कभी कारीगरी थी शान, आज रोटी का नहीं इंतजाम

विकास के दावों के बावजूद आज भी बहुत से समुदाय आर्थिक-सामाजिक पिछड़ेपन के अंधकूप में जीवन-यापन कर रहे हैं। अपने पूर्वाग्रहों के कारण आस-पास के लोग इन समुदायों को समाज की मुख्यधारा में शामिल नहीं करते। सरकार द्वारा भी इनके हुनर और कारीगरी की कद्रो-कीमत बढ़ाने के लिए कोई कोशिशें की जाती दिखाई नहीं देती हैं। उनके परम्परागत धंधे तथाकथित विकास की भेंट चढ़ चुके हैं और इस विकास के साथ कदमताल करते हुए सम्मान के साथ गुजर-बसर करने में वे अपने आप को लाचार पा रहे हैं। यही हालत सिकलीगर समुदाय की है। कड़ी मेहनत करते हुए भी लोहे का काम करने वाले इस समुदाय के लोग दो जून की रोटी के लिए जगह-जगह ठोंकरें खाने को मजबूर हैं।

सिकलीगर एक घुमंतु समुदाय है। इस समुदाय के लोग कईं राज्यों में हैं। हरियाणा में ही इस समुदाय के कुछ लोग ताले-चाबियां बनाने का काम करते हैं, जिन्हें मलवई सिकलीगर कहा जाता है। ये संभवत: मूल रूप से मालवा क्षेत्र से संबंध रखते हैं। करनाल जिला के गांव डेरा हलवाना, जपती छपरा सिकलीगरान, गढ़ी खजूर, बराणा, संजय नगर डेरा,यमुनानगर में दड़बा गांव, सिरसा में चतरगढ़ पट्टी सिकलीगर लोगों कंडेरों के रूप में बसे हुए हैं। इन स्थानों पर मारवाड़ मूल के सिकलीगर हैं, जोकि अपने आप को ‘माल्डी’ और दूसरे समुदाय के लोगों को ‘डाम्बे’ कहते हैं। इन गांवों में इनकी आबादी हजारों में होगी। बोली में पंजाबी और मारवाड़ी का मेल दिखाई देता है।

ऐतिहासिक रूप से सिकलीगर समुदाय अपने कौशल और साहस के लिए जाना जाता है। सिकलीगर समुदाय का संबंध सिक्खों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी के साथ बताया जाता है। बताते हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह की सेना में सिकलीगर समुदाय के लोग अस्त्र-शस्त्र बनाने और उसे चमकाने का काम करते थे। यह कहा जाता है कि इनका संबंध मूल रूप से राजस्थान के चित्तौड़-मारवाड़ क्षेत्र से रहा है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने इनके हथियार निर्माण व उन्हें तराशने के हुनर की पहचान की और उन्हें अपनी सेना में सेवाएं देने के लिए बुलाया। यह भी बताया जाता है सिकलीगर सिकिल नाम की धातु से हथियार बनाने में सिद्धहस्त थे। जब इन्होंने हथियार बनाए तो उनकी चमक इतनी थी कि हथियारों में शकलें दिखाई देती थी। कुछ पुराने हथियारों की शकलें सुधार दी। सिकिल धातु से बने हथियारों में शकलें दिखने के कारण ही इन्हें सिकलीगर नाम दिया गया। इसी प्रकार ये लोग सिरकियां (झोंपडिय़ां) बना कर रहते हैं, इससे भी इनके नामकरण का अनुमान लगाया जाता है। हथियार बनाने के अलावा इस समुदाय के युवकों का साहस भी बेमिसाल था। गुरु गोबिंद सिंह की सेना में उन्होंने अपने युद्ध कौशल और साहस का लोहा मनवाया। भाई बचित्तर सिंह को सेना में सेनापति की जिम्मेदारी दी गई थी, जिन्हें समुदाय के लोग आदर्श के रूप में देखते हैं।

समय बीतने के साथ ही इनके हुनर की आज बेकद्री हो रही है। सबसे पहले तो हथियार निर्माण का काम पिट गया। इससे ये लोहे का काम करने लगे। कुछ लोग ताले-चाबियां बनाने लगे और माल्डी सिकलीगरों का काम तसले, बाल्टियां और कढ़ाई बनाने और उनका टूटा तल्ला लगाने तक सिंकुड़ कर रह गया। बनाए गए तसले व बाल्टियों को समुदाय के लोग एक राज्य से दूसरे राज्य में पैदल या फिर साइकिल पर ले जाकर बेचते हैं और तल्ले लगाते हैं। इस कार्य के चलते लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान में आना जाना पड़ता है। फेरी के काम में लगे लोग प्रतिदिन कईं-कईं सौ कि.मी. साइकिल चलाते हैं। कईं बार वे एक राज्य की सीमा को पार करके दूसरे राज्य में पहुंच जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद आमदनी के मामले में उनकी जेबें खाली होती हैं। अपने इस पुश्तैनी धंधे में कड़ी मेहनत के बावजूद उनकी रोजी-रोटी नहीं चल पाती है जिसके चलते समुदाय कंगाली और भुखमरी से जूझ रहा है।

                कुछ समय पहले तक तो लोहे के तसले व बाल्टियों की कारीगरी से रोटी का इंतजाम हो जाता था। जब से प्लास्टिक की चीजों ने घर में पहुंच बनाई और खाओ-पीओ व फेंको की संस्कृति बढ़ती जा रही है, तब से तो स्थिति बेहद विकट हो गई है। ये लोहे के तसलों के तल्ले लगवाने के तराने छेड़ते फिरते हैं और लोगों ने घरों में लोहे के तसले रखने छोड़ दिए हैं। तो फिर रोटी कैसे निकलेगी। सिकलीगर लोगों का समय के साथ नहीं चल पाने के पीछे एक कारण इनकी कबीलाई और घुमंतु जीवन शैली भी है। इनका जीवन आदिवासियों जैसा है और जीवन पूरी तरह से जल-जंगल पर टिका हुआ है। आज भी सिकलीगर समुदाय के लोग डेरे बनाकर रहते हैं। करनाल जि़ले में इनके डेरे शहरों से दूर यमुना नदी के किनारे बने हुए हैं। जब यहां पर ये आए थे तो उस वक्त उनके डेरे जंगलों में बने थे और पूरा क्षेत्र पानी से भरा हुआ था, जहां पर तरबूज की प्लेजें लगाई जाती थी। आज भी इस समुदाय के लोग शिकार करते हैं। शिकार के लिए इन्हें हथियार और जाल बनाने आते हैं। इन हथियारों को लेकर इनमें गौरव-गाथाएं चलती हैं। जंगल से शिकार करने पर जानवरों के सींग और दांत आदि झोंपडिय़ों में सजाना इनकी शान का प्रतीक होता है। जंगलों के लगातार कटते जाने और यमुना के सूखते जाने के कारण इनके जीवन में एक अजीब खालीपन दिखाई देता है। शायद इस खालीपन को भरने के लिए भी ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर मारे-मारे फिरते हैं।

                सिकलीगर मुख्यधारा से बिल्कुल अलग दिखाई देते हैं। इनकी संस्कृति आदिवासियों जैसी है। इसके बावजूद हरियाणा में इन्हें जनजाति का दर्जा नहीं दिया गया है। जबकि इनकी जीवन-शैली देखकर साफ हो जाता है कि ये किसी भी तरह से जनजाति से कम नहीं हैं। हाल ही तक यह माना जाता था कि इस समुदाय की घुमंतु प्रवृत्ति है। इन लोगों को विभिन्न स्थानों पर ले जाने वाले ड्राईवर मदन ने इस धारणा को मिथ्या साबित कर दिया। उन्होंने बताया कि जब ये काम-धंधे के लिए दूसरे स्थान पर जाते हैं तो अपनी सिकरी (झोंपड़ी)के आगे कांटेदार झाडिय़ां लगाते हैं और जाने से पहले रोते हुए शोक मनाते हैं। अपनी झोंपड़ी, बस्ती व डेरे से जाते हुए किया जाने वाला विलाप साफ बताता है कि घुमंतु प्रवृत्ति नहीं मजबूरी है।

सारा साल एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने-फिरने के बाद ये एक-दो महीने अपने डेरों में इकट्ठेहोते हैं। अक्सर वीरान रहने वाली इनकी बस्तियों में तब उत्सव का माहौल होता है। ये लोग नए कपड़े सिलवाते हैं और अपने बच्चों की शादियां करते हैं। आज जब हम 21वीं सदी की बात कर रहे हैं तो सिकलीगर समुदाय के लोग आज भी बाल विवाह करते हैं। एक जगह से दूसरी जगह घूमने की विवशता के कारण जीवन में स्थायीत्व नहीं है। इससे बच्चोंं की पढ़ाई भी नहीं हो पाती है। शिक्षा के मामले में इस समुदाय की बेहद खराब स्थिति है। इस समुदाय से एक-आध ही व्यक्ति सरकारी सेवा में है। हरियाणा के जि़ला-करनाल के गांव डेरा सिकलीगर (हलवाना) में करीब चार हजार की आबादी पर चार-पांच लड़कियों को आंगनवाड़ी वर्कर व आशा वर्कर बनने का मौका मिला है। समुदाय की कोई भी लड़की स्नातक तक की शिक्षा हासिल नहीं कर पाई है। शिक्षा के अभाव में ही बाल विवाह होते हैं और बाल विवाहों के कारण बच्चेे शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं जा पाते हैं। बाल विवाह के कारण महिलाओं और बच्चोंं के स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। शादी के बाद परिपक्व होने से पहले ही लड़कियां मां बन जाती हैं। इससे समुदाय में जन्मदर अधिक है। लेकिन मृत्य�� दर भी अधिक है। डेरों और बस्तियों में स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव होने के कारण कईं बार बिमारियां समुदाय के लोगों को चपेट में ले लेती हैं।

                सिकलीगर समुदाय के लोग शादियों के मामले में हरियाणा की खाप-पंचायतों की तरह कट्टर नहीं हैं। शादियों से पहले लड़का-लड़की की सहमति जरूरी है। अक्सर लड़कियां और लड़के अपने जीवन साथी का चुनाव खुद करते हैं। प्रेम का इजहार वे एक-दूसरे के ऊपर पानी फेंक कर करते हैं, इससे इनके प्रेम का आस-पास के लोगों को पता चल जाता है। अक्सर गांव के गांव में शादियां होती हैं। समुदाय में शादी के समय दहेज देने की परम्परा भी नहीं है। परम्परागत तौर पर शादी का सारा खर्च वर पक्ष के जिम्मे है। विवाह समारोह में शामिल होने के लिए शगुन के रूप में कन्या दान देने की परम्परा भी नहीं है। लड़कियां परिवार द्वारा चुने गए उनके जीवन-साथी को रिजेक्ट कर सकती हैं और करती भी हैं। इस समुदाय में ऑनर किलिंग जैसी कू्ररता दिखाई नहीं देती। यही नहीं समुदाय में खुलेपन व जीवन साथी चुनने की आजादी होने के कारण बलात्कार जैसे अपराध भी नहीं होते हैं। हरियाणा और पंजाब की बहुत सी जातियां व समुदाय बेटियों को बोझ मानने के लिए कु£ख्यात हैं। कन्या और देवी पूजा का ढोंग करते हुए कईं लोग उनसे छुटकारा पाने के लिए धड़ल्ले से कन्या भ्रूण हत्याएं करते हैं। वहीं सिकलीगर समुदाय में बेटियों को बोझ नहीं माना जाता। बेटियों के जन्म पर भी उसी प्रकार से खुशी मनाई जाती है, जैसे बेटों के जन्म पर। यदि हरियाणा के ही विभिन्न समुदायों के लिंगानुपात का तुलनात्मक अध्ययन कर लिया जाए तो सिकलीगर समुदाय में अनुपात या तो बराबर मिलेगा या फिर बेटियां अधिक होंगी। इस मामले में सिकलीगर समुदाय हरियाणा के अगड़े और पढ़े-लिखे समुदायों के लिए रोल मॉडल हो सकता है।

                शिक्षा के मामले में इनकी मां-बोली का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। इनकी बोली पंजाबी के नज़दीक है। गुरु गोबिंद सिंह की सेना से संबंध रखने, इनकी वेश-भूषा, सिर पर पगड़ी, दाढ़ी आदि को देखकर भी ये सिक्ख धर्म के ज्यादा नज़दीक हैं। ये सिक्खों के त्योहारों को मनाते और गुरुद्वारे में जाते रहे हैं। बाद में इस समुदाय की अधिकतर आबादी निरंकारी मिशन के साथ जुड़ गई। इनकी बोली-भाषा और परम्पराओं का संज्ञान लिए बिना समुदाय के बच्चों की बेहतर शिक्षा का प्रबंध नहीं हो सकता है। कुछ युवाओं ने दसवीं और बारहवीं तक की शिक्षा भी ग्रहण की है। लेकिन अधिकतर बच्चे घुमंतु जीवन और विभिन्न प्रकार की समस्याओं के कारण शिक्षा पांचवीं या आठवीं से पहले ही छोड़ देते हैं। इन डेरों में खुले स्कूलों में सुविधाओं और अध्यापकों का टोटा बड़ी समस्या है। इनकी मातृभाषा पंजाबी पढऩे-पढ़ाने की सुविधा नहीं है। यदि प्रतिभाओं की बात करें तो इस समुदाय के बच्चोंं में विभिन्न प्रकार की प्रतिभाएं हैं। गायन-वादन के मामले में बच्चे बड़े बेमिसाल हैं। लेकिन शिक्षा के अभाव में प्रतिभा को निखारने का अवसर नहीं मिलता है।

सिकलीगर लोगों के जीवन में स्थायीत्व लाने और उनके पुनर्वास के लिए इनके डेरों व गांवों में पढ़ाई और दवाई की बेहतर व्यवस्था की जानी चाहिए। उक्त सात गांवों की ही बात करें तो वर्षों से समुदाय के लोग इन गांवों में रह रहे हैं। लेकिन इनकी अपनी कोई जमीन नहीं है। गत वर्षों में महात्मा गांधी ग्राम बस्ती योजना के तहत पूरे प्रदेश में बीपीएल और अनुसूचित जाति के लोगों को सौ-सौ वर्ग गज के प्लाट वितरित किए गए, लेकिन इन गांवों के सिकलीगर लोगों को ये प्लाट भी नहीं दिए गए। इंदिरा आवास योजना के बावजूद बहुत से लोग सिरकियों में ही रह रहे हैं। सिरकियों में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे खुले में शौच जाने की यातना झेलने के लिए बच्चेे, बूढ़े और महिलाएं मजबूर हैं। इनके डेरे गंदगी और बिमारियों का साम्राज्य हैं। डेरों में झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा खूब चलता है। यह समुदाय झाड़-फूंक में तो यकीन नहीं करता था, लेकिन अब कुछ लोग अंधविश्वासों में भी पड़े हुए हैं।

डेरा हलवाना में पंचायत सदस्य गीता कौर, महिला अनार कौर, अनीता कौर व महेन्द्र कौर बताती हैं कि अन्य समुदायों से कुछ मामलों में लड़कियों की स्थिति अच्छी होने के बावजूद खाना बनाने की जिम्मेदारी महिलाओं की है। इसके लिए ईंधन की व्यवस्था करना भी किसी आफत से कम नहीं है। महिलाओं को चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करने के लिए कईं-कईं किलोमीटर चलना पड़ता है और लकड़ी के ढेर सिर पर रखकर लाने पड़ते हैं। महिलाओं के लिए यह बहुत बड़ी समस्या है। पशु पालन नहीं होने के कारण उपले भी नहीं बन पाते। आसपास के गांव के लोग उनके गांव में उपले बेचने के लिए आते हैं और दो रुपए का एक उपला देते हैं। उन्हें आटा-दाल तो उधार मिल जाता है, लेकिन चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी नहीं मिलती है। बार-बार चूल्हा जलाने से बचने के लिए पूरे समुदाय में सिर्फ दो ही बार खाना बनाया जाता है। उन्होंने मांग उठाई कि सरकार को उन्हें मुफ्त चूल्हे और सिलैंडर देने चाहिएं। हरप्रीत सिंह, भजन सिंह, शेर सिंह, सुरजीत सिंह, मनोज सिंह व सोनू सिंह ने कहा कि वर्षों से जिन डेरों व गांवों में वे बसे हुए हैं,वे स्थान आज भी शामलात भूमि के रूप में जाने जाते हैं। उन्हें प्लाट और घर बनाने के लिए अनुदान दिया जाए तो उनके जीवन में स्थायित्व आ पाएगा। सरकार को उनके डेरों में लोहे के औजारों और उपकरणों का कौशल विकास केंद्र्र और उद्योग लगाने, स्कूलों को अपग्रेड करके सुविधाएं बढ़ाने और बिमारियों से बचाने के लिए स्वास्थ्य केंद्र्र खोलने का काम तत्परता से करना चाहिए।


स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज- 17 से 19

Advertisements

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.