कविता


सच के हक़ में

तुम जानते हो कि तुम दिमाग़ को मार नहीं सकते।
तुम जानते हो कि एक दिन तुम्हारी बेशर्मी भी
तुम्हारे किसी काम ना आयेगी।
तुम ज़ोर-ज़ोर चिल्ला सकते हो मगर सहज तर्कों से घबराते हो।
तुम बहस नहीं कर पाते इसलिये साजि़श पर उतर आते हो।
तुम्हारे विकृत चेहरों पर कभी-कभी प्यार आता है।
तुम्हारी नासमझी पर अफ़सोस होता है कि तुम अब भी डराने में यक़ीन रखते हो।
मगर एक बात कहूं-‘सच कहना सबसे बड़ी नियामत है।’
और सच को पहचान लेना सबसे बड़ा हुनर..
तुम जऱा सच के हक़ में आकर तो देखो,
सच कहता हूं बहुत मज़ा है।
आओ तो… मेरे प्यारे राष्ट्रभक्तों।

स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 22

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