कविता


चौपाये अतीत

प्रतिबद्ध हैं वे कटिबद्ध हैं वे
वर्तमान व भविष्य को स्वर्णिम अतीत की ओर
धकेलने को
चलो धकेलो-पेलो धकेलते चलो पेलते चलो
राज पथ पर जन-जन को नकेलते चलो
पीछे ही पीछे नीचे ही नीचे
लो पहुंच ही गये उस गौरव काल में
स्वर्ण रजत हीरों जड़े पुरातन मॉल में
अरे वाह! राजमहल हैं, पुष्पक विमान हैं
अथक श्रम से टूटी अस्थियों पिंजरों के गौरव गान हैं
भोंदल-तोंदल धर्मगुरु हैं मनुष्य गौण आस्थाएं महान हैं
वन्दन-अभिनंदन अर्चन-पूजन का बोलबाला है
दिग्गजों के मुखश्री में बौनों का निवाला है
धर्म ध्वजाएं फहरा रहीं
जगह-जगह ढाह कहर रहीं
सामन्तों के ठाठ हैं श्रमिकों के ठूंठ हैं
आमजन तो भारवाहक गधे हैं या फिर पालकियों के ऊंट हैं
अरे इसके पीछे भी तो एक अतीत है झिलमिलाता हुआ
दैवी संकेतों से अपनी ओर बुलाता हुआ
चले चलो धकेलते चलो पेलते चलो
राजदंड से जन जन को नकेलते चलो
अरे यहां तो गुफाएं हैं कंदराएं हैं
अंग ढकने को पत्तियां हैं खाल हैं
भाल उन्नत करने को गले में मुंड-माल हैं
हाथों में भाले हैं, विष बुझे बाण हैं
गर्व से कहो हम तो कबीले हैं
रक्त सने हैं तो क्या राष्ट्र रंग में रंगे हैं, रंगीले हैं
इस अतीत के पीछे भी कई चौपाए अतीत हैं
पर छोड़ो मैं तो गौरवान्वित करने चला था
पर आप तो बेहद भयभीत हैं।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 25

 

 

 

 

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