मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की एक किताब है ‘ग़ुबार-ए-ख़ातिर’ यानी दिल के ग़ुबार। यह किताब उन ख़तों का मज्मूआ है जो उन्होंने 1942 में अपनी गिरफ़्तारी के बाद अहमदनगर कि़ले में नजऱबन्दी के दौरान अपने एक दोस्त को लिखे थे। ये रचनाएँ भी दिल के ग़ुबार ही हैं। और ये भी एक ख़ास तरह की नजऱबन्दी के दौरान ही लिखी गईं ‘नजऱबन्दी’ जो इन रचनाओं के लेखक को झेलनी पड़ी आरक्षण के लिए हरियाणा में हुए उस आन्दोलन के दौरान। कुछ रचनाएँ अपने शहर से दूर एक शहर में जन्मीं जहाँ से वापिस अपने शहर पहुँचना उन दिनों मुमकिन न था   वतन से दूर की ‘नजऱबन्दी’ ख़त्म हुई, वापिस ‘वतन’ आना हुआ तो नजऱबन्दी ने नया रूप लिया। न जाने कितने ही दिन लोगों से मिलते, बात करते और हालात का जायज़ा लेते हुए गुजऱे उस सब को समझने की कोशिश में कि जिस ने वहां पहुंचा दिया था जिस बारे किसी ने ख़वाब में भी न सोचा होगा। शहर की सड़कों पर घूमने की आज़ादी तो थी मगर दिल और दिमाग़ क़ैद थे उस पूरे माहौल से पैदा हुई कैफियत में था। इसी पूरे दौर में कुछ और रचनाओं ने जन्म लिया। 1947, 1984, 1989, 2002 में जैसे एक और साल जुड़ गया हो 2016 । कई लोगों को कहते सुना इस बीच कि यह ज़ख्म भी उतना ही गहरा है।


1

दुकां-दुकां धुआं-धुआं

सड़क-सड़क हुई हैरां
हुए हैं दिन अब कितने ही
पर आज भी जाओ वहां
तो पाओगे हवा में बू
जो दे रही सबूत है
कि किस तरह जली दुकां
दुकां का ही नहीं ये हश्र
अलग नहीं है फस्ल ये
यही हुआ यहां-वहां
रवां-दवां जो चल पड़े थे
काफिले हुजूम के
जो रुकने को तैयार थे
न थकने को तैयार थे
था जिन का बस यही बयां
कि हम को चाहिए है जो
नहीं मिला तो सोच लो
क्या होगा हश्र देख लो
हैरानगी की बात है
हैं जद में वो जहान भी
जहां से निकलें खेतियां
जिन्हें कहैं हैं हम जवां
कि जिन के दम पे कल बने
कि जिन से ये जहां सजे
वो इल्म के इदारे भी
हुए हैं ख़ाक अब यहां
कि काफिलों ने उन को भी
न छोड़ा और किया हवाले
आग के यहां वहां
हवा ले जो उठी लपट
उसे बुझा भी लो अभी
कि अब बुझी अगर नहीं
तो ख़ाक हो रहेगा ये
तुम्हारा मेरा बाग़बाँ
जिसे बनाया मिल के था
बयाबाँ सा दिखे है जो
करें हम इस को फिर खड़ा
बनाएँ फिर से वो जहाँ
ले आएँ फिर से वो समाँ
कि फिर जलाएँ वो शमा
कि जिस शमा की रौशनी
औ’ बाग़बाँ की फ़स्ल-ए-गुल
बनाएँगे नया जहाँ।

2

कर्फ्यू

सड़क सुनसान
बस्ती के वासी
घुस चुके थे घरों में
इस ऐलान के बाद
कि लग गया है कर्फ्यू

मगर क्या गज़़ब था
वो कर्फ्यू भी देखो
कि कुछ ही मिनट में
बढ़ा आया रेला
जैसे उठती चली आई आंधी
थी इक सरकशी की

निकला ग़ुबार
उस हुजूम-ए-आतशी का
उट्ठी जो लपटें
वो ख़ामोश सड़कें
थीं अब धूँ धूँ करती
क्या रौनक़ थी वो भी !

आतशपरस्ती के वो सब सिपाही
हुए पाक-ओ-खुर्रम
जो उगली थी आग कुछ जुबानों ने पहले
उस की ही लौ में थे वो अब नहाते
पाकीजगी की नई रौ बनाते

गुजऱ चुके हैं दिन कई उस दोस्त से मिले
कुछ ऐसी ज़र्ब आई है इस रिश्ते पे मिरे
बुलाना चाहूँ उस को तो वो मुँह को फेर ले
हो गुजऱा इन दिनों में शहर पर से क्या मिरे
टूटी यूँ डोर रिश्ते की अन्दर तलक है घाव
मैंने बढ़ाया हाथ भी तो वो बस चुप रहा
क्या क्या लुटा है इन दिनों कोई उन्हें बताए
जो ले गए हैं लूट कर इस शहर को मिरे

3

दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं

किस मुक़ाम पे ले आया
शहर मेरा मुझे
पर शहर को क्यूँ दूँ इल्ज़ाम
जुर्म तो उन का है
घुटनों पे लाए
जो शहर को मेरे

4.

(उस शख़्स के नाम जिस ने दिया दिन-रात पहरा अपने इदारे की इमारत का और बचाया उस को)

खो रहो
और
सो रहो
ये खोना सोना ही
इस दर्द-ओ-ग़म की दवा अब तो

क्या कहते हो?
क्यूं तुम ऐसा कहते हो?
सो रहोगे तुम
और खो रहोगे तुम
तो कौन होगा
बागबां का
पहरा देने को?

याद करो
उस शख्स की भी दास्तां
जो खड़ा रहा
दो दिन
दो रात
तन्हा
न घुसने दिया उन को
जो भरे ही चले आते थे
न रुकते थे
न थमते थे
नारे भी
लगाए चले आते थे
मगर फिर भी
वो रहा बेदार
न सो रहा

था वो
न खो रहा
था वो
खड़ा रहा था वो
पहरे पे
लगा रहा था वो

चाहो तो सो रहो तुम
और खो रहो तुम
मगर समझ लो ये
कि खोने-सोने में
नहीं मुदावा
दवा जो करनी है मरज़ की
जगे ही रहने के सिवा कोई और नहीं है चारा

5.

(मुश्किल वक्त में दिलेरी से काम लेने वाली एक औरत के नाम)

अपने हाथों से पंक्चर लगाती है वो
साथ ख़ाविन्द के हर पल है रहती खड़ी
साइकिल-स्कूटर की ट्यूबों के पंक्चर लगाती है वो

उन दिनों तो मगर वो रही थी खड़ी
पहरेदारी पे हर वक़्त दुकान अपनी की

साथ देने को ख़ाविन्द भी था मगर
वक्त ज़्यादा तो पहरे पे वो थी रही

उस की आंखों ने देखे
थे मंजऱ सभी
हूजूमों का आना
हुजूमों का जाना
इस दुकां को जलाना
और उसे लूट जाना
किसी को तो पहले था लूटा गया बस
मगर बाद उस के जलायागया

हुजूम ऐसे थे वो
कर सके न कोई
आमना-सामना
लैस थे वो सभी
और थे तैयार भी

आया इक और रेला
मगर अब की बार
रुख़ उधर का किया
थी जहां वो खड़ी
ठेठ बोली में उस ने दुहाई थी दी
उस के लहजे से टल सा गया ख़तरा था

पर दुकां साथ की –
‘किस की सै यो दुकान?
इस का मालिक सै कौन?’
‘या बी थारी सै
ज्यूकर सै मेरी खड़ी।’
‘साच्ची साच्ची बता!’
‘क्यां तैं बोलूं मैं झूट

बोल्लूं साच्ची सै यो बी दुकान आपणी।’
सहमी-सहमी सी आवाज़ में बोली वो
एक लजिऱ्श थी आवाज़ में उस की तब
और मुंह को कलेजा था आता हुआ

दिल की धड़कन बढ़ी
हाथ जोड़े हुए थी वहां वो खड़ी
चेहरा था ज़र्द सा
लेकिन पक्का इरादा
किया उस ने था

‘जैसे मेरी दुकां
वैसी ही है
हमारे पड़ोसी की जान-ओ-दुकां
दुख में और सुख में हम जो रहे साथ हैं
कैसे कर देते उन के हवाले इन्हें-
बस यही इक खय़ाल
आता था बार-बार अपने दिल में जनाब !
उन को लुटता हुआ कैसे हम देखते
जिन के हमराह हमसाया हम हैं रहे
क्यूं न उन के लिए हम न हाथ जोड़ते
और न रहते खड़े इस तरह रात-दिन !
हां, बचा ली थी हमसाए की भी दुकां!

6.

चुपचाप देखता है वो
न बोले वो न डोले वो
नजऱों से लागे है मगर
कुछ तो है मापे-तोले वो
ज्यों सोचता हो इस डगर
आया हुआ है पहले वो
जो अब लगे है वीरां सा
आबाद था मोहल्ला वो

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( मई-जून 2016), पेज -27 -28

 

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