कहानी


बचपन पूरे जीवन का माई-बाप होता है। बचपन के बाद अपना कद निकालता हुआ जीवन इसी बचपन की जुबान से ही बोलता-बतियाता है। इसके बावजूद इस नटखट बचपन का कोई भरोसा भी नहीं कि कब वह कोई खुराफ़ात कर डाले और कब सिर चढ़ कर बोलने लगे। बुजुर्ग इंसान भी अपने भीतर अपने बचपन को कंगारू के बच्चे की तरह ही समेटे रहता है और बचपन झट उसकी गोद से निकलकर उन्हीं गलियों में लौट जाता है जहां वह अपने दोस्तों के साथ खेल में सारी दुनिया को भुलाए बैठा रहता था और घर-वापसी की आवाज लगाती हुई मां की आवाज उसे किसी दूसरे लोक से आती हुई अजनबी सी आवाज़ लगती थी जिसे वह हर हाल में अनसुना कर देता था मगर घर तो उसे लौटना ही होता था।

मेरा बचपन घुन्ना बचपन था। चुप्पी मुझे मां से विरासत में मिली, वे बेहद कम बोलती और पिता? पिता के बोलों से मेरा कभी परिचय ही नहीं हो पाया, मेरे लिए वे सदा अजनबी पिता ही रहे, घर को भी उनकी आदत नहीं पड़ी थी यही कारण था कि घर को उनके रहने या न रहने से कभी कोई फर्क नहीं पड़ा, वह पिता के बिना भी खुश था। घर को मेरे और मां के नाज़-नखरों से ही आबाद रहने की लत लगी हुई थी। बहुत बचपन में मेरे घर के चारों कोनों में जब चुप्पी गूंजने लगती कई बार तो इतनी अधिक की उस गूंज से पीछा छुड़ाने के लिए मैं भाग कर मां के आंचल की पनाह ले लेता था। मां अक्सर गुनगुनाया करती थी मगर हैरानी की यह बात थी उनकी गुनगुनाहट का एक भी लय मुझ तक नहीं पहुँच पाती थी। मुझे लगता था शो विंडो की गुंगी गुडिया की तरह मां के सिर्फ होठ ही हिलते दिखते हैं कोई आवाज नहीं आती फिर भी पता नहीं क्यों मुझे अक्सर लगता था कि मां का मन  बहुत बातूनी है जो भीतर ही भीतर खूब बातें करता है।

तब मैं बहुत छोटा था, इतना छोटा कि मां जो बताए वो ही जीवन, दोस्त जो कहें वही सच और टीचर जो दिखाए वही दुनिया।

उस बचपन के कई हिस्से थे और लगभग सभी हिस्सों में मां की चहलकदमी मौजूद रहा करती थी। रात को मैं मां से कहानी की जिद करता, मां का ठहर- ठहर  कर बोलना परियों का बोलना लगता, मां मेरे सिर को सहलाती जाती और धीरे-धीरे कहानी सुनाती जाती और मैं उनके कहे को देर तक अपने भीतर लपेटता रहता।

स्कूल में जब मेरे सहपाठी अपने-अपने पिताओं की हिम्मत भरे किस्से सुनाते, जिनमें उन शोहदों का जिक्र भी होता जिनको मां अपनी स्कूटी रोक कर झाड लगाती और फिर जब मां स्कूटी स्टार्ट करती तो उनसे लिपटा हुआ मैं आनंद से भर जाता। कभी फ्यूज उड़ जाने पर मां एक पतला सा तार मीटर में लगा देती और झट से बिजली आ जाती। ऐसे ही ढेरों किस्से मेरी जुबान पर धरे रहते। मां के किस्से सुना कर सबको लाजवाब  कर देना मुझे खूब सुहाता और अंत में एक जोश के साथ यह वाक्य जोडऩा न भूलता,

मेरी मम्मी का मुक्का लगा नाज्

जाहिर है तब मेरी मां ही मेरी सुपर हीरो थी। स्कूल इंटरवेल में एक बड़ा सा घेरा बना कर खड़े मेरे दोस्त मेरे चेहरे की तरफ मुहं बाए एकटक देखते रहते क्योंकि  उनकी मम्मियों का शौर्य तो कभी का पिता की फुंकार के नीचे कहीं दम तोड़ चुका होता।

आज मैं तीस बरस का हो चला हूं। मां आज भी मेरे लिए एक स्केल हैं जिसके मैं हर घटना को मापने की कोशिश करता हूं, और इसी तरह से मां के जरिए मैंने अपने जीवन और दुनिया को मापा-परखा है। जब मैं बच्चा था तो उसकी गोदी से एक पल को भी उतरना नहीं चाहता था। मां के बिना मेरा जीना जैसे मुहाल था, सुबह जब वह कालेज जाने को होती तो मैं उसके पांवों से बुरी तरह से लिपट जाया करता।

उन्हीं दिनों के आसपास मां और पिता के बीच अलगाव हो गया था और हम ने पिता के घर को छोड़ कर मामा के घर आ गए थे। फिर किराए का छोटा सा घर लेकर मामा के पड़ोस में ही रहने लगे थे।

मां की दुनिया ने एक बड़ी सी करवट ली थी। अब अकेले ही उसे दुनिया से दो-दो हाथ करने थे। मैं भी बड़ा हो रहा था। मैंने देखा कि समाज के पास किसी विधवा के दुख के लिए तो कान थे मगर  तलाकशुदा स्त्री के नाम पर उसकी जीभ लपलपाने लगती थी। विवाह संस्था पर सिलवटें देख कर समाज झट स्त्री को मुजरिम मानकर उसे कटघरे में खड़ा कर देता था। मेरी मां का बलिदान किसी को दिखाई नहीं दिया। समाज को बच्चों के लिए पिता का नाम चाहिए था, दो पांवों वाला वह पुरुष जिसके मस्तक पर पिता लिखा होता। लेकिन हम पिता के बिना ही अपने पांव जमीन पर जमाते गए और दुनिया हमारे लिए बड़ी होती गई और दुनिया के लिए हम। बावजूद इसके मां और मैंने दुनिया को अपने निजी दायरे में नहीं आने दिया। हम दुनिया की चहलकदमी को दूर से देखते और आनंद लेते कभी खीजते पर उससे कभी हाथ नहीं मिलाते। हम दोनों की दुनिया अपनी अलग राह पर चलती रही।

मां के बगल में मुझे देखकर लोग कहते, बेटा ही बड़ा होकर तुम्हारा सहारा बनेगा, तब मैं जल्दी ही बड़े होने की कामना किया करता। एक बार तो अपने दोस्त के कहने से मैं एक टॉनिक ले आया और चुपके से हर रोज सुबह उसे पीने लगा। मेरे दोस्त के अनुसार उसे हर रोज पीने से बच्चे जल्दी बड़े हो जाते थे।

मैं टीनएज के दौर में प्रवेश कर चुका था। मेरे जीवन का रंग अब गुलाबी  होने लगा  था। उन दिनों मैं अक्सर सोचता था साहिर लुधियानवी की तरह मैं भी मां के साथ उम्र भर रहूंगा और किसी को हम दोनों के बीच नहीं आने दूंगा। लेकिन वह जीवन ही क्या जो करवट न ले। मेरे जीवन में सुदीप्ति चली आई और मेरी टीनएज वाली सोच पर पलीता लग गया। सच में मुझे लगने लगा कि लोग ठीक ही कहा करते हैं ‘मोहब्बत जो न करवाए वहां बेहतर’।

परसों मेरा विवाह है, मेरी शादी में कई अड़चनें आ रही हैं, पहली मेरा सरकारी नौकरी में ना होना, दूसरी सुदीप्ति और मेरे प्रदेश में लंबी दूरी और मां तीसरी पिता का साया मेरे सर पर ना होना। पहली दो चीजों का हल करना मेरे बूते से बाहर की बात है पर तीसरी अड़चन को लेकर कुछ सोचा जा सकता था।

तभी मेरे दिमाग में एक विचार उभरा कुछ सोच कर पिताजी को फोन लगाया।  बरसों पहले नोट किया गया उनका फोन नंबर बदल चुका था, तब ध्यान आया अपने बचपन के दोस्त करण को जो डैडी  के पड़ोस में ही रहता है। करण से डैडी का फोन नंबर पता करवाया।

पिता शब्द की चाबी ने मेरे भीतर जैसे स्मृतियों का ताला खोल दिया है,  अजनबी डैडी की रिश्ते  से कई यादें सामने तैरने लगी हैं। कुछ वर्ष पहले जब मैं आठवी कक्षा में था तब डैडी सामने आए थे। उन दिनों हमारी कक्षा के एक धन्ना सेठ के बेटे रमण शेट्टी के दिमाग में कुछ सरसरहाट हुई उसने मुझे और मेरे दोस्त विनोद पराशर से कहा

‘यार मेरे पिताजी का सारा ध्यान पैसा कमाने में हैं वे मुझे बिलकुल प्यार नहीं करते, कुछ ऐसा करो कि वे मेरा ख्याल रखने लगें।’

तीसरे दिन विनोद पराशर अपना धांसू आइडिया लेकर प्रस्तुत था। क्यों न रमण शेट्टी को कहीं छुपा दिया जाये और उसके अपहरण की अफवाह फैला दी जाए। आइडिया सचमुच शानदार था। मैं एक बार तो ख़ुशी से उछला मगर जल्दी ही ठंडा पड़ गया।

‘यार आईडिया तो अच्छा है लेकिन रिस्की है’

मगर इसमें काफी एडवैंचर है, यह सोच कर हमने स्कूल से रफूचक्कर होने की योजना बनाई। इस बीच रमण शेट्टी के पिता एक महीने के बिजनेस टूर पर चले गए और हमारी योजना धरी की धरी रह गई। इस बीच एक दिन विनोद को एक खूबसूरत सी जीप चलाने का मन हुआ और उसकी बातों में मैं भी आ गया और हम दोनों ने क्रिकेट-टूर से वापिस आते हुए किसी की प���र्क की हुई नई जीप पांच-सात किलोमीटर तक चला कर छोड़ दी, फिर तो हमें ऐसा करने का चस्का लग गया। हम दोनों ने ऐसा कई बार किया। तभी स्कूल के एक बड़े लड़के को हमारी कारगुजारियों की भनक लग गई तब हमें जेल की हवा खानी पड़ी।

फिर जो होना था वह हुआ स्कूल से निकाल दिए गए हम दोनों और पुलिस घर तक पहुंची।

मां ने साफ कह दिया, ‘गलती की है तो सजा भी भुगतनी होगी’

 मुझे मां के स्वभाव का पता था इस हालात में वह मेरी नहीं हो सकेगी। हमारा पुलिस केस बन गया था। तब मेरी छोटी बहन ने कुछ सोचा और वह डैडी के दफ्तर गई और सारी स्थितियां समझाई। डैडी जेल में आए, वे थोड़े मुलायम दिख रहे थे और मैं उनके सामने शर्मिंदा खड़ा था, उन्होंने मुझसे कुछ नहीं पूछा शायद बचपन की नादानियों के बारे में उन्हें पता था। इस बीच तीन दिन की छुट्टी पड़ गई और हमें जेल में ही रहना पड़ा। पिताजी तीन दिनों  तक सौतली मां के हाथों से बना खाना लेकर आते रहे और मैं सिर झुकाए उनसे मिलता रहा।

जेल से निकलने पर वे मुझे घर पहुंचा गए। मां उनके सामने नहीं आई। बहन के बहुत कहने के बाद भी। उसके बाद फिर पिता अपनी दुनिया में लोप हो गए और मैं अपनी।

आज मेरी शादी का दिन है, घर में पंद्रह-बीस रिश्तेदार जमा है। पिता को लेने उनके घर जा रहा हूं। बरसों बाद उन्हें देखकर मैं एकबारगी ठिठक गया हूं। उनके मुहं के सारे दांत निकल गए हैं.पोपले मुहं से वे मुझसे सोफे  पर बैठने को कह रहे हैं पर मैं हूं कि उन्हें घूरे ही चला जा रहा हूं।

‘नकली दांत परेशान करते हैं इसलिए नहीं लगवाए’। मुझे घूरता देख वे खुद ही बोल पड़ते हैं।

गाड़ी में उन्होंने बताया कि मैंने यही सोचा की तुम अपनी मां की मर्जी के खिलाफ विवाह कर रहे हो इसलिए शायद मेरी मदद की जरूरत है।

मैंने कहा, ‘नहीं ऐसा कुछ नहीं है’।

पिताजी ने बैंक की नौकरी से रिटायर होकर  सफेद कुर्ता पाजामा पहनना शुरू कर दिया था , वे काफी कमजोर और बीमार से दिख रहे थे।

अपने बेटे-बेटी और पत्नी के बारे में खुद ब खुद बताते जा रहे थे और मैं हां, हूं कर चुपचाप सुनता रहा।

सोचता रहा डैडी मेरे ही शहर में रहते हैं और मेरे लिए वे आज भी वैसे ही अजनबी हैं जैसे बचपन में थे लेकिन आज  भी एक दूर का रिश्ता बना हुआ जो मृतप्राय होकर भी  उखड़ी-उखड़ी सांसें लेकर उठ खड़ा हो जाता  है, जैसे आज यह रिश्ता अपनी पूरी सांस ले कर मेरे बगल में बैठा हुआ है।

अचानक मुझे उड़ता-उड़ता हुआ यह ख्याल आया कि अपने डैडी को उनके अंतिम समय में देख कर मेरी क्या स्थिति होगी? क्या उनकी देह को अग्नि को समर्पित करते हुए मेरा मन विचलित नहीं होगा।

डैडी ने शादी में सारी रस्में अदा की,  मां दूर से ही मौसियों और नाना-नानी के साथ बैठी देखती रही।

मैं फेरे ले रहा हूं पर डैडी मेरे मन में करवट ले रहे हैं और हर फेरे पर मेरी नजर उन पर टिक जाती है। कैसे मासूम से बैठे हैं पिता जैसे हमारे रिश्ते में पलीता लगाने में उनका कोई दोष नहीं शायद हो भी या नहीं।

किसी ने क्या खूब कहा है- जीवन एक रंगमंच हैं और हम उसके किरदार। डैडी जीवन रूपी इस जीवन में कभी-कभार आकर चले जाते हैं। लेकिन  किरदार में दम न पहले था न आज है।  पंडित रामप्यारे रटे-रटाये मंत्र उच्चारित कर रहा है,

‘इहेमाविन्द्र सं नद चक्रवाकेव दम्पति, प्रजयौनौ स्वस्तकौ विस्वमा युवर्य शनुताम’

मेरे करीब आहुति डालते हुए तुम क्या कर रहे हो डैडी। कहीं तुम भी मेरी तरह ही अपने कमजोर किरदार के हमारे जीवन में आवाजाही में सोच रहे हो माई डियर अजनबी डैडी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 19 से 21

 

 

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