सामयिकी

पूरी दुनिया की नजर अमरीका पर है, ऐसा हर दस  साल बाद होता है। नवम्बर 2014 में अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव होना है। अभी पद की उम्मीदवारी के चयन के लिए चुनाव अभियान चल रहा है। जुलाई अंत तक दोनों पार्टियां अपने-अपने उम्मीदवार चुन लेंगी। इस पूरे अभियान में विश्व के जनमानस की गहरी दिलचस्पी होने का सबसे बड़ा कारण है अमरीका का सर्वोच्च महाशक्ति होना। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमरीकी राष्ट्रपति शक्तिशाली शख्सियत होती है, जो पूरी दुनिया के हर मामले में निर्णायक दखलदांजी करती है। बेशक, इस दखलदांजी के भयानक परिणाम  निकलते रहे हैं, लेकिन ये आज तक जारी हैं।  अमरीकी आर्थिक शक्ति कमजोर होने के बावजूद भी। चीन-रूस की टोका-टाकी भी इस खुली धौंसपट्टी / दादागिरी पर कोई खास लगाम नहीं कस पा रही। अमरीकी डालर आज भी अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा है व लगातार मजबूत होता जा रहा है। अब अगर पूरी दुनिया का राजनैतिक-आर्थिक दायरा अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में गहरी दिलचस्पी रखे तो आश्चर्य क्या है? चुनाव अभियान की मीडिया कवरेज ने इस दिलचस्पी के क्षेत्र को बढ़ाकर आमजन को भी इसमें शामिल कर लिया है। ये एक तरह से अच्छा ही है, क्योकि इस एक शख्स के फैसलों से पूरे जगत के जनमानस का रोजमर्रा का जीवन प्रभावित होता है। हम भारतियों का तो कहना ही क्या, हमारे उच्च व मध्य वर्ग के लिए तो अमरीका ड्रीमलैंड है और अमरीकी जीवन शैली का रहन-सहन सर्वोच्च पसंद।

पिछले छह महीने से भी ज्यादा समय से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चल रही है। सभी 52 राज्यों में दोनों पार्टियों (रिपब्लिकन व डेमोक्रेट) के उम्मीदवारों के बीच घमासान जारी है। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार पद की दौड़ में खरबपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने सभी प्रतिद्वंद्धियों को बहुत पीछे छोड़ दिया है, जबकि डेमोके्रेटिक पार्टी में हिलेरी क्लिंटन व बर्नी सैण्डर के बीच मुकाबला जारी है, लेकिन इस बार का अभियान खासा हंगामेदार और उम्मीद भरा है। डेमोक्रेट बर्नी सैण्डर और रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी चन्दे के मामलें में एक जैसी राय रखते हैं। दोनों कह रहे हैं कि अभियान के दौरान कार्पोरेट घरानों से चुनावी चंदा नहीं लेना चाहिए, लेकिन इस एकमत के कारण बिल्कुल विपरीत है। बर्नी कह रहे हैं कि कार्पोरेट घराने करोड़ों डालर चुनावी चंदा देकर एक तरह की ‘इनवैस्टमैंट’ करते हैं। बाद में अपने पक्ष की नीतियां बनवाकर इस रकम का कई हजार गुणा वसूल करते हैं। इन सारी भारी भरकम रकम का बोझ आम अमरीकी नागरिक उठाता है। (भाई ऐसा तो हर देश में हो रहा है) बर्नी का पूरा अभियान आम अमरीकियों  के छोटे-छोटे योगदान से चल रहा है। ट्रम्प ने शपथ पत्र में अपनी सम्पति की कुल कीमत 10 अरब डालर बतायी है। उन्होंने पूरे चुनाव अभियान में किसी भी कार्पोरेट से डोनेशन नहीं लिया है। उनकी राय के अनुसार तो केवल अरबपति ही उम्मीदवार होने चाहिएं।

हिलेरी इस मसले पर फंसी हुई हैं, चूंकि बड़े डोनेशन उन्होंने ले रखे हैं, लेकिन मजबूरी के चलते उन्हें कहना पड़ रहा है कि वो कार्पोरेटी लालच पर लगाम लगाएंगी। बर्नी उनसे बार-बार पूछ रहे हैं कि ये कैसे संभव है कि उन्हीं का धन इस्तेमाल करें और उन्हीं के नुक्सान की नीतियां बनाएं। सच है बर्नी भाई हमारे हरियाणा में तो कहते ही हैं कि जिसकी खावै बाकळी, उसी की गावै रागनी। बर्र्नी, ट्रम्प से भी पूछ रहे हैं कि आपने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में किस-किस उम्मीदवार को कितना-कितना चंदा दिया था। ट्रम्प बिल्कुल मूक है। चुनाव अभियान की शुरूआत में ही सारे मीडिया और सभी सर्वेक्षणों ने बर्नी सैण्डर को बहुत हल्के में  लिया था, लेकिन बर्नी के आर्थिक संकट, मंदी-महंगाई, बेरोजगारी व प्रदूषण सभी समस्याओं के लिए वाल स्ट्रीट (स्टोरियों का अड्डा), कार्पोरेटी लालच और जैव ईंधन कम्पनियों को जिम्मेदार ठहराया और इन पर खुला हमला बोल दिया। इस तरह, बदहाल अमरीकी जनमानस के बीच उनकी प्रसिद्धि का ग्राफ बढ़ता गया और वे एक के बाद दूसरी जीत दर्ज करते गए। उन्हीं के शब्दों में एक बानगी  देखिए, बर्नी यहां कैलिफोर्निया राज्य की एक जनसभा में बोल रहे हैं कि दुनिया बदल रही है, लाखों-लाख अमरीकियों में वर्तमान राजनैतिक आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ जबरदस्त रोष है। आज डेमोक्रेटिक पार्टी के पास एक मौका है कि वो अपने दरवाजे इन लोगों के लिए खोल दे और इन सबका जोरदार स्वागत करे, क्योंकि ये सब लोग वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाने हेतु एक लंबी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार होकर आए हैं। ये सब लोग वालस्ट्रीट से बड़े-बड़े निगमों के लालच से और जैव ईंधन कम्पनियों के प्रदूषण से टकराने के मूड में आए हैं और ये तीनों राक्षस ही इस सुंदर ग्रह का सत्यानाश कर रहे हैं।

क्या कोई सोच भी सकता था कि अमरीकी राजनीति में कभी ऐसा तूफान भी आएगा कि इसकी चूलें हिल जाएंगी। 2004 के चुनाव में जानसंस के रूप में ऐसी ही छोटी सी धारा थी। उसे नजरअंदाज करके मार दिया गया था। 1968 में वियतनाम युद्ध विरोधियेां ने ऐसा ही तूफान उठाया था, लेकिन इस बार सबसे अलग है ये बर्नी सैण्डर की हुंकार जिससे एक ओर कार्पोरेट कांप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर समस्त अमरीका के युद्ध विरोधी, रंगभेद विरोधी, नारीवादी, प्रवासी रक्षक ओकूपाई वाल स्ट्रीट आंदोलनकारी और पर्यावरणवादी एक मंच पर इकट्ठा हो गए हैं। आज स्थिति यह है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता, प्रतिनिधि, सुपर प्रतिनिधि हिलेरी के साथ  हैं पर आम अमरीकी जनमानस का बहुमत बर्नी के पक्ष में मजबूती से खड़ा है।

उधर, दूसरी तरफ ग्रांड ओल्ड पार्टी रिपब्लिकन में डोनाल्ड ट्रम्प का पूरा चुनाव अभियान मुस्लिमों, हिस्पैनिकों, प्रवासियों, शरणाॢथयों व असहायों के खिलाफ घृणा का सैलाब है। इससे आम अमरीकी नागरिकों  का बड़ा हिस्सा इस कद्र  चिंतित है कि ट्रम्प के राष्ट्रपति चुने जाने की स्थिति में 28 प्रतिशत अमरीकी देश छोड़ने की सोच रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के कई बड़े नेता ट्रम्प की उम्मीदवारी रोकने का अभियान चला रहे हैं, लेकिन अमरीकी मध्य वर्ग (श्वेत) की ये त्रासदी है कि वे इस घृणा की नदी में अपनी बदहाली का हल खोज रहे हैं। ये सब भारत से  कितना मिलता-जुलता है।

अभी कई बड़े राज्यों में, दोनों ही पार्टियों के चुनाव सम्मेलन बाकी हैं। औपचारिक घोषणा चाहे जुलाई अन्त तक हो, लेकिन लगभग निश्चित हो चुका है कि नवम्बर 16 में मुकाबला डेमोक्रेटिक हिलेरी क्लिंटन और रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प के बीच होने जा रहा है। ये विडम्बना है, अमेरिकी चुनावी प्रक्रिया की, कि एक पार्टी में जिस उम्मीदवार के पक्ष में जनमत है उसके पक्ष में पार्टी नहीं, दूसरी पार्टी में खुद पार्टी जिसके खिलाफ है, पार्टी वोटर उसके पक्ष में है। दोनों पार्टियों में  इस पूरी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। रयूटर के ताजा सर्वेक्षण के अनुसार आधे से भी ज्यादा अमेरिकियों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया ही गलत है। इस सारे गड़बड़झाले का फायदा उठाकर कोई भी उम्मीदवार बन सकता है। इस पूरी प्रक्रिया का अपहरण किया जा सकता है। दो तिहाई अमरीकन सोचते हैं कि इसे बदल दिया जाना चाहिए। प्रक्रिया वाकई उलझ-पुलझ है। प्राईमरी, काकस/आम पार्टी मैंबर, डेलीगेटस, सुपर डेलीगेटस, अटैच्ड/अनअटैच्ड/अच्छा खासा समझदार नागरिक भी चकरा जाता है। इसी से मिलती-जुलती राष्ट्रपति पद के आम चुनाव की प्रक्रिया है। जहां आम वोटर का बहुमत, समयानुसार और कोलेजियम का गड़बड़झाला है। इसी कारण कई बार आम चुनाव में हास्यास्पद स्थिति पैदा हो जाती है। इसी सदी की शुरुआत में अलगौर और जार्जबुश के बीच ऐसा हो चुका है।

हैरानी की बात है कि हम भारतीय फिर भी इसकी नकल करना चाहते हैं और टू पार्टी सिस्टम की वकालत करते हैं। सभी जनमत संग्रह और सर्वेक्षण एक जैसे नतीजे दिखा रहे हैं कि हिलेरी और ट्रम्प के बीच का फासला घट कर केवल 2 प्रतिशत रह गया है, लेकिन बर्नी सैण्डर और ट्रम्प के बीच अगर मुकाबला हो तो बर्नी ट्रम्प से 10 प्रतिशत आगे हैं। ये त्रासदी है कि अमरीकी बहुमत के चहेते होने के बावजूद बर्नी राष्ट्रपति तो दूर राष्ट्रपति के उम्मीदवार भी नहीं बन पाएंगे और हर तरह की घृणा फैलाने वाले मूर्ख-अरबपति ट्रम्प व्हाईट हाऊस के नजदीक पहुंचते जा रहे हैं। पिछले छ: महीने तक अमरीकी जन मानस के दिलो दिमाग पर छाए रहने के बावजूद, नवम्बर 16 के चुनाव अभियान में बेरोजगारी-महंगाई-पर्यावरण मुद्दा नहीं होगा, क्योंकि उम्मीदवार बर्नी नहीं हिलेरी हैं। मीडिया के असहयोग के बावजूद बर्नी  इन मुद्दों को गरमाए रहते, क्योंकि वे जड़ पर सीधा हमला करते हैं। हिलेरी में इन मुद्दों पर खुद खोट है और वे रस्म अदायगी करेगी। ट्रम्प की घृणा के शोर में ये रस्म अदायगी गुम हो जाएगी। रही सही कसर, अमरीकी गर्व और आतंकवाद का प्रेत पूरी कर देगा। एक शानदार शुरूआत के इतने दुखद अंत की किसी ने भी कल्पना नहीं की होगी। आने वाले चार सालों में ट्रम्प राष्ट्रपति के रूप में दुनियाभर में क्या-क्या कार्यों को अंजाम देंगे। ये सोच-सोच कर रोमांच भी होता है और दु:ख भी। अब तो एक ही आह निकलती है कि बर्नी चार साल और जवान रहें। अभी वे 70 के करीब के शानदार नौजवान दिखते हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज-48-49

 

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