल तो सिर्फ तुम्हें करना आता है।’ लड़की यह सुनकर थोड़ा फूलती है, एकाएक उदास होती है, अतीत की राहों पर वापिस लौटती है और जैसे किसी गहरे, अंधेरे तहखाने से बोलती है-‘सब मम्मी ने सिखाया राजे, सब! मम्मी ने ही हमारे घर को बनाया, बढ़ाया! पापा तो बस…!…क्यों डियर, अब इस पद्मिनी को टैक्सी न बना दें…टिन्न्न ईग्ग्ग!!

                टिन-ईग! वह साड़ी का पल्लू कमर में खोंसे कोठी के आगे-पीछे लगाए गए पौधों को पानी दे रही है कि नेपाली नौकर-‘बहादुर’-किचन का काम छोड़ उससे कुछ दूर आकर खड़ा हो जाता है। उंगलियां चटकाता वह कभी जमीन, कभी फूलों, कभी उसके चेहरों की ओर देखता है – कुछ परेशान-सा। बहादुर की मौजूदगी का अहसास होते ही वह गुस्से का पोज ले लेती है – ‘क्या है रे?…किचन का काम  खत्म हो गया क्या?’ बहादुर उंगलियां चटकाता, हकलाता है-‘मेम साब, …मेम सहब…वो…।’ वह पोज में गुस्से की लकीरें और गहरी कर देती है-‘क्या मेम साब-मेम साब लगा रखी है। बोलना नहीं आता क्या? तुम गंवारों को कभी कुछ नहीं आएगा! कितनी बार कहा है जो कहना हो उसे पहले ठीक से सोचो,्र फिर साफ-साफ कहो।’ बहादुर की नजरें जमीन, फूलों, उसके चेहरे से लडख़ड़ाती हुई जमीन पर जा गिरती हैं। वह ढीले बदन को कुछ-कुछ अटेन्शन की पोजीशन में लाता है, कुछ देर सोचता है, फिर ऐसे बोलने लगता है, जैसे कोई बच्चा टीचर को अपना पाठ सुना रहा हो-‘घर से चि_ी आई है। बाप बीमार है। पैसा मंगाया है। नहीं भेजा तो मर जाएगा।’ बहादुर के खड़े होने और बोलने के अंदाज पर उसकी हंसी छूटने को होती है कि वह फिर उंगलियां चटकाता, हकलाता है-‘मेम साब’…इस महीने की तनखा…इस महीने की तनखा पैले ही दे दो मेम साब! लड़की हंसने को स्थगित कर फिर गुस्से का पोज लेने को होती है कि बहादुर की आवाज रुंध जाती है-‘मेम साब…बाप…!’ वह द्रवित होती है लेकिन कठोर बनी रहहती है-‘पैसे की खदान हे क्या यहां? इस महीने का काम क्या पहले ही कर दिया है जो तनख्वाह पहले दे दें।’ बहादुर उंगलियां चटकाता सुबकने लगता है। वह आवाज को थोड़ा नरम कर लेती है-‘अच्छा-अच्छा, रो मत! चल किचन का काम निपटा। शाम को साहब से पूछ कर बता दूंगी।’…लड़की फूलों-पौधों को पानी देती सोचती जाती है – पैसे तो इसे दे ही देने चाहिएं। इस उम्र में बेचारा…! फिर कहीं और खिसक गया तो! मिसेज वर्मन तो इसे पहले ही फुसलाने के चक्कर में है। लेकिन नौकरों को रखना हो तो थोड़ा डांट-डपट करनी ही चाहिए, वरना सर चढ़ जाते हैं। मम्मी के सारे गुर कितने कामयाब हैं! मेरी जगह पपा होते तो क्या करते?…हूं! बहादुर से काम लेने की बजाए उसे पढ़ाने-लिखाने लगते! पपा वाज इन इम्प्रेक्टीकल गाई!…पर मैंने भी क्या नहीं किया बहादुर के लिए!  आया था तो कितना गंदा था-चिक्कट कपड़े, मैला बदन! ऐसा नौकर भला गेस्ट लोगों के सामने लाया जा सकता था! अब तो बहादुर का हुलिया ही बदल गया है। नौकर नहीं, मिनी डैनी लगता है। मिसेज बर्मन ने देखा था तो बोली-‘ओह! हाऊ क्यूट…!…वह  अपनी कृति पर मुग्ध हो जाती है। फैसला कर लेती है कि शाम को बहादुर को पेशगी तनख्वाह दे देगी। सवा सौ ही की तो बात है! अपनी सहृदयता और उदारता पर गद्गद् होती है-‘हां जी, हमसे तो नहीं बना जाता इतना पत्थर दिल! हमने भी तो बुरे दिन देखे हैं!’ भ��तर जाकर बहादुर से कहती है-‘चाय पीने  का मन हो तो बना लो।’…टिन्न…ईग्ग!!

टिन-ईग! पुरुष ने काम से थककर एक पखवाड़े  की छुट्टियां ली हैं। वे दोनों एयर-इंडिया के जहाज की सीढिय़ों से ऊपर चढ़ते विदा करने आए मित्रों की ओर हाथ हिला रहे हैं। नेपाल…सिंगापुर…हांगकांग! मित्रों ने काफी सामान लिखवा दिया है वहां से लाने के लिए। थोड़ा खतरा है पर एक तरीके से मुफ्त में पड़ जाएगा ये ट्रिप। हो सकता है कुछ बच-बचा भी जाए। पुरुष फिर भावुक हो उठा है-‘यू आर टू वाईज! टू फार साइटेड!…टिन्न ईग्ग!!

टिन-ईग! उसने स्कूल की नौकरी छोड़ दी है। ट्यूशनं भी। स्टाक-शेयर के जरिए वह घर बैठे उससे दुगना पैसा कमा रही है। पढ़ा तो इस दुनिया में बस पपा जैसे लोग सकते हैं। एक कोचिंग सेंटर खोल दिया है कोठी के पिछले हिस्से मेंं। छोटे भाई को उसका प्रिंसीपल बना दिया है। शुरू में दिमाग लगाना पड़ा था थोड़ा, अब तो पूरा सिस्टम ऑटोमेटिक हो गया है। छोटा देख-रेख में ट्रेंड हो गया है। पढऩे में तो उसका शुरू से मन नहीं था। वह सेटल न करती तो छोटा जानें क्या करता! कितनी श्रद्धा से ‘दीदी-दीदी’ करता है।…टिन्न…ईग्ग्ग!!

…टिन-ईग…टिन्न…ई-ग्ग…टिन्न्न ईग्…ग!!

दृश्य और स्थितियां कहीं चुकते न थे। हर दृश्य और स्थिति में उसे अपनी भूमिका, भंगिमाएं और संवाद बिल्कुल ठीक तौर पर मालूम थे। भविष्य का एक सुनियोजित नक्शा था उसके पास। लेकिन…! उसके दिमाग में इच्छाएं सफेद, भूरे अयालों वाले अरबी घोड़ों की तरह दौड़तीं कि कोई ऊंची दीवार सामने आ जाती। घोड़े बेचैनी से हिनहिनाते, पैर पटकते। लड़की गुस्से और झुंझलाहट से भर जाती।-काश! कोई उसे धान की तरह उसके हालात कीे जमीन से उखाड़ वहां रोप सकता  जहां…! मम्मी हिम्मत बंधाती-‘करेंगे छोटी, इस दीवार में भी किसी तरह सुराख करेंगे!…कभी आशंकाओं और अनिश्चितता की खाइयों के किनारों पर घोड़े ठिठक जाते, पीछे हटने लगते। वह मम्मी की ओर देखती-‘पुल’ बिछाओ मम्मी, कोई पुल बिछाओ इन खाइयों पर।’ मम्मी ग्लूकोज की बोतलें  चढ़वातीं।…कभी घोड़े भय और असहायता के काले दल-दल में धंस जाते और गर्क होने लगते। लड़की चिल्लाती-‘मम्मी…!’ कोयला होते कंकाल-सी मम्मी कराहते हुए बिस्तर से उठतीं, खुद को जैसे-तैसे बटोर थकी आंखों से आसपास कोई रस्सी ढूंढने लगती। शुरू में…यह ‘लेकिन’ रंगों और रोशनियों में छिपा एक बिन्दू भर था, फिर धीरे-धीरे इसका आकार बढऩे लगा…

होश संभालने से लेकर पपा के सायकेट्रिक वार्ड में दाखिल कराए जाने तक लड़की ने मम्मी को हमेशा पपा से झगड़ते पाया था। पपा कॉलेज से आकर अपने कमरे में बंद हो जाते या जानें किस-किस जगह  सभा-गोष्ठियों-सेमीनारों में दिन गुजार रात गए घर लौटते। पर उनकी लिखाई-पढ़ाई, घूमने-फिरने का कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आता था। पड़ोसी प्रो. गुप्ता थे – लुंगी लपेटे ट्यूश्नों के कई-कई बैच चलाते। गाइडें लिखते। मुटल्ली मिसेज गुप्ता मम्मी से कहतीं-‘चलै है भैंना, चल आज वासिंग  मशीन देख आवैं…हमनै तो जी अपने बबलू खातिर भी रोहनी में मकान रजीस्टर करवा दिया हैगा…।’ मम्मी पपा के आगे-पीछे भुनभुनातीं-‘अरे इस घर, इन बच्चों के बारे में भी सोचो कुछ कि सारी जिन्दगी बस लड़कपन ही करते रहोगे! पपा किताबों के ग_र खरीद लाते, मम्मी उन पर हिफाजत भरी नजर डालती, तुनकतीं – ‘किसी काम की चीज पर भी पैसा खर्च करोगे कभी कि बस नावलों से भरते रहोगे इस घर को। तीन-तीन बच्चों के बाप हो गए हो, सोच-समझ कर उड़ाओ। जब गृहस्थ की है तो गृहस्थ की तरह निभाओ।’

घर कभी-कभी पपा के अजीबो-गरीब दोस्तों से भर जाता। वे ठहाके लगाते। किचन में घुस सारी चीनी खत्म कर डालते। फर्श को सिगरेट-बीडिय़ों के अधजले टुकड़ों से भर देते। बहस करते। बहस के दौरान एक-दूसरे को गुस्से से देखते, ऊंचे-ऊंचे बोलते, खामोश हो जाते, तेज-तेज कश मारते, फिर ठहाके लगाने लगते। वे लड़की से दो साल बड़े भाई को बहुत चाहते थे। उसे जाने क्या-क्या बताते, किताबें दे जाते। वह उनके बीच बैठा हथेलियों पर ठुड्डी टिकाए, आंखें फाड़-फाड़ उन्हें देखता, उनकी बहस सुनता रहता। उनके लिए चाय बनाकर खुश होता। दौड़-दौड़ कर पान लाता। मम्मी लड़की और छोटे को लेकर छत पर चली जातीं। कुढ़तीं। बार-बार ठंडी सांसें छोड़ते हुए लड़की से कहतीं-‘देख ले छोटी, देख ले। लुट रहा है हमारा घर! ये निठल्ले डाकू बरबाद कर देंगे हमें। देख ले छोटी, देख ले।’ लड़की को पपा और उनके दोस्तों पर गुस्सा आता। छोटा मु_ी बंद कर एक उंगली को सीधा करके फायर करने लगता-‘बला हो कल मैं इने दंबूक से उला दूंगा। ठांय…ठांय…ठांय!’ कमरे से आंगन और आंगन से छत तक न समझ  आन वाले शब्दों के टुकड़े उड़ते रहते-आजादी के बाद उपभोक्तावादी समाज..जन-चेतना का राजनीतिकरण…तेलंगाना का तरीका…नेहरू की नीतियां…फासिस्टी संगठन…!

पपा को कुछ नहीं आता था। न पड़ोसियों-रिश्तेदारों से कायदे की बातें करना, न खरीद-फरोख्त, न ढंग से रहना-सहना। सब मम्मी को करना पड़ता। वही सोग-सगुन के मौकों पर लोगों के यहां आती-जातीं, लड़-झगड़ घर के सामान में बढ़ोतरी करतीं, खरीददारी करतीं। बाप रे, मम्मी को कितना कुछ पता था-आजकल कौन-सी नौकरी में कितना पैसा मिलता है, किस ओहदे का जमाई कितने तक का पड़ जाता है, किस पड़ोसी ने चुपचाप अपनी कंवारी लड़की का गर्भपात करवाया है, किस रिश्तेदार के लड़के ने प्रेम-विवाह किया है…! सिर्फ मैट्रिक  पास थीं मम्मी, और पपा थे लेक्चरार, पर कितना अन्तर था दोनों के ज्ञान में! लड़की मम्मी से प्रभावित रहती। मम्मी कहीं भी आते-जाते लड़की को अक्सर साथ रखतीं। फिर छोटे-मोटे कामों पर उसे अकेली भेजने लगीं-ढेर हिदायतों के साथ।

दो लड़कियां और आ गईं। मम्मी का झगड़ना बढ़ गया। वे तीन-तीन लड़कियों के ब्याह के बोझ की बात करती रहतीं। पपा कभी-कभी कहते-‘जमाना बदल जाएगा, इनके बड़ी होने तक। ये खुद कर  लेंगी अपनी शादियां, अपनी पसंद के लड़कों के साथ।’ मम्मी चिल्ला उठती-‘बिगाड़ दो, अभी से बिगाड़ दो। और कुछ तो बस का है नहीं तुम्हारे।  हाय राम…किस्मत ही फूट गई रे…!’ मम्मी दोनेां हाथों से अपना माथा पीटतीं, साड़ी का आंचल मुंह में ठूंस रोने लगतीं। पपा अपने कमरे में चले जाते। डरी, सहमी छोटी बच्चियांं मम्मी से  चिमट जातीं। बड़ा मम्मी को घूरता। मम्मी पपा के बंद कमरे की तरफ हाथ हिला-हिला गालियां देने लगतीं। बड़ा झपटकर उनके मुंह को अपनी हथेली से भींच देता। मम्मी फर्श पर पैर पटकने लगतीं। छोटा हाथ को बंदूक बना बड़े की तरफ फायर करता। बड़ा उसे धुन देता और मम्मी बड़े को। वह थोड़ी देर चुपचाप खड़ा मम्मी को घूरता फिर पपा के कमरे में घुस जाता। लड़की मम्मी को पानी पिलाती।

मम्मी हिम्मती थीं, पपा दब्बू और डरपोक। मम्मी झगड़तीं तो पपा धीमी आवाज में कुछ समझाने की कोशिश करते, बीच में ही चुप हो जाते, फिर मम्मी के पास से हट जाते। वे घर से काफी बाहर रहने लगे थे। हां, बड़ा अक्सर मम्मी को उल्टा-सीधा कहता। धीरे-धीरे सब कुछ मम्मी के हाथों में सिमटता गया, सारे फैसले। पपा को रोज दो कप चाय, घर से कालेज आने-जाने का बस-किराया और महीने में एकाध किताब के पैसे दे दिए जाते और बस। मम्मी ने पास-पड़ोस की औरतों को मिला कर दो छोटी-छोटी लॉटरियां शुरू की। बैंक में तीनों लड़कियों के नाम माहवार कुछ पैसा जमा होने लगा। स्वेटर बुनने की एक मशीन खरीदी गई। और एक बड़े से गत्ते पर लिखकर घर के बाहर लटका दिया गया-‘यहां डिजाइनदार स्वेटर बुने जाते हैं।’ पपा के कमरे से किताबों के ढेर निकाल पुरानी साडिय़ों में बांध किचन की परछत्ती पर रख दिए गए और कमरा किराए पर चढ़ा दिया गया। पपा के अजीबो-गरीब दोस्तों की आमद बंद कर दी गई। खाली लगते घर में एक-एक कर चीजें आती गईं-डबल बेड, सोफा, दीवार घड़ी, कुकिंग गैस। घर अब घर-सा लगने लगा। जब भी कोई नई चीज आती, पूरे मुहल्ले की औरतें एक-एक करके देखने आतीं। नई चीज पर हर कोण से चर्चा होती। मिसेज गुप्ता से तुलना की जाती। मम्मी सज-संवर सोफे पर बैठतीं और मुंह बना-बनाकर पड़ोसियों से बातें करतीं। मुहल्ले की औरतों के समाज में उनकी कद्र और रुतबा बढ़ता जा रहा था।

पपा और बड़ा जाने कहां-कहां घूमते। देर से घर लौटते और चुप रहते। पपा की चुप में तो मालूम नहीं क्या था, पर बड़े की चुप अंगारे पर जमी राख थी! लड़की को बड़े से डर लगता। वह छोटे से प्यार करती। जिस रोज टीवी आया पपा हौले से बुदबुदाए-‘क्या कर रही हो तुम? बच्चों को कैसे जीना सिखा रही हो? मम्मी ने, कड़वी निगाहों से उन्हें देखा-‘ऐसे जीना सिखा रही हूं जैसे जीना चाहिए, जैसे दुनिया जी रही है! तुम जैसे नामरद…।’ चुपचाप खड़ा बड़ा मम्मी की ओर लपका-‘फिर से कहो, फिर से कहो, जरा…।’ पपा उसका हाथ थाम बाहर ले गए।

लड़की बी.ए. कर गई थी। ‘सरिता’ पढ़ती, ‘स्पान’ मंगाती। शाम को बड़े और पपा को छोड़ सब टीवी के चारों और बैठते। वह डेल कार्नेजी की किताबें पढ़ती-पढ़ती कह उठती-‘हाय, ये बात तो मम्मी भी कहती है! ममा इज सो वाई•ा!’ एक दिन बड़ ेने सुन लिया तो गुर्रा पड़ा उस पर ‘योर ममा इज  अ स्पाईडर!’ लड़की को उसकी बात बिल्कुल समझ नहीं आई। ‘ये भी पता नहीं पपा की तरह किस दुनिया में रहता है! कैसी तो वकेबलरी इस्तेमाल करता है! परसों मम्मी के बारे में कह रहा था कि वे हीलियम भरा बैलून हैं!…एम.ए. के बाद यूं ही आवारागर्दी करता घूमता है! मम्मी ने कहा कम्पीटीशन में बैठो तो किस तरह से देखा था मम्मी को-जैसे भस्म कर देगा। मिस्टर सुखीजा तो कह रहे थे डाइयां बनाने की मशीन लगा दो इसके लिए घर में ही, वे गाइड कर देंगे, मार्किट बनवा देंगे।…दिस मि. सुखीजा इ अ सक्सेसफुल मैन! कुछ ही साल में कितना बड़ा बिजनेस फैला लिया है। इन्होंने डेल कार्नेजी पढ़ा है क्या?…कहां पढ़ा होगा? आठवीं के बाद तो पढऩा छोड़ दिया था इन्होंने।’

मम्मी को लड़की के ब्याह की चिंता सताने लगी थी। वे परिचितों-रिश्तेदारों से लड़का बताने के लिए कहतीं। मम्मी और लड़की उनके बताए लड़कों पर नाक-भौंह सिकोड़ लेती। ढीले-ढाले यू.डी.सी., रेलवे में कलर्की करते बुढ़ाए जवान, गवर्नमेंट स्कूलों के आलसी, आत्मसंतुष्ट मास्टर। मम्मी कहतीं-‘ये लोग सोचते हैं हमें इनके जमाइयों-सा लीचड़ ही चाहिए!’ लड़की ने एम.ए. के पहले साल में संतोषी माता के व्रत रखे। दूसरे साल वह धर्म निरपेक्ष हो गई, शुक्रवार को खटाई खाने लगी। पपा और बड़े को लेकर मम्मी का गुस्सा बढऩे लगा-‘कैसे मर्द हैं ये, दुनिया से न्यारे।’ वे हाई ब्लड-प्रेशर का शिकार हो चलीं। लेकिन वे लड़के के लिए भाग-दौड़ करती रहीं, लोगों को कहती रहीं।

ममी जमीन और जमाने को समझने वाली औरत थीं। जानती थीं खाते-पीते घरों के सुंदर, हृष्ट-पुष्ट, कमाऊ पूत यूं ही दुल्हे बनकर नहीं आ जाते। मम्मी पासबुकें देखतीं। घर के आंगन में उन्होंने एक ब्लैक बोर्ड, कुछ खिलौने और चार्ट, छोटे-छोटूे स्टूलों और थर्ड डिवीजन में बीए पास एक टीचर का बंदोबस्त कर ‘क्रीसेन्ट नर्सरी पब्लिक स्कूल’ खोल दिया। मुहल्ले और आसपास के दस-पंद्रह छोटे-छोटे बच्चे आंगन में ‘ए से एपल’ गाने लगे। बड़ी लाटरियां डालनी शुरू कर दी। मिस्टर सुखीजा से पूछताछ कर छोटे-मोटे स्टॉक-शेयर खरीदने लगीं। अब वे अपने लाडले छोटे पर भी बिगड़ने लगी थीं। वह पढऩा-लिखना छोड़ बो डेरेक और ब्र्रूस ली के पोस्टर जमा करता रहता।  बोनी-एम के कैसेट सुनता रहता। बड़ा तो पहले ही कई-कई दिन घर से गायब रहता था। लौटता तो उसकी आंखें दहकती होतीं, कपड़ों और बालों में धूल भरी होतीं। छोटी लड़कियां भी तेजी से जवानी में कदम रख रही थीं।

राम-राम कर एक काम का लड़का नजर आया। लंबा सुंदर, सेल्ज मैनेजर। लउ़की ने फोटो देखते ही उसे पसंद कर लिया। उसके भीतर कई दिन टिनींग-टिनींग होती रही, घोड़े सरपट दौड़ते रहे। मम्मी जोश से भर गई। लड़के वाले देखने आ रहे थे। कई दिन पहले से तैयारियां शुरू हुई। वे ‘अपनी’ कार में आए – लड़के की डॉक्टर बहन, मां, भाभी और लड़का। शक्ल, पहरावा, बातचीत, खानदान – सब मन माफिक! लड़के ने लड़की को देखा फिर दीवार पर लगी पेंटिंग को देखने लगा जो लड़की की एक चित्रकार दोस्त ने बनाई थी और जिस पर लड़की ने मिन्नतें कर अपना नाम लिखवा लिया था। मम्मी ने उस दिन के लिए सुखीजा का नौकर मांग लिया था। वे बैठी-बैठी मेहमानों से ढेरों बातें कहती रहीं। उन्हें हमेशा पता होता था कब और कहां कैसी बातें करनी चाहिए। वे जाने लगे। मम्मी के जवाब मांगने पर बोले कि डाक से बता देंगे। उस दिन मम्मी ने छोटे के पोस्टर फाड़कर फैंक दिए, बड़े और पपा को कोसा और कराहती हुई बिस्तर में पड़ गई।

लड़की की क्लास में कई इश्क चल रहे थे। एक दो ने उसकी तरफ भी लाईन मारी। एक लड़का उसे कुछ जंचा। हालांकि उसका कद सपने के पुरुष से छोटा था पर वह दो-तीन इंच समझौता करने के लिए तैयार थी। लड़की ने जांच-पड़ताल की। वह शौकिया पढ़ रहा था, बाप का हेल्मेट बनाने का कारखाना था, घर में अकेला लड़का था, लड़की को लेकर गंभीर था। एक दिक्कत सामने आई-वह दूसरी जात का था। लड़की ने इस स्तर पर प्रगतिशील हो जाने का फैसला लिया। डेटिंग शुरू हुई। लड़की का सामान्य ज्ञान काफी व्यापक था। उसे मालूम था किस नम्बर की मुलाकात में बात कहां तक पहुंचती है, लेकिन पहली ही बार में उसे भावुक और गाबदू  है कि उसके मां-बाप जात-पात को लेकर बहुत कट्टर किस्म के लोग हैं और लड़की से ब्याह किसी हालत में नहीं होने देंगे कि वह अपने-बाप से बेइंतहा प्यार करता है और सपने में भी उन्हें दुख पहुंचाने की बात नहीं सोच सकता, लेकिन वह लड़की को बहुत चाहता और उसके बगैर जीना उसे नामुमकिन लगता है। विचित्र उलझन भरी स्थिति थी। लड़की ने अपने पास एकत्रित सारे फार्मूलों से ये सवाल हल करके देखा। नहीं हुआ। लड़का उससे आखिर चाहता क्या है? क्या मम्मी से सलाह ली जाए। एम.ए. फाइनल का पूरा साल इसी ऊहा-पोह में गुजर गया। लड़का उसकी ओर मासूम,  हसरत भरी निगाहों से देखता रहता।

मम्मी ने छोटे के लिए डाई बनाने वाली मशीन लगवा दी। पर वह सिर्फ पोस्टर इक_े करता, अंग्रेजी फिल्में देखता, कमरा बंद कर ट्रेबोल्टा की तरह नाचने की कोशिश करता। कुवैत वाले रिश्तेदार को चि_ियां लिखता कि वे उसके लिए वहीं कोई काम ढूंढ दें, वह इंडिया से ‘बोर’ हो गया है और जवाब का इंतजार करता रहता। एक दिन सुखीजा ने मम्मी को बताया कि बड़ा सरकार के खिलाफ काम करता है। ‘गलत गल्ल आ जी! बड़ा ओच्छा काम अ जी! कोई होनहार बंदा कद्दे राज दी खिलाफत नई करदा जी!’ पपा बहुत अजीब हो गए थे। महीन में एकाध दिन भूल जाते कि वे कौन हैं। खुद को कभी कृष्णा बताते, कभी नेहरू! ऊट-पटांग बकते-‘राष्ट्रीय अखंडता…शासक वर्ग का बदलता हुआ चरित्र…नियो-रिच फिलीस्टाईन्स…!’ अगले दिन फिर ठीक हो जाते। मम्मी अब उन्हें डांटती नहीं थी। उनसे नजर बचातीं। लड़की को कई दफा और देखने वाले आए। बात नहीं बनी। कहीं न कहीं गड़बड़ हो जाती। लड़का ठीक होता तो इन्कम कम होती, इन्कम उम्मीद के आसपास होती तो लड़का ‘टॉल एंड हैंडसम’ न होता, कहीं दोनों बातें पूरी होतीं तो लड़के वाले डाक से जवाब देने की बात कहकर चले जाते।…शहर में रोज स्टोव फटने लगे थे। बहुएं जलतीं या जला दी जातीं। मम्मी बड़बड़ाती – ‘हे भगवान! ये क्या हो रहा है?’ लड़की को भी समझ न आता कि क्या हो रहा है। उसे कभी डर लगने लगता। वह मम्मी को कई बार अकेले में रोते पाती। फिर एक दिन पपा एक महीने तक भूले रहे कि वे कौन हैं। सुखीजा की कार में मम्मी उन्हें अस्पताल ले गई। डाक्टरों ने उन्हें सायकेट्रिक वार्ड में दाखिल कर लिया। अगले दिन मम्मी को भी ग्लूकोज चढ़वाना पड़ा।

मम्मी के बनाए रास्तों पर अब सारी भाग-दौड़ लड़की के पैरों को करनी पड़ती। ढेरों हिसाब-किताब, ढेरों जोड़-तोड़! उसने मुफ्त में सुखीजा के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। सुखीजा के एक दोस्त ने ‘आक्सफोर्ड कान्वेंट मॉडल स्कूल’ खोला। लड़की ‘फोर द टाईम बीइंग’ टीचर हो गई। सुबह आठ बजे स्कूल निकलती, दो से आठ ‘विहारों’ में नई रईसों के बिगड़े बच्चों को ट्यूश्नें पढ़ाती। बच्चों की मुटाप ेग्रस्त मम्मियों से बात की बात में घुल-मिल जाती। उनके घरों में आने वाली चीजों के बारे में जानकारियां लेती। घर के स्कूल की देखभाल, लॉटरियां, स्टाक-शेयर, सामाजिकता के तकाजे – सब लड़की के जिम्मे! वह बेतरह थक जाती।…लेकिन दिन की तमाम व्यस्तताओं और थकान के बावजूद बीच-बीच में टिनींग-टिनींग का संगीत बजता, घोड़ों के अयाल उड़ते! पर रात को जब उसके पास कोई व्यस्तता न बचती, वह अपनी उम्र के साल गिनती तो एक बेचैनी से भरने लगती। उसे अपना-आप बहुत अकेला लगता। घर ही के लोगों के चेहरे सवाल बनकर उसे घेरने लगते-मम्मी, पपा, बड़ा, छोटा, वह खुद! संगीत और घोड़ों की टापें मद्धम पड़तीं, दूर और दूर होती जातीं और अन्त में न जाने कहां खो जातीं। वह एक अंधेरे कुएं में डूबती जाती। कुएं में स्टोव फटने के धमाके और जलती औरतों की चीखें गूंजती। वह पसीने में नहा जाती।

उसे नींद के बुरे-बुरे सपने आते-पागल, जंगली हाथियोंं का चिंघाड़ता हुआ एक झुण्ड उसकी कोठी के फूलों और पौधों को अपने भारी-भरकम पैरों से कुचल रहा है…वे दरवाजे तोड़ कर ड्राइंगरूम, किचन, बैडरूम में घुस आए हैं…उत्पात मचा रहे हैं…एक हाथी ने पुरुष को अपनी सूंड में उठा दीवार पर दे मारा है…प्लास्टर ऑव पेरिस के बुत की तरह पुरुष खील-खील हो गया है…टूटे हुए टीवी, वीडियो, स्टीरियो पर्शियन कालीन पर बिखरे पड़े हैं…हाथी मारुति से फुटबाल खेल रहे हैं…बड़ा हंस रहा है।

स      ुबह की रोशनी और परिचित चीजें, चेहरे, आवाजें उसे आश्वस्त करते। जाने-माने रास्ते फिर फैलने लगते-फैलते जाते, फैलते जाते! वह दौड़ने लगती। हाथियों की चिंघाड़ें और बड़े की हंसी व्यस्तता में खो जाती। सारी व्यवस्थताओं के बावजूद कभी-कभी टिनींग, टिनींग का संगीत लौट आता, घोड़ों की टापें सुनाई देने लगतीं…

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज-43 से 47

 

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