आलेख


ज्ञान प्रकाश विवेक

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देश का विभाजन एक न भूलने वाली घटना थी। यह एक ऐसी त्रासदी थी, जिसने भूगोल ही नहीं, अवाम को भी तकसीम करके रख दिया। जो उधर से लोग विस्थापित होकर इधर आए, उन्हें शरणार्थी कहा गया। जो यहां से पाकिस्तान जा बसे वो मोहाजि़रों की तरह जीवन जीने को अभिशप्त रहे। विस्थापन ने अजीब-सी वेदना और बेघरी का दुख दिया। इस विस्थापन ने स्मृतियों की गूंज दी। जौन ऐलिया हिन्दोस्तान से पाकिस्तान जा बसे, लेकिन हिन्दोस्तान की यादें उनमें तड़प पैदा करती रहीं। उन्होंने कहा भी-‘क्या मैं तुमको याद नहीं हूं गंगा जी और जमुना जी।’ नासिर काज़मी भी पाकिस्तान चले गए, लेकिन हिन्दोस्तान उन्हें हमेशा याद आता रहा। उन्होंने एक शेर में दुखभरे लहजे में कहा-‘आए हैं इस गली से तो पत्थर ही ले चलें।’

पाकिस्तान से जो लोग यहां आकर बसे। वो लगभग खाली हाथ आए। वो जान बचाकर, लुट-पिट कर यहां पहुंचे। इसके बावजूद, बेघरी की वेदना के साथ-साथ सैंकड़ों यादें भी थीं, जिन्हें वो मिल-बांट कर शेर करते। यादों को ताजा करते और आंखों को नम करते। कुमार पाशी गहरे जज़्बात के साथ, उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं-(वो भी पाकिस्तान से आए थे)

बस कि ‘पाशी’ न मर सके न जिए
दिल का रिश्ता था टूटता भी क्या

पाकिस्तान से यहां आकर बसने वाले बेशक खाली हाथ आए, लेकिन तीन चीजें अपने साथ जरूर लाए। छोड़ दी गई ज़मीन की यादें, उर्दू ज़बान और शायरी!

यह महज़ इत्तेफाक़ नहीं था, बल्कि परिस्थितियां ज्यादा हाइल थीं कि पाकिस्तान छोड़कर आए अधिकांश लोग पानीपत, करनाल, सोनीपत, अम्बाला, रोहतक, बहादुरगढ़, कुरुक्षेत्र आदि शहरों में बसते चले गए। बहुत सारे लोगों ने दिल्ली में अपनी बस्तियां बसाई।

एक वो वक्त था जब हरियाणा (उस वक्त का पंजाब) उर्दू ज़बान का मर्कज़ था। वो बजुर्ग पीढ़ी जो पाकिस्तान से आई थी, न सिर्फ ख़तो-क़िताबत उर्दू में करती थी, बल्कि शायरी में भी अच्छा ख़ासा दख़ल रखती थी। वो लोग या तो शायरी करते या फिर उर्दू के मोतबर शायरों के शेर, वक़्त-ज़रूरत सुनते-सुनाते।

आबिद आलमी जब अपने माता-पिता के साथ विस्थापितों की तरह हिन्दुस्तान आकर बसे। शायरी करने की प्रेरणा, उन्होंने कहां से हासिल की होगी, इसका पता नहीं चलता। बेशक, उस दौर का वातावरण भी किसी शायराना फ़ितरत के नौजवान को शायरी की हिस्स पैदा करता रहा हो। $गौरतलब है पचास-साठ के दशक में छोटे-बड़े शहरों में नशिस्तें मुनक्क़द होती रहती थीं, लेकिन आबिद आलमी की जितनी साफ़-शफ्फ़ाक शायरी है, ज़रूर उनका कोई उस्ताद भी रहा होगा, जिसका जि़क्र कहीं नहीं। अगर उन्होंने अपने स्तर पर उरूज़ की समझ विकसित की हो, तो यह बात बड़ी असाधारण है और $गौरतलब भी। शायरी सी प्रतिभा उनमें जन्मजात थी। बेशक, उर्दू ज़बान की समझ वो पाकिस्तान में हासिल कर चुके थे। उस ज़बान का विस्तार और कलात्मक रंग उन्होंने र$फ्ता-र$फ्ता प्राप्त किया।

$गौरतलब है कि उस दौर की शायरी, हरियाणा के जिन इलाकों, जिन ख़ित्तों में हो रही थी, उस शायरी का रंग रवायती ज्यादा था। ग़ज़ल में फ़ारसियत, अल्फाज़ में संगीतात्मकता, इज़ाफ़तें और मफ़हूम में हुस्नो-इश्क़। ग़ज़लों में ख़ास तरह का चमत्कारिक गुण और रवानी! लेकिन आबिद आलमी ने एक नई रविश को अख्तियार किया। उनके पास य$कीनन, तीक्ष्ण दृष्टि थी। अनुभवों की पुनरर्चना का शऊर था। शुरूआत उन्होंने जदीदियत से की। यह आधुनिकता बोध, आबिद की ग़ज़लों को न सिर्फ़ नौइयत और ताज़गी प्रदान करता है बल्कि देखने, सोचने, समझने और जि़ंदगी और समय और समाज और रिश्तों पर शायरी के ज़रिए तबसरा करने की सलाहियत अता करता है।

हैरानी इस बात की है कि आबिद आलमी की आक्रामक, विद्रोही और जुझारू ग़ज़लों पर ही बात होती रही है, जबकि आबिद आलमी की ग़ज़लगोई के तीन मक़ाम हैं। या फिर ये भी कह सकते हैं कि उनकी शायरी के तीन कालखण्ड हैं। पहले कालखण्ड में वो पुरलुत्फ़ जदीद ग़ज़लें कहते हैं। बेशक वो कालखण्ड थोड़े समय का रहा है। दूसरा और उनकी शायरी का सबसे महत्वपूर्ण समय, प्रतिवाद की शायरी का समय है। यहां आबिद आलमी अपने जोशो-ख़रोश के साथ, तंत्र के निषेध का प्रबल भावना से विरोध करते, क्रांतिकारी शायर के रूप में नज़र आते हैं।

तीसरा कालखण्ड जिसमें शायर की निजताएं हैं। दुख है और उसकी मूर्त तथा अमूर्त कथाएं। बेशक आबिद आलमी को रोग ने तोड़-फोड़ दिया है। अपने दुख, उदासियां, हताशा, अकेलापन। इन सबके बावजूद, आबिद ने ग़ज़लें इस दौर में भी लिखीं। उनके रोग की छायाएं इन ग़ज़लों पर दिखाई देती हैं। अगर शैली और शिल्प की दृष्टि से देखा जाए, तो ग़ज़लें यहां भी परिपक्व हैं। यहां कथ्य में बेशक निजताएं हैं, लेकिन ग़ज़लों का कलात्मक स्वरूप कहीं भंग नहीं होता।

अक्सर देखा गया है शायर जब रोगग्रस्त हुए तो उनकी शायरी पर मृत्युबोध भी चाहे, अनचाहे व्यक्त होता चला गया। $गालिब का यह शेर-‘हो चुकीं $गालिब बलाएं सब तमाम। एक मर्गे नागहानी और है।’ नासिर जब बीमार हुए तो उन्होंने बहुत सारी ग़ज़लें इसी दौर में लिखीं। उनके शेर का एक मिसरा है-‘क्या तुझे हो गया बता तो सही।’ इब्ने इन्शा ने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पहले एक नज़्म लिखी-‘अब उम्र की नक़दी खत्म हुई।’ बहरहाल, इस तरह के बेशुमार उदाहरण दिए जा सकते हैं।

आबिद आलमी की शायरी पर बात करते हैं। – दायरा, नए ज़ाविए तथा हर्फे़ आख़िर को केंद्र में रखते हुए शायर के सरोकारों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं।

‘दायरा’ की ग़ज़लें पढऩे और महसूस करने से पूर्व उस दौर की यानी पांचवें, छठे और सातवें दशक की उर्दू शायरी पर ध्यान जाता है, जब जहीद उर्दू ग़ज़ल किसी आंदोलन की तरह उभरी। नए प्रतीकों, नए रूपकों, नए अल्फ़ाज़ में ग़ज़लें लिखी जाने लगी। नासिर काज़मी ने जदीद उर्दू ग़ज़ल के दर खोले। फ़ारसी ज़बान के बदले आसान उर्दू ज़बान में ग़ज़लें लिखीं। नए इमेजिस और नई प्रतीकात्मकता से ऐसे शेर कहे कि पाठक/श्रोता हैरान रह गए। उसके बाद, शायरों का जदीदियत के प्रति रूझान निरंतर विकसित होता चला गया।

आबिद आलमी की ग़ज़लों का पहला संग्रह (1971) उसी दौर की काव्य यात्रा है। यहां अजीब किस्म की बेचैनी है। जि़ंदगी को समझने का नया दृष्टिकोण है। बात प्रतीकों में, गूढ़ार्थ पैदा करती हुई-

मैं उसके वास्ते सूरज कहां से आखिर लाऊं
न जाने रात मुझे क्या समझ रही है अभी

रात के पुल को पार कर लेता
नींद का बोझ आंख उठा न सकी

मेरे घर में तड़प रही है रात
ख़्वाब जाने कहां लुटा आई

तीनों अश्आर में रात का प्रतीक केंद्र में है। तीनों अश्आर में अभिव्यक्ति की सघनता है। यहां शायर की अनुभूति को अश्आर में महसूस किया जा सकता है। यहां रूपक की रचना है। बात संकेतों में है। इसलिए जटिल है। रात का तसव्वुर विभिन्न कोणों से व्यक्त हुआ है। रात एक है उसे अनुभव करने के कई सारे रूप! कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे शायर रात की बात नहीं कर रहा जि़ंदगी की मुश्किलों को रात के पस:मंजर व्यक्त कर रहा है।

जदीद शायर का यह एक सौंदर्य है कि आसान लफ्जों में गहरी बात की जाए। प्रकृति के शेड्स उठाए जाएं और उन्हें ���माज के साथ, आवाम के साथ, व्यक्ति के साथ रिश्ता कायम किया जाए। कुछ शेर $गौरतलब हैं-

आसमां रात दरख्तों के करीब आया था
पूछता फिरता था क्या उनमें छुपा है कोई

शायर जब कभी दश्त में, रात गए गुज़रा तो उसे महसूस हुआ कि इन दरख्तों में कोई अज्ञात शै है। अगर वो बात को सीधे तौर से कहता तो शेर सपाट हो जाता। यहां आसमां किरदार का सृजन और उसका दरख्तों से पूछना’ शेर को बड़ा बना देता है।

शेर में कथ्य/विचार को किस अनूठे अंदाज में व्यक्त किया जाए, यही शायर की मौलिकता को दर्शाता है। यही शायर के अनुभवों की परिपक्वता का अहसास कराता है। शेर है-

राह की धूल में डूबा हुआ पहुंचेगा
अपने माज़ी का पता लेने गया है कोई

शेर में कोई किरदार है। वो अपने अतीत में रवाना हुआ है, लेकिन शायर का दावा है कि वो जब आएगा तो ग़र्द आलूद होगा। ज़ाद्दिर है, यादें हलाक़ करके रख देती है। स्मृति और अतीत पर बहुत शेर कहे गए हैं। लेकिन इस शेर में अभिव्यक्ति का सौंदर्य है। सादगी से कही बात का अपना रूतबा है।

जदीद शायरी के शुरूआती दौर में कुछ तत्व बड़े मानीख़ेज होकर ग़ज़लों में व्यक्त हो रहे थे। जदीद ग़ज़ल का वो दौर नए-नए तजुर्बों का दौर था। जब अपनी ज़ात (व्यक्ति) से टकराने के अलावा अपनी तलाश भी प्रमुख तत्व था। आत्म निर्वासन और मोहभंग का वो दौर था (वो दौर कमोबेश अब भी है) अपने-अपने ढंग से अपनी ‘मैं’ को व्यक्त किया जा रहा था। आबिद आलमी के ये शेर इसी सिलसिले में गौरतलब हैं-

मेरी निगाह में दिन है मेरे बदन में है रात
मेरी किताब अधूरी पड़ी है बरसों से।

देखने को है बदन और हक़ीकत ये है
एक मलबा है जो मुद्दत से उठा रखा है

जाने किस दुख के जंगल में सब पहचाने खो आया है
घर का रस्ता पूछ रहा है आबिद घर की दीवारों से

प्रतीक संश्लिष्ट हैं और गूढ़ भी। बदन किताब है बरसों से अधूरी किताब। बदन मलबा है। यहां बदन केंद्र में है। सहर एक फिलासफ़ी है। अधूरापन हर शख़्स की नियति है। तीसरे शेर में पहचान का संकट है। महानगरीय जीवन की यह विडम्बना तब भी थी (और अब भी है) कि मनुष्य अपनी पहचान खोता चला गया है।

1971 में उनकी ग़ज़लों का मजमुआ प्रकाशित हुआ। यहां वो अपने समय को जदीद लहजे में व्यक्त करते सशक्त शायर के रूप में नज़र आते हैं। बाद में उनकी शायरी रूझान और सरोकार बदलने लगते हैं। 1990 में जनवादी लेखक संघ (भिवानी) ने उनकी दूसरी किताब ‘नए ज़ाविए’ प्रकाशित की। 1971 के बाद का समय आबिद आलमी की शायरी की प्रखरता, तीक्ष्णता और आक्रामकता का समय है। यहां वो एक विद्रोही कवि के रूप में न सिर्फ अपनी शिनाख़्त कराते हैं, बल्कि अपना एक ऐसा अंदाज़े-बयां भी विकसित करते हैं, जिसमें कुछ कर गुज़रने का वलवला है और अल्फ़ाज़ में चमक! कुछ शेर-

उसी तड़प से उसी जोश से चलो यारो
सवेरा दूर नहीं है चले चलो यारो

कभी ये लोग हमारी ही राह तकते थे
जगा के साथ इन्हें भी लिए चलो यारो

कोई फ़सीज भी दरिया को रोक सकती नहीं
अंधेरा चीर के आगे बढ़े चलो यारो

यहां आगे बढऩे का जज़्बा है। यहां जदीद शायरी के गूढ़ प्रतीक नहीं। बात सीधी, सरल, दिल तक पहुंचती। आबिद मुद्दे की बात करते हैं। या यूं कहें कि उनकी शेरीयत में ठोस कथ्य है जो प्रखर रूप में व्यक्त होता है।

मैं नए दौर की आवाज़ हूं यानी ‘आबिद’
एक इक लफ्ज़ का मफ़हूम नया है मुझमें

वो नए मफ़हूम की ग़ज़लें लिखते हैं और इस बात का उन्हें भरपूर अहसास भी है। वो बेवजह शब्द ख़र्च नहीं करते। विचार की शक्ति से अपनी ग़ज़लों में चेतना पैदा करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे ग़ज़लों के शब्द चकमक पत्थर की तरह टकराकर रोशनी पैदा कर रहे हैं-

जो लिखते फिरते हैं एक-इक मकां पे नाम अपना
उन्हें बता दो कि इक दिन हिसाब भी होगा

हवसपरस्त तंत्र के बरअक्स शायर का कथन जितना तुर्श है उतना मानवीय! आदिब जब कहते हैं-उसी तड़प से उसी जोश से चलो यारो। तो वो दूसरों की नहीं, अपनी तड़प को बयान रहे होते हैं। इसी सिलसिले में उनकी ग़ज़ल का एक शेर है-

इक-एक दर्द से इतना बिला-झिझक कह दो
हमारे दिल में उठेगा जो दायमी होगा

यह शेर दुखों से मुख़ातिब है। अस्थाई और छोटे-मोटे दुखों को शायर ललकार-सा रहा है कि हमारे दिल में उठेगा (दर्द) जो दायमी (स्थायी) होगा। ज़रा $गौर करें तो यह शेर लोक जीवन की आवाज़ बनकर उभरता प्रतीत होता है। जहां दुखों के साथ जीना भी एक कला होती है।

ग़ज़ल एक ऐसी पेचीदा और विचित्र सिन्फ़ (विद्या) है जो अपनी संरचना में रूमानियत को छुपाए रखती है। यूं भी कह सकते हैं कि रूमानियत ग़ज़ल का सौंदर्य है और उसकी सीमा भी। बहुत कम शायरों ने ग़ज़ल के रूमान को तोड़ते हुए विद्रोही स्वर पैदा किए। $फैज ने क्रांतिकारी जज्बे की बेहतरीन नज़्में लिखीं। लेकिन ग़ज़ल में-‘चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले’ जैसा रूमान रचते रहे। मख्दूम की क्रांतिकारी नज़्में तपिश पैदा करती हैं। लेकिन ग़ज़ल की दुनिया में जब आते हैं तो ‘बात फूलों की रात फूलों की’ जैसी रूमानियत के रूबरू होते हैं।

हबीब जालिब इस लिहाज़ से विद्रोही शायर थे। वो सम्पूर्ण रचनाकर्म स्वर पैदा करने वाले ऐसे शायर थे, जिनकी आधी के क़रीब जि़ंदगी जेल में गुजरी। उनकी ग़ज़ल का एक शेर है-

उसको शायद खिलौना लगी हथकड़ी
मेरी बच्ची मुझे देखकर हंस पड़ी

आबिद आलमी हबीब जालिब की परंपरा को विस्तार देते प्रतीत होते हैं। हबीब जालिब मोहाजि़र थे तो आबिद आलमी शरणार्थी।

विस्थापन की वेदना को व्यक्त करता आबिद का ये शेर-

हम अपने कंधे पे ही अपना घर उठाए फिरे
कहीं भी बस्ती बसाने का हौसला न हुआ

आबिद की ग़ज़लों में साथीपन है। परामर्श है। चुनौतियों से लडऩे का जज़्बा है। हौसलाअफ़ज़ाई है। यथा-

अब इनको काट के बढ़ जाओ देखते क्या हो
पहाड़ कहने से रस्ता नहीं देता

रात के इस पहाड़ को काटो
उस तरफ़ सुबह राह तकती है

उठाए फिरते हो क्यों बोझ तपते लफ़्ज़ों का
सरे-उफ़क़ अब इसे आफ़ताब-सा रख दो

उपरोक्त कुछ अश्आर के ज़रिए आबिद आलमी की ग़ज़लों में समाज के साथ रिश्ते का पता चलता है। यहां पूरी संचेतना के साथ कमज़ोर के भीतर विश्वास पैदा करने की प्रगतिशील सोच है-पहाड़ कहने से रस्ता कभी नहीं देता। आबिद आलमी तपते हुए लफ़्जों को शरारा बनाकर ग़ज़लों में पिरो देते हैं।

लोक की शक्ति का अहसास यहां है। जो अपनी ख़ामोशी को भी हथियार में बदलने का हुनर रखती है। यही लोक शक्ति उनकी ग़ज़ल के इन अश्आर में और अधिक प्रबल भावना से व्यक्त होती है-

यूं बग़ल में दबाए फिरते हो क्या
आग तूफ़ान जलज़ला कुछ है

यूं ही ख़ामोश तो नहीं ये लोग
सोच लो इनका मुद्आ कुछ है

इसको भी शामिले-सफ़र कर लो
राह में ये पहाड़-सा कुछ है

जनसाधारण के पास जो होता है वो ‘थोड़ा-सा’ होता है। लेकिन उस शक्ति से वो अनजान-से होते हैं। शायर उसे व्यक्त करते हुए कितने हौसलाकुन प्रतीक इस्तेमाल कर रहा है। आग, तूफान, जलजला कुछ है। ‘खामोशी’ यहां अर्थवान है तो रास्ते का पहाड़ भी। सबसे ज़रूरी बात। रदीफ ‘कुछ’ है कितना अधिक सांकेतिक है। यही शैली उनके अश्आर की पहचान है। उनके अश्आर में जोक रौशन ख्य़ाल होते हैं वो दिलासा देते हैं, सकून बख़्शते हैं।

आबिद ग़ज़ल लिखते वक्त हर तत्व के प्रति सचेत रहते हैं-शब्द, विचार, खानी, का$िफया सब के प्रति सावधान! रदीफ़ के प्रति भी उतनी जिम्मेदारी का निर्वाह। यहां-देखते क्या हो रदीफ़-किसी जनजागरण में गाए जाने वाले गीतों से छनकर आया हो जैसे।

ग़ज़लों में रदीफ़ों का इतना सुंदर, सार्थक प्रयोग करने वाले आबिद आलमी की बहुत सारी ग़ज़लें बिना रदीफ़ के भी हैं। यह कोई ऐब तो नहीं। लेकिन मुकम्मल ग़ज़ल का अहसास रदीफ़ के साथ ही होता है।

आबिद आलमी ने शहर को केंद्र में रखकर बहुत सारे शेर कहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वो मुल्यहीनता को व्यक्त कर रहे हों। शहरी तहज़ीब से वो बेज़ार हों, यथा-

चूसते हैं क़दम-क़दम पे लहू
हम तो इस शहर से चले यारो

न जाने कौन-से लफ़्जों को क्या बैठे
ये क़ातिलों का नगर है मियां यहां ख़ामोश!

शहर केंद्रित बहुत सारे शेर हैं। आक्रोश की अभिव्यक्ति है। आबिद आलमी शहर में रहकर शहर के प्रति तल्ख़्ा शेर कहते हैं। क्या वो गांव की ओर लौटना चाहते हैं। नहीं लौटना चाहते। उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं। शहर की सभी सुविधाएं हासिल करते हुए शहर का प्रतिवाद!

शहर को लेकर आबिद के अश्आर में नकार का भाव बेशक हो, लेकिन उनकी प्रतिवाद की शायरी अपनी तरह की है। यहां सफ़र में निकल पडऩे की तड़प है। यहां तलाश है और तलाश का अपना फ़लसफ़ा है। यथास्थिति का अस्वीकार और व्यवस्था के छल को बेनकाब करने की जुर्रत है। मसलन ये शेर-

रहीन-ए-क़त्लोग़ारत यूं मेरा हिन्दोस्तां कब तक
लुटेंगी अपने के हाथों की इसकी दिल्लियां कब तक

रहेंगी लफ़्ज मज़लूमों के आख़िर बेज़ुबां कब तक
रहेंगी बंद गोदामों में इनकी अर्जियां कब तक

इस ‘कब तक’ की काट ज़रूरी है।  इस यथास्थिति को तोडऩा ज़रूरी है। एक नए समाज की ज़रूरत है। जहां जीवन की गरिमा बरकरार रहे। शोषित समाज का सम्मान आहत न हो। एक ऐसे जहान की तलाश और उसके लिए शायर की तड़प गौरतलब है-

रास्ते पर जमी हुई है बर्फ़
अपने पैरों पे आग मल के चलो

राह मक़तल की और जश्न का दिन
सरफ़रोशो मचल-मचल के चलो

आग मलकर चलना नायाब मुहावरा है। यहां चलने की जिद्द है। इस जिद्द में नई दुनिया तामीर करने की ख़्वाहिश है जो ज़ाहिर नहीं, बातिन है। दूसरा शेर जिसमें न सिर्फ क्रांतिकारी गूंजते हुए स्वर हैं, बल्कि ख़ास तरह का जुनून भी है। यही जि़द्द यही वलवला, यही तौकीफ़, यही शेर कहने का सलीका, यही वैचारिक ऊर्जा, बग़ावती तेवर और यही कमज़ोर की पक्षधरता और यही सदाकत भरी हसरतआबिद आलमी की शायरी का सरोकार है।

नए ज़ाविए किताब में शायर अपनी प्रबल भावना और तबोताब के साथ, अपनी तरक्कीपसंद सोच को व्यक्त करता है। यही किताब आबिद आलमी के भीतर खड़े विद्रोही शायर से तआरूफ़ करती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि दायरा और हर्फे-आखिर की ग़ज़लें बेमकसद हैं। उस शायरी का अपना मक़सद है।  जदीदियत के दौर में लिखी गई ग़ज़लों का अपना सौंदर्य है।

हर्फे आख़िर किताब की ग़ज़लें पढ़ते हुए महसूस होता है कि आरंभ में यहां की आक्रामक तेवर हैं, लेकिन बाद में शायर अपनी निजताओं को मार्मिक और भावनात्मक रूप से व्यक्त करता है। ये शायरी न कमज़ोर है न अपरिपक्व। हम कह सकते हैं कि आबिद आलमी की शायरी का (और उनका अपना) तीसरा पड़ाव है। यहां एक शायर की व्याकुलताएं हैं। ये व्याकुलताएं शायर की ही नहीं कमज़ोर पड़ते किसी भी शख़्स की हो सकती हैं। इन व्याकुलताओं के बरअक्स अनात्म समय और समाज की कारगुज़ारियां हैं। कुछ शेर-

पत्थरों ने मुझे सुना आख़िर
मुझको आख़िर किया गया महसूस

जानकारों ने वो सुलूक किया
हमको हर अजनबी लगा अपना

मुझको नाकामी का पैकर क्यों अभी से कह रहे हो
मेरा जद्दोजहद से रिश्ता अभी टूटा नहीं है

तेरे पास आने में कासिर मैं तो हूं ही ये बता
क्या घड़ी भर मुझसे मिलने तू भी आ सकता नहीं

कुछ दिनों से वाक़ई क्या रंगे-दुनिया और है
या फ़कत मेरी निगाहों का तकाज़ा और है

उपरोक्त अश्आर किसी आईने की तरह है, जहां संबधों के खंडित और विकृत चेहरे हैं। आत्मकेंद्रित लोग, किसी के पास फ़ुरसत के क्षण नहीं कि दुख सांझा कर सकें। इन अश्आर को पढ़ें तो यह बात शिद्दत से महसूस होती है कि हमारा निस्संग समाज सुख के उत्सव मनाता है। ये ग़ज़लें, जो आबिद आलमी ने जीवन के आख़री दौर में लिखीं, ज़रूरी ग़ज़लें इसलिए हैं कि एक दिन हम सब वो मंज़र देखेंगे, जब एक तरफ हम अकेले, अपनी वीरानियों, उदासियों और स्मृतियों के साथ होंगे, दूसरी तरफ़ बेहिस दुनिया अपने जलवों के साथ।

और आख़िर में सघन प्रेम केंद्रित एक शेर जो पूरी किताब में किसी चमक की तरह मौजूद है, स्मृतियों की गूंज दूर तक सुनाई देती है-

तेरे उतरे हुए चेहरे से ज़ाहिर है कि जल्दी में
मुझे ठुकरा के तेरा व$क्त भी अच्छा नहीं गुज़रा।

आबिद आलमी की शायरी में नए समाज और बेहतर दुनिया को तामीर करने की बेचैनी है। यहां जो शायर का विद्रोही स्वर है, उसमें बनावट नहीं, सदाकत है। यहां भाषा साफ़ शफ्फ़ाक जीवंत और मानी$खेज़ है। यहां तीन तरह की ग़ज़लें हैं। यानी कथ्यगत बदलाव निरंतर महसूस होता है। लेकिन हर मक़ाम पर हम ए बा-सलीका, बा-अदब शायर से तअरूफ़ करते हैं।

स्रोतः #सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 48 से 52

 

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