आलेख

ब्राह्मणवाद की विचारधारा ने श्रम-जन्य कर्मों का तिरस्कार करते हुए वर्णधर्मी व्यवस्था के अंतर्गत उत्पादनशील श्रेणियों का शोषण बनाए रखा है।  कबीर की वाणियों में इस ब्राह्मणिक विचारधारा का निषेध किया गया है। दूसरे, कबीर ने वर्णधर्मी व्यवस्था के अंधविश्वास पूर्ण सिद्धांतों की तर्कहीनता को अनावृत किया है। तीसरे, उन्होंने श्रम की ब्राह्मणिक अवमानना के विपरीत श्रम-जन्य कर्मों को सत्याचरण की कसौटी मानते हुए श्रम के गौरव को पुनस्र्थापित किया है।

संत कबीर जिस जुलाहा जाति में पालित हुए थे, वह एकाध पुश्त पहले की योगी जैसी किसी आश्रम भ्रष्ट जाति से मुसलमान हुई थी या अभी होने की राह में थी।1

 ये अपने को न हिन्दू मानते थे, न मुसलमान, वेदों के प्रति अनास्थाशील थे, ब्राह्मण को महत्व नहीं देते थे, ब्राह्माणिक कर्मकाण्डों का निषेध करते थे, वर्ण व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे, ब्राह्माणिक देवी देवताओं को पूज्य नहीं मानते थे।

 कबीर ने दमन के खिलाफ, दीर्घकालीन प्रतिरोधकमूलक विचारों को, नए सिरे से गठित करते हुए, अपनी सम्प्रेषणीय प्रतिभा के सामथ्र्य पर एक आंदोलन के रूप में श्रमिकों, किसानों, सेवा कर्मियों, अस्पृश्यों को एकजुट होने का सैद्धांतिक आधार प्रदान किया है।

 कबीर वेद के मार्ग के विपरीत खड़े हैं। वे सीधे-सीधे कहना चाहते हैं कि वेदों को छोड़ दो-‘तजिबा वेदा’ क्योंकि वेद पुराण और स्मृति ग्रंथों ने कभी किसी का उद्धार नहीं किया। कबीर कहते हैं, वेद, पुराण के श्रवण से क्या होता है – किआ बेद पुराना सुनीअै। कबीर का मानना है कि चार वेद, स्मृति ग्रंथ, पुराण ये सब परमात्मा के विषय में कुछ जानते नहीं। यहां तक कि उन्होंने वेद को और मुसलमानों के धार्मिक ग्रंथ कतेब को भी व्यर्थ माना है, क्योंकि इनसे चिंताओं को मिटाया नहीं जा सकता :

वेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाई।2

कबीर कहते हैं, ब्रह्मा वेदों का विचार तो करता है, पर अलख को नहीं देख पाता।3 कबीर ने सचेत होकर यह जान लिया था कि वेद, पुराण विष के समान हैं :

जन जागे ना ऐमहि नांण, विषय से लागे वेद  पुरांण।4

सुम्रित बेद सबै सुनैं, नहीं आवैं कृत काज।5

संतों का निर्गुण राम वेद के निषेध के तहत, ब्राह्माणिक ग्रंथों से न्यारा था :

लोक बेद थैं अछै नियारा, छाडि़ रह्यो सब ही संसारा
जसकर गांउ न ठांउ न खेंरा, कैसे गुन बरनूं मैं तेरा।6

इसलिए वे वेदों के पठन-पाठन में लीन ब्राह्मण को भटका हुआ मानते थे।

पंडित भूले पढि़ गुन्य बेदा, आप न पांवैं नानां भेदा।7

पंडित वेद का व्याख्यान तो खूब करते हैं, पर अभ्यान्तरिक तत्व को नहीं जान पाते-

पढि़ पढि़ पंडित बेद बषाणैं, भीतरि हूती बसत न जांणैं।8

ब्राह्मण जगत का गुरु भले ही हो, भक्तों का गुरु नहीं है, वह तो वेदों के भ्रम में फंस कर मरा जा रहा है :

कबीर बामनु गुरु है जगत का, भगतन का गुरु नाहि।
अरझि उरझि के पचि मुआ चारउ बेदहु माहि।9

कबीर पंडित को चार वेदों में डूबा हुआ मानते हैं।10

 संतों का मानना है कि लगी हुई आग में संयोग से मूर्ख शायद बच जाए, पर पंडित के बचने की कोई संभावना नहीं।11

कबीर का कथन है कि ब्राह्मण का वेद-पुराण पाठ गधे पर चंदन लगे होने की तरह हास्यास्पद है।12

 कुमति के बस में वह दुर्भाग्यशाली है, वेद पाठ तो करता है, नाम जप उसके पास नहीं है, वह परिवार सहित डूब मरेगा। साफ तौर पर कबीर का नाम जप, ब्राह्माणिक वेद मार्ग से न्यारा तो था ही, उससे एकदम दूसरी दिशा में था।

कबीर ने चेताया कि तू ब्राह्मण है और मैं काशी का जुलाहा हूं, तेरी मेरी बराबरी कैसे हो सकती है? मुझे राम नाम का भरोसा है और तू तो वेदों के भरोसे डूब मरेगा :

तू ब्रह्मनु मैं कासी का जुलहा मोहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि।
हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूबि मरहि।।13

एक अन्य स्थल पर कबीर ने ताल ठोंक कर ब्राह्मण के ज्ञान को ललकारते हुए कहा था, ब्राह्मण! तू तो भूपतियों का याचक है, उनसे दान जुटाया करता है, मैं केवल हरि पर भरोसा किए हूं। तुझे जनेऊ का अभिमान भले ही हो, तू मेरी बराबरी क्या करेगा, मेरे घर तो नित्यप्रति सूत का ताना तना रहता है।14

शुद्रों के विरुद्ध अनेक प्रकार के आरोपित  अभिशापों  के लिए ब्राह्मणवाद के पास कोई तक नहीं था। इसलिए वर्णधर्मी दमनमूलक व्यवस्था के सुचारू कार्यान्वयन के लिए दैवी मान्यता प्राप्त ब्राह्माणिक ग्रंथों के माध्यम से अंधविश्वासों और मिथकों का एक भरा पूरा तंत्र प्रचारित-प्रसारित किया जाने लगा था। देखने की बात है कि शोषणपरक सत्ताओं को सदैव अंधविश्वासों की जरूरत रही है।

 वेदादि ग्रंथों के श्रवण और सामान्य रूप में शिक्षित होनेे के अधिकार से वंचित कर दिए गए दलित वर्गों के कबीरादि संतों की वाणियों में जिस विवेकशील और तर्कसंगत तरीके से ब्राह्माणिक अंधविश्वासों का पर्दाफाश किया गया है, वह देखने की बात है।

संत समझा पा रहे थे कि व्रतों का विधान केवल ियों के रतिभाव को नियंत्रण में लेते हुए ियों की मनोचेतना को कुंठित बनाए रखने की एक युक्ति मात्र थी। ियों के निमित्त पुराणों में व्रतों की लंबी सूचियां दी गई हैं। व्रतों के पुण्यों, प्रलोभनों और प्रायश्चितों के वर्णनों की कोई सीमा नहीं है। इस बात का अनुमान आज सबसे अधिक प्रचलित ‘करवा चौथ’ के व्रत और इस व्रत की कथा से लगाया जा सकता है। करवा चौथ के व्रत का प्रावधान पति की दीर्घायु के लिए है। जाहिर है कि इस व्रत द्वारा स्त्री के समर्पण, बेबसी, वैधव्य के आसन्न भय को पुन:पुन: दृढ़ किए रखने का सिलसिला हर वर्ष अनिवार्य रूप से दोहराया जाता है।

कबीर ने बड़े कठोर शब्दों में बताया था कि जो स्त्री अन्न का त्याग करती है, वह न तो सोहागन है और न ही एक सामान्य  :

छोडहि अंनु करहि पाखंड न सोहागन न ओहि रंड।15

 अन्नादि पदार्थों को संतों ने धन्य माना है। कबीर के लिए अन्न और नाम का जप एक जैसी बात है :

 जपीअै नामु जपीअै अंनु
अंनै बिना न होई सुकालु
तजिअै अंन न मिले गुपालु।।
धनु अनादि ठाकुर मनु मानिआ।।16

 कबीर ने एक स्थल पर अपने ईश्वर से शिकायत की है कि भूखे, भक्ति नहीं की जा सकती है। वे सहज भाव से दो सेर आटा मांगते हैं। एक पाव घी और साथ में नमक :

दुइ सेर मांगउ चूना। पाउ घीउ संगि लूना।।17

एक श्रमिक की सबसे बड़ी चाह यही होती है कि उसे पेट भर भोजन मिल सके। जिसे क्षुधा का अहसास हो, उसे ही अन्न का महत्व मालूम होता है। संतों के लिए श्रम ही सबसे महत्वपूर्ण रहा है। परजीविता उनके लिए हराम है। संत उन्हें धन्य मानते हैं, जिन्हें अन्न के महत्व का अहसास है।

संत कहते हैं, जो अन्न के महत्व को नहीं समझते, वे तीन लोक में अपना सम्मान ही खो बैठते हैं :

अंनै बाहरि जो नर होवहि।।
तीनि भवन महि अपनी पति खोवहि।।18

संतों के यहां अन्न का महत्व हमें भारत का आद्यभौतिकवादी परम्परा की याद दिलाता है। उपनिषदों में पूर्व वर्गीय आद्यभौतिकवादी समाज के अवशेष खोजे जा सकते हैं। यास्क ने हमें संकेत दिया है कि ब्रह्म का एक अर्थ अन्न भी था। इसके लिए उन्होंने तैत्तिरीय उपनिषद् का उदाहरण दिया है 19:

 ‘इस पृथ्वी के जितने भी प्राणी हैं, वे वस्तुत: अन्न से उपजे हैं। अन्न पर ही वे निर्भर हैं और अंत में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। वस्तुत: सभी प्राणियों में प्रथम उत्पन्न अन्न है। इसलिए इसे सर्वनिदान औषधि कहा जाता है। वस्तुत: जो ब्रह्म की अन्न के रूप में उपासना करते हैं, उन्हें सभी प्रकार का अन्न प्राप्त होता है।’

 कबीर ने श्राद्ध कर्मकांड की धूत्र्तता के बारे में बताया, जीवित मां बाप का तो सम्मान किया नहीं जाता, मरने के बाद यह कैसा पाखंड है। पितरों को भी क्या मिलता है। कौवों, कुत्तों को भोजन परोसा जाता है, वे ही इसे खाते हैं, अंधविश्वास है कि जैसे तर्पण के रूप में अर्पित यह खाद्य पदार्थ मृतक पूर्वजों को प्राप्त हो जाता हो:

जीवित पितर न मानै कोऊ मूए सिराध कराही।
पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही।।20

जीवितों को प्रताडि़त करते हुए मृतकों की पूजा का यह आडंबर, भारत की ब्राह्माणिक विचारधारा का ऐसा विरोधाभास है, जिसे जनसामान्य की मनोचेतना में आत्मसात कर दिया गया है। शताब्दियों से इसमें जकड़े हुए लोग इसका पालन करते आ रहे हैं।

शौच-अशौच, मूर्ति पूजा, श्राद्ध, व्रत, सूतक, उपनयन आदि अनेक ब्राह्माणिक कर्मकाण्डों का न तो किसी प्रकार की आध्यामिकता से सम्बन्ध है, न ही ये आद्य कर्मकाण्डीय चर्चाओं के रूप में प्रकृति को  तुष्ट करने के जनजातिय समूहगत अनुकरणमूलक टोने-टोटके आदि के अवशेष हैं, बल्कि साफ तौर पर ये पितृसत्ता, वर्णव्यवस्था, कर्मवाद आदि वर्गीय शोषण के तहत आरोपित किए गए ब्राह्मणवाद के विचारधारक उपस्कर हैं।

सूतक भी एक ऐसा ही आरोपण है जो स्त्रियों को एक खास अवधि के लिए अस्पृश्य बना देता है। इसके अनुसार मासिक स्राव और प्रसूति के दौरान ी का स्पर्श निषिद्ध किया गया है।

स्त्रियों के रजोधर्म के सहज ही अशुद्ध होने की कल्पना पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण की उपज है। सूतक का संबंध इस बात से भी है कि जाति प्रथा में ियों का दमन और शोषण निहित रहता है।  एक तरह से ियों और सामाजिक समूहों पर अशुद्धता का आरोपण वर्ग-शोषण का चरम रूप है। शौच-अशौच की विचारधारा आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की निम्न स्थिति और शोषण को वैधता प्रदान करती रही है।

 कबीर ने अस्पृश्यता की लज्जाजनक सैद्धांतिकी के छद्मजाल को संतों ने अपने सहज और स्वाभाविक तर्कों द्वारा उड़ा दिया था। कबीर का कहना था कि यदि सूतक रूपी ब्राह्मणिक अशौचता को मानें तो फिर पिता भी जूठा सिद्ध हो जाएगा। माता भी और उसकी संतान भी सूतकमयी अशौच से ग्रस्त हो जाएगी। कबीर ने कहा कि इससे तो कहीं कोई शौच नहीं। ब्राह्माणिक दृष्टि से जिह्वा तो जूठी होती ही है, बोलना भी जूठा है, नयन भी जूठे हैं। इंद्रियों की जूठन से छुटकारा पाया ही नहीं जा सकता। आग जूठी है, पानी जूठा है। भोजन पकाने की प्रक्रिया जूठी है। जूठे व्यक्ति ही पकाते हैं। कलछुल भी जूठी हुई और परोसने वाले भी जूठे हुए। कबीर कहते हैं, बताओ पंडित! फिर कौन पवित्र है? इस प्रकार संत विश्वास दिला रहे हैं कि सब कर्मकाण्ड मात्र जकड़बंदी हैं।21

 जाति व्यवस्था ब्राह्माणिक समाज शास्त्र का केंद्रीय मुद्दा है। ब्राह्माणिक विचारधारा का प्रत्येक प्रयत्न जाति-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध रहा है। आर्थिक अधिशेष के मद्देनजर श्रमिकों, उत्पादनशील श्रेणियों पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से आरोपित अशक्ततायें और दमन समझ में आने वाली बात है। प्राक् पंूजीवादी समाजों के सामंतीय तत्वों द्वारा इस प्रकार का चलन सर्वत्र बनाए रखा जाता है पर अमानवीय शोषण के प्रतिरोध का दमन करने के उद्देश्य से श्रमिकों को बांटे रखने में, परस्पर द्वेषमूलक सोपानक्रम का प्रावधान, भारत के ब्राह्माणिक सामंतवाद की एक ऐसी ‘स्ट्रेटजी’ को लक्षित करता है, जिसके उद्भव और विकास की गुत्थी को सुलझाने के ढेरों अध्ययन अभी भी उलझे दिखाई देते हैं। जाति व्यवस्था के निमित्त इस उलझाव का एक अधिक गंभीर पक्ष, स्त्री के प्रति ब्राह्माणिक विचारधारा द्वारा तिरस्कार का एक ऐसा दृष्टिकोण और व्यवहारिक चलन है, जिसने एक मनोविकार और मनोग्र्रंथि के रूप में द्विज अथवा अद्विज सभी वर्गों को जकड़ रखा है।

स्त्री और शूद्र की इस दारुण अवमानना के मद्देनजर कबीर ने बड़े जोरदार ढंग से ब्राह्मणिक ग्रंथों के अतार्किक, अस्वाभाविक और अमानवीय विचारों को एक सिरे से हास्यास्पद सिद्ध करते हुए, ब्राह्मणिक ‘पापयोनि’ के अभिशाप से छुटकारा दिलाकर भारतीय स्त्री और श्रमिक को मानवीय अधिकार से मंडित किया है।

कबीर के एक ही पद ने ब्राह्मणिक जाति व्यवस्था के जन्मजात दैवी सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया है।

जाहिर है, जैसा कि कबीर ने कहा, गर्भावस्था में किसी की कोई कुल जाति नहीं होती। पैदा होते ही किसी का ब्राह्मण, क्षत्रिय, शुद्र होना, कितना हास्यास्पद और अतार्किक है।

गर्भवास महि कुलु नहीं जाती, ब्रहम बिंदु ते सभ उतपाती।
कहु रे पंडित बामन कब के होए, बामन कहि कहि जनमु मत खोए।
जौ तूं ब्राहमणु ब्रहमणी जाइया, तउ आन बाट कहे नहीं आइआ।
तुम कत ब्राहमण हम कत सूद, हम कत लोहू तुम कत दूध
कहु कबीर जो ब्रहमु बीचारै, सो ब्राहमणु कहीअतु है हमारे।। 22

यहां सीधे-सीधे वर्णों के उद्भव के एक प्राचीन सूत्र का स्पष्ट निषेध है। चतुर्वर्ण की उत्पत्ति के बारे में प्राचीनतम अनुमान ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में वर्णित सृष्टि संबंधी पूरा कथा में दिया गया है

जाति प्रथा की विडम्बना यह है कि ब्राह्मणिक ग्रंथों द्वारा लोक चेतना में इस बात को पैठा दिया गया है कि जाति का निर्धारण जन्मना होता है। इसी असंगत ब्राह्माणिक अनर्गल कूटनीतिक सैद्धांतिकी को लक्ष्य करते हुए कबीर ने कहा, ब्राह्मण! तू भी स्त्री के उसी प्रजननांग से पैदा हुआ है, जिससे शुद्र और अन्य प्राणी पैदा होते हैं। फिर तू जन्मते ही विशिष्ट क्यों मान लिया जाता है? क्या गर्भवास में ही तेरी जाति तय हो जाती है? हां, यदि ऐसा हो तो जन्म से ही विशिष्ट होने के लिए अन्य सामान्य जन की अपेक्षा तेरा जन्म किसी विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा होना चाहिए था।

कबीर कटाक्ष करते हुए कह रहे हैं तेरे जन्मते ही ब्राह्मण होने का कारण कहीं यह तो नहीं कि शायद तेरी धमनियों में पवित्र दूध बह रहा हो, जबकि हम शुद्रों की धमनियों में तो रक्त ही प्रवाहित होता है।

 देखने की बात है कि कबीर के इस तिलमिला देने वाले प्रत्युत्तर से बढ़कर ब्राह्मणिक जन्मना जाति प्रथा के विरुद्ध धारदार, मार्मिक और सटीक तर्क क्या हो सकता है। इसके बाद जाति प्रथा के जन्मना छद्म के विरोध में किसी अन्य तर्क की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती। व्यंग्य की यह तर्क-सामथ्र्य कबीर की प्रतिभा का ही कमाल है।

गौरतलब है कि इस सिलसिले में कबीर ने वर्ण व्यवस्था के विचारधारक स्रोत ब्राह्मणिक ग्रंथों और ब्राह्मणिक कर्मकाण्डों को भी एक सिरे से हास्यास्पद सिद्ध कर रहे थे। कबीर के लिए ‘जनेऊ’ दो तागों से अधिक कुछ नहीं था, जुलाहे के तने हुए ढेरों ताने बाने से क्या उसकी कोई बराबरी है। ‘जनेऊ’ के साथ जुड़े ब्राह्मणिक पाप-पुण्य, नरकों के आतंक, जन्म-जन्मांतरों के ढकोसले, जिनके बल पर ब्राह्मण का त्रासक अभिशाप शुद्रों को गुलाम बनाए था, एक झटके में उड़ते दिखाई दिए हैं।

ब्राह्मणिक ग्रंथों की मिथकीय जकड़बंदी की मार्फत सामंतीय अमानवीय शोषण का दुश्चक्र शताब्दियों से अनवरत जारी है। कबीर ने इस वैचारिक दुरभिसन्धि की सही ढंग से निशानदेही करते हुए वेदादि गं्रथों के बारे में कहा था कि ये कागज तो एक प्रकार से पशुओं को बांधने का बाड़ा है, स्याही में लिखावट इस बाड़े के द्वार हैं। पत्थर की मूर्तियों ने दुनिया डुबो दी है, इस पर पंडित डकैत की तरह है :

 कबीर कागद की ओबरी मसु के करम कपाट
पाहन बोरी पिरथमी पंडित पाड़ी बाट।23

कबीर पंडित के समस्त वेद-ज्ञान को उस काठ की कोठी की तरह देख रहे थे, जिसके चारों ओर आग लगी हुई है। कबीर का कहना था कि मूर्ख तो शायद बच भी जाएं, पर स्वयं पंडित कोई बचाव नहीं था :

 कबीर कोठी काठ की देहदिसि लागी आगि
पंडित पंडित जल मूए मूरख उबरे भागि।24

कबीर ने ब्राह्मणिक प्रतिक्रियावाद को लक्षित करते हुए बड़े आक्रोश-वेदों का निषेध किया है। कबीर का मानना है कि चारों वेदों में उलझ कर पंडित स्वयं तो डूबा ही था, उसने अपने चेलों को भी बहा दिया है :

आप डुबे चहु बेद महि चेले दीए बहाई25

कबीर इसे कुमति मानते हैं। पंडित को संबोधित करते हुए कबीर ने बताया, हे पांडे! तू कुमति में लीन है, राम नहीं जपता। वेद और पुराण पढऩे का क्या लाभ? यह तो गधे पर चंदन के भार जैसा है:

पंडीया कवन कुमति तुम लागे
बूडहुगे परवार सकल सिउ राम न जपहु अभागे
बेद पुराण पढ़े का किआ गुनु खर चंदन जस भारा।26

 कबीर ने पंडित को मन का अंधा बताया है, स्वयं कुछ जानता नहीं, दूसरों को उपदेश दे रहा है :

मन के अंधे आपि न बूझहु काहि बुझावहु भाई।27

कबीर के अनुसार वेदों का पढऩा, राजा के धन संचय के समान व्यर्थ है :

दरबु संचि संचि राजे मूए गडि ले कंचन भारी
बेद पड़े पडि़ पंडित मूए  रूपु देखि देखि नारी।28

संत स्पष्ट मानते हैं इनका पढऩा क्या! इनका क्या मनन! क्या श्रवण! इन ग्रंथों का कोई प्रयोजन नहीं :

किआ पड़ीअै किया गुनीअै,
किया बेद पुराना सुनीअै,
पड़े सुने किया होई।29

कबीर वेद, वेद मार्ग और ब्राह्मण की वर्णधर्मी अहम्मन्यता को चुनौती देते हुए, दरअसल ब्राह्मणिक वर्ण व्यवस्था की बुनियादों पर प्रहार कर रहे थे। इस दृष्टि से अवतारों का खण्डन उनका सबसे बड़ा क्रांतिकारी मुद्दा था।

अवतारवाद का निषेध करते हुए संतों ने पाया कि ब्राह्मणिक परब्रह्म जाति, धर्म के बंधनों से जकड़ा हुआ था। राम अथवा कृष्ण, क्षत्रिय और परशुराम, ब्राह्मण बनकर रह गए थे। कीरी से लेकर कुंजर तक जिस सांई के जीव थे, वह सांई दशरथ का बेटा, रावण का शत्रु, देवकी कोख से सामान्य शिशु की तरह जन्मने और व्याध के तीर से मरने वाला सामान्य मायालिप्त संसारी बन चुका था। कबीर को पक्का विश्वास था कि दशरथ सुत का बखान करने वाले त्रैलोक्य राम नाम के मर्म से अपरिचित हैं :

 दशरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम को मरम है आना।30

 भला जो काल का वशवर्ती हो वह परब्रह्म कैसे हो सकता है? लेकिन ब्राह्मणिक चौबीसों अवतार तो प्रत्यक्षत: काल के वशवर्ती हैं। राम, कृष्ण, परशुराम सबको मरना पड़ा है :

 दस चौदह औतार काल के बसि में होई
पलटू आगे मरि रह्यो आखिर मरना भूल
राम कृष्ण परसराम ने मरना किया कबूल।31

कबीर ने बताया, मेरा यह राम दशरथ के घर अवतरित नहीं हुआ, उसने लंका के राजा को नहीं सताया। देवकी की कोख में भी वह नहीं आया और न यशोदा ने उसे गोद ही खिलाया। न वह ग्वालों के साथ फिरा, न उसने अंगुली पर गोवर्धन को उठाया। न उसने वामन के रूप में बलि को छला, न वाराह रूप में उसने धरती और वेद का उद्धार ही किया। वह न गंडक का शालिग्राम है, कोल, कच्छ-मच्छ होकर जल में विचरने वाला भी वह नहीं है। बदरिकाश्रम में बैठकर उसने ध्यान नहीं लगाया, परशुराम बनकर क्षत्रियों का संहार नहीं किया। द्वारावती में उसकी (कृष्ण रूप में) मौत नहीं हुई, जगन्नाथ में उसका शरीर नहीं गाड़ा गया। कबीर की मानो, यह सब ऊपरी व्यवहार है। जो संसार में बरत रहा है, वह इन सबसे अगम्य है।32 वह आदिकत्र्ता कर्मों से अतीत है, आवागमन से ऊपर है, वह न जन्मता है, न मरता है। सहस्रों पृथ्वी और आकाशों में उसका विस्तार है, वह देश और काल से ऊपर है। वह नाद-बिन्दु से अतीत है। वही हमारा खसम है। अगर कहो कि दशरथ का बेटा है तो भाई दशरथ को किसने जन्माया? स्वयं दशरथ का पिता कहां से आया? भला, जो कर्मों से बंधा हुआ हो वह कत्र्ता कैसे हो सकता है?33

अगर वह दशरथ का बेटा  है, तो निश्चय ही दशरथ से पहले वह नहीं था। पर मेरा राम तो तबसे है, जब सृष्टि का कहीं पता भी नहीं था-जब न पवन था न पानी, न धरती थी न आकाश, न शरीर था न शरीर को धारण करने वाला स्थान, न गर्भ था न मूल, न कली थी न फूल, न शब्द था न स्वाद, न विद्या थी न वेद, न गुरु था न शिष्य। उस समय तो गति  से अतीत वह अकेला राम ही था। कबीर कहते हैं, मैं उस नांव-गांव से रहित अविगत की गति क्या कहूं? जिसने गुण ही नहीं, उसका क्या देखें और क्या नाम दें?34

कबीर के मत से इस अविगत की गति लक्ष्य नहीं की जा सकती। चारों वेद, सारी स्मृतियां और पुराण तथा नौ व्याकरण कोई उस निर्गुण राम का मर्म नहीं समझ सका।35 उस राम का कोई नाम-निशान नहीं है। भूख-प्यास का गुण भी उसमें नहीं है। घट-घट में वही समाया हुआ है। पर उसका कोई मर्म नहीं जानता। वह समस्त वेद और भेद से विवर्जित है, पाप और पुण्य से अतीत है, ज्ञान और ध्यान का अविषय है, स्थूल और सूक्ष्म से परे है, मेष और भीख से बाहर है, डिंभ और रूप से ही नहीं, वह अनुपम तत्व तीनों लोकों से अतीत है, त्रैलोक्य विलक्षण है, डिंभ और रूप से ही नहीं, वह अनुपम तीनों लोकों से अतीत है, त्रैलोक्य विलक्षण है।36 वह राम अवरण है, अकल है, अविनाशी है। न उसके रूप हैं, न रंग है, न देह।37 वह तो बस निरंजन है, निरंजन, केवल निरंजन। उसके रंग रूप, मुद्रा माया कुछ नहीं है। वह न समुद्र है, न पर्वत, न धरती है, न आकाश, न सूर्य है, न चंद्र, न पानी है न पवन, न नाद है, न बिन्दु, न काल है, न काया, न जप है, न तप। जोग, ध्यान और पूजा भी वह नहीं है। वह शिव भी नहीं है, शक्ति भी नहीं है और न कोई अन्य देवता है। ऋग्, यजु: साम और अथर्ववेद या व्याकरण भी वह नहीं है। जल और जल में बिम्बित छाया जैसा वह जगत जब नहीं था, तब भी वह था।38

संतों ने अवतारवाद के मिथकीय छद्म जाल को एक झटके से उड़ा दिया था। ब्राह्मणिक विचारधारा के ढेरों ग्रंथों को बेमानी कर दिया था।

 कबीर में वैदिक देवताओं के प्रति किसी प्रकार का कोई सम्मान व्यक्त नहीं किया गया। संतों के अनुसार वैदिक देवता बेमानी हैं। कालांतर में वैसे भी देवताओं का वर्चस्व समाप्त होता गया था पर फिर भी पुराण ग्रंथों में सम्मानित रूप से स्मरण जरूर किये जाते रहे हैं। संतों के यहां तो उनका हास्यास्पद ढंग से वर्णन है।

संतों की वाणियों में ब्रह्मण्डीय गतिशीलता ही प्रकृति का द्वन्द्वात्मक नियम-विधान है, जिसे संतों ने ‘हुक्म’ की पारिभाषिकी द्वारा व्यक्त किया है। देखने की बात है कि ‘हुक्म’ के माध्यम से जीवन जगत के रागात्मक सम्बन्ध ‘अकाल पुरुष’ में आत्मसात होकर एक परमानन्द में रूपांतरित होते देखे जा सकते हैं।

कबीर का कथन है-

‘जिस मरणे ते जग डरे मेरे मन आनंद
मरने ही ते पाईये पूरण परमानंद’39

कबीर का यह पूर्ण परमानन्द पारलौकिक नहीं है, न ही यह बैकुण्ठ गमन है, न इसमें किसी स्वर्ग की परिकल्पना है बल्कि यह जीवन, मृत्यु के साथ-साथ समग्र निर्माण-विनाश के द्वन्द्वात्मक नियम-विधान को आत्मसात करने का परिणाम है।

कबीर ने अनेक स्थलों पर स्पष्ट किया है कि यह आना जाना, होना-मिटना भौतिक तत्वों का संगम और भौतिक तत्वों के ब्रह्मण्डीय लीनता के कारण है। इसमें किसी पारलौकिक अथवा किसी देवी सत्ता का दखल नहीं है।

कुदरत की अवधारणा द्वारा कबीर पंडित के जिस ‘वाद’ का विरोध कर रहे थे, वह था जगत के मिथ्यात्त्व को स्थापित करने वाला सिद्धांत। जाहिर है कि जागतिक अनुभवों की दृष्टि से ऐसा कोई तर्क नहीं हो सकता था, जिसके बल पर दृश्यमान प्रपंच को मिथ्या सिद्ध किया जा सकता।

ब्राह्मणिक ग्रंथों का समाजशा समाज को दो वर्गों में विभाजित किए था, एक ओर समाज के उच्च वर्ग थे, दूसरी ओर शुद्र थे। उच्च वर्णों का ‘द्विज’  कोटि में रखा गया। द्विज का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला अर्थात् दूसरी बार पैदा होने का अर्थ था ‘उपनयन संस्कार’! इस संस्कार के विशेषाधिकार के कारण ये समाज के विशिष्ट व्यक्ति थे। शुद्रों को उपनयन का अधिकार नहीं था। शुद्र प्रत्येक प्रकार के मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिए गए थे। निस्सन्देह शुद्र उस समाज के बहुसंख्यक श्रमिक थे, जिनके अतिरिक्त उत्पादन पर ही समाज के विशेषाधिकार प्राप्त शासक, पुरोहित, व्यापारी आदि वर्गों के लोग सुविधासम्पन्न जीवनयापन की सुविधा में थे। इस प्रकार की यथास्थिति को बनाये रखना परजीवी वर्ग के हितों की पूर्ति के लिए अत्यावश्यक था तथा वे इसके लिए निरंतर सजग एवं प्रयत्नशील रहे हैं। ब्राह्मणिक दार्शनिकों का एक भरा पूरा वर्ग जगत के मिथ्यात्व की घोषणा करता हुआ श्रमिकों की अमानवीय स्थिति का औचित्य प्रतिपादित करने में स्मृति ग्रंथों के सृजन और विकास में लगा रहा है। भौतिक जगत को यथार्थता रहित बताया जाने लगा। प्रकृति का वास्तविक ज्ञान, जिसे आज के युग में  विज्ञान कहा जाता है, उनके लिए शून्य, कपोल-कल्पित, आकाश कुसुम या केवल नाम-रूप था।

कबीर ने ‘शब्द’ को केंद्रीय महत्व प्रदान किया है। ‘शब्द’ की द्वन्द्वात्मक गतिशीलता में कबीर ज्ञान के यथार्थक बोध का संधान करते रहे हैं। कबीर का शब्द अपने में ज्ञान भी है और ज्ञान का स्रोत भी है। इसे उन्होंने दही बिलोने के रूपक द्वारा स्पष्ट किया है। वे कहते हैं, तन मटकी है, मन उसमें मथानी है। शब्द रूपी दही को, तन की मटकी में मन रूपी मथानी द्वारा बिलोने की प्रक्रिया द्वारा ज्ञान रूपी सारतत्व प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में देह और मन की द्वन्द्वात्मक अनुभवमयता, शब्द में निहित ज्ञान की अन्तक्र्रिया द्वाारा पुन: शब्द के माध्यम से ही नित्य नये  ज्ञान बोध को गतिशील किए रहती है:

तन करि मटुकी मन माहि बिलोई।
इसु मटुकी महि सबद संजोई।।
हरि का बिलोवना मन का बीचारा।
गुर प्रसादि पावै अंम्रित धारा।।40

कबीर का ‘शब्द’ रहस्यमूलक नहीं, बल्कि ज्ञान के संचय और सम्प्रेषण का प्रत्यक्षीकृत रूप है। कबीर ने शब्द में ज्ञान को निहित मानकर ज्ञान के विकास में ज्ञान के इतिहास के योगदान को लक्षित किया है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी के संचित अनुभवों का भाषा के कूटों से प्रस्फुटित ज्ञान ही, अवधारणा के स्तर पर वर्तमान के द्वन्द्वात्मक बहुआयामी अनुभवों की अन्तक्र्रिया के माध्यम से नित्य नये ज्ञान के धाराप्रवाह को गति प्रदान किए रहता है। ब्राह्मणिक ‘ग्रंथ’ और कबीर के ‘शब्द’ का यह अन्तद्र्वन्द्व उत्पीड़क और उत्पीडि़त के वर्गीय अन्तर्विरोध को लक्षित करता है।

 ब्राह्मणिक ग्रंथ वर्गीय उत्पीडऩ के निमित्त ब्राह्मणिक अंधविश्वासों का छद्म जाल हैं, जबकि कबीर का ‘शब्द’ उत्पीडि़तों के प्रतिरोध को क्रांतिकारी दिशा प्रदान करता है, क्योंकि कबीर के शब्द में ज्ञान के संधान की प्रक्रिया का आधार जीवन जगत के अनुभवों का केंद्र मानवीय देह है, जिसे उन्होंने तन रूपी मटकी में शब्द के बिलोने की मार्फत ज्ञान पाने की बात कही है। यह वह ‘तन’ है, जिसे ब्राह्मणिक ग्रंथों में दूषित माना गया है और यह वह ‘तन’ है, जो उत्पादन शील वर्गों की श्रम-जन्य आजीविका की आधार भूमि है और जिसकी भव्यता के मद्देनजर संतों ने इसी तन में अपने ‘अकाल पुरुष’ को परिव्याप्त माना है।

कबीर के निरंजन को घट-घट में व्याप्त मान लेने पर सभी ईश्वरवादी परम्पराएं निरस्त हो जाती हैं।

कबीर ने बताया कि उनका राम एक प्रकाश पुंज की तरह घट-घट में विद्यमान है।41 कबीर ने बताया, काया में उसे जानो, इसमें जो बोलता है, वह स्वयं है-

काया मांहे जांनैं सोई, जो बोलै सो आपै होई।
कबीर का स्वामी घट-घट में निवास करता है-
कबीरा कौ स्वामी घटि घटि रह्यौ समाई।42

ब्राह्मण्डीय सार्वभौम-‘अकाल पुरुष’ को घट-घट में व्याप्त सिद्ध करते हुए कबीर ने, शरीर से भिन्न किसी स्वायत्त आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहंी किया। ब्राह्मणिक विचारधारा में देह को मलिन अथवा दूषित घोषित करते हुए देह से अलग एक स्वायत्त ‘आत्मा’ को सर्वोपरि यथार्थता के रूप में स्थापित किया गया है। दरअसल आत्मा की यही सैद्धांतिकी शारीरिक श्रम में लगे लोगों के तिरस्कार और शोषण का आधार रही है। आत्मवाद के तहत जीवन जगत के अनुभवों को मिथ्या बताते हुए उत्पादन कर्म की अवमानना की गई और उत्पादनशील श्रेणियों के प्रतिरोध की सभी संभावनाओं पर अंकुश लगा दिया गया था।

हमारे पास इस आत्मवाद के स्थान पर देहवाद की एक दीर्घ परम्परा रही है। इसी देहवादी परम्परा का विकास करते हुए कबीर ने सिलसिलेवार अपनी मौखिक वाणियों में देह का महत्व स्थापित किया है।

कबीर का राम घट में, देह में रमा हुआ है :
राम लौ घट भीतर रमि रह्या।।43

कबीर दास ने ‘पिंड में ही ब्राह्माण्ड को जानने’ की बात कही है। कबीर का विश्वास है कि तन मेें तीन भुवन की विद्यमानता मान लेने से ही सत्य को उपलब्ध किया जा सकता है।

कबीर ने काजी को भी काया की खोज की सलाह दी है :

काजी सो जो काइया बीचारै।।44

कबीर की साधना का केंद्र मानवीय देह है। इसीलिए वे इसे कमाण की तरह कस कर रखने का उपदेश देते हैं। पांच तत्व बाण हैं और इन बाणों से मन रूपी मृग को वश किया जाना है। जैसे स्वर्णकार कसौटी पर सोने को परखा करता है, उसी प्रकार कबीर शरीर को ‘सोधने’ की बात कहते हैं।45

देह के बारे में पंडित के वाद-विवाद का निषेध करते हुए बार-बार कहा गया है कि देह के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। खास तौर पर जब संतों का दृढ़तापूर्वक विश्वास है कि उनका निरंजन मानवीय देह में ही निवास करता है। कबीर कहते हैं

हरि-हरि महि तनु है तन महि हरि है सरब निरंतरि सोइ रे।46

कबीर मनुष्य जन्म को दुर्लभ मानते हैं। यह बार-बार नहीं होता। इस जन्म की पुनरावृति नहीं होती। वृक्ष से फल झड़ने के बाद वही फल पुन: वृक्ष पर नहीं लगाया जा सकता:

 मनिषा  जनम दुर्लभ है, देह न बारंबार
तरवर थैं फल झडि़ पडय़ा बहुरि न लागै डार।।47

इसके उलट ब्राह्मणिक विचारधारा के पास वर्गीय इस्तेमाल के लिए पुनर्जन्म का सिद्धांत है। ब्राह्म��वाद का मानना है कि देह में बद्ध आत्मा, देह से छुटकारा पाकर कतिपय नये रूपों को ग्रहण करती हुई पाप-पुण्य आदि कर्मफल के समाप्त होने पर अन्ततोगत्वा किसी ब्रह्म के अद्वैत में विलीन हो जाती है। ब्राह्मणिक जीवात्मा ऐसा दुश्चक्र है, जिसका पुराण ग्रंथों में कोई ओर छोर नहीं। उनका आशय आत्मा और देह की गुत्थी को सुलझाने में नहीं था, बल्कि वे पुनर्जन्म द्वारा पुन: पुन: यह सिद्ध करना चाहते रहे हैं कि उनके आदर्श समाज का वर्ण विधान पिछले जन्म के कर्मों पर आधृत है। यह एक ऐसा मिथ था कि जिसके आधार पर भारत का विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग शुद्रों के घोर अमानवीय उत्पीडऩ को न्यायसंगत सिद्ध करता आ रहा है। यहां देह का नकार दरअसल श्रम का तिरस्कार है। जबकि कबीर तन को संभालने की चिंता करते हुए श्रम और श्रमिक का महत्व स्थापित कर रहे थे। ध्यान रहे कि एक श्रमिक की पूंजी तो मात्र देह ही हो सकती है देह से ही उसका अस्तित्व है।

कबीर आवागमन, पुनर्जन्म, परलोक आदि के यत्र तत्र निषेध के माध्यम से मूलत: देह केंद्रित श्रम मूलक जीवन दृष्टि को अधिक स्पष्ट करते रहे हैं। बार-बार उन्होंने कहा है कि जीवन का उद्भव भौतिक तत्वों के सुमेल का परिणाम है। पाप-पुण्य बैकुंठ स्वर्ग का कोई वजूद नहीं है।

ब्राह्मणिक परम्परा में दावा किया गया है कि आत्मा देह में कैद है, देह के मिटने पर ही मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। देह के मुकाबले आत्मा का सर्वोपरि महत्व उपनिषदों का केंद्रीय विषय रहा है। इसलिये कबीर वैदिक परम्परा के मान्यता प्राप्त ऋषियों से अपेक्षा नहीं रखते कि वे देह और आत्मा के द्वन्द्वात्मक रहस्य को जानते नहीं होंगे :

 सनकादिक नारद मुनि सेखा।
तिन भी तन महि मन नहीं पेखा।।48

कबीर आत्मा के लिए यहां मन का प्रयोग करते हुए केवल चेतना का संकेत दे रहे हैं। कबीर इस मन को खोजने के लिए प्रश्न उठाते हैं कि तन छूट जाने पर मन कहां चला जाता है? पर उन्होंने शायद इसका उत्तर अपने पूर्व संतों से जान लिया था और बता सके थे कि यह मन कहीं आता-जाता नहीं है, इसका कोई आवागमन नहीं है। दूसरे शब्दों में कबीर का अन्तर्निहित अभिप्राय यह था कि देह और चेतना अभिन्न हैं, एक ही तांत्रिक प्रक्रिया का परिणाम हैं। देह का छूटना, चेतना के छूटने से भिन्न नहीं है, इस बारे में फैलाए गए भ्रमों के मिटने पर ही सत्य का साक्षात्कार हो पाता है। कबीर इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए बता रहे हैं कि चेतना देह से भिन्न कोई रूप या चिन्ह नहीं होती।

आत्मवाद, जगत को मिथ्या मानने वाले सभी सिद्धांतों का मूल है। आत्मवाद में चेतना का देह से अलग अस्तित्व सिद्ध करते हुए मानवीय देह को घृणित मान लिया गया है। देह के नकार में उन श्रमजन्य गतिविधियों का तिरस्कार है, जिनकी बदौलत आत्मवादी दार्शनिक जिन्दा है। इसी विडम्बनायुक्त दुरभिसन्धि में हमारे श्रमिकों की अवमानना का रहस्य छिपा हुआ है। देखने की बात है कि जिन ग्रंथों में आत्मवाद का महिमामंडन किया गया, उन्हीं मेंंं साथ ही श्रमिकों को पापयोनि से अभिशप्त करते हुए उन्हें मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया गया था।

श्रम और श्रमिक की श्रमजन्य आजीविका को सत्याचरण की कसौटी मानते हुए संतों का कहना था, सही राह पाने का एकमात्र साधन- ‘श्रमजन्य उपार्जन की मिल बांट पर आधृत जीवन पद्धति है।’

ब्राह्मणिक ग्रंथों ने धर्म और धर्म के कर्मकाण्डों के माध्यम से श्रम और श्रमिक के तिरस्कार की एक भरी पूरी सैद्धांतिकी सृजित करते हुए श्रमजन्य कंरणी वाले किसानों, सेवा कर्मियों, शिल्पियों, श्रमिकों को शुद्र  ‘अस्पृश्य’ पापयोनि सिद्ध किए रखा था।
कबीर ने इस स्थिति को उलट दिया था। उन्होंने शुद्रों के मानवाधिकारों को ही ईश्वर आस्था की कसौटी पर प्रमाणित कर दिया था।

जिसकी कथनी, करनी और रहनी में तालमेल न हो, कबीर उसे आदमी नहीं, कुत्ता मानते हैं।

जैसी मुख तैं नीकसै तैसी चालै नांहि
मानुख नहीं तै स्वांन गति बांधे जमपुर जांहि।।49

कबीर स्वर्ग नहीं चाहते, मोक्ष नहीं चाहते। उनका परम प्राप्तव्य लोभ, झूठ, मनोविकारों के त्याग पर आधृत ‘रहनी’ है। संतों का ‘नाम  जप’ किसी तत्वचिंतन का विषय न होकर इसी ‘रहनी’ का विषय है। संत इसी को सहज समाधि या उन्मनी रहनी कहते हैं। पुराणों की ब्राह्मणिक भक्ति और कबीर के नाम-जप में यही मौलिक भेद है। संत ‘नाम-जप’ को रहनी या लाचार से बाहर नहीं मानते। ब्राह्मणिक भक्ति में माना यह गया है कि आचार चाहे जैसा भी हो, अगर व्यक्ति गलती से ही एक बार राम का नाम ले ले तो कुछ और करने की जरूरत नहीं रह जाती। सीधे नाम लेना तो खैर कुछ बात है, वाल्मीकि उल्टा नाम जपकर ही ब्रह्म समान हो गए थे-

उलटा नाम जपत जग जाना।
वाल्मीकि  भयए ब्रह्म  समाना।

ब्राह्मणवाद और संतों के विश्व दृष्टिकोण का यही मूलभूत भेद है। देखने की बात है कि ब्राह्मणवाद की वर्णधर्मी भौतिक और बौद्धिक श्रम की बांट में, जाहिर हैे कि बुद्धिजीवी वर्ग शारीरिक श्रम के उत्तरदायित्व से मुक्त रहता है। श्रम-प्रक्रिया मूल रूप से प्रकृति और भौतिक मानव देह  के बीच क्रिया प्रतिक्रिया है और इसमें बाह्य पदार्थों को अपनी आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने का प्रयत्न रहता है। कहने का मतलब यह है कि भौतिक विश्व-प्रकृति की यथार्थता तब तक मानव चेतना पर अपनी छाप बनाये रखती है जब तक मनुष्य श्रम-साध्य कार्यों में लगा होता है। इस दृष्टि से श्रम साध्य कार्यों के केंद्रीय महत्व के कारण ही संतों के लिए मानवीय देह सर्वोपरि है और इसी सिलसिले में प्रकृति और ब्राह्मण्ड, यथार्थ वास्तविकता है। इसके विपरीत द्विजों के  लिए श्रम का निषेध करते हुए, द्विजों की ब्राह्मणिक विचारधारा में मनुष्य और प्रकृति के बीच क्रिया-कलाप को भंग कर दिए जाने पर देह के स्थान पर आत्मा को सर्वोपरि मान लिया गया है और तब प्रकृति और ब्राह्मण्डी यथार्थता स्वत: मिथ्या प्रतीत होने लगती है। मनुष्य की चेतना जो विषय को प्रतिबिम्बित करती है, वह विषय ही जब लुप्त हो जाता है तो चेतना, फिर स्वत: स्वायत्त रूप से रहस्यवाद में रूपांतरित होने लगती है। यही ब्राह्मणवाद का आत्मवाद है।

ब्राह्मणिक आत्मवाद की पहली शर्त यह है कि आत्मनिर्भर या स्वतंत्र प्रकृति के अस्तित्व को नकार दिया जाए। ब्राह्मणिक आत्मवाद न केवल प्रकृति के अस्तित्व को न मानने वाला सिद्धांत है, बल्कि इसमें यह निश्चित किया गया है कि आत्मा या चेतन ही परम सत्य है और मानव मस्तिष्क ही वास्तविकता का संचालन करता है।

कबीर ने प्राणि-जगत, प्रकृति और ब्राह्माण्ड की एकसूत्र संवेदनात्मक मनोचेतना के आधार पर ब्राह्मणवाद की इस वर्गीय आत्मवादी विचारधारा को चुनौती प्रदान करते हुए निरपख और समतामूलक विश्व दृष्टिकोण स्थापित किया था। इस प्रयत्न में कबीर ने सभी भेदमूलक मतवादी परम्पराओं पर गहराई से नजर गड़ाये हुए कहा था-

पषा पषी के पेषणै सब जगत भुलाना।50

 पखपात का विरोध करते हुए कबीर ने पंडित और मुल्ला दोनों को त्याग कर सब विवाद ही खत्म कर दिए थे-

हमारा झगरा रहा न कोऊ,
पंडित मुलां छाडे दोऊ।
पंडित मुलां जो लिखि दीआ,
छाडि चले हम कछू न लीआ।51

गौरतलब है कि यह निरपखता कबीर के इस विश्वास पर आधृत है कि जिस प्रकार एक ही मिट्टी से भांति-भांति के बर्तन घड़ लिए जाते हैं। उसी प्रकार एक ही कुदरत से सृष्टि और स��ष्टि के समस्त प्राणि जगत की संरचना हुई है। संतों ने ब्रह्माण्ड और ब्राह्माण्डीय वस्तु-जगत की यथार्थता को प्रमाणित करते हुए बताया है कि रचयिता, सृष्टि में स्वयं विद्यमान है और पुन: सृष्टि, रचयिता में समोयी हुई है:

खालिकु खलक खलक महि खालिकु पूरि रहिओ सरब ठांई।
माटी एक अनेक भांति करि साजी साजनहारै।
ना कुछ पोच माटी के भांडे न कछु पोच कुंभारै।52

 कबीर की वाणियों में इस वस्तुस्थिति पर जोर दिया गया है कि मानवीय-अभ्युदय में ईश्वरवादी धर्मों की कोई सार्थक भूमिका नहीं है बल्कि इस प्रकार के धर्मों के भेदमूलक गठनों ने अपने पैरोकारों के बीच विखण्डनताओं के बीजारोपण किए हैं। इन धर्मों के बदल में, संत, घट-घट में ब्राह्मण्डीय सार्वभौम ‘अकालपुरुष’ की विद्यमानता को समझते-समझाते हुए, मानवीय सत्याचरण की आध्यात्मिक मनोचेतना पर आधृत ‘आपा पछाण’-‘अपो दीपो भव’ के ज्ञानालोक में मानवीय अस्मिता का संधान कर रहे थे।

दमनमूलक ब्राह्मणिक विचारधारा की चुनौती के मद्देनजर, धर्मों,  मत-मतान्तरों और जातियों के विखण्डनों को रद्द करते हुए, कबीर दरअसल एक बड़े रूपांतरण की प्रतिबद्धता के साथ पीडि़त वर्गों की एकजुटता के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। गौरतलब है कि कबीर की वाणी में प्रतिपादित मानवीय एकता और समता, समभावमूलक और समन्वयपरक नहीं है बल्कि उन्होंने ब्राह्मणिक उत्पीड़क वर्चस्व और दलित के बीच साफ तौर पर एक द्वन्द्वात्मक अंतर्विरोध लक्षित किया है-

तू बाह्मन मैं कासी क जुलहा बूझहु मोर गिआना।
तुम  तउ जाचे भूपति राजे हरि सिउ मोर धिआना।53
तू  ब्रहमनु मैं कासी का जुलहा मोहि तोहि बराबरी कैसे कै बनहि।
हमरे राम नाम कहि उबरे बेद भरोसे पांडे डूब मरहि।।54

निष्कर्षत: कबीर की वाणी में ब्राह्मण और जुलाहा का यह अंतर्विरोध सत्ता और जन विमर्शों का अन्तर्विरोध है।

कबीर की वाणी अतार्किक, मिथकीय, अंधविश्वासपरक, दमनमूलक, ब्राह्मणिक विचारधारा के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष करते आ रहे असुरों/शुद्रों/लोकायतों के निरपख, नैतिक, समतामूलक और तर्कसम्मत जनविमर्शों का पुनर्जागरण हैं।

संदर्भ:

  1. भगत रविदास, सं.:जसबीर सिंह साबर, अमृतसर 1984, पृ.-283
  2. बाणी भगत कबीर जी, सं.भाई जोधसिंह, पटियाला, पृ.-95
  3. वही, पृ.-150,
    1. 4. कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, वाराणसी, सं. 2050, पृ.-155,  5.वही, पृ.-173,   6.वही, पृ.-184,       7.वही, पृ.-173       8.वही, पृ.-80,        9.बाणी भगत कबीर जी, पृ.-181,                      10.वही, पृ.-164,    11.वही, पृ.-173,    12.वही, पृ.-120,    13.वही, पृ.-115,      14.वही, पृ.-179,    15.वही, पृ.-111,     16.वही,         17.वही, पृ.-92,      18.वही, पृ.-111,    19. तैत्तिरीय उपनिषद 11.2,         20.बाणी भगत कबीर जी, पृ.-27     21.वही, पृ.-25,      22.वही, पृ.-6,        23.वही, पृ.-169,    24.वही, पृ.-173,    25.वही, पृ.-164,      26.वही, पृ.-119,    27.वही, पृ.-120,    28.वही, पृ.-87,  29.वही, पृ.-91,      30. कबीरदास बीजक,           31.महात्माओं की वाणी, पृ.-129        32.कबीर ग्रंथावली,  तिवारी, रमैनी 2, 33.वही, पद-158,  34.वही, रमैनी 4,  35.वही, पद-153,  36.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, पद 220,        37. संतवाणी संग्रह, पृ.-15,  38.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, पद 219,   39.   40.   41.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, पृ.-54,       42.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, 150.328, 43. वही, 64.4,    44.बाणी भगत कबीर जी, पृ.-134,    45.वही,    46.वही,   47.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, पृ.-19,      48.बाणी भगत कबीर जी, पृ.-22,      49.कबीर ग्रंथावली, सं.पारसनाथ तिवारी, 249:9,    50.कबीर ग्रंथावली, श्यामसुंदर दास, 111.181,   52.वही,पृ.-149,  53.वही,पृ.-79,       54.वही,पृ.-115,
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