आलेख

महान लेखक प्रेमचंद के साहित्य से हर कोई परिचित है। उनके साहित्य में तत्कालीन सामाजिकशक्तियों की टकराहट-संघर्ष-आंदोलन स्पष्टत: मौजूद हैं। विकास नारायण राय का प्रस्तुत विशेष आलेख प्रेमचंद की विचारधारा को उनकी कहानियों के भीतर से समझने का उपक्रम है।

 

नमक का दरोगा यानी प्रेमचंद बकलम खुद

                मैने संक्षेप में ग्यारह वर्षीय उन्नयन को ‘नमक के दरोगा’ युवा वंशीधर की कहानी सुनाई कि कैसे लाख प्रलोभन के बावजूद उन्होंने नमक की तस्करी में लिप्त जाने-माने रईस व्यापारी-जमींदार अलोपीदीन की गाडिय़ों को जब्त कर उसे गिरफ्तार किया और कैसे पैसे/रसूख के दम पर अलोपीदीन तो तुरंत बाइज्जत बरी हो गये पर वंशीधर को नौकरी से मुअत्तली मिली। यही नहीं, वंशीधर की ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित अलोपीदीन ने उन्हें अपनी तमाम एस्टेट का मैनेजर बनाने का फरमान उनके घर जाकर दिया और अंत में दोनों गले भी लगे। उन्नयन की सशंय भरी टिप्पणी थी— क्या अलोपीदीन ने तस्करी छोड़़ दी?

                प्रेमचंद अपनी लेखनी को लेकर बेहद स्पष्ट होना चाहते तो उन्नयन के इस सवाल का जवाब भी कहानी में एक या दो पंक्तियों में आ गया होता। तब भी कहानी में ध्वनि यही है कि अलोपीदीन ने बेशक बेमुरौवत दरोगा से समझौता किया पर तस्करी के अपने धन्धे से समझौता नहीं किया, और न ही वंशीधर ने उनकी मैनेजरी स्वीकारते हुए ऐसी कोई पूर्व-शर्त ही रखी। इसी ध्वनि ने उन्नयन को निराश किया होगा। एक कहानी जिसे कहानीकार ने अपनी ओर से श्रद्धा, उमंग और मैत्री के नोट पर समाप्त किया हो, उसे अपने ग्यारह वर्षीय पाठक को निराश नहीं छोड़ना चाहिए। जब मैंने प्रेमचंद की कहानियों का एक वृहद संकलन पूरा किया तो ऐन प्रेस में जाने के समय ‘नमक का दरोगा’ को हटा लिया। मुझे लगा इस कहानी को संकलन में डालना अपने नायक प्रेमचंद के साथ साहित्यिक अन्याय करने जैसा न हो जाय।

                तब भी काफी दिनों तक कुछ न कुछ द्वंद्व रहा। कहीं कहानी के शीर्षक में ही तो कुछ छिपा नहीं है— विद्रूप या व्यंग्य, अंग्रेजी राज की छद्म नैतिकता और उसके प्रति भारतीय मानस की गुलाम वफादारी को लेकर? पर कहानी शुरूआत से बताने लगती है कि मामला ऐन नमक की तस्करी से न कुछ ज्यादा है न कम, और कहानी का घटनाक्रम निहायत साधन सम्पन्न  तस्कर की मुहिम और व्यक्तिगत ईमानदारी पर डटे दरोगा के तनाव के गिर्द चला है। प्रेमचंद के यशस्वी पुत्र अमृतराय जरा भी शक या शुबहे का शिकार नहीं हैं— ‘घूसखोरी हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी का आज जैसे एक हिस्सा हो गई है, वैसे तो शायद पहले कभी नहीं थी, और यहां-वहां कुछ गिने-चुने लोग उसके इन्द्रजाल से बचकर निकलते भी दिखाई पड़़ते हैं, जिससे मन में एक फुरहरी सी होती है, नयी आशा का संचार होता है। फिर ‘नमक का दरोगा’, जैसी कहानी की प्रांसगिकता में क्या संदेह है।’

                वैसे प्रेमचंद के लिए इसी कहानी में उन्नयन की निराशा की काट देना भी क्या मुश्किल था। कहानी के क्लाइमेक्स में, सम्मानित तस्कर अलोपीदीन मुअत्तल दरोगा वंशीधर से, स्वयं के ब्राह्मïणत्व और वंशीधर की अडिग ईमानदारी की दुहाई देने की कवायद में, तस्करी त्यागने का ऐलान भी शामिल कर सकता था। यह प्रेमचंद के अपने नायक गांधी के ‘हृदय परिवर्तन’ के समीप भी होता, बेशक कहानी कुछ और सपाट हो जाती जैसे उनकी एक और हृदय-परिवर्तित दरोगा की कहानी ‘जुलूस’ भी कुछ हद तक हो जाती है। कहानी ‘नमक का दरोगा’ 1919-20 में लिखी गयी और गांधी का भीषण ‘असहयोग आन्दोलन’ 1921 में आ रहा था। 1921 में ही प्रेमचंद ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा भी दिया।

                1930 में, जब प्रेमचंद गांधी के पूरे प्रभाव में रहे होंगे, उन्होंने बनारसीदास चतुर्वेदी को दिये साक्षात्कार में ‘नमक का दरोगा’को अपनी तब तक लिखी दो सौ से ऊपर कहानियों में तीसरे स्थान पर रखा। इसी साक्षात्कार में आगे उन्होंने कहा— ‘इस समय तो सबसे बड़़ी आकांक्षा यही है कि इस स्वराज-संग्राम में विजयी हों। ये वही प्रेमचंद हैं जिनकी नवंबर 1928 में ‘साप्ताहिक  ‘भारत’ में ‘खूनी’ नामक कहानी प्रकाशित हो चुकी थी। ‘खूनी’में नाटकीय हृदय परिवर्तन भी होता है और यह कहानी को सपाट भी बनाता है। पर ‘खूनी’ में हृदय-परिवर्तन समाज-द्रोही (देश-द्रोही) वकील का नहीं, वरन् प्रतिशोध की आग में धधकती उसकी पत्नी का होता है, जो अंत में पति का खून करने वाले क्रान्तिकर्मी के ही पक्ष में हो जाती है। क्योंकि बतौर सरकारी वकील, पति शिक्षा प्रचार और परोपकार (क्रांति-कर्म) में लगे युवकों की गर्दन पर कानून की छुरी चलवाता रहा है। अभी प्रेमचंद में यह दम नहीं था कि वे कहानी में ‘देश-द्रोही’और ‘क्रांतिकारी’ शब्दों का प्रयोग करते। पर उनका अभीष्ठ समझना मुश्किल नहीं है— वह गढ़़ी हुई गवाहियों के दम पर क्रांतिकारियों को अंग्रेजी राज द्वारा फांसी के तख्ते पर और यातना-गृहों में भेजने का दौर था और भारतीय मूल के सरकारी वकील, आम लोगों की चेतना में, सबसे बड़़े गद्दारों के रूप में स्थान पाते थे। कहानी में लाहौर और शाहजहांपुर का जिक्र बहुत मौजू है— लाहौर क्रांतिकारियों पर मुकदमों के कारण और शाहजहांपुर काकोरी के शहीद अशफाक उल्ला  की नगरी के नाते। काकोरी काण्ड के चार वीरों को दिसम्बर 1927 में फर्जी कानूनी कार्यवाही के दम पर फांसी पर चढ़़ाया गया था, और ‘खूनी’ कहानी उसके चंद महीनों बाद की ही उपज है।

                पर ‘खूनी’ को ‘नमक का दरोगा’ की कुंजी मानने से पहले 1920 तक के अंग्रेजी राज के कर्मचारी प्रेमचंद पर एक नजर जरूरी है। 1908 में पदोन्नत होकर वे सरकारी स्कूलों में डिप्टी इंस्पेक्टर हो चुके थे और 1919-20 में नौकरी में बदस्तूर कायम थे, जब कहानी ‘नमक का दरोगा’लिखी गयी। 1921 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। पर तब भी जो लेखक दस साल बाद की कहानी (खूनी) में भी गद्दार को गद्दार और क्रांतिकारी को क्रांतिकारी नहीं कह पा रहा हो, वह नौकरी रहते सावधान और विचक्षण (ह्यह्वड्ढह्लद्यद्ग) हो, तो स्वाभाविक ही है। 1930 के साक्षात्कार में उन्होंने ‘स्वराज-संग्राम’के सीधे समर्थन का साहस किया, तो इसलिए कि तब तक स्वराज शब्द ब्रिटिश-राज की नजरों में क्रांन्तिसूचक न रहकर कांग्रेस से सौदेबाजी की कवायद का हिस्सा हो चुका था। 1929 के लाहौर अधिवेशन में कांग्रेस का पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव आ चुका था।

                1908 से 1920 के बीच प्रेमचंद छह वर्ष यानी 1914 तक महोबा के हमीरपुर में रहे, और फिर नौकरी में बस्ती व गोरखपुर के बीच। 1915 से इस्तीफा देने तक वे सरकारी स्कूलों में शिक्षक (हेडमास्टर भी) रहे। आल्हा-ऊदल के महोबा ने उनसे ‘रानी सारन्धा’, ‘राजा हरदौल’, ‘विक्रमादित्य का तेगा’जैसी जातीय स्वाभिमान से भरी कहानियां तो लिखवार्ईं, पर इसी दौर के एक प्रकरण से उनके व्यक्तित्व में विद्यमान सरकारी चाकर पर भी रोशनी पड़़ती है। 1908 में प्रकाशित उनके पहले कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’को हमीरपुर के कलेक्टर ने विद्रोहात्मक मानकर खुद प्रेमचंद से ही जलवा दिया और भविष्य के लिए उन्हें चेतावनी दी। नौकरी के दौरान प्रेमचंद ने और भी बहुत कुछ बर्दाश्त किया होगा। 1919 में जलियांवाला बाग का शैतानी नरसंहार हुआ, जिसका प्रेमचंद पर भी गहरा असर हुआ होगा— हालाँकि प्रेमचंद की रचनाओं में यह प्रकरण नदारद रहा।

                अंग्रेज हाकिम के हाथों हिन्दुस्तानी कारिंदे को मिलने वाला अपमान, जिसका उनको नौकरी के दौरान सामना होता ही होगा, भी काफी बाद में प्रेमचंद की रचनाओं में आ पाया। इस अपमान के प्रतिरोध की प्रत्यक्ष हिम्मत प्रेमचंद ने ‘पत्नी से पति’ (1930) जैसी इक्का-दुक्की कहानी में दिखायी, जिसमें पत्नी के कांग्रेसी जलसे में भाग लेने के कारण अंग्रेजपरस्त होते हुए भी सुपवाइजरी ओहदे के पति दीनानाथ सेठ को दफ्तर में जब अंग्रेज हाकिम के हाथों गाली के बाद रूल से भी पिटने की नौबत आ गयी, तो उन्होंने भी पलटकर हाकिम को घूंसा जड़़ दिया और नौकरी को लात मार दी।

                पर राज के नौकर की मन:स्थिति को जीते हुए यदि आहत प्रेमचंद को विरोध के भी स्वर लाने हों तो कैसे लायें ? कहानी ‘नमक का दरोगा’इस आयाम का विलक्षण उदाहरण है। टेक्स्ट में कोई लाग-लपेट नहीं है और लगता है जैसे यह महज अंग्रेजी राज के एक वफादार नौकर की अडिग गाथा है। बीच में उस पर ईमानदारी के नाते विपदा भी आती है पर अन्तत: उसकी ईमानदारी ही उसे कहीं बड़़ा पुरस्कार दिलाती है। एक नैतिक जीवन-मूल्य के रूप में ईमानदारी के इस सुखान्त से किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, बेशक चाहे अमृत राय द्वारा कहानी को प्रेरणास्पद प्रसंग के रूप में पेश करना यकबयक गले न भी उतरे। प्रथम विश्वयुद्ध से उबरा अंग्रेज बादशाह भी ऐसी कहानी से खुश ही हो सकता था। नमक अधिनियम 1918 में बना था, जिसके विरोध में गांधी के नेतृत्व में कहीं 1931 में जाकर सविनय अवज्ञा का राष्ट्रीय आन्दोलन— दांडी मार्च— सम्पन्न हो सका। लिहाजा एक ईमानदारी दिखानेवाला हिन्दुस्तानी मूल का आदर्श दरोगा यदि उस अधिनियम को लागू करा रहा है तो यह राज के लिए एक अच्छी पब्लिसिटी हुयी। पर प्रेमचंद ढर्रे पर चलते जा रहे मशीनी नौकर नहीं हैं, वे साहित्यकर्म भी बेहद शिद्दत से कर रहे हैं ।

                ‘खूनी’ में यदि प्रेमचंद के निष्पादन की विचक्षणता को परख सकें तो ‘नमक का दरोगा’में वे तीन बातें रेखांकित कर रहे हैं — (1) नमक का कानून बनाकर अंग्रेजी राज ने इस देश के लोगों को उनके स्वाभाविक अधिकार से वंचित किया, (2) अंग्रेजी राज एक बेहद भ्रष्ट तंत्र है, (3) उस राज की चाकरी करने वाला व्यक्ति, कितना ही सचरित्र क्यों न हो, समझौतापरस्ती पर बाध्य होता ही है। यानी— प्रेमचंद बकलम खुद!

                26 दिसम्बर, 1934 को इन्द्रनाथ मदान को अंग्रेजी में भेजे लिखित जवाब में प्रेमचंद कहते हैं— ‘मैं कभी जेल नहीं गया। मैं कोई रण में उतरने वाला व्यक्ति नहीं हूँ । पर मेरे लेखन ने कई बार सत्ता को खिन्न किया है, मेरी एक या दो किताबों पर बंदिश भी लगी है। आगे इसी जवाब में क्रांति से सामाजिक परिवर्तन लाने के सवाल पर वह कहते हैं — ‘मैं क्रम विकास में विश्वास करता हूँ, हमारा मतलब लोकमत को विकसित करना है……..हालांकि यदि मेरे पास ऐसा कुछ पूर्वज्ञान होता और मैं जानता कि उथल-पुथल से स्वर्ग की राह खुलेगी, तो मैं विनाश से भी परहेज नहीं करता। दरअसल प्रेमचंद ने जाहिरा कुछ ऐसा कहा नहीं जो एक या दो रचनाओं पर बंदिश से आगे की नौबत लाता। पर इसकी कसर उनकी विचक्षणता ने पूरी की।

                इस आलोक में यदि ‘नमक का दरोगा’ को पढ़ें तो सब कुछ बदल जाता है। ऐन शुरूआत से प्रेमचंद नमक-कानून को ललकार रहे हैं— ‘जब नमक का नया विभाग बना और ईश्वर प्रदत्त वस्तु के व्यवहार करने का निषेध हो गया तो लोग चोरी-छिपे इसका व्यवहार करने लगे। अनेक प्रकार के छल प्रपंचों का सूत्रपात हुआ, कोई घूस से काम निकालता था, कोई चालाकी से।’ प्रथम विश्वयुद्ध की आर्थिक भरपाई के लिए ब्रिटिश-राज भारत में अपने लूट के कारोबार को जो विस्तार और तद्नुसार सार्वजनिक/सरकारी भ्रष्टाचार को जो बढ़़ावा दे रहा था, नमक-कानून भी उसी का हिस्सा हुआ। प्रेमचंद ने दरोगा वंशीधर की ईमानदारी को राज के प्रति वफादारी नहीं, इंसान का धर्म कहा— जब नमक-तस्कर अलोपीदीन छूटने के लिए रिश्वत की रकम बढ़़ाने लगा— ‘धर्म (वंशीधर) की इस बुद्धिहीन दृढ़़ता और देव-दुर्लभ त्याग पर धन बहुत झुंझलाया। अब दोनों शक्तियों में संग्राम होने लगा। धन ने उछल-उछल कर आक्रमण करने शुरू किये। एक से पांच, पांच से दस, दस से पन्द्रह और पन्द्रह से बीस हजार तक नौबत पहुंची, किन्तु धर्म अलौकिक वीरता के साथ इस बहुसंख्यक सेना के सम्मुख अकेला पर्वत की भांति अटल, अविचलित खड़़ा था।’ और, अंग्रेजी-राज का न्याय किस कदर भ्रष्ट है— ‘किन्तु अदालत में पहुंचने की देर थी। पंडित अलोपीदीन इस अगाध वन के सिंह थे। अधिकारी वर्ग उनके भक्त, अमले उनके सेवक, वकील मुख्तार उनके आज्ञा पालक और अरदली, चपरासी तथा चौकीदार तो उनके बिना मोल के गुलाम थे। उन्हें देखते ही लोग चारों तरफ से दौड़़े। सभी विस्मित हो रहे थे। इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया, बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आये। ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करने वाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह कानून केपंजे में आये! प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।’ अलोपीदीन अपने स्वार्थ में, ताकि उसकी जायदाद के लिए ईमानदार मैनेजर मिल जाय, वंशीधर को रखने गया। यह अवसर था प्रेमचंद के पास उसके मुंह से राज को तिरस्कृत कराने का— ‘मैंने हजारों रईस और अमीर देखे, हजारों उच्च पदाधिकारियों से काम पड़़ा किन्तु मुझे परास्त किया तो आपने। मैंने सबको अपना और अपने धन का गुलाम बनाकर छोड़़ दिया।’

                ‘जुलूस’ (1930) के अंत में अंग्रेजदां दरोगा बीरबल सिंह का हृदय परिवर्तन हो सकता है और वे सत्याग्रहियों को कुचलते हुए उनके पक्ष को समझ भी सकते हैं— ‘मैं बुद्धिमान न सही, पर इतना जानता हूं कि ये लोग देश और जाति का उद्धार करने के लिए ही कोशिश कर रहे हैं। यह भी जानता हूं कि सरकार इस ख्याल को कुचल डालना चाहती है। ऐसा गधा नहीं हूं कि गुलामी की जिन्दगी पर गर्व करूं, लेकिन परिस्थिति से मजबूर हूं।’ 1919-20 में नमक के दरोगा को यह सुविधा नहीं थी— लिहाजा सरकारी मशीनरी, जिसके पास राज चलाने का एक सहज हथकंडा भ्रष्टाचार है, को जनता की नजरों में तिरस्कृत करने के लिए उसके पास सबसे कारगर हथियार उसकी ईमानदारी है। और क्योंकि भारत में आज भी यह समीकरण ज्यों का त्यों है, यह भी कहा जा सकता है कि अमृत राय की टिप्पणी में कुछ गलत नहीं कहा गया। तो उन्नयन को निराश होने की जरूरत नहीं है।

प्रेम के प्रेत :

                प्रेम को लेकर शुरुआती प्रेमचंद में सुपर-इगो से निर्वाह की जबरदस्त ललक भी रही। यूं प्रेमचंद की, उनके आखिरी दौर तक भी, कई कहानियां सुपर-इगो वाले लक्षणों से पूरी तरह मुक्त नहीं हैं— अपने शुरुआती दौर में तो वे आन-बान-शान, मर्दानगी, सतीत्व, वीरोचित, स्त्रैण, वफादारी, बलिदान जैसे परम्परागत समाज-स्वीकृत मानदण्डों से ग्रस्त रहे ही। अपने जीवन के संभवत: अंतिम एवं बेहद महत्वपूर्ण वैचारिक लेख ‘महाजनी सभ्यता’ (हंस सितम्बर 1936) तक में भी, जब वे एक कम्युनिस्ट समाज के पक्ष में बयान कलमबद्ध कर रहे हैं, उन्होंने राजाओं की राज्य-विस्तार की महत्वाकांक्षा को ‘वीरोचित’जैसा विशेषण दिया है। लेकिन एक सहज कर्तव्यनिष्ठा, अनुराग और बन्धुत्व की समानान्तर प्रवृत्ति उनकी कथाओं को प्रेरित करती रही, जो ही उत्तरोत्तर प्रधान भी होती गयी। प्रेमचंद ने जैसे निचोड़ रूप में कहा— ‘साहित्य हमारे जीवन को स्वाभाविक और स्वाधीन बनाता है।…..यही उसका मुख्य उद्देश्य है।’ (साहित्य का उद्देश्य, 1936) प्रेमचंद की कथाओं में कशमकश का मंच यह भी रहा कि समाज में न सभी स्वाभाविक हो पाते हैं, न स्वाधीन।

                अपने साक्षात्कारों व लेखों में प्रेम को त्याग, तपस्या, बलिदान का दर्जा देने वाले प्रेमचंद की कथा-यात्रा में, दरअसल प्रेम को सहजता और समानता और स्वतंत्रता के व्यक्तिगत बयानों और सामाजिक हलचलों के तद्ïनुरूप उपकरणों के रूप में पेश करते आयाम नजर आते हैं। घासवाली (1929), प्रेम का उदय (1931), स्मृति का पुजारी (1932) और बालक (1933) जैसी कहानियों में वे प्रेम की सहजता और प्रेम में समानता के साथ गहरा तदातम्य बिठा सके— लेकिन प्रेम में स्वाधीनता स्थापित कर पाना तो आज के गतिशील समाज में भी संभव नहीं हो पाया है! आत्म-संगीत (1929), विद्रोही (1928), तिरसूल (1930),स्वामिनी (1931), नया विवाह (1932) प्रेमचंद की ऐसी ही अर्ध-स्वाधीन सी कथाएं हैं, जो उस समय के हिन्दी समाज के लिए अविश्वसनीय ही रही होंगी।

                ऐसे में उन्हें सहारों की जरूरत हो, तो यह स्वाभाविक रहा होगा प्रेमंचद के लिए कि वे लौकिक दुनिया से गृहस्थ-प्रेम और अलौकिक दुनिया से निजी-प्रेत अपने समर्थन के लिए चुनते। एक तो वे निजी जीवन में खुद खांटी के पारिवारिक जीव ठहरे, और दूसरे उन्होंने भूत-प्रेतों, तिलिस्मों, दरवेशों, हातिमताइयों, ऐयारों, जादुई रहस्यों के किस्सों के बीच बचपन से वय:सन्धि और जवानी में पदार्पण का सफर तय किया था। कथानकों में प्रेम को पारिवारिक तत्व बनाने का उन्हें फायदा यह रहा कि उसे ‘पहली नजर में प्यार’ जैसी रूमानी धारणा या ‘भगवान के घर बनी जोड़ी’ जैसी दैवी धारणा से अलग किया जा सका। जैसे परिवार का भौतिक विकास होना है, प्रेम का भी। यदि विकास संभव नहीं तो प्रेम भी नहीं रह सकता। और प्रेम पर प्रेत की छाया?  चांदनी में नहाई एकांत झील के शांत-उन्माद पर किनारे खड़े वृक्षों के प्रभाव जैसी— उसे द्विगुणित और स्थायी करने वाली! भौतिक प्रेम के निरूपण में खुद के संकोच को तोड़ने के लिए परिवार का, और उन प्रसंगों में मानवीय जिम्मेदारी का एहसास भरने के लिए प्रेत का माध्यम प्रेमचंद ने लिया।

                आइए शुरुआती प्रेमचंद को कहानी अमृत (जमाना, मार्च 1913) से देखें। शायर अख्तर का ख्याल है कि  साहित्य के उन्माद और सौन्दर्य के उन्माद में पुराना वैर है— ‘सुन्दर स्त्री मेरे लिए रंगीन, कातिल नागिन थी जिसे देखकर आंखें खुश होती हैं मगर दिल डर से सिमट जाता है।’ साथ छोड़ती शायरी को जिंदा रखने के लिए अख्तर अपनी झूठी मौत की खबर तक उड़ा देता है। अन्तत: प्रेतों की दुनिया से निकलकर, अपनी एक अनजान प्रशंसक आयशा से प्रेम भरी मुलाकातें ही उसे जता पायीं कि प्रेम ‘वह अमृत की बूंद है जो मरे हुए भावों को जिंदा कर देती है।….यही अक्सीर थी जिसकी अनजाने ही मुझे तलाश थी।’ इसी दौर की ऐसी ही कहानियां हैं ‘त्रिया चरित्र’ और ‘धोखा’। पहली कहानी में रईसी का वारिस मगनदास गलतफहमी वश दिल्ली छोड़ दूर नागपुर के एक गांव में मगनसिंह नाम से साईसी करने लगता है, उसकी भावी पत्नी इंदिरा भी मालिन की भतीजी बनकर रम्भा नाम से, अपनी पहचान छिपाकर, वहीं आ गयी। दोनों में प्रेम परवान चढ़ा पर परिस्थितियों में बदलाव से मगनदास को वापस रईसी में लौटना पड़ा और उसका इंदिरा से ब्याह रचा। राज खुला। तब से दोनों साल में एक बार उसी झोंपड़े में मगनसिंह और रम्भा के नाम से लौटते हैं। प्रेम पर प्रेत के असर का हाल देखिए— ‘वह झोंपड़ा, वह मुहब्बत का मंदिर, वह प्रेम-भवन, फूल और हरियाली से लहरा रहा था। चम्पा मालिन उन्हें वहां मिली। गांव के जमींदार उनसे मिलने के लिए आए, कई दिन तक फिर मगनसिंह को घोड़े निकालने पड़े। रम्भा कुएं से पानी लाती, खाना पकाती, फिर चक्की पीसती और गाती। गांव की औरतें फिर उससे अपने कुर्ते और बच्चों की लेसदार टोपियां सिलातीं। हां, इतना जरूर कहतीं कि उसका रंग कैसा निखर आया है, हाथ-पांव कैसे मुलायम पड़ गये हैं, किसी बड़े घर की रानी मालूम होती है। मगर स्वभाव वही है, वही बोली है, वही मुरौवत, वही हंसमुख चेहरा।’ प्रेम में स्त्री-पुरुष समानता की झलक भी! मगनदास ने पुराने दिनों की खातिर कहा— ‘मैं अपनी रम्भा को अब भी इन्दिरा से ज्यादा प्यार करता हूं।’ इन्दिरा का जवाब तुर्की-ब-तुर्की था— ‘तुम्हें रम्भा है तो क्या मेरा मगनसिंह नहीं है। मैं अब भी उस पर मरती हूं।’

                ‘धोखा’ में भेष बदलने की और बड़ी ऐयारी है। राजकुमारी प्रभा राजा हरिश्चन्द्र से ब्याही जाकर पति के शारीरिक प्रेम में तो डूबती है पर अकेले होते ही कुंवारेपने में आंखों में बसी रसीले-योगी गायक की मोहिनी छवि में खो जाने से खुद को नहीं रोक पाती। पति ने एक दिन चित्रशाला दिखाई तो वहां उसी योगी का एक छोटा-सा चित्र भी था। प्रभा के चेहरे को पढ़कर राजा ने तुरंत बाहर जाकर योगी का गाना सुनवाने का प्रबंध कर दिया। अब, दाम्पत्य जीवन के भीतर ही, कहानी के सूत्र प्रेतों के हाथ में जा पहुंचे— ‘वही हृदयग्राही राग था, वही हृदय-भेदी प्रभाव, वही मनोहरता और वही सब कुछ, जो मन को मोह लेता है। एक क्षण में योगी की मोहिनी मूर्ति दिखाई दी। वही मस्तानापन, वही मतवाले नेत्र, वही नयनाभिराम देवताओं का-सा स्वरूप। मुखमंडल पर मंद-मंद मुस्कान थी। प्रभा ने उसकी तरफ सहमी हुई आंखों से देखा। एकाएक उसका हृदय उछल पड़ा। उसकी आंखों के आगे से एक पर्दा हट गया। प्रेम-विह्वल हो, आंखों में आंसू-भरे वह अपने पति के चरणारविंदों पर गिर पड़ी और गद्ïगद कंठ से बोली— प्यारे! प्रियतम!’

                दोनों प्रेमियों की अपनी-अपनी स्वाधीनता के तत्व भी! ‘राजा हरिश्चन्द्र ने कहा— जानती हो, मैंने यह स्वांग क्यों रचा था? गाने का मुझे सदा से व्यसन है और सुना है तुम्हें इसका शौक है। तुम्हें अपना हृदय भेंट करने से प्रथम एक बार तुम्हारा दर्शन करना आवश्यक प्रतीत हुआ और उसके लिए सबसे सुगम उपाय यही सूझ पड़ा। प्रभा ने अनुराग से देखकर कहा— ‘योगी बनकर तुमने जो कुछ पा लिया, वह राजा रहकर कदापि न पा सकते। अब तुम मेरे पति हो और प्रियतम भी हो; पर तुमने मुझे बड़ा धोखा दिया और मेरी आत्मा को कलंकित किया। इसका उत्तरदाता कौन होगा?’ जाहिर है प्रेत होंगे और कौन!

                प्रेमचंद के अपने प्रेत भी तो हैं। उनका एक और आयाम देखिए— ‘सती’ शीर्षक से, प्रेम को गौरान्वित करती, दो कहानियां हैं प्रेमचंद की। पहली कहानी (माधुरी, मार्च 1924) में रानी चिंता अपने सिपहसालार प्रेमी के रणभूमि से जान बचाकर वापस आने पर भी चिता से नहीं उतरती— तुम मेरे रत्न सिंह नहीं।…..’मैं जिस पुरुष के चरणों की दासी बनी थी, वह देवलोक में विराजमान है।….वह वीर राजपूत था, रणक्षेत्र से भागनेवाला कायर नहीं!’ दूसरी कहानी (चन्दन, मई 1932) में कमजोर वर्ग की ‘मुलिया को देखते हुए उसका पति कल्लू कुछ भी नहीं है।….उसे अपने चचेरे भाई राजा से बहुत खटका रहता है।’ यद्यपि पति-पत्नी एक दूसरे के प्रेम में न्योछावर हैं, पर मुलिया जब अल्हड़पने में राजा से चुंदरी स्वीकार कर लेती है तो भ्रम और अवसाद का शिकार कल्लू कलुषित भोग विलास में पड़ जानलेवा बीमारी से ग्रस्त हो जाता है। यद्यपि मुलिया ‘उसे प्रसन्न करने के लिए बार-बार प्रयत्न करती; पर वह जितना ही उसको खींचने की चेष्ट करती थी, उतना ही वह उससे विचलता था, जैसे कोई कंटिए में फंसी मछली हो।’ मुलिया की अनथक सेवा से, जीवन का अंत आते-आते, कल्लू पर स्पष्ट हो गया कि मुलिया अब भी उसी की है। उसकी मृत्यु के छह महीने के भीतर, नौकरी पर परदेश गये राजा की स्त्री मर गयी। राजा घर लौटा तो उसने मुलिया को घेरा— ‘तुम कब तक भैया के नाम को रोती रहोगी?’ मुलिया घृणा से बिफर उठी— ‘मैं जानती हूं कि मैं मर जाती, तो मेरा सिरताज जन्म भर मेरे नाम को रोया करता। ऐसे ही पुरुषों की स्त्रियां उन पर प्राण देती हैं। तुम जैसे सोहदों के भ��ग में पत्तल चाटना लिखा है, चाटो; मगर खबरदार, आज से मेरे घर में पांव न रखना, नहीं तो जान से हाथ धोओगे! बस, निकल जाओ। उसके मुख पर ऐसा तेज, स्वर में इतनी कटुता थी कि राजा को जबान खोलने का भी साहस न हुआ, चुपके से निकल भागा।’ प्रेमचंद यह तो नहीं धिक्कार रहे कि ऐसे सम्पूर्ण पुरुष कहां जिनसे स्त्रियां प्रेम कर सकें!

                प्रेमचंद के आर्यसमाजी-गृहस्थ भूतों ने उनसे ये कहानियां लिखवाई होंगी? अन्यथा एक और दलित मुलिया ‘घासवाली’ (माधुरी, दिसम्बर 1929) को वे पहले ही रच चुके थे, जो पति से प्रेम करते हुए एक विजातीय सहृदय के प्रति भी कोमल भावनाएं रखने में समर्थ है। इन्हीं प्रेमचंद ने ‘विद्रोही’ (1928), ‘स्वामिनी’ (1931) और ‘नया विवाह’ (1932) जैसे कैनवस पर अपने यौन के मालिक स्त्री-चरित्र भी रचे। बचपने से जिसे चाहा, जब उससे विवाह में दहेज का सवाल आड़े आ गया तो वह विद्रोही तरह-तरह से सभी पर, स्थितियों पर बस खीझ ही उतारता रह गया। पर तारा की कहीं और शादी होने के सालों बाद वह तारा और उसके पति से सहज मैत्री-भाव से मिल सका; यहां तक कि तारा के पति ने जोश से उसे बताया— ‘आपके प्रेम को वह अपनी जिन्दगी की सबसे प्यारी चीज समझती है। आप शायद समझते हों कि उन दिनों की याद करके उसे दुख होता होगा। बिल्कुल नहीं। वही  उसके जीवन की सबसे मधुर  स्मृतियां हैं। वह कहती है, मैंने अपने कृष्णा को तुममें पाया है।’ पति की मृत्यु के बाद प्यारी ने ससुर से स्वामिनी का दर्जा पाकर खूब हीले से घर चलाया। कालान्तर में ससुर नहीं रहा, देवर अपने परिवार सहित परदेश चला गया, वह एकदम अकेली रह गयी। घर के पुराने हलवाहे जोखू की सहानुभूति और परिश्रम के सहारे प्यारी ने धीरे-धीरे जीवन और खेती को फिर व्यवस्थित कर लिया। उस परस्पर निर्भरता और सहयोग ने स्वामिनी और नौकर के बीच अटूट प्रेम की सृष्टि की और दोनों के बीच विवाह सम्बन्ध का रास्ता खोल दिया। जीवन में प्रेम की स्वाभाविकता और किसे कहेंगे! लाला जी ने अधेड़ावस्था में नया विवाह किया और जीवन में उमंग के लिए युवा सेठानी ने नौजवान घरेलू सहायक का सहारा लिया।

                कितनी ही कहानियों में प्रेमचंद ने प्रतिशोधी अलौकिक शक्तियों की रचना समर्थों के निरंकुश आचरण के विरुद्ध इस्तेमाल की है। सोच वही जो सदियों से जन-साहित्य का हिस्सा रही— जहां लौकिक ताना-बाना एकदम आतताई, अन्यायपूर्ण और निराशाजनक है, वहां अलौकिक दखल ही सही! यहां तक कि काल और कठिनाइयों को लांघने में मददगार उनके प्रेत-प्रसंग, प्रेम जैसी कोमलतम भावनाओं के वाहक भी बने हैं। इस मिश्रण का निचोड़ उनकी अंतिम दौर की कहानी ‘स्मृति का पुजारी’ (1932) है; आदमी के प्रेम को खुराक मिलती है भौतिक जगत से और प्रेतों को आदमी का पीछा करती उसकी स्मृतियों से। पर इस कहानी में उतरने से पहले, कुछ क्षण ठहर कर, प्रेमचंद के रचे प्रेत-प्रोफाइल पर एक नजर।

                प्रेमचंद के सारे प्रेत—आततायी स्मृतियों के बिंब—सवर्ण हैं, और विशेषकर ब्राह्मण। दलित, जब समर्थों के  इतिहास में शामिल ही नहीं, तो उनकी स्मृतियों या पश्चातापों का हिस्सा कैसे होते? दलित न तो आततायी स्मृतियों के वारिस हो सकते हैं और न जनक; लिहाजा न वे प्रेत बनकर प्रतिशोध ले सकते हैं और न उनके अपने प्रेत होते हैं जो उनसे प्रतिशोध लें। यह समाज में दलित के पूरी तरह हाशिये पर होने की स्थिति है। हां उनके वजूद की रगों में घुसे विप्र-विधान का प्रेत जरूर उन्हें शिकार बनाता रह सकता है— सवा सेर गेहूं के ऋणी मजदूर शंकर द्वारा ब्याज में पुश्त-दर-पुश्त की गुलामी स्वीकारने का तर्क यही तो था कि ‘एक तो ऋण— वह भी ब्राह्मïण का— बही में नाम रह गया तो सीधे नरक में जाऊंगा।’

                लब्बो-लुवाब यह कि ‘गरीब की हाय’ का प्रेत समर्थ अन्यायी को भी तभी लगता है, जब वह गरीब सवर्ण हो। 1911 की इस कहानी में विधवा ब्राह्मïणी मूंगा के रुपये हड़पने वाले मुंशी दम्पति को, मूंगा द्वारा उनके दरवाजे पर भूखे-प्यासे जान देने पर, ब्रह्म-हत्या का दंड भुगतना पड़ा— गांववासियों द्वारा उनके अघोषित बहिष्कार के रूप में। अब उन्हें रात-दिन मूंगा का प्रेत नजर आता— ‘तेरा लहू पीऊंगी।’ लाख भागे, पर दोनों ने तड़पते जान छोड़ी। 1924 की कहानी ‘भूत’ में चौबे ने मरती पत्नी को दिया वचन दरकिनार कर गोद ली लड़की बिन्नी से ही ब्याह रचा डाला। जिस रात बिन्नी बधू बनकर आयी, पत्नी मंगला सदेह, साकार, सजीव रूप में जहां-तहां से चौबे पर हंसती— ‘बिन्नी तुम्हारी पुत्री है।’ इस कहानी में समाज चौबे के साथ है, तो भी वे इस तिरस्कार से विक्षिप्त हो गये। ब्राह्मण-प्रेत के ‘दंड’ (1925) से मुक्ति है ही नहीं— कचहरियों के दलाल जगत पांडे द्वारा दी घूस की रकम को उसका काम किए बिना डकारना जंट साहब को बेहद महंगा पड़ा। पांडे द्वारा विरोध में उनके दरवाजे पर दम तोडऩे पर, पांडे का प्रेत जंट साहब के बिरादरी के बहिष्कार से बल पाकर उन्हें बदहवास रखता है और उनकी पत्नी के लिए तो जानलेवा ही हो जाता है।

                यह भी उनके प्रेत-प्रोफाइल का अनिवार्य हिस्सा है कि प्रेमचंद ने अलौकिक में अंधविश्वास को नहीं उतरने दिया। ‘नाग पूजा’ (1923) उनकी एकमात्र ऐसी कहानी है जिसमें कोई प्रेत खल-भूमिका में है। पर इसमें भी उसकी चुनौती जिसने स्वीकार कर उसका अंत किया, वह एक वैज्ञानिक था और उसने भौतिक उपकरणों का ही प्रयोग किया। कहानी ‘मूठ’ (जमाना, जनवरी 1922) में ‘मूठ चली और चोर के मुंह से रक्त जारी हुआ, जब तक वह माल न लौटा दे रक्त बंद नहीं होता।’ कंजूस डाक्टर साहब के घर में से पांच सौ रुपये उड़ गये थे। ओझा ताड़ गया कि किसी घर वाले का ही हाथ है— ‘फिर एक बार अच्छी तरह सोच लीजिए। मूठ तो मैं चला दूंगा, लेकिन उसको उतारने का जिम्मा मैं नहीं ले सकता।’ यानी प्रेत तो अपना खुद का भय है, उसे दूसरा कैसे उतारेगा? सारी कहानी में मनोविज्ञान ही काम कर रहा है। ओझा तो पैसे लेकर सो गया, डाक्टर साहब देर रात घर वापस आये तो घर की बुढिय़ा महरी जगिया, जिसने उन्हें भी गोद खिलाया था, घबड़ा गयी— भइया मूठ में जान जोखम है।

                डाक्टर— चोरी की यही सजा है।
जगिया— किस ओझे ने चलाई है।
डाक्टर— बुद्घू चौधरी ने।
जगिया— अरे राम उसकी मूठ का तो उतार नहीं।

                रात की रात जगिया की हालत बिगड़ती गयी। डाक्टर ने जाकर देखा तो हाथ-पैर अकड़ गये थे। दवा का जोर न चला तो रात में ही डाक्टर उसी ओझा के पास वापस पहुंचा। ‘पर अभी तो बुद्घू ने मूठ चलाई ही नहीं। उसका असर क्योंकर हुआ।’ मूठ नहीं चली, यह डाक्टर को क्या पता। लिहाजा ओझा को मुंह मांगे दाम देकर मूठ उतरवाने घर लाया, और आध घंटे में उसके बुदबुदाने, बेसुरा गाने, अंगडाइयां लेने, जगिया के सिर पर हाथ फेरने से मूठ, जो चलाई ही नहीं थी, उतर गयी। ‘उधर कौवे की बोली सुनाई दी, जगिया एक अंगड़ाई  लेकर उठ बैठी।’ तीर्थयात्रा के लिए की गयी चोरी के पश्चाताप का उसका चक्र जो पूरा हुआ! पूरी की पूरी कहानी प्रेतों ने चलायी पर इसमें ओझा के प्रेत न थे; पात्रों के अपने-अपने प्रेत रहे।

                व्यक्ति प्रेमचंद के भी अपने प्रेत होंगे। उनकी निजी प्रेम-कामनाएं भी रही होंगी। कहानीकार के रूप में अन्तत: उन्होंने इनसे क्या-क्या नहीं हासिल कराया! ‘स्मृति का पुजारी’ पैंतालीस वर्षीय होरीलाल सजीव मनुष्य नहीं, पत्नी के देहांत के बाद दुनिया से विरक्त होकर महज स्मृतियों का पुतला है। पर एक ऐसा कोमल दौर भी आया जो इस पुजारी को प्रेत-दुनिया से वापस भौतिक दुनिया में लाया और उसके जीवन को व्यवस्थित कर गया। यह और बात है कि होरीलाल इस दौर को निभा नहीं पाये और वापस स्मृतियों की अस्त-व्यस्तता में ही लौट गये।

                ‘जब उनकी स्त्री जीवित थी, तब कुछ और ही बात थी…. दोनों एक दूसरे के आशिक थे, और उनका प्रेम पौधों के कलम की भांति दिनों के साथ और भी घनिष्ठ होता जाता था…. पचीस साल के अभिन्न सहचर ने उनकी आत्माओं में इतनी समानता पैदा कर दी थी कि जो बात एक के दिल में आती थी, वही दूसरे के दिल में बोल उठती थी।’ महाशय जी का अभी सब कुछ अच्छा था, चाहते तो दूसरा ब्याह कर लेते; पर इस स्मृति के पुजारी ने प्रेम के नाम को दाग न लगाया— ‘अब हफ्तों बाल नहीं बनते; कपड़े नहीं बदले जाते। घसियारों-सी सूरत बनी हुई है, कुछ परवाह नहीं। कहां तो मुंह-अंधेरे उठते थे और चार मील का चक्कर लगा आते थे…. कहां अब आठ बजे तक चारपाई पर पड़े करवटें बदल रहे हैं।….कहां तो अच्छे-अच्छे सूटों का खब्त था….कहां पुराने-धुराने बदरंग सिकुड़े-सिकुड़ाये, ढ़ीले-ढ़ाले कपड़े लटकाए चले जा रहे हैं….पैंतालीस की उम्र में जो आदमी पैंतीस का लगता था, वह पचास की उम्र में सत्तर का लगता है, कमर भी झुक गई, बाल भी सफेद हो गये, दांत भी गायब हो गये। जिसने उन्हें तब देखा हो, आज पहचान भी न सके।’ यहां तक कि जिन विषयों पर उनका पत्नी से मतभेद हुआ करता था, अब उन पर उनके वही विचार हो गये जो पत्नी के थे। यानी पूरी तरह प्रेत के शिकंजे में! दोस्तों द्वारा ठेल-ठाल कर प्रात: सैर के लिए भेजे जाने के दौरान होरीलाल की मुलाकात स्थानीय लड़कियों के हाई स्कूल की नयी हेड-मिस्ट्रेस मिस इंदिरा से हुई, जिन्होंने उनमें रुचि दिखानी शुरु कर दी। इस साथ के असर ने रंग दिखाया— ‘मैंने सोचा, जब संसार में रहना है, तो जिन्दों की तरह क्यों न रहूं। मुर्दों की तरह जीने से क्या फायदा।’ दोस्तों ने देखा कि उनके घर की खिड़कियां जो बरसों से बंद पड़ी थीं, खुल गयी हैं। उनकी चपलता, प्रसन्नता और सजीवता वापस आ गयी है। इंदिरा ने उन्हें, जैसे वे थे— एक विरक्त विधुर— वैसे ही स्वीकारा था— ‘अगर आप समझते हों कि मैं आपकी कुछ सेवा कर सकती हूं, तो मैं हर तरह हाजिर हूं, मुझे आपसे जो भक्ति और प्रेम है, वह इसी रूप में चरितार्थ हो सकता है।’ पर होरीलाल वह स्वर्ण अवसर नहीं पकड़ सके, उन्होंने प्रेतों की दुनिया में वापसी ही अपने लिए चुनी— ‘आठ बज रहे थे। खिड़कियों के पट बंद थे। सामने बरामदे में कूड़े-करकट का ढेर था। ठीक वही दशा थी, जो पहले नजर आती थी।’

                प्रेम की भौतिक दुनिया में रहने के लिए प्रेमचंद ने गंगू ब्राह्मण को रचा। ‘हंस’ के अप्रैल 1933 अंक में प्रकाशित कहानी ‘बालक’ में विधवा-आश्रम से निकाली एक गोमती देवी है, जो तीन बार ब्याही जाकर पतियों के पास से भाग आयी और अब एक अलग कोठरी लेकर रहती हुई सारे मुहल्ले के शोहदों का मनोरंजन केन्द्र बनी हुई है। पुराने विचारों का पोंगा ब्राह्मïण गंगू जिसे नयी सभ्यता की हवा तक न लगी और जो ऊंच-नीच, छूत-छात मानने वाला उग्र स्वभाव का जीव है, गोमती देवी के प्रेम में पड़कर छूटती नौकरी के समय मालिक के समझाने पर यह तर्क पेश करने में समर्थ है— ‘जहां प्रेम नहीं है हुजूर, वहां कोई स्त्री नहीं रह सकती। स्त्री केवल रोटी कपड़ा ही नहीं चाहती, कुछ प्रेम भी तो चाहती है। वे लोग समझते होंगे कि हमने एक विधवा से विवाह करके उसके ऊपर कोई बहुत बड़ा एहसान किया है। चाहते होंगे कि तन-मन से वह उनकी हो जाय, लेकिन दूसरे को अपना बनाने के लिए पहले आप उसका बन जाना पड़ता है हुजूर।’ ‘और तुम ऐसी स्त्री से विवाह करोगे?…. समझ लो, जीवन कड़ुवा हो जायेगा।’…. गंगू ने शहीदों के से आवेश से कहा— ‘मैं  तो  समझता  हूं, मेरी जिन्दगी बन जायेगी बाबू जी, आगे भगवान की मर्जी!’

                गंगू ने गोमती से विवाह कर लिया और अब सदैव प्रसन्न-मुख एवं निश्चिन्त दिखता। उसके स्वभाव में एक आत्मसम्मान पैदा हो गया था। एक दिन सुना गया कि गोमती गंगू के घर से चली गयी। लोगों ने गंगू को उकसाने और उसका उपहास उड़ाने की चेष्टा की पर गंगू अब भी गोमती का मंत्र पढ़ता रहा— ‘वह प्रेम तो मरते दम तक याद रहेगा…. जब तक उसे ढूंढ न लाऊंगा, मुझे चैन न आयेगा।’ गंगू को गोमती लखनऊ के जनाने अस्पताल में मिली। वह अपना पता एक सहेली के पास छोड़ गयी थी, यह कहकर कि अगर गंगू बहुत घबराये तो बता देना। साथ में नवजात बच्चा भी था, जाहिरा वह गंगू का बच्चा नहीं था। इसी भय से गोमती भागी थी। पर गंगू जिस भौतिक जगत में रहकर प्रेम में डूबा हुआ है, वहां प्रेतों के लिए कोई स्थान नहीं— ‘गोमती, अगर तुम्हारा मन मुझसे नहीं मिलता, तो तुम मुझे छोड़ दो। मैं अभी चला जाऊंगा और फिर कभी तुम्हारे पास न आऊंगा। तुमको जब कुछ काम पड़े तो मुझे लिखना, मैं भरसक तुम्हारी मदद करूंगा। मुझे तुमसे कुछ मलाल नहीं है। मेरी आंखों में तुम अब भी उतनी ही भली हो। अब भी मैं तुम्हें उतना ही चाहता हूं। नहीं,अब मैं तुम्हें और ज्यादा चाहता हूं; लेकिन अगर तुम्हारा मन मुझसे फिर नहीं गया है, तो मेरे साथ चलो। गंगू जीते-जी तुमसे बेवफाई नहीं करेगा। मैंने तुमसे इसलिए विवाह नहीं किया कि तुम देवी हो; बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता था और सोचता था कि तुम भी मुझे चाहती हो। यह बच्चा मेरा बच्चा है। मेरा अपना बच्चा है। मैंने एक बोया हुआ खेत लिया, तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूंगा, कि उसे किसी दूसरे ने बोया था?’

                मनुष्य स्वयं प्रेम का भी स्रोत है जैसे प्रेत का—’आत्म-संगीत’(माधुरी, अगस्त 1927) में रानी मनोरमा को प्रेम के संगीत ने महल से निकालकर ऐसा खींचना शुरु किया कि उस तक पहुंचने की विकलता में, नदी-तट पर पहुंच वह अनजाने मांझी के पैरों पर गिर पड़ी— ‘नौका खोल।…. अब इस चाह में दाह है।’ रानी की यह विकलता बराबर बढ़ती ही गयी जब तक कि उसे आभास नहीं हुआ कि ‘वह स्वयं इस संगीत का स्रोत थी।’

                सारत: प्रेमचंद ने प्रेम को लेकर इतना सब कहा— बहुत कुछ प्रेतों के माध्यम से भी। यह कहानी कहने की तकनीक का कमाल है कि उनकी प्रेम-कहानियां, प्रेम को लेकर कही गई कहानियां लगती हैं।

प्रेमचंद का कद : वर्ग चेतना

                माक्र्सवादी सामाजिकता को आत्मसात करना हो या सहज ही आधार और अधिरचना का द्वंद्वात्मक सम्बन्ध समझना हो तो प्रेमचंद की वर्ग-चेतना पर आधारित एक ही कहानी ‘नशा’ काफी है। फरवरी 1934 में ‘चांद’ में प्रकाशित इस कहानी में उनके पूरी तरह विकसित कम्युनिस्ट कद को अनायास देखा जा सकता है।

                माक्र्स का मशहूर कथन है—मनुष्यों की चेतना उनके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उल्टे उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है। ‘नशा’ में एक गरीब क्लर्क का बेटा अमीर जमींदार घराने के सहपाठी ईश्वरी के साथ उसके गांव छुट्टियां बिताने जाता है। इससे पहले वह ईश्वरी की कुलीन, दम्भी, सामन्ती जीवन-शैली का घोर आलोचक रहा है। पर रेल के ऊंचे दर्जे में यात्रा से लेकर ऐशो-आराम से बीते छुट्टी के दिनों ने उस पर भी उन्हीं अभिजात मूल्यों का नशा चढ़ा दिया। ईश्वरी ने गांव में सभी से उसका परिचय एक बड़े रियासतजादे के रूप में दिया था और इस दौरान वह पूरी तरह से कुंवर साहब को जीने भी लगा— मेज पर लैम्प रखा था, दियासलाई भी वहीं थी, कुंवर साहब अखबार पढऩे को भिन्ना रहे हैं, पर लैम्प अपने हाथ से कैसे जलाएं जब ईश्वरी ऐसा नहीं करता, तभी ओहदेदार मुंशी रियासत अली आ निकले और कुंवर साहब फट पड़े—’तुम लोगों को इतनी फिक्र भी नहीं कि लैम्प जलवा दो। मालूम नहीं ऐसे कामचोर आदमियों का यहां कैसे गुजर होता है। मेरे यहां घण्टे भर निर्वाह न हो।’

                वापसी यात्रा ऊंचे दर्जे का टिकट न मिलने से भीड़-भड़क्के में तीसरे दर्जे में करनी पड़ी। धक्का-धक्की से बौखलाए कुंवर साहब ने एक ग्रामीण सहयात्री पर हाथ चला दिया तो कइयों ने उन्हें जम कर सुनायी। अब उनका नशा उतरना शुरू हुआ और वे अपनी दुनिया में वापस लौटे।

                कहते हैं किसी बड़ी लकीर को बिना छुए छोटी करना है तो उसके ऐन बराबर में एक उससे भी बड़ी लकीर खींच दो। प्रेमचंद की तमाम वर्ग-चेतना की कहानियां हिन्दी की ही नहीं विश्व-साहित्य फलक की सर्वश्रेष्ठ कहानियों में रखी जायेंगी। यही वह बड़ी लकीर है, खुद जिससे प्रेमचंद की अन्य लकीरें छोटी नजर आने लगती हैं। इसी बड़ी लकीर की वजह से प्रेमचंद को दलित विरोधी कहने वालों को सुविधा होती है। यहां तक कि इसी बड़ी लकीर की वजह से वे स्त्री-चेतना और अल्पसंख्यक-चेतना पर भी हमेशा खरे नहीं उतरते दिखाये जा सकते हैं।

                होता यह है कि जिन कथाओं में प्रेमचंद के शोषित पात्र— किसान, दलित, स्त्री, अल्पसंख्यक—जातिगत सांचे में गढ़े जाते हैं, उनकी शानदार यथार्थपरकता के बावजूद, वे रचनाएं किसी न किसी रूप में एकध्रुवीय और सपाट रह जाती हैं। और जिन कथाओं में यही पात्र वर्ग-चेतना से सम्पन्न हैं, वे सम्पूर्ण और कमाल की रचनाएं हो जाती हैं। यांत्रिकता के कैदी भी हैं प्रेमचंद और द्वंद्वात्मकता की लहर भी बने हैं। तभी पत्नी के ‘कफन’ (जामिया, दिसम्बर 1935) के पैसों से गुलछर्रे उड़ाते घीसू और माधव को दलित चेतना नहीं पहचान पाती। जो जानवर का जीवन जी रहा है, वह जानवर ही हो गया—यह वर्ग-दृष्टि नहीं संस्कार-दृष्टि हुयी। ‘कफन’ में यही हुआ है कि ‘पशु से मनुष्य’ को यंत्रवत लागू होने दिया गया।

                    प्रेमचंद की ‘पशु से मनुष्य’ कहानी ‘प्रभा’ के फरवरी 1920 के अंक में छपी। अन्तत: एक कम्युनिस्ट कथाकार के रूप में प्रेमचंद के विकास के सूत्र इस कहानी में मौजूद हैं। साथ ही इस बात के भी कि क्यों वे अपने विकास-क्रम में, लक्षणों के बावजूद, रुढि़वादी सनातनी, आर्यसमाजी, अंधविश्वासी, कट्टरपंथी, मानवतावादी या महज गांधीवादी के रूप में समाप्त नहीं हुए। अक्तूबर 1917 की रूसी समाजवादी क्रांति के आलोक में तबके ढुलमुल सरकारी अध्यापक प्रेमचंद का इस कहानी में जैसे पकते हुए साहित्यकार प्रेमचंद से संवाद चल रहा है—’समय सफल चोर का सबसे बड़ा मित्र है। एक एक क्षण उसे निर्दोष सिद्ध करता जाता है।’ दुर्गा माली ने बार-एट लॉ डाक्टर मेहरा के बगान से, ऊपरी आमदनी के खाते में की गयी आम की चोरी को छिपाने के लिए देर रात वापस लौटने की जुगत की, तो भी पकड़ा गया। पर समाज में तमाम व्यक्तिगत, पारिवारिक, महाजनी एवं कार्पोरेट सम्पत्ति की प्रणालियां ऊपरी (बेशी) आमदनी की प्रणाली ही तो हैं, और इससे लाभ उठाने वाले हर व्यक्ति, परिवार, संस्था, मूल्य वैधता के हकदार बने रहे हैं।

                दीन, चोर, कामचोर, झूठे, लालची दुर्गा माली का नयी जगह पर जहां मालिक प्रेमशंकर समेत सभी काम करने वाले बराबर के हकदार हैं, कायाकल्प हो गया। वह कैसे एक मेहनती, कुशल, आत्मविश्वास से लबालब, सच्चे आदमी में बदल गया, यह पूर्व-मालिक मेहरा के लिए ईर्ष्या, आश्चर्य और चुभन का विषय है। प्रेमशंकर और मेहरा के वार्तालाप में समाजवादी व्यवस्था के प्रति आश्वस्ति के तर्क लगातार स्वर पाते हैं—

                ‘जहां कोई मालिक होता है दूसरा उसका नौकर तो उन दोनों में तुरंत द्वेष पैदा हो जाता है। मालिक चाहता है कि इससे जितना काम लेते बने, लेना चाहिए। नौकर चाहता है कि मैं कम से कम काम करूं। उनमें स्नेह या सहानुभूति का नाम तक नहीं होता। दोनों यथार्थ में एक-दूसरे के शत्रु होते हैं। यों प्रेमचंद ने इस प्रसंग में ‘सहकारिता’ को श्रेय दिया है पर वर्ग-विद्वेष और अपवर्तन की स्पष्ट बानगी और भला क्या होगी!

                भारतीय समाज में जातिगत वर्ण-व्यवस्था के द्वंद्व पर आम्बेडकर ने ठेठ माक्र्सवादी समझ से कहा— ‘यह श्रम का ही नहीं, श्रमिकों का भी विभाजन है।’ लिहाजा उनका मुख्य स्वर जाति-प्रथा के विनाश का है, न कि उसको दुहने का। प्रेमचंद का भी माक्र्सवादी रुझान ‘पशु से मनुष्य’ द्वंद्व को कुछ ऐसे ही रूप में तर्क देता है— ‘शासन-प्रबंध, वकालत, चिकित्सा, चित्र-रचना, शिक्षा, दलाली, व्यापार, संगीत और इसी प्रकार की सैकड़ों अन्य कलाएं शिक्षित समुदाय की जीवन-वृत्ति बनी हुई हैं। पर इनमें से से एक भी धनोपार्जन नहीं करतीं। इनका आधार दूसरों की कमाई पर है। मेरी समझ में नहीं आता कि वह उद्योग-धंधे जो जीवन की सामग्रियां पैदा करते हैं, जिन पर जीवन का अवलम्बन है, क्यों उन पेशों से नीचे समझे जायें, जिनका काम केवल मनोरंजन या अधिक-से-अधिक धनोपार्जन में सहायता करना है।’

                प्रेमचंद के विकास-क्रम में इस मुकाम पर पहुंचने की तुलना उनकी ठेठ मानवतावादी कहानी ‘सज्जनता का दंड’ (मार्च 1916, सरस्वती) से की जा सकती है। एक ईमानदार इंजीनियर का भ्रष्ट ठेकेदारों के गिरोह ने अन्तत: चीफ इंजीनियर की मार्फत, छोटे पद पर एक छोटी जगह तबादला करा ही दिया। उनकी पत्नी भी आर्थिक तंगी के चलते असंतुष्ट रहती थीं, पर अंत में क्षोभ-भरे पति को उन्होंने उत्साहित किया— ‘रोये तो वह जिसने कौडिय़ों पर अपनी आत्मा भ्रष्ट की हो— जिसने रुपयों पर अपना धर्म बेचा हो। यह बुराई का दंड नहीं है। यह भलाई और सज्जनता का दंड है, इसे सानन्द झेलना चाहिए।’ यानी सज्जन क्यों सज्जन हैं और बदमाशी की जड़ कहां है, प्रेमचंद की कहानी में ये सवाल अभी नहीं उठ सके हैं।

                किसान के आर्थिक क्षरण के चलते मजदूर बन जाने का द्वंद्व प्रेमचंद की कितनी ही कथाओं में आया है; जमीन के एक टुकड़े पर न्योछावर किसान का अपनी सर्वहारा-नियति से द्वंद्व! इसी वर्ग-दृष्टि ने ‘पूस की रात’ (माधुरी, मई 1930) को एक महान कहानी बनाया—ठंड से हलकान हल्कू ने कर्ज में डूबी अपनी किसानी को जंगली जानवरों द्वारा, खुद की पहरेदारी में ही, तहस-नहस होने दिया और अपने जैसों की सर्वहारा की नियति को रेखांकित किया। उस रात के किसान से मजदूर में बदलते हल्कू को आज भी इसी प्रक्रिया से गुजरते कौन नहीं पहचानेगा भला!

                और ‘गुल्ली-डंडा’ के गया चमार से तो मेरा व्यक्तिगत परिचय है। बचपन में एक गरीब घर का लड़का हमारे साथ हाकी खेलने आया करता था। उसकी मुखमुद्रा ऐसी थी कि लगता वह लगातार हंस रहा हो। हमारे मैदान में हमसे हाकी मांगकर, हमारी ही बाल से खेलने से वह हमारी धौंस का भी स्वाभाविक शिकार बनता। मैं शरीर में उससे बड़ा था और कभी-कभी झल्लाहट में उस पर मेरा हाथ भी चल जाता। खेल में ‘गलती’ करने के बावजूद उसकी मुस्कराहट मेरी झल्लाहट को बढ़ाने का ही काम करती। एक दिन वह चुपचाप अपने बड़े भाई या चाचा को लेकर आया। वह बलिष्ठ नौजवान बाहर से हमें खेलते देखता रहा और इस नयी उपस्थिति से अनजान मैं और दिनों की तरह उस गरीब खिलाड़ी की डांट-डपट करता रहा। अचानक, जैसे ही एक बार बाल मुझसे नहीं रुकी, उस बलिष्ठ नौजवान ने लपककर मेरे हाथ उमेठ कर पीठ के पीछे जकड़ दिये। बाकी सभी तमाशा देखते रहे— मैं छूटने को छटपटाया, चीखा-चिल्लाया, फिर रुआंसा-अपमानित खड़ा रह गया। वह बीच-बीच में मेरे सिर पर हल्की-सी चपत लगाता और कहता कि यह बाल न रोकने की सजा है। मैं घर जाना चाहता था पर उसने मुझे जाने नहीं दिया— खेलते रहो मैं यहीं से देखता रहूंगा, जितनी बार गलती करोगे सजा दूंगा। मेरे पास सिवाय उसकी बात मानने के कोई चारा नहीं था। पर दोबारा खेल शुरू होने पर ��क गलती पर जब उसने मैदान में घुसकर मुझे दो ठुड्डे लगाये तो मैं जार-जार रोने लगा और जैसे ही उसकी पकड़ ढीली हुयी घर की ओर भाग लिया। वह बलिष्ठ नौजवान दोबारा हमारे बीच नहीं आया। हम जल्द ही फिर पहले जैसे ही खेलने लगे। पर खेल क्या, उस अनुभव के बाद जीवन में भी किसी गरीब को हीन समझना मेरे लिए संभव नहीं रहा !

                इस तरह मैं भी गया चमार को जानता हूं-थानेदार के लड़के ने गुल्ली-डंडा के खेल में बिना पदे खिसकना चाहा तो गया ने उसे घेर लिया, बराबर की गाली दी, और दांत से काटे जाने पर डंडे का पलट वार भी किया। अवसर के अभाव में वह गांव में ही मजदूरी करने को रह गया। थानेदार का लड़का बीस साल बाद उसी इलाके में बतौर जिला-इंजीनियर दौरे पर आया तो उसने बचपन के उस खेल-सखा को ढूंढ निकाला। सामाजिक अन्तर के चलते गया उसका लिहाज करता रहा और बचपन की याद ताजा करने में गुल्ली-डंडा खेलते हुए अफसर की सारी धांधलियों को भी नजरअदांज कर गया। पर दूसरे दिन जब स्थानीय टीमों में मैच हुआ तो गया का खेल वही पुराने रंग में था। किसी ने धांधली करनी चाही तो उसका पुराना रौद्र-रूप भी दिखा। जाहिर हो गया कि उसने अपने अफसर-मित्र को अपने जोड़ का नहीं समझा था— ‘वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूं।’

                प्रेमचंद की गिनती की प्रेम कहानियों के बीच से यदि एक यादगार कहानी चुननी हो तो मैं ‘घासवाली’ (माधुरी, दिसम्बर 1929) चुनूंगा। कहानी की नवविवाहिता रूपवती नायिका मुलिया हाड़-मांस की दलित औरत है, जो शोषणकारी प्रसंगों और कोमल मानवीय भावनाओं के द्वंद्व को क्षमता भर जीने में जुटी रहती है। गांव के रंगीले ठाकुर चैन सिंह को भी ऐसे देहातों के समाज से परिचित लोग जानते ही हैं। इस शादीशुदा नौजवान का सहज मानना है कि ‘नीच-जाति की औरत जरा-सी घुड़की-धमकी, या जरा-सी लालच से तुम्हारी मुट्ïठी में आ जायेगी।’ मुलिया का पति महावीर चाहता तो है कि उसको कलेजे में बिठा कर रखे पर फिर उसके इक्के के घोड़े के लिए घास कौन छील कर लाए। मुलिया उसके प्रेम पर निहाल है, अगर चैन सिंह की कारस्तानी उसे बता दे तो महावीर उस ठाकुर के खून का प्यासा हो जाय। पर   ‘फिर न जाने क्या हो!’ आखिर ठाकुरों की कृपा से ही घास मिलनी है। चैन सिंह जब ज्यादा घेरता है तो मुलिया द्वारा विरोध में उपरोक्त द्वंद्व मुखर होता जाता है— ‘अगर मेरा आदमी तुम्हारी औरत से इसी तरह बातें करता, तो तुम्हें कैसा लगता।’ ‘इसीलिए न कि जानते हो कि मैं कुछ नहीं कर सकती। जाकर किसी खतरानी (क्षत्राणी) के चरणों पर सिर रखो, तो मालूम हो कि चरणों पर सिर रखने का क्या फल मिलता है। फिर यह सिर तुम्हारी गर्दन पर न रहेगा।’ ‘मुझे किसी बड़े घर का नाम बता दो, जिसमें कोई साईस, कोई कोचवान और कोई कहार, कोई पण्डा, कोई महाराज न घुसा बैठा हो?… और वे औरतें जो करती हैं, ठीक करती हैं। उनके घरवाले भी तो चमारिनों और कहारिनों पर जान देते फिरते हैं। लेना देना बराबर हो जाता है।’ ‘मेरी एक नहीं दोनों आंखें फूट जायें तब भी वह (महावीर) मुझे इसी तरह रखेगा। मुझे उठावेगा, बैठावेगा, खिलावेगा। तुम चाहते हो, मैं ऐसे आदमी के साथ कपट करूं?’

                प्रेमचंद ने यदि चैन सिंह को खालिस सवर्ण नर-पिशाच बना दिया होता तो मुलिया भी एक कृत्रिम दलित देवी बन कर रह जाती। औरत के धिक्कार से वह दूसरा ही आदमी हो गया—सिर्फ मुलिया के प्रति ही नहीं, यहां तक कि अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों से व्यवहार को लेकर भी। चैन सिंह ने जब पाया कि मुलिया की गरीबी उस पर भारी पड़ रही है और वह निर्वाह के लिए कचहरियों के आगे पति के इक्के की मंदी को घास बेचकर पूरा करने में बेजा हरकतों में पड़ रही है, तो उसने महावीर के इक्के को, बेगार में नहीं, रुपये रोज पर अपनी सवारी में रख लिया—इस ताकीद के साथ कि घास लेकर घरवाली को बाजार मत भेजा करो।

                जो कोई कहानी नहीं कर सकती, प्रेमचंद ने वैसा कुछ भी इस प्रेम-कहानी में नहीं कराया। ऊंच-नीच, भले-बुरे में बंटा वह समाज वैसे का वैसा ही रहा। स्वार्थ और लम्पटता, प्रेम और विश्वास, मुलिया और महावीर, मुलिया और चैन सिंह—प्रेमचंद ने अपनी ओर से कुछ भी नहीं जोड़ा। पर न जाने कैसे अंत में यह मुलिया और चैन सिंह की परस्पर मानवीय-विश्वास की कहानी बन जाती है। कचहरी में अपने बेजा व्यवहार के लिए मुलिया के सफाई देने पर जब चैन सिंह ने जोर देकर कहा कि उसे ऐसा कभी नहीं लगा तो मुलिया मुस्कराकर बोली—मुझे तुमसे यही आशा थी और है। इस तरह एक दलित औरत के लिए उसी विश्वास से जिससे उसने जातीय लम्पटता को दुत्कारा था, प्रेम के आस्वाद को स्वीकारना भी संभव हो सका। सहसा यह कहानी यांत्रिक भौतिकवाद से अलग द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की जमीन पर खड़ी हो जाती है।

                परकाया प्रवेश की सीमा को, लेखन के संदर्भ में, प्रेमचंद ने इस तरह व्यक्त किया— ‘अगर वह खुद उसी दलित समाज का एक अंग है, तब तो उसका काम कुछ आसान हो जाता है क्योंकि वह अपने मनोभावों का विश्लेषण करके अपने समाज की वकालत कर सकता है। लेकिन वह अधिकतर अपने मुवक्किल की आन्तरिक प्रेरणाओं से, उसके मनोगत भावों से अपरिचित होता है। ऐसी दशा में उसका पथ-प्रदर्शक मनोविज्ञान के सिवा कोई और नहीं हो सकता है।’ (साहित्य और मनोविज्ञान)

                एक संगत तुलना होगी ‘सद्गति’ (1930) की ‘दंड’ (1925) से। दोनों कहानियों में व्यवस्था के चालक सिरे को पकड़े पशुवत मनुष्य की मनमानी नहीं चल पाती, पर दोनों में घटनाक्रम का निर्वाह अलग-अलग हुआ है। ‘सद्गति’ में साइत निकलवाने के लिए दुखी चमार पंडित घासीराम की बेगारी में मर जाता है पर पुलिस की तहकीकात के भय से उसके टोलेवाले तक मुर्दे को उठाने नहीं आते, पंडित को ही उसे रस्सी से घसीटकर गांव से बाहर करना होता है— जानवरों द्वारा खाये जाने के लिए। ‘दंड’ में कचहरीबाज जगत पांडे ने मुकदमा जीतने के लिए जंट साहब मिस्टर सिन्हा को घूस पहुंचाई पर विपक्षी राजा साहब से बड़ी रकम पहुंच जाने पर जब सिन्हा ने पांडे के खिलाफ फैसला दे दिया, तो वह जंट के बंगले के बाहर इस ठसक से भूखा-प्यासा धरने पर बैठ गया— ‘भगवान के दरबार में विप्रों का ही राज्य है। विप्र का धन लेकर कोई सुखी नहीं रह सकता।’ बला टालने को अन्तत: सिन्हा उसे मुंहमांगी कीमत देने को राजी हो गया पर तब तक जगत पांडे उसके दरवाजे पर ही मर लिया। यह ब्राह्मण का शव था। किसी को भी पुलिस की तहकीकात के भय ने नहीं रोका। जब शव उठा तो हजारों आदमी साथ थे। यानी एक निरीह दलित और एक निरीह ब्राह्मïण के शवों के निर्वाह में भी जमीन आसमान का अन्तर! प्रेमचंद की दलित जीवन की कथाओं ने सवर्ण मानसिकता को पीढ़ी दर पीढ़ी उसके जातिगत ‘सदाचार’ से मुक्त कराने की भूमिका बखूबी निभायी है। यहां तक कि एक ध्रुवीय ‘कफन’ को लेकर भी वे इसीलिए प्रेमचंद के प्रति ऋणी हैं।

                प्रेमचंद ने उस जमाने में रचा जिसमें भारतीय भूखंड का एक राष्ट्र के अस्तित्व में बदलना तो तय बात थी, पर उन उपकरणों में भयानक खींचतान होती रही जो इस अस्तित्व रचना में सक्रिय थे। आर्थिक फलक पर साम्राज्यवाद, जागीरदारी, जमींदारी, स्वदेशी, में कशमकश और सामाजिक फलक पर आर्य समाज, ब्रह्मसमाज, द्रविड कषगम जैसे आंदोलन, और गांधी, आम्बेडकर, नेहरू, जिन्ना, विवेकानन्द, भगत सिंह, जैसे मसीहा छाये हुए थे। इस समूचे परिदृश्य को स्वराज की ललक एवं आधुनिक जीवन-मूल्यों ने संभव किया था, और इसके आर-पार अपनी-अपनी भूमिका में नौकरशाही, बुर्जुआजी, राष्ट्रीय-पूंजी, किसान-मजदूर की सक्रियता का प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न असर काम कर रहा था। 1936 में प्���ेमचंद के निधन के समय इसके नकारात्मक परिणामों—विभाजन,पूंजीवादी-वर्चस्व, बुर्जुआ-परजीविता, नौकरशाही-नियंत्रण, साम्प्रदायिक-संकीर्णता— की वे भविष्यवाणी नहीं कर सकते थे। पर लक्षणों को चिन्हित करने में प्रेमचंद शायद ही चूके हों। उन्होंने उपरोक्त हर उपकरण को परखा अपनी ढेरों कहानियों में—बेशक अपने संस्कार, अपनी शंकाओं और अपने समाधानों को भी जगह दी।  ठ्ठ ठ्ठ

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( जुलाई-अगस्त, 2016), पेज 20 से 27

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