संवाद


7 अप्रैल 2016 को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र में ‘देस हरियाणा’ पत्रिका के तत्वाधान में ‘अपने लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें ‘आजादी मेरा ब्रांड’ की लेखिका अनुराधा बेनीवाल ने भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने अपने अनुभव सांझा किए तथा उपस्थित लोगों के सवालों पर अपना दृष्टिकोण रखा। इस अवसर पर लगभग 180 लोग मौजूद थे, जिसमें लेखक शोधार्थी व विद्यार्थी शामिल थे। यह संवाद बहुत ही जीवंत था, जिसमें समाज, संस्कृति, लेखन व लेखकीय दायित्व से जुड़े ज्वलंत सवाल उठे। बड़ी ईमानदारी और बेबाकी से अनुराधा बेनीवाल ने उत्तर दिए। इस अवसर पर अनुराधा के माता-पिता भी मौजूद थे तथा उनके पिता श्री कृष्ण बेनीवाल ने भी अनुभव प्रस्तुत किए। इस कार्यक्रम की पूरी कार्रवाई पाठकों के लिए प्रकाशित है।  इस अवसर पर अनुराधा बेनीवाल के पिता श्री कृष्ण बेनीवाल ने अपने विचार रखे। सं.

आपसे कुछ बातें करनी हैं। हमारी कल्चर है समाज है वो सारा ही सेक्सुअल है। आप कहैंगे कि वो कैसे है। आप कहोगे कि हम तो बचाते हैं असल में हम बचाते नहीं हम दबाते हैं। हम डरते हैं सेक्स से। हमने सेक्स को हव्वा बना राख्या है। हमने लड़कियों को इस ढंग से पाला-पोसा होता है।

मैंने अपनी बेटी को जो कहा आप को बता देता हूं। मैंने एक टी वी सीरीयल देखा जिसमें एक लड़की को ब्लैकमेल किया जा रहा है। मैंने अपनी बेटी को कहा कि तेरे साथ किसी तरह की कोई घटना हो जाए मैं तेरे साथ हूं। मैं तेरा सपोर्ट करूंगा। मैं इस बात से डर गया कि मेरी बेटी को ब्लैकमेल कर लेगा तो इससे गंदी कोई बात नहीं होगी।

मैं गांव में पला हुआ, गांव से जुड़ा हुआ हूं। मुझे सिकुड़ती हुई लड़कियां अच्छी नहीं लगती। अपनी बात खड़ी हो कर कहो। लेकिन इसमें लड़कियों का कसूर नहीं है। 8वीं 9वीं मेें ही जब उसकी छाती उभार लेने लगती है तभी उसकी दादी, ताई, काकी, पड़ौसन कहने लगती हैं कि ‘ऐ लत्ता ढक ले’ उसको अपराध बोध करवा दिया जाता है। ऐसा मैने देखा है।

आज तक ये बात मैंने नहीं बताई थी। जब ये मेरी बेटी दस साल की थी तो मैंने एक औरत को इसे टोकते देखा। मैं सकपका गया। यदि आपको आपकी नाक, मुंह, आंख के बारे में कुछ कह दिया जाए महसूस करवा दिया जाए तो आप सिकुड़ोगे। वह अपराध बोध महसूस करता है।

ये जब आठवीं में थी। ये घर में पढ़ी। मैं सिलेबस की किताबें लाता था और घर पर ही परीक्षा ले लेता था। 55-60 साल के आदमी ने कहा ‘भाई ये तो ब्याहण की होगी’। मैंने पूछा- ‘कै देख्या तनै’। भाई साहब, उसने  छाती देखी और कुछ नहीं देख्या। ये शर्म की बात है हमारे समाज के लिए। आपने ये पूछा नहीं कि ये कितनी इंटेलिजेंट है, क्या खाती है, क्या खेलती है। क्या उपलब्धि है। बस एक ही बात है ‘ये स्याणी होगी, या ब्याहण की होगी’।

अगर किसी लड़की-लड़के के साथ घटना घटती है, बलात्कार होता है तो समाज जिम्मेवार है। हमने ऐसे समाज को बनाया है, ऐसे समाज को चाहा है। आप जिस समाज के अंदर पल-बढ़-बन रहे हैं। आप उसको पसंद करते हैं अन्यथा वो कैसे टिकेगा। हमने अच्छा समाज कब चाहा है। जैसा ढर्रा चल रहा है उसको ही लीपा पोती करके ढकने में लगे हो न कभी साफ करने की हिम्मत की न साफ करना चाहा। मैं इस मामले से दुखी हूं, क्रोधित हूं।

रही आरक्षण की बातें। हर मां-बाप जिसके दो बच्चे हैं उसने कहा कि इसको तो मैं बदमास बनाऊंगा, इसको अफसर बनाऊंगा। एक एस पी रिटायर हुआ उसके चार बेटे हैं। वो कह रहा है कि एक को बदमास बनाऊंगा, एक को अफसर।

एक लड़का दूध लेकर आता है, आठवीं में पढ़ता है। उसी से फीडबैक मिलती है। मैने पूछा कि अब तो आरक्षण मिल गया। अब राजी हो। कहता हैं जी राजी हूं जी।

नुक्सान तो बहुत हो गया भाई, दुकानें जल गई, बिल्डिंग जल गई। बोला जी वो तो सरकार की जळी हैं। जब हमारे बच्चे यह कहैंंगे,  रेल जळगी तो सरकार की जळगी, तो भारत माता की जय क्यूकर होगी भाई। जै स्कूल के बच्चे का डेस्क तोड़ दे और रोणा आवै तो उसको भारत माता कहते हैं। तीन रंग के कपड़े को ही भारत माता नहीं कहते, शेर के आगे खड़ी सुंदर युवती  उसे भारत माता नहीं कहते। भारत माता आपका बच्चा है। स्कूल कालेज में पढऩे वाला बच्चा है।

आरक्षण के दौरान मैं जुड़ा, मेरी बेटी के फेसबुक से। मैने टिप्पणियां पढ़ीं। मैं विचलित इस बात से हुआ कि एम बी बी एस के बच्चे, आई आई टी के बच्चे गर्व से कहते हैं ‘मैं जाट हूं’।

भाई इंसान के सिवाय अगर कोई कुछ है वो उतना ही इंसान कम है। मैं यदि 50 प्रतिशत जाट हूं तो 50 प्रतिशत ही इंसान बचता हूं। यदि 50 प्रतिशत हिंदू या मुसलमान हूं तो 50 प्रतिशत ही इंसान रह जाता हूं। इंसान ऐसे ही थोड़े हो जाता है। इंसान उसको कहते हैं जिसमें प्रेम हो, करुणा हो, दया हो, सहानुभूति हो। हमारी शक्ल इंसानों से मिलती है हम इंसान थोड़े ही हैं।

आपको कुछ भी मिल जाए, आरक्षण तो क्या यदि आपको सारी धरती का राज भी मिल जाए यदि आपको जी दुखी करके मिला है तो आपका कभी विकास नहीं हो सकता, कभी भला नहीं हो सकता।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा( मई-जून 2016) पेज- 53

 

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