महासिंह पूनिया

                किसी समाज की संस्कृति, रहन-सहन, भोजन व वेशभूषा को वहां के जीवनयापन के साधन व वहां की जलवायु सर्वाधिक प्रभावित करती है। अस्तित्व के संघर्ष में उत्पन्न आवश्यक वस्तुएं कालांतर में सांस्कृतिक प्रतीकों व चिह्नों में तब्दील हो जाया करती हैं। मानव समाज इन्हें अपनी पहचान से जोड़ लेता है। सांस्कृतिक कही जाने वाली समस्त वस्तुओं के साथ ऐसा हुआ है। समाज विशेष की वेशभूषा ने इस सांस्कृतिक सफर को तय किया है। गर्मी-सर्दी से बचने के लिए तथा काम करते वक्त सिर ढकने वाला कपड़ा कब पुरुषों की इज्जत व स्त्रिायों की लाज का प्रतीक बन जाएगा। कब यह सामन्ती ठसक का रूप लेकर उत्पीड़न का प्रतीक बन जाएगी। कितने मुहावरों में इसकी अभिव्यक्ति होने लगेगी। किसी समाज के मूल्यों को व उनमें हो रहे बदलाव को वेशभूषा से भी समझा जा सकता है। मसलन हरियाणा में औरतों की कुर्ती तथा पुरुषों के कुर्ते की काट, कालर, बटन यहां तक कि जेब में भी कोई अन्तर नहीं है, हां पुरुषों का कुर्ता औरत की कुर्ती से जरा सा लम्बा जरूर होता है। फिर ऐसे स्वर संस्कृति रक्षा के नाम पर स्वीकृति कैसे पा जाते हैं जो स्त्रिायों को मनचाहे अथवा पुरुषों जैसे कपड़े पहनने की न केवल मनाही करते हैं, इसके लिए बल-प्रयोग को भी उचित मानते हैं। हरियाणा की सांस्कृतिक विविधता यहां की वेशभूषा में भी दिखाई देती है। यहां महासिंह पूनिया का ‘पगड़ी’ पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित कर रहे हैं। सुधी लेखकों से हरियाणा की वेशभूषा के विभिन्न पक्षों का समाजशास्त्राीय व ऐतिहासिक विश्लेषण करते लेख आमंत्रित हैं। – सम्पादक (सुभाष चंद्र)

                पगड़ी हरियाणा की लोकसांस्कृतिक विरासत का एक ऐसा प्रतीक है, जो अपने अंतर्गत सांस्कृतिक मूल्यों को समाहित किए हुए है। पुरातात्विक स्थलों से हरियाणवी पगड़ी के अनेकों प्रमाण भी मिले हैं।

                प्राचीन काल में सिर को सुरक्षित ढंग से रखने के लिए पगड़ी का प्रयोग किया जाने लगा। पगड़ी को सिर की सुरक्षा के लिए धारण किया जाता रहा है, इसलिए इस परिधान को सभी परिधानों में सर्वाेच्च स्थान मिला है। पगड़ी को हरियाणवीं लोकजीवन में पग, पाग, पग्गड़, पगड़ी, पगमंडासा, साफा, पेचा, फेंटा, खण्डवा, खण्डका, आदि नामों से जाना जाता है। जबकि साहित्य में पगड़ी को रूमालियो, परणा, शीशकाय, जालक, मुरैठा, मुकुट, कनटोपा, मदील, मोलिया और चिंदी आदि नामों से भी जाना जाता है। वास्तव में पगड़ी का मूल ध्येय शरीर के ऊपरी भाग (सिर) को सर्दी , गर्मी, धूप, लू, वर्षा आदि विपदाओं से सुरक्षित रखना रहा है, किंतु धीरे-धीरे इसे सामाजिक मान्यता के माध्यम से मान और सम्मान के प्रतीक के साथ जोड़ दिया गया।

                अपनी हजारों वर्ष की यात्रा के अंतर्गत पगड़ी ने अनेक रंग, रूप, आकार, प्रकार बदले किन्तु मूलरूप से पगड़ी में कोई परिवर्तन नहीं आया। पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर पगड़ी का परिधान तो सिंधु घाटी की सभ्यता से भी पहले था। उस समय नर और नारी दोनों ही पगड़ी पहनते थे। वैदिक साहित्य की दृष्टि से यदि अवलोकन किया जाए, तो पगड़ी विशेष वैदिक सम्मान का प्रतीक रही है। इस युग में इसे ‘उष्राशि’ के नाम से पुकारा जाता था।  रामायण काल में पगड़ी को विशेष महत्ता मिली। इसी काल में पगड़ी को लोकलाज के साथ जोड़ दिया गया। महाभारत काल में भी पगड़ी की परम्परा ज्यों-की-त्यों बनी रही।

                शकों के समय में भी पगड़ी का चलन रहा, किंतु इस युग में लोगों ने सुरक्षा की दृष्टि से पगड़ी के स्थान पर चमड़े का टुकड़ा सिर पर रखना शुरु कर दिया। शकों और कुषाणों के बीच जो युद्ध हुआ, उसमें कुषाण विजयी रहे, किंतु वे शकों के सिर पर पगड़ीनुमा चमड़े को देखकर स्तब्ध रहे। अमादलपुर (सुघ ) पुरातात्विक स्थल से खुदाई से निकली कुषाणकालीन मिट्टी की मूर्तियों पर बंधी हुई पगड़ियां इसका पुख्ता प्रमाण हैं।

                मुगलकाल में पगड़ी को विशेष सम्मान मिला और इसके ऊपर हीरे और मोतियों की रत्नों से जड़ी मालाएं तथा कलंगियां लगाई जाने लगी। इस काल में पगड़ियां भिन्न-भिन्न रूप धारण करने लगी। सिर पर पहले टोपी या कुल्लाह पहने जाने लगा और उसके ऊपर पगड़ी बांधी जाने लगी। पगड़ी के ऊपर खड़े हुए भाग को तुर्राह की संज्ञा भी दी गई। गर्मियों में कुल्लाह गेेहूं के तिनकों से तथा सर्दियों में मोटे कपड़े से बनाया जाने लगा। इस काल में पगड़ी ने अनेक रूप धारण किए। राजा, सेनापति, युवराज सभी अलग-अलग तरह की पगड़ियां बांधने लगे। साधारण जनता सूत्ती कपड़े की पगड़ी बांधने लगी।

                17वीं सदी में जब भारत में अंग्रेज लोग आए तो उन्होंने पगड़ी के स्थान पर हैट का प्रयोग शुरु किया, किंतु पारम्परिक पगड़ी ने हार नहीं मानी। राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानन्द, विवेकानन्द, दीनबंधू सर छोटू राम, सेठ छाज्जू राम, सेठ धन्नामल सरीखे अनेक महापुरुषों के सिर पर सजी पगड़ी से इसका अनुमान लगाया जा सकता है।

                हरियाणवीं लोकजीवन में पगड़ी का सम्बन्ध संस्कारों से भी जुड़ा हुआ है। यहां पर जाति के आधार पर भी पगड़िया के अलग-अलग रंग-रूप तथा आकार देखने को मिलते हैं। देश की आजादी के समय पगड़ी संभाल जट्टा गीत के माध्यम से देशभक्ति व समाज की लाज बचाने का जो संदेश दिया गया, उससे भला कौन परिचित नहीं है? हरियाणा में सम्प्रदाय, क्षेत्रा, जाति के आधार पर भी पगड़ी की पहचान रही है। हिन्दू पगड़ी, मुस्लिम पगड़ी, सिक्ख पगड़ी, आर्यसमाजी पगड़ी, ब्रज पगड़ी, अहीरवाली पगड़ी, मेव व मेवाती पगड़ी, खाद्दरी पगड़ी, बागड़ी पगड़ी, बांगरू पगड़ी, गुज्जर पगड़ी, राजपूती पगड़ी, बिश्रोई पगड़ी, मारवाड़ी पगड़ी, रोड़ पगड़ी, बाणियां पगड़ी, सुनारी पगड़ी, पगड़ी, राव पगड़ी, पाकिस्तानी पगड़ी, मुल्तानी पगड़ी, पेचदार पगड़ी, तुर्रेदार पगड़ी व विवाह पगड़ी आदि का प्रचलन रहा है। समाज में केवल उन्हीं जातियों की पगड़ियां प्रचलित रही हैं, जिनका वर्चस्व समाज में अधिक रहा है। इसके अतिरिक्त हरियाणवी समाज में काल तथा परिस्थिति एवं स्थान के आधार पर पहनी जाने वाली हल्की, भारी, छोटी-बड़ी व रंग-बिरंगी पगड़ियां आज भी प्रचलित हैं, लोकजीवन में भागलपुरी साफे का प्रचलन इसका प्रमाण है।

                हरियाणवी पगड़ी का यहां के सामाजिक जीवन से परस्पर गहरा नाता रहा है। हरियाणा में मूलतः पगड़ी को सामाजिक प्रतिष्ठा तथा सम्मान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। यहां पर पिता की मृत्यु के पश्चात् बड़े बेटे को पाग या पगड़ी की रस्म भी अदा की जाती है। इस अवसर पर सभी नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा पाग लाने की परम्परा भी है। लोकजीवन में इसे ‘पाग-बंधाई’ रस्म के नाम से जाना जाता है। हरियाणा में विविध रंगों की पगड़ियां पहनने की परम्परा रही है। हरियाणा के ब्रज भाग में रंग-बिरंगी पीली तथा नारंगी पगड़िया का प्रचलन अधिक रहा है। जबकि अहीरवाल में गहरे लाल रंग, चुंदड़ी तथा छींटदार पगड़ियां अधिक पहनी जाती है, जबकि खादर व बांगर में साामान्य सफेद रंग की पगड़ियां पहनी जाती हैं। बागड़ क्षेत्र के लोग सफेद तथा गहरे रंग की पगड़ियां पहनते हैं। हरियाणा में रंग-बिरंगी पगड़ियों की विविधता ब्रज तथा अहीरवाल क्षेत्र में ही देखने को मिलती है।

हरियाणवी लोकजीवन में परिवार के मुखिया द्वारा पगड़ी पहनने की परम्परा रही है। इसी प्रकार ठोळे के मुखिया, पट्टी के मुखिया, पान्ने के मुखिया, गांव, गोत्र, सतगामा, अठगामा, बारहा, खाप तथा पाळ के चौधरियों द्वार��� भी हरियाणवी पगड़ी बांधने की परम्परा का पालन किया जाता रहा हैं।  इतना ही नहीं, यहां पर ब्याह-शादी तथा अन्य अवसरों पर रूठे हुओं को मनाने के लिए पगड़ी उतारकर अंतिम प्रयास के रूप में मनाने की परम्परा अब भी कहीं-न-कहीं दिखाई पड़ती है।

                हरियाणवी लोकजीवन में बच्चे पगड़ी नहीं पहनते। जबकि युवा वर्ग द्वारा खेत-क्यार में काम करते समय मंडासा तथा मंडासी मारने के साथ परणा आदि बांधने की परम्परा आज भी कायम है। सामान्यतः जहां हरियाणा के अधिकतर लोगों द्वारा सफेद रंग की पगड़ी पहनी जाती है, वहीं पर साधु समाज से जुड़े हुए लोग गेरुवे रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। हरियाणा में अनेक स्थानों पर सुआ रंग की पगड़ी भी बांधने की परम्परा रही है। सुआ पगड़ी को लेकर गांव बापोड़ा जो जिला भिवानी में पड़ता है, के लोगों को शासकों ने हरा दिया था, जिसकी बदौलत उन्होंने धनाणा गांव पर चढाई की थी। उसी समय से आज तक हरियाणा में पगड़ी को लेकर यह कहावत प्रचलित है  –

बापोड़ा मत जाणिये, यू गाम धनाणा,
कुरड़ी टामक बाजता, यू जाणै सारा हरयाणा,

सूई बांधै पागड़ी, जा रजपूती बाणा।
(यहां पर सुई बांधा पागड़ी से अभिप्राय- हरे रंग की सुआ पगड़ी से है। )

                वर्तमान समय में हरियाणा में विवाह के अवसर पर लाल, गुलाबी, छींट तथा राजपूती पगड़ियों की बांधने की परम्परा की शुरूआत हो चुकी है। इसके अतिरिक्त अनेक राजनीतिक पार्टियों ने भी पगड़ी की परम्परा को अपनाकर इसे राजनीतिक रंग दे दिया है।

                हरियाणवी पगड़ी की चौड़ाई गज भर होती है और इसकी लम्बाई छः से नौ गज तक की होती है। लोकजीवन में भारी तथा लम्बी पगड़ी बांधने की परम्परा भी रही है, क्योंकि पहले पशुओं को चराते समय पाळियों को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ता था, गहरे कुओं से पानी निकालने तथा पाळियों के बिछौणे के रूप में भी इन पगड़ियों का प्रयोग किया जाता था।

                हरियाणवीं पगड़ी को अलग-अलग इलाके में अलग-अलग तरीके से बांधने की परम्परा रही है। मुख्यतः पगड़ी को बांधने के दो ही ढंग होते हैं, बहुप्रचलित ढंग को राजपूती कहा जाता है, जिसमें खंडके का आधा भाग अनेक तह करके दोनों कानों के ऊपर डाल लिया जाता है और गोलाकार में लपेट लिया जाता है। यह पगड़ी थोड़ी ढीली रहती है और इसमें आगे कट भी दिखाई देता है। दूसरा पेंचदार तरीके से पगड़ी बांधी जाती है। यह पगड़ी सख्त होती है, इसका प्रचलन दक्षिण हरियाणा में देखने को मिलता है। इसके अतिरिक्त हरियाणा में भरतपुरी, जोधपुरी, भागलपुरी, जयपुरी, मारवाड़ी आदि पगड़ियां बांधने की परम्परा भी रही है।

                हरियाणवी लोकजीवन में पगड़ी की परम्परा इतनी रच और बस गई कि दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले मुहावरों, लोकोक्तियों, उक्तियों, रागनियों, लोकगीतों आदि सभी लोकसाहित्यिक विधाओं में पगड़िया से जुड़े हुए अनेकों उदाहरण देखने को मिलते हैं – पगड़ी उछालणा, पगड़ी तारणा, पगड़ी की लाज राखणा, खण्डवा पायां मैं धरणा, तुर्रा छोड़णा, पगड़ी बांधणा, पगड़ी बदल यार होणा, पगड़ी धरणा, पगड़ीधारी होणा, अहमद की पगड़ी मुहम्मद के सिर, घी भी खाओ, पगड़ी भी राखो, उनकी इज्जत भी के खाक, जिन्नैं पगड़ी दे परदेसी, पगड़ी संभाल जट्टा, सिर सलामत तो पगड़ी पचास, कह तै मोड्डा बांधै पगड़ी ना तै रह्वै उघाड़े सिर आदि अनेकों ऐसे मुहावरे एवं उक्तियां हैं जो हमारी लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हरियाणवी लोकजीवन में अनेक ऐसी जनोक्तियां एवं कहावतें प्रचलित हैं, जिनका सीधा सम्बंध पगड़ी से है। उदाहरण के लिए – हुक्के तै हुरमत गई, नेम गया सब छूट, पगड़ी बेच तम्बाकू लिया, गई हिय की फूट। सब्जरंग के सिर की पगड़ी अलबेली का बेला है, पां तै ओ पाणी पीवै, उसका नाम पहेला है। धरती का मण्डल देवता, सिर का मण्डल सूत, घर का मण्डल स्त्राी, कुल का मण्डल पूत आदि वे उदाहरण है जो लोकसाहित्य में पगड़ी की परम्परा को दर्शाते हैं।

                हरियाणा जैसा प्रदेश जिसके बुजुर्गों की पहचान केवल पगड़ी के माध्यम से हुआ करती थी, आज उसका अस्तित्व खतरे में है, क्योंकि नई पीढ़ी पगड़ी बांधने की परम्परा नकार चुकी है। हरियाणा में साठ साल से नीचे शायद ही कोई व्यक्ति सिर पर पगड़ी बांधता हो। आने वाले वर्षों में जब हरियाणवीं समाज में बिना पगड़ी के हो जाएगा, तो आने वाली पीढियों को संभवतः यकीन भी नहीं होगा कि हमारे पूर्वज किस-किस तरह की पगड़ियां बांधा करते थे।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज- 53 से 55

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