आलेख


                अगर आंकड़ों की नजर से देखें तो 1991 से लागू उदारीकरण, वैश्वीकरण व नीजिकरण की नीतियों के चलते भारत के सकल घरेलू उत्पादन में वृद्धि दर्ज हुई है। लेकिन हमारे  हुक्मरान व अर्थशास्त्री इस तथ्य को नजरअंदाज करते रहे है कि वर्तमान आर्थिक प्रगति व विकास के पीछे देश की आधी आबादी महिलाओं, भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्यरत असंख्य बाल श्रमिकों व देश की युवा श्रम शक्ति की महती भूमिका है! हमारे देश की श्रम शक्ति 47.2 करोड़ है जो विश्व के किसी भी देश की श्रम शक्ति की तुलना में विशालतम है। पिछले दो दशकों में रोजगार के अवसरों में वृद्धि के जितना राग अलापा जा रहा है। उसकी तुलना में इससे भी बड़ा भयावह सच यह है कि रोजगार के अवसरों व गुणवत्ता में बड़े स्तर पर ह्रास हुआ है।

                आज लगभग 93 फीसद श्रम शक्ति असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। जिनके पास ना तो किसी भी तरह के रोजगार की सुरक्षा है, ना ही पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा है और ना ही कोई सुरक्षित आय! संगठित क्षेत्र में भी लगभग आधी आबादी अनौपचारिक मजदूरों की ही है जिन्में अधिकांश मजदूर ठेका मजदूर ही है। जहां 1990-1991 में ठेका मजदूरों की संख्या 13.5 फीसदी थी वहीं इनकी संख्या 2010-11 में बढकर 33.9 फीसद हो गई है। सार्वजनिक व निजी क्षेत्र के तीन-चौथाई से अधिक ठेका मजदूरों के पास कोई लिखित संविदा नहीं है! ये मजदूर सिर्फ  और सिर्फ  ठेकेदारों व मालिकों के हाथों हर रूप में शोषित होने के लिए ही अभिशप्त है !

                गरीबी के कारण बहुत से परिवार अपने बच्चों को काम पर भेजने के लिए मजबूर होते हैं। जबकि हमारे संविधान की धारा 24 बाल श्रम को अधिनियम 1986 के तहत पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित करती है। लेकिन इसके बावजूद हर साल देश के करीब 49 लाख बच्चे

 बाल मजदूर बनने को मजबूर है। जिनमें से हम तमाम तरह के प्रयासों के बावजूद मात्र 1 लाख बच्चों को बचा पाते हैं। हालांकि कैलाश सत्यार्थी जैसे लोगों ने इस गंभीर मुद्दे पर कुछ डेंट डालने का प्रयास किया है पर स्थिति अभी जस की तस बनी हुई है। प्रस्तुत आलेख में साल 2014-15 में किए शोध कार्य के आधार पर कुछ जमीनी हकीकतों को बयान करने की कोशिश की है।

                ‘हरियाणा सरकार के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग (2012) के अनुसार राज्य में कुल 3036 ईंट भट्ठा उद्योग इकाइयां पंजीकृत है। राज्य की राजधानी चंडीगढ़ में स्थित श्रम विभाग एवं खाद्य आपूर्ति विभाग में शोधकार्य के लिए आवश्यक सूचनाएं मांगने बारे दो बार विजिट करने पर यह वास्तविकता पता चली कि राज्य के किसी भी विभाग के पास कुल श्रमिकों की संख्या से सम्बन्धित तथा प्रवासी श्रमिकों, महिला श्रमिकों एवं बाल श्रमिकों से सम्बन्धित कोई भी ठोस तथ्य व आंकड़े मौजूद नहीं है। शोध सर्वेक्षण के आधार पर प्रमाणत: यह जरूर कहा जा सकता है कि एक ईंट भट्ठा के अन्तर्गत दस तरह की अलग-अलग क्रियाओं में शामिल औसतन 175 श्रमिक कार्य करते हैं। जिनमें पथेर, जलाई, भराई, निकासी, मुंशी, चौकीदार, ड्राइवर, केरीवाला, बेलदार एवं लोडिंग-अनलोडिंग के श्रमिक शामिल है। यदि 175 श्रमिक प्रति भट्ठा इकाई की औसत संख्या मानें तो प्रदेशभर में कुल 531300 श्रमिक बनते हैं।

                अनुभव बता रहा है कि इस कुल आबादी में 80 फीसदी से अधिक आबादी दलित समुदाय से है। सर्वेक्षण से पता चला है कि प्रत्येक ईंट भट्ठे पर कुल श्रमिकों का 40 फीसदी महिला श्रमिक कार्यरत है। यानी इस उद्योग में 212520 महिला श्रमिक कार्यरत हैं। शोधकार्य के दौरान राज्यभर के भट्ठा उद्योग का प्रत्यक्ष अनुभव एवं अवलोकन बता रहा है कि 4 से 14 साल की उम्र के बीच के औसतन 15-18 बच्चे प्रत्येक ईंट भट्ठा इकाई पर कार्यरत हैं  जिसमें बड़ी संख्या लड़कियों की है। केवल ईंट-भट्ठा उद्योग में यदि हम बाल मजदूरों की संख्या पर नजर डालें तो अनुमानत: यह कहा सकता है कि भट्ठों पर लगभग 50 हजार (बाल मजदूर लाल झंडा भट्ठा मजदूर यूनियन, हरियाणा के अनुसार) आज 2015 में भी कार्यरत हैं। यदि एक भट्ठेपर कुल औसत जनसंख्या का आंकलन करें तो 90 परिवार और 5 सदस्य प्रति परिवार मानें तो एक भट्ठेपर 450 की संख्या बनती है। यानी राज्यभर में मात्र इस उद्योग में गांव, शहर व समाज से दूर खेतों में स्थित भट्ठों पर 13.66 लाख आबादी अपना जीवन बसर करने पर मजबूर है। अनुमानत: राज्यभर में 200 ईंट भट्ठा इकाइयां बिना पंजीकरण के संचालित होकर शासन-प्रशासन को निरन्तर अंगूठा दिखा रही है। ‘यदि हम बिना पंजीकरण चलने वाले भट्ठों के मजदूरों की संख्या को भी जोड़ लें तो यह आंकड़ा 14.56 लाख तक पहुंच जाता है। इस कुल आबादी में लगभग 85 फीसद मजदूर आबादी प्रवासी है जो के देश के विभिन्न राज्यों से जैसे राजस्थान, यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, आसाम, झारखंड, बंगाल, उड़ीसा आदि राज्यों से सिर्फ यहां भट्ठों पर पिसने-खपने के लिए आती है। सौ फीसदी मजदूरों का कहना है कि उनको यह काम मजबूरी में करना पड़ रहा है। जिनके पास कोई वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था नहीं है।

                सभी पंजीकृत ईंट भट्ठा इकाइयां कारखाना अधिनियम 1948 के नियमों व प्रावधानों के अन्तर्गत संचालित हो रही है। जिसका तात्पर्य यह है कि ये सभी औद्योगिक इकाइयां इस अधिनियम के अन्तर्गत लिखित में यह वायदा करती है कि वे सभी अपने उद्योग में इस अधिनियम के कायदे-कानूनों को एवं अन्य केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा बनाए गए श्रम कानूनों को लागू करेंगे। इस उद्योग पर केन्द्र के 20 श्रम कानून व राज्य के 4 श्रम कानून सीधे तौर पर लागू है। परन्तु शोधकार्य के परिणाम व प्रत्यक्ष अवलोकन बता रहा है कि तमाम कानूनी प्रावधानों व वास्तविक ठोस जमीनी सच्चाई में दूर-दूर तक कोई तालमेल नजर नहीं आ रहा है। व्यवहार में ईंट भट्ठों पर एक ही श्रम कानून चलता है और वो है मालिक का लट्ठ कानून। जो आठों पहर ना केवल मजदूरों पर चलता है बल्कि मजदूर यूनियन के नेताओं को भी नहीं छोड़ता है। उद्योग मालिक के इस लट्ठ  कानून को सत्ता, प्रशासन व मालिक तीनों की तिकड़ी का पूर्ण अघोषित समर्थन हासिल है। तभी तो 1923 में लागू हुए श्रम कानून के प्रावधान 90 साल के बाद भी इस उद्योग में आज तक लागू नहीं हुए है।

                ‘मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के सभी प्रावधान सिर्फ और सिर्फ  महिला मजदूरों के लाभ व कल्याण के लिए ही हैं। अधिनियम कहता है कि यदि ईंट भट्ठों पर कार्य के दौरान किसी महिला की डिलीवरी होती है तो मालिक द्वारा उसे 3500 रुपए मैडिकल बोनस एवं कम से कम 6 सप्ताह की व अधिकतम 12 सप्ताह की मजदूरी सहित छुट्टियां देने का प्रावधान है। जबकि व्यवहारिकता यह कह रही है कि अधिकतर डिलीवरी भट्ठों पर ही बिना किसी डाक्टर व प्रशिक्षित दाई के हो रही है। जिसका परिणाम यह देखने को मिलता है कि डिलीवरी के समय या कुछ दिन बाद नवजात शिशुओं व माताओं तक की अकाल मृत्यु हो जाती है। इस उद्योग में किसी भी स्थिति में ना तो एक भी दिन की छुट्टी दी जा रही है और ना ही किसी भी रूप में कोई मेडिकल बोनस का भुगतान किया जाता है। फिर गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच, टीकाकरण व उचित पोषण जैसी चीजें तो बहुत दूर की बात है।

                 ‘ईंट भट्ठा उद्योग का सबसे बड़ा व भयावह सच यह है कि इस उद्योग में कार्यरत वर्ष 2014 तक 2.4 लाख महिला मजदूरों में से एक भी महिला का नाम एक मजदूर के तौर पर कहीं भी किसी भी रिकार्ड में दर्ज नहीं है?  ईंट भट्ठों पर असल व्यवहार दर्शा रहा है कि भट्ठों पर मौजूद मुंशी की कच्ची कापी में उन��हीं मजदूरों के नाम लिखे होते हैं जिनको पेशगी दी गई है और वो भी सिर्फ  पुरुषों के? सर्वेक्षण के दौरान अंबाला जिले के एक भट्ठेपर बिहार के नालन्दा की एक महिला मजदूर ने बताया कि वो पिछले 22-25 सालों से भट्ठों पर ही काम कर रही है। आठ साल पहले उचित इलाज ना मिल पाने के कारण बीमारी के चलते उसके पति की मौत हो गई। इसके बाद वह अपने चार बच्चों के साथ मिट्टी के साथ मिट्टी बन गुजर बसर कर रही है। परन्तु मालिक के यहां आज भी कच्ची कापी में एक मजदूर के तौर पर उसके पति का ही नाम लिखा जा रहा है। इनका खुद का नहीं?                 मूलत: इस उद्योग में महिला मजदूर हर तरह से दमित व शोषित है। वे बच्चों को भी संभाल रही है, घर का सारा काम भी करती है और अपने पति व परिवार के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर श्रम करती है। सर्वेक्षण के दौरान एक सवाल के रूप में जब पुरुष मजदूरों से यह पूछा गया कि वो भट्ठेपर खुद के मनोरंजन के लिए क्या-क्या करते है? तो अधिकतर मजदूरों का केवल एक ही सीधा सा सपाट जवाब था कि दारु पीना और हर रोज घरवाली से सैक्स करना और यहां जंगल में क्या है? महिलाओं के शोषण व जीवन व्यथा की फेहरिस्त मात्र यहीं तक आकर नहीं थम रही है? जब स्थितियां इससे भी भयावह होती है तो पूरी मानवता को शर्मसार कर देती हैं। सर्वेक्षण के दौरान पानीपत जिले के एक भट्ठेपर पता चला कि भट्ठेके पास के गांव के चार लड़के दारू के नशे में चूर रात को 11 बजे भट्ठेपर एक मजदूर की झुग्गी में घुस गए और जमीन पर अपने परिवार संग सो रही एक महिला को पकड़ खींचते हुए जोर जबरदस्ती कर उसे अपनी कार की ओर घसीटने लगे। जब हो-हल्ला सुन आस पड़ोस के मजदूर जाग गए और इनको रोकने लगे तो इनका कहना था कि हम इसे सुबह छोड़ जायेंगें, तुम चिन्ता मत करो? यह बोलने व ऐसा करने में इनको तनिक भी संकोच नहीं था। ऐसे ही रोहतक के एक भट्ठेसे दोपहरी में शौच के लिए गई महिला को दो लड़के उठा ले गए और तीन दिन तक अपने खेत में उसके साथ गैंग रेप करते रहे। चौथे दिन बदहवासी की स्थिति में उस महिला को भट्ठेके पास फेंक गए। इस तरह की आए दिन सीजन दर सीजन घटने वाली घटनाओं की अपनी दास्तान है।

                ‘श्रम कानून कहते है कि भट्ठों पर श्रमिकों के लिए प्रर्याप्त संख्या में शौचालयों की सुविधा महिला व पुरुषों के लिए अलग-अलग होनी चाहिए’ जबकि वास्तव में कहीं-कहीं एकाध जगह ही 2-4 कच्चे शौचालय खुद श्रमिकों ने ही अपनी झुग्गी के पास ही कच्ची ईंटों से बनाए हैं। जहां झुग्गी के पीछे ही कस्सी से लगभग दो या ढाई फीट गहरा व एक फीट चोड़ा गड्डा खोदकर उस पर कोई लक्कड़ या पत्थर के टुकड़े रख दिए गए है तथा साइडों में कच्ची ईंटें इतनी ऊंचाई तक लगा दी जाती है कि बैठा हुआ आदमी ना दिखे। जहां ना तो पानी की कोई व्यवस्था होती है और ना ही इनकी सफाई की। हिसार, सिरसा व फतेहाबाद के इलाके में शौचालयों की जगह कुछ कुईयां बना रखी है। दस फीट गहरा गड्डा खोदकर उसके ऊपर दो बाई तीन का आधा ईंच मोटा पत्थर बीच से काट कर रख दिया जाता है। बारिश आदि आने पर ये नीचे धंस जाते है और कई बार ऐसी घटनाएं भी हो चुकी है कि ऊपर बैठा मजदूर भी नीचे ही धंस जाता है। इन कुईयों को खाली भी नहीं कराया जाता है। झुग्गियों के पास होने के कारण इनमें बदबू भी बहुत आती है और बीमारियां भी फैलती है। सरकार के आंकड़े व रिपोर्ट दर्शाती है कि भट्ठों पर पक्के शौचालय बने है पर सिर्फ  सरकारी कागजों का पेट भरने के लिए। श्रमिकों ने बताया कि वो सभी बाहर खेतों में ही शौच करने जाते हैं। जब ये आस-पास के खेतों में जा बैठते है तो उन खेतों के मालिक ना केवल इनको गन्दी गालियां बकते हैं, बल्कि पिटाई तक भी कर देते हैं। सबसे बड़ी समस्या महिलाओं व लड़कियों के लिए है ये सिर्फ  रात के अन्धेरे में ही शौच के लिए जा पाती हैं? रात का अन्धेरा तो और भी दंश व पीड़ा देने वाला है? जहां महिलाओं के साथ अनेक बार ऐसी दुर्घटनाएं घट चुकी है कि जब महिलाएं शौच के लिए खेतों में बैठी होती है तो उनको धक्का मारकर खेतों में भाग जाते है। कितनी ही बार इनके साथ बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाएं तक हो चुकी है। मेवात के एक भट्ठेपर दस साल की लड़की ने बताया कि पास के खेत का मालिक जब सुबह खेत में आता है तो वह उस शौच/लैटरिंग को कस्सी में उठाकर हमारी झुग्गियों मे फेंक जाता है या फिर हमारे पसार में जहां हम ईंट पाथते है वहां फेंक जाता है और पता चलने पर पिटाई भी करता है।

                निरक्षरता व अज्ञानता ने इन गरीब, दलित, वंचित आबादियों के बीच अपना लगभग स्थाई सा डेरा डाल रखा है। सर्वेक्षण के परिणाम बता रहे हैं कि मजदूर महिलाओं में 95 फीसद से भी अधिक निरक्षर है। शिक्षा, साक्षरता की योजनाएं इन आबादियों तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है परन्तु आंकड़ों में साक्षरता दर निरंतर बढ़ती ही जा रही है?

                बड़े स्तर पर भट्ठा मजदूरों में बाल विवाह व बेमेल विवाह आज भी प्रचलन में है। भट्ठों पर यह देखा गया है कि 17-18 साल की उम्र होते-होते लड़की 2-3 बच्चों की मां बन चुकी होती है। दावे के साथ यह कहा जा सकता है कि 95 फीसद से अधिक भट्ठा महिला मजदूर खून की कमी की शिकार है तथा उचित पोषण के अभाव में शारीरिक रूप से कमजोर भी है। जिसके कारण आए दिन नित नई-नई बीमारियां इनको घेरे रहती है। उचित स्वास्थ्य सुविधाएं ना मिलने का पूरा हर्जाना महिलाओं को ही चुकाना पड़ता है।

                सर्वेक्षण ने एक बार फिर इस बात को प्रमाणित किया है कि महिलाएं इनके साथ हो रहे भेदभाव व शोषण के कारण इनकी खुद की पहचान इनसे दूर होती जा रही है। इनकी व्यक्तिगत पहचान, इच्छाएं, सपने आदि सब कुछ मानों सदा के लिए इनसे बिछुड़ते चले जाते हैं। हमारे देश की आधी आबादी का बडा़ हिस्सा बस किसी की मां, बहन, बेटी, पत्नी, चाची, ताई, बुआ, दादी आदि ही बनकर रह जाती है। सर्वेक्षण के दौरान कई महिलाएं ऐसी मिली जब उनसे उनका नाम पूछा गया तो उनके पास कोई जवाब नहीं था? आलम यह है कि गरीबी व तमाम तरह के अभाव के थपेड़े इन्हें इनकी उम्र तक भी भुला देते है। एक 18-20 साल महिला से जब उसकी उम्र जाननी चाही तो कहने लगी-साहब आप ही देख कर लिख लो, 30-40 तो होगी?

                भट्ठों पर कार्यरत महिलाओं के जीवन के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण सकारात्मक पहलू भी है जिनको रेखांकित किया जाना अति आवश्यक है। मसलन भट्ठों पर कहीं भी घूंघट नहीं है। फिर वो मजदूर महिला चाहे यूपी की हो या राजस्थान व बिहार की जहां आज भी घूंघट का खूब चलन है। सर्वेक्षण के दौरान भट्ठेपर कार्यरत जब एक मजदूर (ससूर) से पूछा गया कि उसके साथ परिवार के अन्य सदस्यों के इलावा उसकी पुत्रवधु भी बिना घूंघट के काम कर रही है तो क्या उसको कोई दिक्कत तो नहीं है? जवाब में ससुर का कहना था कि यहां कोई घूंघट नहीं करता है, अगर ये घूंघट करेगी तो काम कैसे होगा? मैंने खुद ही इसको मना किया है। जब इनसे यह पूछा गया कि आप सीजन के बाद अपने गांव वापिस जायेंगें, तो वहां भी घूंघट…..? तो इनका कहना था कि वहां तो गांव है, समाज है सब करते हैं तो यह भी करेगी। इस उद्योग में काम के संबंधों के कारण एक बड़ी सामाजिक बुराई पर इतना बड़ा डेंट पडऩा बहुत बड़ा क्रान्तिकारी कदम कहा जा सकता है। यदि इस मसले पर इन मजदूर परिवारों को थोड़ा और जागरुक किया जाए तो इस कुप्रथा को लाखों मजदूर परिवारों से दूर किया जा सकता है जिसका प्रभाव दूर तलक पडऩा लाजिमी है।

                इस उद्योग का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है बाल श्रम। सर्वेक्षण के दौरान भट्ठों पर देखने को मिला कि यहां चार से पांच साल का बच्चा अपने मां-बाप का काम में हाथ बटाना शुरू कर देता है। जिस उम्र में बच्चें को खिलौने, किताब, पंैसिल, दूध व रोटी चाहिए, तब इनके मासूम कंधों पर काम का बोझ और नन्हें-नन्हें हाथों में ईंटे थमा दी जाती है। ये बहुत बड़ी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी लेकर पैदा होते है और जल्दी ही बूढ़े हो जाते है। पांच साल की बच्ची अपने चार साल के, तीन साल के भाई-बहनों का लालन-पालन व देख-रेख एक मां की तरह करती है और उनको दिनभर गोदी में उठाए-उठाए खिलाती रहती है। यहां छोटे-छोटे बच्चे कच्ची ईंटो को पलटने का काम करते हैं ताकि वो दोनों तरफ  से धूप व हवा से सूख जाएं और फिर सुखने पर बच्चे उठा-उठाकर चट्टा लगाने की जगह तक भी इनको ढोने में मदद करते है? पसार में रेत फैलाने, मिट्टी के गोले बनाने है, अपने परिवारजनों को पानी पिलाने व अपने छोटे भाई-बहनों को रखने आदि कितने ही तो काम है जिनको ये अंजाम देते हैं। स्कूल, बालबाड़ी, खिलौने, बचपन और बचपन की आजादी आदि इनकी कल्पना से परे की चीजें हो गई है। दरअसल इनको सपने में भी ईंट, गारा, मिट्टी, भट्ठा और मालिक के इलावा कुछ नहीं दिखता है।

                मजदूर परिवारों में बच्चे पांच-सात साल की उम्र में ही हर वो काम करने में पारंगत हो जाते है जो उनके मां-बाप करते हैं। लेकिन मालिकों द्वारा कहा ये जाता है कि यहां बाल श्रम नहीं है और हमारे यहां कोई भी बच्चा काम नहीं करता। सर्वेक्षण के दौरान पाया कि 15-20 बाल-मजदूर हर भट्ठेपर कार्यरत है। कुल मिलाकर केवल इस उद्योग में राज्यभर में लगभग 50 हजार बाल मजदूर कार्यरत हैं। जबकि भारत सरकार की जनगणना 2011 के आंकड़े बता रहे हैं कि हरियाणा राज्य में कुल 53492 ही बाल श्रमिक है।

                भट्ठों पर ना तो स्कूल व शिक्षा की कोई व्यवस्था है और ना ही बालवाड़ी की। बच्चों को बाल श्रम में धकेलने का एक प्रमुख कारण भट्ठों पर इन दोनों चीजों का अभाव भी है। जब अभिभावकों से यह पूछा गया कि आप अपने बच्चों को भट्ठेके नजदीक के गांव में क्यों नहीं दाखिल कराते? इनका जवाब यह था कि हम तो स्कूल के मास्टर के पास गए थे – पर वो हमे देखकर बोला कि ये तो बिहारी हैं  इनका कोई पता ठिकाना नहीं कब भाग जाएं। और हमें धमकाकर स्कूल से भगा दिया गया। गरीब आदमी की कोई जिन्दगी ना है। दूसरा स्कूल बहुत दूर है। हम छोटे-छोटे बच्चों को अकेले कैसे भेजें। मजदूरों ने बताया कि हमें तो रातभर नींद नहीं आती कि हमारी तो जिन्दगी बर्बाद हो ही गई पर हमारे बच्चों का क्या होगा। हम तो इन्हें पढाना-लिखाना चाहते हैं और सोचते हैं कि ये तो कुछ बन जाएं। पर क्या करें गरीबों की कोई नहीं सुनता।

                हालांकि ‘बाल श्रम अधिनियम के अनुसार उद्योग मालिक को आर्थिक जुर्माने के साथ-साथ तीन महीने से लेकर एक साल तक के कारावास का सख्त प्रावधान है’ परन्तु यह  कड़वी सच्चाई है कि आज तलक एक भी भट्ठा मालिक के खिलाफ  कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हुई।

                क्या कभी इस आबादी की भी श्रम कानूनों व संविधान में लिखित तमाम अधिकारों तक पहुंच बन पाएगी? क्या कभी देशभर के भट्ठा उद्योग में कार्यरत लाखों बाल मजदूरों को उनका बचपन लौटाया जा सकेगा?

स्रोत- सं. देस हरियाणा (मई-जून 2016), पेज-13-16

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