संस्मरण

ललित कार्तिकेय का जन्म हरियाणा के सारन में हुआ। उन्होंने ‘हिलियम’, ‘तलछट का कोरस’, कहानी संग्रह, ‘सामने का समय’, आलोचना तथा देरिदा की ‘स्पेक्टर्स ऑफ माक्र्स’, सलमान रशदी के उपन्यास ‘शरम’ तथा शिव के. कुमार के उपन्यास ‘तीन किनारों वाली नदी’ का अनुवाद किया। वे हरियाणा प्रगतिशील लेखक संघ के सचिव रहे। ‘अथ’ पत्रिका का संपादन किया। सं.


ललित कार्तिकेय इस दुनिया से कूच कर गया है। इतनी खामोश मौत कि हिन्दी अदब को पता ही न चला। पता चला तो रुक रुक कर। सहमी-सहमी आवाजों और सरगोशियों के साथ, ललित के कदीमी दोस्त, एक-दूसरे से फोन पर पूछते रहे, ‘ललित?….ललित का कुछ पता चला?’ क्या सचमुच ललित अब नहीं रहा?’

                हिन्दी के दानिश्वर अदीबों के सवालों में सनसनी ज्यादा रहा करती है…जितनी सनसनी सवालों में, उतनी जवाबों में।

                लेकिन ललित के बारे में जिस किसी रचनाकार/सम्पादक ने सवाल किया या जवाब दिया-सनसनी किसी के लहजे में नहीं थी।…अगर था तो अपराधबोध था कि हिन्दी अदब के एक बेहद प्रतिभाशाली और जीनियस नौजवान को शिकस्ताहाल छोड़ दिया गया। किसी ने सुध न ली।

ललित अब इस  दुनिया में नहीं है। लेकिन एक अदद पश्चाताप की गठरी, उसके तमाम दोस्तों के पास है-जिसे न वो कहीं रख सकते हैं न छुपा सकते हैं।…क्या यह सच नहीं कि खामोश मौत मरने वाला ललित, हम सबके भीतर, एक विस्फोट छोड़ गया है।

विस्फोट पैदा करने की उसकी आदत थी। नहीं, आदत नहीं। शऊर था। उनींदा पड़े अदब में, अल्फाज के आफताब पैदा करना उसका लहजा था।

हिन्दी साहित्य में जब वो आया तो सरगर्मिए-हयात उसके साथ थी। उसकी ऊर्जा, उसकी चपलता, उसकी बेचैनी, उसके नए जाविए और उन्हें परखने की जिद सब देखने के काबिल था।

                उसकी आबोताब, उसका ताप और उसकी आक्रामकता जितनी दिलचस्प थी, उतना हौल भी पैदा करती थी। मैं अक्सर उसे गालिब का मिसरा सुनाता-उसकी शख्सियत को नजर करते हुए -‘जो आंख ही से न टपका, तो  वो लहू क्या है?’ वो मुस्करा पड़ता। उसकी आंखें ज्यादा मुस्करातीं। उसकी आंखों में शैतान किस्म की मुस्कान तैरती रहती थी। मंजर दूसरा भी हो सकता था-अजीब किस्म का आक्रोश, छटपटाहट और बेकरारी भी उसके चेहरे पर नुमायां हो जाती थी, लेकिन उसके सांवले, सख्त और दडिय़ल चेहरे का सामना कर पाना सबके बस की बात नहीं थी। आपने उसे देखा और उसने आपकी खिल्ली उड़ाई! आप भौंचक! वो सहज! आप नाराज! वो इत्मीनान में। वो इतनी सुविधा किसी को नहीं देता था कि कोई उस पर हावी हो। इतनी इजाजत भी वो किसी को नहीं देता था कि कोई उसका अंतरंग हो। ऐसा नहीं कि वो ठस्स और बेहिस किस्म का इंसान था। उसमें रगबत थी। वो रिश्ते बनाना जानता था। और रिश्ते तोड़ना भी जानता था। उसकी पसंद और नापसंद, एक ऐसा बीहड़ थी, जिसमें घुसना मुश्किल था और ललित के उस बीहड़ को समझना और भी मुश्किल! हिन्दी साहित्य में एक अकेला ललित था…बाकमाल! जो अपने अंदर कई सारी शख्शियतें लिए फिरता था।

हिन्दी साहित्य में ललित किसी जुनून की तरह प्रविष्ट हुआ…और जाती दफा दश्त की अजहद खामोशियां बिछाकर चला गया।

आठवें-नौवें दशक में, हिन्दी साहित्य को नए सिरे से महसूस करने, अपनी जिद्द, अपनी अवधारणाओं से हलचल-सी पैदा करने वाला ललित, बाद वक्तों में इतना खामोश और इतना अकेला और इतना गुमनाम हो जाएगा किसी ने सोचा तक न था। खुद, उसे भी पता नहीं था कि अपने शऊर और अपनी प्रतिभा के जरिए, हिन्दी अदब में खलबली मचाने वाला, अदब की दुनिया से खुद को बेदखल कर देगा…इतना बेदखल कि हिन्दी साहित्य से उसे चिढ़ होने लगेगी। हिन्दी के साहित्यकार उसे खोखले, कमजोर और जाहिल नजर आने लगेंगे।

ललित बेहद जटिल चरित्र था। उसे दूसरे तो क्या समझते, वो अपने-आपको समझने में भी असमर्थ रहा। कहा करता था – शरण मेरी हिन्दी साहित्य में ही है। लेकिन अपने इस अहसास को भी एक जुमले में बदलता रहा। और अदब की दुनिया से खुद को दूर करता गया।

विस्मृति के इस भयानक समय में भी लोग ललित को भूले नहीं थे। वो हम सब में इतना विरल, इतना विकट, इतना मौलिक, इतना संशलिष्ट और इतना बेबाक था कि उसे भूल पाना आसान भी कहां था? यार दोस्त मिलते तो पूछते – ललित कहां है? यह सवाल ही इस बात का सबूत था कि ललित हर अदबशनास के दिल में, कहीं-न-कहीं अपनी जगह बनाए हुए था।

जगह अब भी होगी…उसकी स्मृति की हल्की सी गूंज…उसके न होने की पीड़ा के साथ, अब भी होगी उन तमाम रचनाकार दोस्तों के दिल में…जिनसे वो शराब के गिलास टकराता…जिनसे लड़ भी पड़ता।

पहली बार हम सोनीपत में मिले। ‘अथ’ पत्रिका की गोष्ठी में। ललित वहां पढ़ाई पूरी कर चुका था या शायद उसकी पढ़ाई का आखरी साल था। यह बात 1982-1983 की है। अपने कालेज के दौरान वो अपनी तेज तर्रार छवि के लिए जाना जाता था। उसके इशारों पर स्टूडेंटस स्ट्राइक कर सकते थे और उसके इशारों पर अपने क्लास रूम में लौट भी सकते थे। स्टूडेंटस यूनियन का वो सरकरदा था। उसकी विश्वसनीयता थी और वो अपने अल्फाज की ताकत जानता था। अल्फाज की फिजूलखर्ची से वो चिढ़ता था और बाद में भी उसका सारा लेखन किफायतशार लेखक का रहा।

‘अथ’ पत्रिका के बेशक छह-सात अंक निकले, लेकिन बतौर सम्पादक, रचनाकार और अनुवादक उसने अपनी खासी शिनाख्त करा दी थी। तरक्कीपसंद लेखक में जो गुण (और अवगुण) होते हैं वो सब उसमें मौजूद थे। उसमें तीखापन था। समझ थी। उसमें जिज्ञासाएं थी। स्टूडेंटस यूनियन वाली आक्रामकता और अपनी बात से सबको कायल करने की तौफीक भी थी।

तब मेरा दफ्तर गोल मार्किट के पास जैन भवन में था। कभी-कभी ललित वहां आ जाता। कभी अकेले, कभी ज्योति के साथ। महानगरीय छलकपट और बनावट से बहुत दूर! ललित, तब जोशो-खरोश और लेखकीय ताप के साथ उपस्थित होता। वो बीड़ी के सुट्टे मारता। हमारी बातचीत बेहद खुशगवार माहौल में होती। हम बहस भी करते। लेकिन बहस का आखिरी सिरा उसके हाथ में होता। वो अपने लेख दिखाता। ज्योति अंग्रेजी से अनुवाद करती। वो दोनों युवा रचनाकार, हिन्दी साहित्य में दाखिल हो रहे थे। उन दिनों ललित का पुराना और अभिन्न दोस्त अरविन्द जैन भी था। बाद में अरविन्द जैन सुप्रीम कोर्ट का वकील बना और ललित ने वल्लभगढ़ के अग्रवाल कालेज में प्राध्यापक के रूप में ज्वाइन किया।…ज्योति से उसने विवाह किया। सीधा-सादा विवाह और सीधा-सादा जीवन शिल्प!…बहसें। लिखना और अच्छा सोचना।

ललित और ज्योति वैवाहिक जीवन के बाद भी मेरे दफ्तर आते रहे। वो दोनों शानदार लगते। बिल्कुल साधारण कपड़ों में वो दोनों। असाधारण वैचारिक ऊर्जा से लबरेज। ललित बेबाक। ज्योति संकोची और कम बोलने वाली। तब हम सिर्फ चाय पीते। ललित चाय के साथ बीड़ी भी पीता।

इसके बाद। मेरी ट्रांसफर आसफ अली रोड के दफ्तर में हो गई। ललित से मिलना कम हो गया। इस बीच उसने अपनी उपस्थिति ‘हंस’ में बनाई। तब ‘हंस’ की अपनी साख थी और पत्रिका के संपादक राजेंद्र यादव का अपना जलवा था। लेखक, ‘हंस’ के दफ्तर में बा-अदब दाखिल होते। ललित कार्तिकेय अपनी धमक, अपनी धज और अपने बेलिहाज लहजे के साथ प्रविष्ठ होता। राजेंद्र यादव, ललित से बेहद मुत्असिर हुए। हंस। आबनुसीरंगत की बड़ी-सी मेज के आमने-सामने दो अदीब! एक बूढ़ा संपादक। एक नौजवान कथाकार। दो प्रतिभाएं। एक के पास अनुभवों का जखीरा। दूसरे के पास ��ुछ कर गुजरने का वलवला। अदब में छा जाने की महत्वाकांक्षा!..और ललित!…अपनी रचनात्मकता को गर्वीली स्वीकृति दिलाने वाला मुसन्निफ!…लेखक!

अदब की आंधियों की हैसियत दूसरी तरह की होती है। वो अल्फाज के चरागों को रोशनी करती हैं और ललित उस आंधी की ही तरह था। 1987-88 के बाद का दौर था – ‘हीलियम’, ‘हौवा’, ‘एक कलावादी की फुसफुसी ट्रेजडी’ जैसी कहानियों ने नई बहस पैदा की। लेकिन सबसे ज्यादा हैरान किया ललित की ‘तलछट का कोरस’ कहानी ने। अगर हिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों के उसलूब (शिल्प) पर कभी चर्चा हुई तो यकीनन ललित की ‘तलछट का कोरस’ उसमें शामिल होगी। जिस फक्कड़ और बिन्दासपन के साथ पुराने मूल्यों के परखच्चे उड़ाती कहानी ललित ने लिखी है, कहानी को नए अनुभवों से जिन्दगी की ताजगी बख्शी है, वो एक मिसाल है। ललित की सभी शानदार कहानियां ‘हंस’ में प्रकाशित हुई और फिर वो आधार प्रकाशन से 1994 में ‘तलछट का कोरस’ नाम से पुस्तक रूप में छपकर आई।

इसे विडम्बना कहें या अफसोस, ललित वैसी कहानियां फिर कभी न लिख सका। अगर रचनाकार अपना श्रेष्ठ सबसे पहले लिख देता है, तो फिर यह दिक्कत पेश आती है। ‘तलछट का कोरस’ ललित के लिए हमेशा चुनौती की तरह रहा। लेकिन लेखकीय समझदारी उसमें खूब थी। वो आलोचना की तरफ चला गया और सांस्कृतिक/वैचारिक लेख भी लिखने लगा।

लेखकीय समझ उसमें बेशक बहुत-खूब थी, जिन्दगी जीने की समझ उतनी ही कम। न दुनियादारी न व्यवहारिकता! इसी के चलते उसका डोरोथी (जिसे वो ज्योति  कहता था और अपना कहानी संग्रह भी उसने डोरोथी को समर्पित किया था।) मनमुटाव और संबंधों में बिखराव इस हद तक कि दोनों अलग हो गए।

कुरुक्षेत्र में इसी दौरान कहानी पर गोष्ठी थी। मैं वहां था। शाम के वक्त किसी कथाकार ने फब्ती-सी कसते हुए मुझसे पूछा था-‘और भई, ललित का अपनी पत्नी से झगड़ा चल रहा है क्या?’ कथाकार का यह मखौल मुझे नागवार गुजरा। संबंधों में तकरार हो तो हम  तनाव में रहते हैं और इस तनाव का हमारे कथाकार दोस्त मजाक उड़ाएं, मैंने बड़ी तल्खी से जवाब दिया, ‘हम यहां किसी दोस्त के वैवाहिक जीवन को बेपर्दा करने नहीं आए। आप अपनी कमजोर कहानियों तक महदूद रहें तो बेहतर है।’

ये बात मैंने ललित को नहीं बताई थी। लेकिन ललित तक पहुंच गई थी। वो मेरे दफ्तर आया। उसने कहा, ‘ज्ञान, मैं तुझ पर भरोसा करता हूं।’

भरोसा शब्द मामूली शब्द नहीं। इस लफ्ज का हम दोनों ने खैरमकदम किया और हमने पी। वो बहुत अरसे बाद मिला था। इस बीच मेरा दफ्तर जनपथ ट्रांसफर हो चुका था। ललित के लिए यहां पहुंचना आसान था। इन दिनों वो तनाव में था। मेरे पास आना उसे अच्छा लगता था। शायद इसलिए भी कि मैं उसे  कुरेदता नहीं था। वो कहता भी था कि मेरे पास आकर उसे राहत मिलती है। उन दिनों वो ‘हंस’ के दफ्तर जाया करता था। अरविन्द से भी अक्सर मिलता। वो समीक्षाएं लिखने लगा था और समीक्षा केवल समीक्षा नहीं होती थी। वहां एक युवा, प्रखर, पैनी दृष्टिवाला, प्रतिभाशाली आलोचक मौजूद था। ये अलग बात है कि जितना दुरूह उसका अपना व्यक्तित्व था उतनी जटिल उसकी आलोचना!

उसके साहित्यिक कामों के पसमंजर हमेशा चैलेंज पिन्हा होते थे। समीक्षा/आलोचना के वक्त उसने आजमूदा, भोथेरे टूल्ज बदलकर रख दिए। आलोचना बेशक दुरूह होती, लेकिन होती ताजादम!…’हंस’, ‘कथादेश’ और ‘जनसत्ता’ के लिए वो निरंतर लिखता रहा। वो जितना मसरूफ होता, उतना सुकूनयाफ्ता! हर मुश्किल किताब उसे आह्लादित करती। वो चहक उठता। अपनी लिखी हुई चीजें दिखाता। जब खुश होता या मेरी खुश्की उड़ाने के मूड में होता तो मुझे ‘ज्ञान बाबू’ कहता। मैं हंसता। तो वो संजीदा। उसका पार पाना मुश्किल था। कभी वो खूब सारा हंसता। उसकी आंखें थोड़ी मिच जातीं। वो अपने घने काले (और कुछ सफेद) बालोंं में उंगलियां घुमाता। सिर झटकता। ये  उसकी अदाएं थीं-एक नौजवान मुसन्निफ (लेखक) की अदाएं। जो जितना जटिल था उतना मासूम!

कई बार आकर बैठता। कहता, ‘चल उठ, मुझे कमीजें लेनी हैं। मुझे पता नहीं चलता।’

दुनियावी मामलों में वो इतना मासूम था कि जुराबें तक उससे नहीं खरीदी जाती थीं। तब हम दोनों कनाट प्लेस में घूमते। ‘जानकीदास’ से जुराबें खरीदते। एक क्वार्टर वोदका और बिसलरी का पानी! मैं उसका थोड़ा-सा साथ निभाता। मुझे दफ्तर में बैठना होता। हमारी इस मामले में अच्छी अंडरस्टेेंडिंग थी। कभी-कभी यह अंडरस्टेेंडिंग बिगड़ भी जाती।

हिन्दी साहित्य से रफ्ता-रफ्ता दूर हो जाने वाला ललित जब साहित्य में था तो हिन्दी साहित्य उसके भीतर खून की तरह दौड़ता था। देरिदा और ऐजाज अहमद के लेखों के अनुवाद करते समय उसके पसीने छूट गए। बहुत दिन भी खर्च हुए। लेकिन वो था बहुत प्रफुल्लित! उन दिनों कुरियर सेवाएं कम थीं और देरिदा का अनुवाद उसे ज्ञानरंजन को ‘पहल’ के लिए भेजना था। हमने अंतरिक्ष भवन के बेसमेंट में कुरियर दफ्तर ढूंढा और वो डिस्पैच रवाना किया।

ललित का व्यक्तित्व बेहद जटिल था। एक बीहड़ था उसमें तो एक बंजर भी था। एक उजाड़ भी था। उस उजाड़ को वो कभी जाहिर नहीं होने देता था। अपनी आक्रामकता से अपने दुख, तनाव, कष्ट और अकेलेपन को छुपा लेता था।

एक दिन वो सुबह मेरे दफ्तर आ गया। साढ़े दस या ग्यारह बजे। वो सर्दियों के दिन थे। बहुत साल हो चुके हैं इस बात को। कुर्सी पर बैठते ही उसने कहा, ‘ज्ञान, मुझे  रोना है।’

मैं उसकी बात से भौंचक रह गया।

हमारा दफ्तर तीसरी मंजिल पर था और छत की चाबी कुछेक लोगों को मिल सकती थी। मैं भी उनमें से था। मैंने नीचे जाकर चाबी ली। ललित को दफ्तर की छत पर ले आया। वो देर तक आंसू बहाता रहा। मैं देखता रहा। वो बहुत रो चुका, तो मैं उसके लिए पानी और चाय ले आया।

ललित का यह रूप भी था-आक्रामक छवि के विपरीत, बेहद भावुक!

फिर कुछ साल वो मिला ही नहीं। न फोन न मिला। इस बीच उसका छपना-छपाना भी कम ही रहा।

फिर अचानक एक दिन वो दफ्तर आया। उसने चौंकाया, ‘ज्ञान, मैंने शादी कर ली है।’

मैं खुश हुआ। हाथ मिलाया। बधाई दी।

उसने अपनी पत्नी का नाम बताया-इंदिराजी। हमने ‘वोल्गा’ में बीयर पी।

ललित के ये खूबसूरत दिन थे। वो खुश होता। खूब लिखता। लिख चुकने के बाद, वोल्गा में बीयर! वोल्गा, कनाट प्लेस का ऐसा बार-रेस्तरां था, जहां के वेटर बहुत पुराने थे। रेस्तरां कदीमी और अधेड़ वेटर! वो बाअदब, झुककर बीयर को गिलास में भरते। बड़ी शाइस्तगी से बात करते। आर्डर लेते। वोल्गा दोपहर को भरा रहता। कैरीवैली का सेक्सोफोन (सीडी का संगीत) वातावरण को पुरलत्फ बनाता।

अब वोल्गा बंद हो चुका है।

अब ललित भी इस संसार में नहीं रहा।

इंदिरा जी से विवाह के बाद ललित गोल मार्किट के पास इंदिरा जी के फ्लैट में रहने लगा था।

इस बीच उसकी वैचारिक लेखों की एक किताब आई ‘सामने का समय’। किताब के लेख पढ़े तो ललित अपने समय से किस तरह वैचारिक मुठभेड़ करता है, उसका बोध, उसका अहसास इस किताब से होता है। किताब की पांडुलिपि तैयार करने में उसने अपनी ‘जीवन संगिनी इंदिरा’ का आभार व्यक्त किया है। ‘कथादेश’ के सम्पादक हरिनारायण के प्रति कृतज्ञता जाहिर की है। यह थोड़ा चौंकाती भी है। इसलिए कि वो किसी के प्रति कृतज्ञ होता ही नहीं था। ललित की फितरत में हासिल करना तो था, ‘देना’ नहीं था।

                अपने-आपको ��िखने की दुनिया से बाहर कर देने वाला ललित, अपने एक लेख में, उन लोगों का मखौल उड़ाता प्रतीत होता है जो कहा करते हैं – लिखने से क्या हो जाएगा?…फिर वो (ललित) प्रबल भावना के साथ यह भी कहता है ‘जैसे महसूस करना, सोचना, कहना, मनुष्यता की निशानी है, वैसी ही सुंदरता की रचना करना भी मनुष्यता की जरूरी पहचान है। लिखने में ये दोनों ही बातें शामिल हैं। लिखने से कुछ होगा या नहीं, यह फालतू का सवाल है।

लिखने की जस्रत पर बल देने वाला ललित, धीरे-धीरे खुद उसी सवाल के जंजाल में फंसता चला गया कि लिखने से क्या होगा?

फिर भी वो लिखता रहा-कभी मन से, कभी उक्ताए हुए लहजे में।

2003 के बाद वो एन.जी.आ.े के लिए अनुवाद करने लगा। उसका नजरिया, सोच, उसका शऊर तक बदलने लगा। वो अपने कालेज से वापिस आता। छोटा-सा कमरा। किताबों कागजों से अटा, मेज भी भरी-भरी। उस पर कम्प्यूटर। स्टैंड पर कागज या वो किताब, जिसका उसने अनुवाद करना होता। कभी वो चाय पीने के बाद काम शुरू कर देगा तो कभी पैग तैयार करता।

मैं बहुत बार उसके घर में आता। हिन्दी का तरक्कीपसंद, जहीन-तरीन, कथाकार, आलोचक और कवि! एन.जी.आ.े के अनुवाद में व्यस्त होता और मग्न भी!…मैं उसे देखकर मलाल में होता, लेकिन वो खुश नजर आता!

मैं उसे देखता रहता और वो दिन याद करता जब वो सलमान रशदी के उपन्यास ‘शेम’ का अनुवाद कर रहा था। उस अनुवाद के पीछे क्या लगन और क्या जज्बा था। तब वो आधे-एक घंटे में दो-तीन बार फोन करता। वो उर्दू के लफ्ज पूछता। अंग्रेजी का तजुर्मा करते हुए ललित पाठकों को (और खुद को) यह अहसास दिलाना चाहता था कि रश्दी अगर उर्दू में लिखते, तो ‘ऐसे ही’ लिखते। वो फोन पर पैरा पढ़ता। रवानी देखता। शब्दों के अर्थ पूछता। बेशक, उसके पास हिन्दी-उर्दू की डिक्शनरी भी थी, लेकिन वो शब्दों के अर्थ मुझ से पूछता रहता। आश्वस्त होता। दफ्तर आता तो पेज-दर-पेज पढ़कर सुनाता।

पाठक अगर ललित कार्तिकेय के अनुवाद किए गए उपन्यास ‘शरम’ (प्रकाशक वाणी प्रकाशन) पढ़ें तो यकीनन, ललित की नई भाषा शैली और उसके मिजाज से तअरूफ होगा। कलिष्ठ हिन्दी लिखनेवाला ललित, ऐसी उर्दू जबान भी अनुवाद में ‘क्रिएट’ कर सकता था।

ललित ने 1995 से 2001 तक अपनी दो पांडुलिपियां भी तैयार कीं-कविता संग्रह और आलोचना! पांडुलिपियां उसने एक प्रकाशक को भेजी थीं। बाद में पता नहीं उनका क्या हुआ?

2003 में मेरी ट्रांसफर गुडग़ांव हो गई। ललित से मिलना कम हो गया। कभी-कभार हम मिलते, तो वह कह भी देता-ज्ञान, तेरी ट्रांसफर ने मेरा एक ठिकाना (86-जनपथ) छीन लिया।

धीरे-धीरे वो पूरी तरह एन.जी.ओ. को समर्पित हो गया। वहां पैसा था, यश बिल्कुल नहीं था। हिन्दी में यश था (या नहीं था) पैसा तो बहुत कम था। ललित में पैसा कमाने का हिर्स पैदा हो गया था। उसकी छोटी-सी बिटिया भी थी। कहता था कि इसे बहुत अच्छे स्कूल में पढ़ाऊंगा। बहुत अच्छा स्कूल, बहुत अच्छी फीस!

मुझे याद है जब हम शिवाजी स्टेडियम के बस टर्मिनल की पटरियों पर बैठकर, फक्कड़ अंदाज में पी रहे होते, तब हम पैसा कमाने वाले लोगों का खूब मजाक उड़ाते। वो हमें चलती फिरती मशीनें लगते या फिर टकसाल!

ललित खुद उसी रास्ते पर चल निकला था। कम्प्यूटर के सामने बैठकर तर्जुमा करता। ललित खुद भी किसी कम्प्यूटर जैसा प्रतीत होता।

रिश्तों को लंबे समय तक निभाना शायद उसकी फितरत में नहीं था। यही वजह थी कि इंदिरा जी से भी उसका रिश्ता सौहार्द्रपूर्ण नहीं रहा था, वो तल्खी और कशमकश में बदल गया था। इंदिरा जी उसके पीने पर रोक लगाना चाहती थीं। लेकिन ललित को यह बर्दाश्त नहीं था।

ललित जब होता, जहां हांता, सौ फीसदी होता। जब आलोचना करता, तो  वो भी सौ फीसदी-पक्षपात रहित! खेमे, बिरदारी और समझौतों पर टिकी हिन्दी आलोचना को उसने चेहरा दिखा दिया था। उसने अदबशनासों को अहसास करा दिया कि उनके कदीमी नजरिए और बूढ़ी जबान थक चुकी है। उसने नया उसलूब पैदा किया और तनकीद को भी नयापन दिया।

ललित ने इंटरव्यू भी लिए-पांच या छह! लेकिन वो इंटरव्यू भी ‘बड़ी रचनाएं’ बन गए। मंगलेश डबराल का इंटरव्यू करते हुए वो बेहद खुश नजर आया।

ललित जब लेखक था तो एक मुकम्मल लेखक! और जब अनुवाद करने लगा तो वो पूरा अनुवादक हो गया। हिन्दी साहित्य से विरक्ति और हिन्दी लेखकों पर फब्ती। नतीजा? हिन्दी के साहित्यकार उससे किनारा करते चलते गए। वजह माकूल थी। ड्रिंक्स का आरंभ खुशगवार माहौल में होता और तल्खी में। ललित की तल्खी और आक्रामकता को पहले प्राय: सब लेखक झेल पाते। सहन कर लेते। बाद में संबंध कशीदा होते गए। दोस्त कम मिलते या न भी मिलते। ललित ने पहले अपना एकांत चुना और बाद में वो एकांत अकेलेपन में बदलता गया। उसके अहंकार ने भी उसे अकेलापन ही दिया और दोस्त छीन लिए।

‘सामने का समय’ किताब के एक लेख में वो लिखता है-‘मुझे निजी तौर पर किताबों के साथ रहने और लिखने  के सिवा कोई रास्ता नहीं मिलता। लेकिन उसकी अपर्याप्तता समझ आती है। लगता है, आसपास कुछ संगी साथियों का होना जरूरी है जो आपकी सृजनात्मकता को नैरन्तर्य देते रह सकें, जिनकी मौजूदगी आपको एक विचारोत्तेजना देती रहे। आपको आपकी बौद्धिक और भावनात्मक कैदों  से मुक्ति दिलाती रहे।’

अफसोस इस बात का है कि बौद्धिक कैद से वो पहले मुक्त न हो सका और भावनात्मक कैद…उसका पैदा किया गया अकेलापन…उससे भी वो कभी रिहा न हो पाया।

हिन्दी साहित्य जैसा भी है (ललित के मुताबिक भांैथरा) वो रचनाकारों को अकेला तो नहीं होने देता। वो रचनाकारों में तपिश पैदा किए रखता है। वो दोस्त छीनता है तो दोस्ता देता भी है।…नशिस्तों में अदीब, सुनने सुनाने कम आते हैं। असल मकसद  दोस्तों से मिलने-मिलाने का भी होता है। रचनाकारों के अंदर का अकेलापन, ऐसे माहौल और बज्म में खींच लाता है।

ललित इस बात को बेशक जानता था, लेकिन उसकी बौद्धिकता (जो बाद में महानता का प्रपंच बनके रह गई) उसे रोक लेती थी।…हिन्दी साहित्य का बरक्स, उसने अपना एक प्रति संसार रच लिया था।

मैंने एक दिन उसे वापिस हिन्दी साहित्य में लौट आने के लिए कहा तो वो बड़ी तल्खी से बोला, ‘क्यों लिखूं?’ किसके लिए लिखूं?’

मैंने फिर कहा, ‘ललित, वहां…हिन्दी साहित्य में जीवन है। ‘इस अनुवाद में यांत्रिकता है।’

‘दिमाग खराब मत कर। तू जा।’ उसने कहा।

मैं कुछ देर उसके कमरे में बैठा रहा चुपचाप। फिर उठकर चला आया। वो कुर्सी पर बैठा पीता रहा।

उसके मन की कशमकश का पता इस बात से भी चलता था कि ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ अखबार मेज के कोने में, मेज के पाये के पास बिखरे पड़े थे। वो रबड़ बैंड में लिपटे थे। उन्हे खोला तक नहीं गया था।

ललित के भीतर पल रहे उजाड़ पर गौर करें, तो हौल-सा उठता है। उसका आत्मनिर्वासन कितने सारे सवाल पैदा करता है? क्यों चुना उसने यह निर्वासन? कौन चुनता है ऐसी दश्ते-तन्हाई, जहां अपनी आवाज भी पलटकर न आए और आए तो वो सिसकती हुई-सी महसूस हो।

ललित अब इस दुनिया में नहीं रहा। उसकी मौत भी सवाल पैदा करती है – क्या वो अकेला मरा है? नहीं जनाब! वो हम सब की जिंदगी के छोटे-छोटे टुकड़े भी साथ लेकर मरा है।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज-39 से 42

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