परिचर्चा

किसी व्यक्ति व समाज की बेहतरी में पुस्तकोंं की भूमिका निर्विवाद है, लेकिन पुस्तक पठन-अध्ययन-मनन की संस्कृति पर मंडराते खतरे की चिंता निरंतर यत्र-तत्र सुनने में आती है। इस संस्कृति के अवसान का मतलब होगा मनुष्यता का क्षरण। यह भी सही है कि कोई भी संस्कृति स्वत: ही नहीं पनपती, उसे पौधों की तरह खाद-पानी देना पड़ता है। इस विषय पर श्री परमानंद शास्त्री जी ने परिचर्चा आयोजित की  है उसकी कार्रवाई यहां प्रस्तुत है। सं.  

परमानंद शास्त्री (सिरसा)

किताबों ने मुझे कई तरह से प्रभावित किया। स्कूली शिक्षा के दौरान अपने बड़े भाई का अनुकरण किया वे गजब के पुस्तक-प्रेमी हैं। तब तक मुझे किताबों के बारे में बहुत समझ भी नहीं थी लेकिन सामने रखी किताबें मानो पढने के लिए खुद बुला रही होती।  आज उस स्थिति को याद करता हूँ तो समझ आता है कि मेरी अध्ययनशीलता में घर में रखी किताबों की कितनी बड़ी भूमिका थी। हमारे मां-बाप को भी सिलेबस से बाहर की ये किताबें अखरती नहीं थी।

                आज बच्चों के लिए सिलेबस से इतर कोई किताब घरों  में नहीं है । शायद उन किताबों को शिक्षा में बाधक मान लिया गया है ? इसी कारण आज हमारे मध्यमवर्ग के परिवारों में किताबों के लिए कोई कोना  नहीं बचा है। यानी बच्चे केा अतिरिक्त ज्ञान हासिल कर सकने का रास्ता बंद है।

                एक बार विश्वपुस्तक दिवस पर एक निजी शिक्षण महाविद्यालय में बी.एड.  व एम. एड. के छात्रों से बात करने का अवसर मिला। मेरे प्रश्न के उत्तर में वहां उपस्थित 300 छात्रों में से एक ने भी सिलेबस से हटकर कोई भी किताब नहीं पढने की बात ईमानदारी से स्वीकार की । फिर उन छात्रों ने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि आजतक न तो किसी ने सिलेबस से इतर किताबों के बारे में बात की और न ही हमें पढने को पुस्तकें मिली। कुछ विद्यार्थियों को अफ़सोस हो रहा था कि उन्होंने आज तक सिलेबस से हटकर एक भी किताब नहीं पढ़ी और अध्यापक  बनने जा रहे हैं।

          कालेज जीवन तक आते-आते पढने की प्रवृति ने स्पष्ट रूप ले लिया था। एक अच्छी खासी अध्ययनशील  मित्रमंडली से सम्पर्क हुआ। जो किताबें पढ़ी जाती उन पर जबरदस्त बहस होती । इसी दौरान पढ़े     प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ ने गहरे तक  प्रभावित किया। लगा हमारे घर-परिवार की ही कहानी है । गोर्की के ‘मां’ उपन्यास ने तो अंदर तक झकझोर दिया। उसके पात्रों  का व्यवहार क्षेत्र विशेष का होने के बावजूद अपने आसपास का लगा। दिल से हूक सी उठती है काश दुनिया की सब माएं ऐसी हो जाएँ ? अब जब मां नहीं है तो पश्चाताप  हो रहा है कि ‘मां’ उपन्यास की कहानी उसे क्यों नहीं सुनाई? वोरिंस पोलेवोई के  ‘असली इंसान’ ने बदतर हालात में अपने मकसद के लिए जीने की तमीज़ सिखाई ।    इन्हीं दिनों पंजाबी के उपन्यासकार जसवंत कंवल के उपन्यास  ‘रात बाकी है’ लहू की लौ ,पढने को मिले । गुरदयाल सिंह का उपन्यास ‘मढ़ी का दीवा’ पढकर अपने समाज की  कई परतों को समझने का मौका मिला। शिव कुमार बटालवी, अवतार सिंह पाश, संत राम उदासी ,लाल सिंह दिल को पढ़ते-सुनते अपनी समझ पर संतोष होने लगा। जूलियस फयूचिक की रचना  ‘फांसी के तख्ते से’ पढ़कर जाना कि ”मौत हमारे कयास से भी साधारण है ,वीरता दैवीय चमत्कार नहीं और जीतने के लिए अजेय शक्ति की जरूरत है। इस किताब से मालूम हुआ कि अपने आदर्श के लिए किस हद तक जूझने की दरकार होती है। इस पुस्तक का एक अंश हमेशा याद आता है -एक कायर अपने जीवन से अधिक बहुत कुछ खो देता है। उसने अपने शानदार फर्ज के साथ गद्दारी की और सबसे घिनौने दुश्मन के आगे हथियार फेंक दिए। बेशक वह जिंदा रहा,पर फिर भी वो मर चुका था क्योंकि उसने अपने भाईचारे से खुद को अलग कर लिया था’’।  आरसी, प्रीत लड़ी, नागमणि, समता, प्रचंड, महरम आदि पत्रिकाएं पढने से साहित्य एवं समाज को और गहरे से समझने की दृष्टि हासिल हुई । ज़ाहिर है किताबों से प्राप्त समझ ने अपना रंग दिखाना ही था। छात्र जीवन की सक्रियता के बाद अध्यापन में भी  किताबों ने अपना रंग बिखेरा। अध्यापन के दौरान छात्रों को सिलेबस से इतर ज्ञान इस तरह की किताबों  की बदौलत ही दिया जा सकता है। तमाम सीमाओं के बावजूद  अध्यापन के साथ-साथ सामाजिक चेतना के आंदोलनों में शिरकत इन किताबों से उत्पन्न संवेदनशीलता की बदौलत ही संभव हो सकी।  अपने लोगों के कष्ट को जानने / समझने और उसे वाणी देने की तमीज किताबों की बदौलत ही हासिल हुई ।

         विद्यालयों में पुस्तकालयों की दशा से आप सब परिचित हैं। सोचा छात्रों के हित में अपने विद्यालय के पुस्तकालय को सक्रिय करें।  सहयोगी अध्यापकों से बात की तो कुछ ने सकारात्मक रुख दिखाया लेकिन एक अध्यापक ने तो यहाँ तक कह दिया -”यो ससुरे अपने सिलेबस की किताबें तो पढ़दे कोनी ,लायब्रेरी वाली किताबें  कित्ते पढ़ लेंगे’’ हमारे अधिकतम अध्यापको की ऐसी ही धारणा है।  लेकिन मेरा अनुभव इसके बिल्कुल विपरीत था। कुछ सकारात्मक सोच वाले अध्यापक मित्रों की मदद से अपने विद्यालय में प्रयोग की शुरूआत की। प्राचार्या से अनुमति लेकर एक कमरे को कबाड़ मुक्त करके सफ़ेदी करवाई। पुस्तकालय प्रभारी अध्यापक से अनुरोध करके संचालन की अनुमति ली। इस दौरान एक बात समझ में आई कि यह प्रयोग केवल छात्रों की सक्रिय भूमिका से ही  सफल हो सकता है। लिहाजा विद्यालय की एक छात्रा को उद्घाटन का जिम्मा सौंपा। गांव की पंचायत, गणमान्य ग्रामीणों, स्टाफ एवं छात्रों की मौजूदगी में उस लड़की ने रिबन काटकर उद्घाटन किया। तथा अपनी बालबुद्धि के अनुरूप वक्तव्य में पुस्तकों की उपयोगिता बताई। इस अवसर पर किसी अन्य को बात कहने का अवसर नहीं दिया गया। प्राचार्या से अनुरोध करके सप्ताह में हर कक्षा का एक पीरियड पुस्तकालय के लिए  निर्धरित करवा लिया। फिर जो हुआ वह अद्भुत था। छात्रों को लगा यह सब कुछ अपना है। भगतसिंह के नाम पर स्थापित यह पुस्तकालय पूर्णतया लोकतांत्रिक व्यवस्था का रूप धारण कर गया । 200-300 किताबें मेज पर खुले में पड़ी रहती, बच्चे खुद किताबें इश्यु कर लेते और अपने हस्ताक्षर से ही जमा कर देते छात्रों में किताबें पढने के ऐसे जनून की उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी। चारेक महीने बाद पुस्तकालय की किताबें नहीं पढने की बात कहने वाले मेरे वही अध्यापक साथी एक छात्र का कान पकडे मेरे पास पुस्तकालय में आकर बोले -”इसने देक्खो, यो बटा सिलेबस की किताब में लायब्रेरी की किताब राक्ख्के पढऩ लाग रह्या था ,इसने समझाओ कि सिलेबस की किताब भी पढ लिया करे कदे।’’ मैंने देखा बच्चा मेरी तरफ आशाभरी भरी नजऱों से देख रहा था। यह व्यवहार बच्चों की अध्ययनशीलता की सम्भावना को स्पष्ट करने के लिए काफी है। पुस्तकालय में बच्चे दौड़े चले आते। पुस्तकालय में अपनी पुस्तक पढने के बाद उसकी कहानी सुनाने का उत्साह देखने लायक होता था। छात्र अपने परिजनों के लिए पुस्तकें ले जाने लगे। इस दौरान बहुत से अध्यापक भी अध्ययन प्रक्रिया से जुड़े। पुस्तकालय सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में उभरा। पुस्तकालय में समय-समय पर जातिप्रथा, कन्या-भ्रूण हत्या, संस्कृति, शिक्षा, व्यक्तित्व निर्माण में पुस्तकों की भूमिका आदि विषयों पर डी.आर. चौधरी, राजीव गोदारा, हरभगवान चावला, सुरेश मेहता, प्रमोद गौरी, पूरन मुदगिल, डॉ जय प्रकाश आदि विद्वानों ने विचार व्यक्त किए। यह पुस्तकालय दूसरे अध्यापकों के लिए भी प्रेरणादायी बना। इससे इतना तो स���पष्ट है कि अगर अध्यापक संवेदनशील एवं समर्पित भाव से कार्य करें तो ज्ञान की प्रवेश द्वार पुस्तकों से छात्रों का जुडाव कोई असंभव कार्य नहीं है। हालात को कोसने की बजाय प्रयास करने की जरूरत है ।

           अब पुस्तकें जीवन का मकसद हैं । मेरा मानना है कि बेहतर समाज के लिए वैचारिक रूप से समृद्ध व्यक्तियों की ज़रूरत है । पुस्तकें विचार निर्माण का सहज मार्ग हैं। मुझे यकीन है कि ज्ञान ही परिवर्तन का माध्यम है। पुस्तकें ज्ञान का प्रवेशद्वार हैं।  वैचारिक दरिद्रता किसी भी समाज के लिए घातक है।

                अगर आप अपने समाज के विद्रूप चेहरे को समझना-समझाना ,बदलना -संवारना चाहते हैं तो किताबों से बेहतर दूसरा सहयोगी कौन है ? अगर आप नई दुनिया का संकल्प साकार करना चाहते हैं तो नवनिर्माण के लिए एक हाथ में औजार  और दूसरे में किताब की ज़रूरत है ।  अगर लोगों के जेहन में शब्दों के बीज बो रहे हैं तो यक़ीनन एक दिन वहां विचारों की फसल लहलहाएगी।

      ‘शिवेतरक्षतये’ (अमंगल के क्षय के लिए ) यही एकमात्र रास्ता है ।

                अधिकाधिक लोगों को पुस्तकों से जोड़ने के मकसद से मैंने बहुत सी साहित्यिक / सामाजिक संस्थायों से तालमेल स्थापित किया है। इन संस्थायों के कार्यक्रमों में  हमारे अनुरोध पर कुछ प्रकाशनों तथा पुस्तक विक्रेताओं द्वारा लगाई ‘पुस्तक प्रदर्शनी’ की निरंतरता और उनमें बिकने वाली पुस्तकों की संख्या किताबें न पढऩे के दावों को खारिज करती है। बल्कि मुझे लगता है कि अच्छी पुस्तकों का विकल्प लोगों के पास है ही नहीं। हमारे मित्र अजैब सिंह और शमशेर सिंह के नेतृत्व में एक प्रकाशन के सहयोग से साठ दिन की पुस्तक यात्रा को ज़बरदस्त समर्थन मिला। बहुत से छात्रों और नौजवानों अपनी औकात से बढ़कर किताबें खरीदी। लोगों में सार्थक साहित्य की ललक है। लेकिन उसकी उपलब्धता और सार्थक साहित्य पर गम्भीर चर्चा की कमी है।

             कुछ दिन पूर्व लड़की ने आकर कहा -”बस स्टैंड ,रेलवे स्टेशन पर मिलने वाली किताबें सामान्य ज्ञान से संबंधित अथवा बहुत ही सतही किस्म की होती हैं, तो ऐसे में अच्छी किताबें कहाँ से खरीदें?

अपने शहरों में पढने लायक किताबें नहीं मिलती इनके लिए दूर किसी बड़े शहर में जाना होगा ऐसा क्यों?’’ मैं सवाल का क्या जवाब देता?  साफ़ है, बाजार में बेहतर साहित्य आसानी से उपलब्ध ही नहीं है।

         व्यक्ति के जीवन में सीखना सहज और अनिवार्य प्रक्रिया है। लेकिन इधर शिक्षा या सीखने कीस्वभाविक प्रक्रिया को नियंत्रित किया जा रहा है। व्यक्ति के सीखने की प्रक्रिया को बाधित करके बाजार अपने लिए अपने ढंग से सिखाने में जुट गया है। बाज़ार ने मान लिया है कि संवेदनशीलता  के रास्ते में सबसे बड़ा अवरोधक है, जबकि बेहतर समाज व बेहतर बाजार दोनों के  लिए संवेदनशील व्यक्तियों की दरकार है।

म्पर्क 9416921622

पिंकी

किताबें पढऩे से  मेरी सोच का दायरा बढ़ा है। जीवन से जुड़ी किताबों को पढ़ा तो महसूस हुआ कि जीवन में कितना संघर्ष करना पड़ता है। किताबें दूसरों के अनुभवों से कुछ सीखने का मौका देती हैं इस तरह किताबों के माध्यम से मैंने भी दूसरों के अनुभव से बहुत कुछ नया  सीखा। किताबों से जुड़ने से पहले जिस तरह मेरे सोचने-समझने पर दूसरों का नियंत्रण था अब स्थिति वैसी नहीं है। अब मैं खुद सोच सकती हूँ कि मुझे क्या करना है। मैंने लड़की होने के नाते हमेशा अपने आप को बहुत छोटा महसूस किया,जब मुझे महिलाओं के जीवन संघर्ष से जुडी किताबें पढने का अवसर मिला और जाना कि वे किस तरह निरंतर अपने जीवन में संघर्ष करती रहीं तो मेरे अंदर भी यह हिम्मत आई कि लड़की हूं तो क्या मैं अपने आपको साबित करके रहूंगी। पुस्तकें पढने के बाद ही मैं समाज की समस्याअंों के बारे में सोचने लगी लेकिन साथ ही मन में आता कि क्या सिर्फ सोचने भर से समस्याएं दूर हो जाएंगी? फिर महसूस हुआ कि सोचना बेकार नहीं होता। सोच सें विचार बनेगा और विचार से तर्क। तर्क से समस्यायों के समाधान का रास्ता समझने में सहायता मिलेगी।

पूजा (आदमपुर)

   मैंने जितनी भी किताबें पढ़ी हैं उन्हें पढ़कर यह लगा कि हमें केवल धर्म या आध्यात्मिकता से जुडी किताबें ही नहीं पढनी चाहिए बल्कि उन किताबों को भी पढना चाहिए जिनमें सामाजिक परिवेश के बारे में, स्त्रियों की स्थिति के बारे में भी पता चले। प्रत्येक मां-बाप यह सोचते हैं कि उनके बच्चे अच्छी अध्यात्मिक किताबें  पढ़ें या फिर सिलेबस से संबंधित।  मेरा अनुभव तो यह है कि बच्चों को हर तरह की किताबें पढऩी  चाहिए  ताकि वे सामाजिक स्थितियों के बारे में ,व्यक्ति के जीवन के उतार-चढ़ाव और परेशानियों को  ठीक से जान-समझ सकें तथा उन परिस्थितियों से निपटने की योग्यता हासिल कर सकें ।   आदमपुर

संजू (खाई शेरगढ़ सिरसा)

    किताबें हमारी सबसे अच्छी मित्र हैं । ये हमें वास्तविकता से अवगत करवाती हैं। पुस्तकों के द्वड्डारा ही हमें दूसरों के अनुभवों व विचारों को जानने-समझने का अवसर मिलता है। पुस्तकें हमें कुछ अलग करने के लिए प्रेरित करती हैं। पुस्तकें हमारे अंदर वो ताकत पैदा करती हैं जिससे हम खुलकर अपनी बात दूसरों के सामने प्रकट कर सकते हैं। वो बातें कहीं और से नहीं जान सकते जो हमें किताबें पढने से पता चलती हैं। हमें सफलता अच्छे और सुस्पष्ट विचारों से मिलती है और अच्छे विचार किताबें पढने से प्राप्त होते हैं । किताबें हमारे अनुभवों को आवाज देती हैं ।

जगजीत सिंह ( वनवाला, सिरसा)

      अध्ययन से जुड़ने से पूर्व जिंदगी को जी रहे थे एक पत्थर की मूर्ति मानिंद। अध्ययन से यह मूर्ति प्राणवान हो उठी। हर पहलू को जानने/समझने  की उत्सुकता बनी रहती है। खुद को जानने का और अपने अस्तित्व को समझने का रास्ता अध्ययन से रोशन दिख रहा है। यह नजर अध्ययन से आई है। इंसानियत की मोमबत्ती को ज्वाला मिल चुकी है। इस कायनात से जुड़े हर पहलू को समझ रहे हैं। खुद को खुद के और इंसानियत के और ज्यादा करीब लाने का कार्य अध्ययन से ही संभव हुआ है ।

रचना (सिरसा)

                मैंने दोनों ही  स्थितियों में किताबें पढ़ी हैं । जब वक्त था पर मन नहीं था और जब मन था पर वक्त नहीं था। किताबें पढ़कर मुझमें कुछ खास परिवर्तन नहीं आया पर यूं जरुर है कि कुछ नया जानने समझने और सोचने को मिला ।

             वहीं किताबें पढ़कर कहीं-कहीं  हम खुद भी तो सब कुछ अनुभव कर रहे होते हैं। वैसा उसे कह नहीं पाते। किताबें हमारी भावनाओं को शब्द देती हैं। अभी तक मैंने जो भी पढ़ा है उससे कुछ न कुछ सीखा ही है। मैंने अनुभव किया है कि कहीं न कहीं किताबें हमें गलत के प्रतिरोध के लिए उत्तेजित करती हैं। किसी को गलत और सही समझने या मानने के लिए तर्क देती हैं। मैंने सिर्फ ‘टाइम पास’ के लिए पढना शुरू किया था पर कुछ किताबें तो ऐसी थीं जिन्होंने दिमाग में उथल-पुथल मचा दी, सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक लेखक किसी की आंतरिक अनुभूतियों को कैसे जान लेता है और उन्हें इतना खुलकर लिख भी देता है ।

                किताबें खाली समय में मनोरंजन तो करती ही हैं साथ ही हमें व्यक्तिगत सोच से परिचित भी करवाती हैं । असल में समाज, घर-परिवार में हमें जो माहौल मिलता है उसके अनुसार ही हमारी सोच निर्मित होती है। परन्तु किताब के किसी पात्र के बारे में पढ़कर हम जब उसके पक्ष या विपक्ष में होते हैं तब हम जान पाते हैं कि हमारी खुद की सोच या चाह क्या है। मुझे अब तक पढ़ी कुछ ऐसी किताबें भी याद हैं, जो फिर से  पढने व दूसरो को पढने के लिए प्रेरित करने की इच्छा है।

                किताबों को लेकर मैं इतना जरुर कह सकती हूँ कि ये हमें वास्तविकता से परिचित करवाती है, सोचने के लिए मजबूर करती हैं ,प्रतिरोध व खुद का पक्ष रखने की समझ भी विकसित करती हैं।  किताबें हमें वो सब सिखा देती हैं और ऐसे-ऐसे विषयों के बारे में सोचने का अवसर देती हैं जो  घर-परिवार, समाज, अध्यापक चाहकर भी नहीं  दे सकते ।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज -16 से 19

 

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