9 मई 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका की ओर से लेखक से मिलिए कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें लेखक सोना चौधरी से छात्रों, शोधार्थियों तथा शिक्षकों ने संवाद किया। सोना चौधरी के तीन उपन्यास प्रकाशित हुए हैं, ‘पायदान’, ‘विचित्र’ और ‘गेम इन गेम’। इस अवसर पर साहित्यकर्मी व पूर्व आई पी एस अधिकारी श्री विकास नारायण राय तथा सामाजिक कार्यकर्ता व सदभावना मंच के संयोजक श्री सुरेन्द्रपाल सिंह उपस्थित थे। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात लेखक श्री ओमसिंह अशफाक ने की। इस अवसर पर सोना चौधरी ने  अपने वक्तव्य में लेखक बनने की प्रक्रिया साझा की। संवाद सत्र में श्रोताओं के बहुत से सवालों के उत्तर दिए उनके अंश यहां प्रस्तुत है। प्रस्तुति – डा. सुभाष चंद्र

 मेरे सामने ‘देस हरियाणा’ पत्रिका का बैनर देख रही हूं। उस पर लिखा है: अभिव्यक्ति का मंच। मैं सोच रही हूं कि क्या वास्तव में ही अभिव्यक्ति का मंच मिलता है। 1947 से लेकर आज तक मुझे नहीं लगता कि महिलाओं को सही मायने में अभिव्यक्ति मंच मिला है। जो एक आध कोई दुस्साहस कर भी लेता है तो वो उसके परिणाम भी भुगतता रहता है। कुरुक्षेत्र महाभारत के युद्ध की धरती है तब से लेकर आज तक नारी के संदर्भ में कुछ खास नहीं बदला है, हो सकता है कुछ कहने का तरीका बदल गया हो। लेकिन स्थिति आज भी वहीं की वहीं है, हम आज भी लड़ रहे हैं। 1947 वाली आजादी को सही मायने में जीने में कितना वक्त लगेगा। सोच तो रहे हैं कि हम आजाद हैं और सुन भी रहे हैं कि आजाद है, लेकिन क्या वाकई आजाद हैं।

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लेखक से मिलिए कार्यक्रम में सोना चौधरी

                मेरे कुछ इस तरह के अनुभव रहे हैं कि जो भी मिलता है, समझाकर चला जाता है। कौन मिलता है समझने वाला यहां, जो मिलता है समझा के चला जाता है। मुझे तो आज तक कोई समझने वाला मिला नहीं। उसमें महिलाएं भी हैं, पुरुष भी हैं, दोस्त भी हैं, रिश्तेदार भी हैं।

                सबकी अपनी दृष्टि होती है, उसके साथ हम अपना एक तर्क जरूर जोड़ देते हैं कि यदि आप चाहती हैं कि आपको स्वीकार किया जाए तो पहले आप हमें स्वीकार कीजिए। हमें सही बोलिए, तभी आप सही हो सकती हैं।

                ये ‘गेम इन गेम’ पुस्तक लिखने का जो दुस्साहस किया है, उसके परिणाम मैं आपसे साझा करूंगी, जो मैं अब झेल रही हूं। इससे पहले ‘पायदान’ उपन्यास लिखा था। उसके लिए मुझे काफी सुनना पड़ा था। यहां तक कि मेरे घर में वो किताबें बक्से में रखी हुई हैं। वो किसी को दिखाई नहीं जाती कि हमारी बेटी लिखती है। ये कह दिया जाता हे कि ये लेखक है, लेकिन ये नहीं दिखाया जाता कि क्या लिखा है। क्योंकि उनको लगता है कि जो मैं लिखती हूं उनके हिसाब से समाज के हिसाब से …। कहीं न कहीं सवाल उठाता है और हर आदमी सवाल से बचना चाहता है। जैसे आजकल मेरे सामने बहुत से सवाल उठाए जा रहे हैं। ईमानदारी से कहूं तो कुछ सवालों से मैं भी बचने की कोशिश करती हूं। सोचती हूं कि इन इन सवालों का जबाव मुझे न देना पड़े, क्योंकि जो सवाल आपको कचोटते हैं, तकलीफ देते हैं, जो गुनाह आपने किया नहीं, फिर भी उसकी सजा देते हैं। वो सवाल सच में बड़े दुखदायी होते हैं।

                पायदान में खेल-कूद के बारे में लिखा था। पहला ऐसा उपन्यास था, खेल-कूद जिसका विषय था। पायदान में खेल का थोड़ा सा हिस्सा था। खेल-कूद को इसलिए चुनती हूं क्योंकि मैंने खेल-कूद को जिया है। एक एक पल को मैने महसूस किया है।

                मुझे लगा कि अभी बहुत कुछ आना बाकी है। लोगों से मिलती थी-सुनती थी तो लगता था कि मुझे इन बातों को सामने लाना चाहिए।

                इस बीच ‘विचित्र’ उपन्यास आया। महिलाओं की वही स्थिति है, चाहे आप खेल-कूद में  लें ले या समाज में, घर में या बाहर, सबकी स्थिति वैसी ही है।

                मुझे अपने आस-पास से ज्यादा सी सहमति नहीं मिलती, वो इसलिए कि कहीं न कहीं मेरा अपना विचार है, मेरी अपनी सोच है। जहां पे भी एक लड़की अपनी स्वतंत्र सोच रखेगी, अपने निर्णय लेगी।जहां वह कहेगी कि मुझे सोचना-समझना-महसूस करना और बोलना भी आता है, वहीं पे उसका बाईकॉट होगा। हमें तो ये समझा के रखा जाता है कि आप मूक-बधिरों की तरह रहिए तो आप सुखी हैं। जहां आपने आवाज उठाई, वो आवाज आप कैसे उठा सकती हैं, आपको हक नहीं है। क्योंकि दोयम दर्जा तो पैदा होते ही मिलता है यहां। हम सब अपने सामाजिक परिवेश को देख रहे हैं, चीजें उतनी बदल नहीं रही हैं। क्योंकि जब पैदा होते हैं तो यही कहा जाता है, ‘ऐ, छोरी होगी’, ‘आग्या पराया धन’, ‘इब या और सिर पे बोझ आगी’। इस तरह की बातें हर लड़की के  जन्म होने पर होती हैं, अगर एक-आध के साथ ऐसा नहीं है, तो बड़े ताज्जुब की बात होगी। हमारे यहां चाहे दस बेटे हों और एक बेटी होगी तो उसके लिए कोई रो नहीं रहा तो हंसता भी नहीं है। बेटा एक हो जाए पहले तो फैमिली कम्पलीट है, यदि पहले बेटी हो गई तो एक बेटे के लिए चाहे दस बेटियां हो जाएं। एक बेटे के लिए सारे यत्न करेंगे। यही स्थिति आज भी है, बहुत कुछ नहीं बदला है।

                मैं अभी आ रही थी, पानीपत की दीवार पे बड़े से नारे लिखे हुए थे कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। लेकिन इन पर कोई अमल नहीं हो रहा। असल में ये दीवारों की बजाए दिमाग पर लिखे जाने चाहिएं, तब जाकर कोई सुधार होगा। महसूस करने से होगा। और महसूस कब होगा, जब उस तरह के अवसर दिए जायेंगे। चिल्लाने-बोलने से नहीं, बल्कि करने से बदलता है।

                जब मुझे कुछ चीजें जो खराब लगती थी। एक डायरी मेरे पास थी, आठवीं कक्षा में। मैं डायरी लिखती थी कभी-कभी घर में इस बात के लिए पिटाई भी होती थी कि अपना समय बरबाद करती है, पढऩे-लिखने का। डायरी क्यों लिखती है।

                मेरे घर में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था, मैं किसानी परिवार से संबंध रखती हूं। मेरी मां एक गृहिणी है। पढऩे की सामग्री ढूंढती रहती थी। मुझे सोचने की बहुत आदत है, उसके लिए खुराक तो चाहिए। रोहतक जैसे माहौल में वो कहां मिलेगी।

                बड़ी दिलचस्प बात है। एक बार मैं पंचकुला चली गई वहां आधार प्रकाशन है। वो पहली साहित्य की दुकान थी, जहां से किताबें मिलती थी। सात-आठ किताबे चुनने के बाद पैसे कम पड़ गए। मैने कहा कि मुझे सारी किताबें चाहिएं और मेरे पास पैसे नहीं है, इन किताबों के पैसे मैं बाद में भेज दूंगी। उन्होंने कहा कि हरियाणा से वो भी लड़की, पढऩे के लिए किताबें मांग रही है। उनको विश्वास नहीं हुआ। हरियाणा के बारे में ये छवि थी कि लोग साहित्य नहीं पढ़ते हैं।

                जिस माहौल से मैं निकली हूं। वहां किताबे, साहित्य बहुत ज्यादा नहीं था। मेरे पास अपनी सोच व संवेदनशीलता थी। जिसने मुझे यहां तक मजबूर किया। क्योंकि कोई भी कहानी आपके आस-पास से होकर नहीं गुजरती, आपके अंदर से होकर गुजरती है। कहानी आपके अंदर घटती है, आपको तोड़ती-मरोड़ती है, हंसाती-रुलाती है और सोचने पर मजबूर करती है। आपकी रातों की नींद खराब करती है, दिन का चैन छीनती है। तब वो कहानी बनती है, कहानी इतनी आसानी से नहीं बनती।

                लेखक भी इतना आसानी से नहीं बनता। मुझे तो हर पल एक नया अनुभव मिला है। मैंने तो यही सीखा है कि अपन��� अनुभव ही अपने जीवन के सबसे अच्छे शिक्षक हैं व मार्गदर्शक हैं। मेरे लिए मेरा अनुभव एक नया शिक्षक रहा है। जिंदगी को मैंने हर पर नए अंदाज से जिया और देखा है। हर ठोकर को कुछ इस तरह लिया है कि ‘जिंदगी में गम मिले इतने कि सहने की आदत सा पड़ गई है, एक भूले नहीं, दूसरे की आदत सी पड़ गई है’। जब छोटी सी चोट भी लगती है, तो सारा ध्यान उसी पर फोकस हो जाता है, लेकिन जब बड़ी चोट लगती है, तो छोटी चोट को भूल जाते हैं और बड़ी चोट पर शिफ्ट हो जाते हैं।

                मेरे साथ बहुत अनुभव रहे हैं कभी उंगली टूट गई, कभी पैर टूट गया, कभी घुटने। इस तरह हर लड़की के साथ होता है। शारीरिक व मानसिक तौर पर उनको हर पल किसी न किसी तकलीफ से गुजरना पड़ता है। जहां वो बोलना शुरु करती है, वहां उसको सवालों का सामना भी करना पड़ता है।

                हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, हम संस्कारों और आधुनिकता के द्वंद्व में है। इसमें हमारे विचार खोते चले जा रहे हैं। हम गलत को गलत सोच कर भी बहुत बार आवाज नहीं उठा पाते।

                मैं जब छोटी थी, तो अंदर से बहुत विद्रोह था, गलत को गलत कहने को और बरदास्त न करने का विद्रोह। लेकिन उस समय मेरी आवाज सुनता कौन। कोई नहीं सुनता। ‘पायदान’ व ‘विचित्र’ तक नहीं सुनी। अब सुन ली गई, लेकिन मेरे साथ ये भी जोड़ दिया गया कि मेरे साथ ही ये सब कुछ हुआ है। पहले आवाज क्यों नहीं उठाई। ये सवाल आज भी मैं झेल रही हूं।

                ‘गेम इन गेम’ में एक प्रसंग है महिला का महिला से अंतरंग संबंध। महीनों तक आप घर से बाहर रहते हैं, यदि आपका भावनात्मक लगाव है और कभी-कभी शारीरिक में भी आ जाती है, तो ये बहुत बड़ा सच है। इसमें मैने कुछ नया नहीं लिखा। ईस्मत चुगताई ने ‘लिहाफ’ में ये लिखा भी है। सवाल इस तरह से पूछा जाता है कि क्या आपके साथ ऐसा हुआ। मेरे साथ हुआ कि नहीं हुआ, लेकिन मैंने उस समाज को जिया तो है। उस माहौल का हिस्सा तो हूं ही कहीं न कहीं। इससे क्या फर्क पड़ता है कि वो मेरे साथ हुआ या मेरी किसी दोस्त के साथ हुआ।

                ‘गेम इन गेम’ पुस्तक को लेकर व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं, कि आप बताइए आपके साथ किस जगह क्या हुआ, वो लोग कौन थे, उनके नाम क्यों नहीं लेते। अगर समाज में कोई बुराई है और हम आवाज उठाते हैं तो उन्हीं के साथ जड़ दिया जाता है कि आपके साथ ऐसा हुआ है क्या। इसका मतलब ये हुआ कि हमारे साथ न हुआ हो तो हम आवाज ही ना उठाएं। यदि हम पर कोई हमला करे तभी हम जागें, नहीं तो हमें कोई जरूरत है ही नहीं। जब हम आवाज उठाती हैं तो या तो दबा दी जाती है या दिशा ही बदल दी जाती है।

                ‘गेम इन गेम’ पुस्तक में जो लिखा है वह सही है। सभी जगह यौन-उत्पीड़न है। घर में, दफ्तर में, मीडिया में सभी जगह तो होता है। असल में मुद्दों पर बात करने की बजाए व्यक्तिगत हमलों में अधिक रुचि है। हमें व्यवस्था सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं है। बार-बार इसी तरह से सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या आपके साथ सब घटित हुआ। तब आपने आवाज क्यों नहीं उठाई। इतने सालों बाद आपने क्या सोचकर लिखा।

                ये लेखक की स्वतंत्रता है कि वह कब लिखेगा। कब उसकी रचना बनेगी। केरल में खिलाडिय़ों ने आत्महत्या की, मुझे बहुत तकलीफ हुई। उन लड़कियों से मेरा कोई व्यक्तिगत संबंध नहीं था, लेकिन मुझे ऐसा लगा कि यह सब कुछ मेरे साथ हुआ। खेल-कूद में किसी लड़की के साथ कुछ ज्यादती होती है तो मुझे वो मेरी तकलीफ लगती है। मेरे आस-पास जो चीजें घट रही है, जब तक मैं ये ना सोचूं कि मेरे साथ घट रही हैं, तब तक मैं लिखूं कैसे, महसूस कैसे करूं। जब हम महसूस करना शुरु करते हैं तो हम सवालों के घेरे में खड़े हो जाते हैं।

                खेल मंत्री जी का बयान आया कि ‘सोना चौधरी हमसे आकर मिलें। रिपोर्ट लिखवायें तो हम इस पर कार्रवाई करेंगे।’ मैं क्या रिपोर्ट लिखवाऊं। मैं तो मुद्दों की बात कर रही हूं। यदि आप सुधारना चाहते हैं तो मैंने उपन्यास में लिख दिया है। आप ऐसी नीतियां बनाइए कि कोई हिम्मत ना कर सके बदतमीजी करने की। ये कोई सुनना नहीं चाहता। दो पंक्तियां मेरे दिमाग में आई थी। ‘बंद दरवाजों पे आवाज लगाया न करो, सिस्टम बहरा है इसे दिल की सुनाया न करो’।

                सबसे पहला हमला महिला के चरित्र पर होता है। खिलाडिय़ों की समस्या उठाते हुए यदि मैं भावुक हो गई तो मीडिया ने उसे यौन-उत्पीड़न का रंग दे दिया। खबर तो बिक गई, लेकिन मुद्दे दब गए। जिन मुद्दों के लिए यह किताब लिखी है, उन मुद्दों पर बात नहीं हो रही है। मेरी व्यक्तिगत जिंदगी पर बात हो रही है। यदि इस तरह से किया जाएगा तो कोई लड़की सच बोलने का साहस नहीं करेगी। सच बोलना कितना मुश्किल है, यह मैंने गेम इन गेम किताब लिखने के बाद जाना। अब मुझे अहसास हुआ कि लोग सच क्यों नहीं बोल पाते हैं। सच बोलने के बाद उसके परिणाम बहुत कष्टदायक हैं। मुझे लगता है कि जैसे मैं अपने ही माहौल में अकेली पड़ गई हूं। आप इस किताब को पढि़ए आपको अच्छा लगेगा।    धन्यवाद।

संवाद सत्र :

 मैं रोहतक में पैदा हुई। मेरी औपचारिक शिक्षा रोहतक में हुई। दिल्ली से चार साल कम्प्यूटर इंजीनियरिंग किया है, फिर मैने अमेरिका से इवेंट मैनेजमेंट पढ़ा है और सिंगापुर युनिवर्सिटी से लीडरशिप पढ़ा है। अब मैं बनारस में हूं।


लिखने से जो सम्मान मिला है, उसकी चर्चा मैं तब करती, यदि मुझे सम्मान के रूप में सम्मान मिलता। आज पहली बार एक लेखक की हैसियत से मुझे कुरुक्षेत्र में बुलाया है। तीन उपन्यास लिखने के बाद हरियाणा में मुझे पहली बार यहां पे बुलाया है, किसी संवाद व विचार-विमर्श के लिए। एक छोटा सा एक कार्यक्रम हिसार में हुआ था, लेकिन तीन उपन्यास लिखने के बाद आज यहां पर चर्चा हुई है।

                एक चीज है कि दर्द जब आपके अंदर है तो हंसी कहां से आए। जो भी आपके अंदर हैं। हंसी है तो भी खुशी है तो भी। आप इनसे जूझते हैं। आजकल इन्हीं सवालों से जूझ रही हूं। इसका मतलब ये नहीं कि जीना छोड़ दूंगी या लिखना छोड़ दूंगी और ज्यादा घसीटूंगी। ‘पायदान’ आया था तो भी अटैक हुए थे, विचित्र आया तो भी अटैक हुए थे। अब ‘गेम इन गेम’ आया। ‘गेम इन गेम’ के बाद क्या आयेगा ये कहना तो मुश्किल है। सूरज हमेशा तप कर ही दूसरों को रोशनी देता है। शायद ये मेरा तपने वाला वक्त चल रहा है। कहीं न कहीं कुछ तो रोशनी निकलेगी।


मुझे साहित्य से बढ़कर कोई रास्ता नजर नहीं आता। साहित्य और शिक्षा ही एक ऐसी चीज है जो हमें सारे पाखंण्डों से दूर कर सकती है। कहीं न कहीं हम भी उन चीजों का हिस्सा हैं, न हम विरोध करते हैं, न हम बोलते हैं। कहीं न कहीं मौन स्वीकृति तो हम भी दे रहे हैं, बढ़ावा दे रहे हैं।

                हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है। यहां बेटियों को बराबर के हक सिर्फ कागजों पर हैं। अभी भी उनको संपत्ति में हक नहीं मिला है। उनके हस्ताक्षर करवा लिए जाते हैं। मुझसे भी हस्ताक्षर करवाए गए हैं। संपत्ति में हक नहीं मिला है। ये शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए कि संपत्ति में बेटियों का अधिकार है, तुम इसको लो। कोई पाठ्यक्रम इसे नहीं पढ़ायेगा। उसमें ये पढ़ाया जाता है कि राम खाना खा, रमा झाड़ू लगा। पहली कक्षा में मात्रा जब सीखता है तो वह सीखता है कि राम तो राजा बेटा है, लेकिन रमा तो पैदा ही झाड़ू लगाने के लिए हुई है। इस मानसिक संरचना के साथ हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं।

                हम अपने परिवेश से कटकर नहीं रह सकते। हम��ं उसी में रहते हुए खुद को बदलते हुए उसे बदलना है। मालिक और मजदूर का जो रिश्ता है। मालिक नियम-कायदे बनाता है और मजदूर उनका पालन करता है। उसी तरह पुरुष शुरु से ही नियम बनाता आया है। महिला नियम बनाती तो उसमें महिला की दृष्टि शामिल होती। शास्त्रों में भी यही व्यवस्था है। एक स्वार्थ का ढांचा है, जो चलता आ रहा है। यदि ढांचा टूट गया तो सारा समाज सुखी हो जाएगा। लेकिन शासन करने के लिए एक सहन करने वाला भी तो चाहिए।


लड़कियों को पढ़ाया तो जा रहा है, लेकिन उनको पढ़ा कर व्हील चेयर पर बिठाकर धक्का मार दिया जाता है। लड़कियों को पढ़ाया इसलिए जाता है कि उनकी शादी के लिए जरूरी है। लोगों को पोस्ट-ग्रेजुएट मेड चाहिए होती है, पार्टनर नहीं।


बेटे चार हैं और जमीन चार एकड़ है तो एक एक एकड़ सबको स्वत: ही आ जाती है। अगर एक बेटी है तो चारों भाई एक तरफ खड़े हो जाते हैं और उस बेटी को हिस्सा नहीं मिलता। उसे उसका हिस्सा दे दीजिए। उसका कैरियर दे दीजिए, बाकी सब काम वो खुद कर लेगी। नजर का इलाज तो डाक्टर कर सकता है, लेकिन नजरिया तो हमें खुद ही बदलना होगा।
महिला सशक्तिकरण की नीतियों में कुछ ऐसा हो कि ये अनिवार्य हो जाए कि बेटी की संपत्ति बेटी को ही मिले, नहीं तो वो सरकारी खाते में चली जायेगी, तभी उसको संपत्ति मिल पाएगी।


मेरे मां-बाप ने मुझे बेटे की तरह पाला है, लेकिन मैं सोचती हूं कि मुझे बेटे की तरह क्यों पाला है।

लड़कियां भी इंसान है, उनमें भावनाएं हैं। हमारे समाजीकरण का सवाल है। बहुत सी महिलाओं की सोच पितृसतात्मक है और बहुत से पुरुष स्त्रीवादी नजरिये से सोचते हैं। यहां सवाल स्त्री बनाम पुरुष का नहीं, बल्कि बराबरी का है।


मैंने जो लिखा है वो सच के आधार पर लिखा है। हो सकता है उसका किसी के अनुभवों से तालमेल न हो। मेरे कहना है कि बात मुद्दों की हो। महिला के हक के मुद्दे हों, खेल संबंधी हों या उनकी आजादी को लेकर हों। ये सच है कि अपने ही शहर, गली व घर में मैं सुरक्षित महसूस नहीं करती। सुरक्षा का माहौल नहीं है। दिन छिपने के बाद परिवार वाले पूछने लगते हैं कि आप कहां पर हैं उनको सुरक्षा की फिक्र होती है। लेकिन भारत से बाहर जाती हूं तो रात भर बाहर रहने पर भी परिवार को सुरक्षा की चिंता नहीं होती, क्योंकि माहौल उनको सुरक्षा का विश्वास दिलाता है।

खेलों व समाज में अनुभवों के आधार पर साहित्य रचना की है। लड़कियों को यही संदेश है, कि लड़की होना कोई पाप नहीं है। उसमें ताकत है उसको पहचानने की जरूरत है।


 

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