कहानी


आग

 एस.आर. हरनोट

शास्त्री वेदराम आज जैसे ही कुर्सी पर बैठने लगे तीसरी कक्षा के एक बच्चे बादिर ने उनसे पूछ लिया,

गुरू जी! गुरू जी! हिन्दू क्या होता है…?

उन्हें एक पल के लिए लगा, कक्षा में बैठे सभी बच्चों ने बर्रों की तरह उन पर आक्रमण कर दिया हो। बच्चों की उपहासयुक्त हंसी और इस प्रश्न से वे भीतर ही भीतर थोड़ा विचलित तो हुए परन्तु अपने को संयत करते हुए कुर्सी पर बैठ गए। मेज पर रखा पानी का गिलास उठाया और एक सांस में गटक गए। दो पलों के लिए आंखे बंद की जैसे भीतर के विचलन को शांत कर रहे हों। धीरे से आंखें खोली तो कक्षा में बैठे प्रश्न पूछने वाले बच्चे पर आंखे टिक गई। वह हल्का-सा सहमा हुआ ऐसे बैठा था मानो कुछ ग़लत पूछ लिया हो। उसके साथ उसी की बिरादरी का एक दूसरा बच्चा भी बैठा था जिसके चेहरे पर भी हल्का सा डर दिखा। शास्त्री जी ने कक्षा के सभी बच्चों पर सरसरी निगाह डाली। वे यह देखकर अचम्भित थे कि उनकी कक्षा में बैठे उच्चवर्ग के बच्चों के ओंठों पर एक व्यंग्यपूर्ण मुस्कान पसरी थी कि बदरू को यह पता भी नहीं कि हिन्दू क्या होता है। इसी बीच स्कूल का चपड़ासी आया और खाली गिलास उठाकर बाहर चला गया।

बादिर जिसे बच्चे बदरू के नाम से भी पुकारते थे वह अभी भी अपनी तख्ती पर आंखें गड़ाए उंगलियों के पोरों से फर्श पर बिछी टाट टूंग रहा था। शास्त्री जी ने बहुत स्नेह से उसे अपने पास बुलाया। मेज की दराज से हाजरी का रजिस्टर निकाल कर उसे पकड़ा दिया कि बच्चों का बारी बारी नाम लेकर हाजरी लगाए। बच्चे के भीतर का डर कम हो गया था पर अपने पूछे प्रश्न को लेकर वह अभी भी आतंकित था जैसे उसने कोई प्रश्न नहीं बल्कि शास्त्री जी से कुछ अनर्गल पूछ लिया हो। उसकी समझ में नहीं आया कि उसके प्रश्न पूछने पर उसके साथी बच्चे क्यों हंसने लगे और गुरूजी ने उत्तर क्यों नहीं दिया…?


कई दिनों से शास्त्री जी के मस्तिष्क में कुछ ऐसी घटनाएं घूम रही थी जिनकी तह तक वह जाने का प्रयास कर रहे थे। वे ज्यादातर धार्मिक और इतिहास की पुस्तकें पढ़ा करते थे। इसके अतिरिक्त अंक-शास्त्र और गीता का नियमित अध्ययन और उस पर मनन करते रहना उनकी दिनचर्या के हिस्से थे। यद्यपि वे व्यर्थ के पूजा-पाठ से हमेशा दूरी बनाए रखते फिर भी उन्हें लोग कई बार बड़े आयोजनों में भागवत कथा या चंडी जैसे कठिन पाठों और यज्ञों को करने के लिए ले जाया करते थे। वे जिस वैदिक प्रावधानों के अन्तर्गत वैज्ञानिक तरीके से उन्हें अंजाम देते वे सभी को चकित कर देते थे।

परन्तु कुछ दिनों से उन्होंने कई प्रगतिशील कवियों की कविताओं का अध्ययन शुरू किया था। कबीर से लेकर मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन के कविता संग्रहों में से एक दो उनके झोले में जरूर होते और समय निकलते ही वे स्कूल में उन्हें पढऩा और आंखे बंद करके गहरा चिंतन करना नहीं भूलते। इनमें मुक्तिबोध उनके प्रिय कवि बन गए थे। इसलिए उनका एक कविता संग्रह ‘चांद का मुंह टेढ़ा’ है’ अक्सर अपने पास रखते और बच्चों को पढ़ाने और कोई पाठ याद करने के लिए देने के बाद वे वहीं बैठे-बैठे संग्रह में से कोई कविता पढ़ लिया करते।

एक दिन भी उनके साथ ऐसा ही कुछ हुआ था। बदरू ने उनसे अचानक पूछा था,

‘गुरू जी! गुरू जी! चांद का मुंह टेढ़ा कैसे होता है…?’

कक्षा के अन्य बच्चे उसकी बात पर उस रोज भी हंसे थे लेकिन वह हंसी आज की हंसी से बिल्कुल भिन्न थी। शास्त्री जी इस प्रश्न से चौंके जरूर थे पर आज की तरह हतप्रभ नहीं हुए थे। हालांकि वे बहुत अच्छे ढंग से इस प्रश्न का उत्तर दे देते पर उन्हें मालूम था कि तीसरी कक्षा के इस बच्चे की समझ में क्या मुक्तिबोध का प्रगतिशील दर्शन आएगा। वे जानते थे कि उस बच्चे ने उनके हाथ में इस किताब का शीर्षक पढ़ लिया होगा। वैसे भी बदरू उनकी क्लास में सबसे होशियार था और उनसे कुछ न कुछ जरूर पूछ लिया करता। शास्त्री जी को उसकी दक्षता पर कई बार हैरानी भी होती थी। आज उन्होंने बड़े मजाकिया ढंग से कहा था,

‘बच्चु! घर जाकर अपने दादा से पूछियो तो।’

बच्चा संतुष्ट हो गया था।

फिर आज ऐसा क्या हो गया कि बदरू के प्रश्न पूछने पर उनका पढ़ाने को भी मन नहीं कर रहा था। आज वैसे भी कल के लिए 15 अगस्त की तैयारियां बच्चों से करवाई जानी थी। क्योंकि सबसे पुराना प्राइमरी स्कूल होने के नाते वह पंचायत के अन्य चार स्कूलों का भी केन्द्र माना जाता था और शास्त्री जी को मुख्याध्यापक का दर्जा पहले से ही हासिल था। इसलिए पंचायत स्तर पर सभी स्कूलों के बच्चों का आयोजन वहीं होना था। उनके साथ दो अध्यापक और थे जो काम कम और बातें ज्यादा करते थे। पर इस आयोजन के लिए उन्हें भी शास्त्री जी ने कई काम सौंप रखे थे।


शास्त्री जी इन दिनों स्कूल के पाठ्यक्रम को बदले जाने को लेकर भी चिंतित थे। उन्होंने अभी तक भी अपने स्कूल में बच्चों को नई पुस्तकों की जानकारी नहीं दी थी जबकि शिक्षा बोर्ड से पहली से लेकर पांचवीं तक की कुछ पुस्तकों के बंडल पहुंच गए थे। इसी बीच उनकी पाठशाला में कई सर्कुलर भी आ गए थे। किसी में सुबह की प्रार्थना के वक्त राष्ट्रगान गाना अनिवार्य कर दिया था तो किसी में राष्ट्रगीत। एक सर्कुलर ऐसा भी था जिसमें प्रत्येक स्कूल के लिए सप्ताह में दो बार ड्रेसकोड शुरू करने के निर्देश थे।  इसमें प्रत्येक छात्र को, चाहे वह किसी भी वर्ग का क्यों न हो, एक विशेष रंग के साथ धोती-कुरते को पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। तीसरा सर्कुलर प्राइमरी पाठशालाओं से लेकर उच्च माध्यमिक पाठशाला के लिए संयुक्त रूप से जारी किया गया था कि एक लघु पुस्तकालय खोला जाए जिसमें वेद, पुराणों से लेकर, रामायण, महाभारत और गीता की प्रतियां उपलब्ध हों। साथ ही हर प्राईमरी स्कूल को 25 हजार और माध्यमिक स्कूल को 50 हजार का बजट भी एलाट कर दिया गया था। इसमें यह भी हिदायतें थी कि पाठशाला का प्रत्येक बच्चा इन महान ग्रन्थों से परिचित हों जिसके लिए प्रत्येक शनिवार को आधे दिन का समय इन्हीं पर मार्गदर्शन देने के लिए निर्धारित कर लिया गया था। चौथा सर्कुलर नए पाठ्यक्रम के संदर्भ में था जिसमें पहली कक्षा के लिए हिन्दी और अंग्रेजी की वर्णमाला और उनसे बनने वाले शब्द पूरी तरह से बदल दिए गए थे। शिक्षकों को ऐसी गोपनीय मार्गदर्शिका तैयार की गई थी जो उन्हीं के हाथों में रहेगी और उसी के आधार पर वे बच्चों को हिन्दी और अंग्रेजी का ज्ञान दे सकेंगे।

शास्त्री जी पर दवाब बढ़ता जा रहा था कि वे क्यों नहीं नए पाठयक्रम को अपने स्कूल में पढ़ाना शुरू कर रहे हैं। वे यही चाहते थे कि किसी तरह दो-तीन महीने निकल जाए और वे सेवानिवृत्त होकर घर चले जाएं। उसके बाद जिसने जो करना हो या पढ़ाना हो उन्हें उससे क्या मतलब। परन्तु यह सबकुछ उनके रहते ही होना था, ऐसा उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था।


बदरू ने एक दिन फिर शास्त्री जी से पूछा था,

‘गुरू जी! गुरू जी! अब ‘अ’ से ‘अवोधा’ क्यों होता है, ‘अनार’ क्यों नहीं होता ?’

पहले तो उनकी समझ में नहीं आया कि वह क्या पूछ रहा है ? उन्होंने बच्चे से दो तीन बार प्रश्न दोहराने को कहा तो वह ‘अवोधा’ ही उच्चारित कर रहा था। उन्हें स्मरण हो आया कि नए पाठयक्रम में बहुत से परिवर्तन कर दिए गए हैं। वे एक सैट पाठ्यक्रम की बद���ी हुई पुस्तकों का घर भी ले गए थे। हालांकि अभी तक ज्यादा अध्ययन नहीं किया था परन्तु बीच-बीच में समय मिलते ही उन्हें उलट-पलट लिया करते और हैरान होते कि इस तरह का पाठयक्रम पहली के बच्चों के लिए तैयार करने का क्या आशय है ?

उनकी समझ में जब ‘अवोधा’ का सही उच्चारण आया तो माथा ठनका। बच्चा पूछ रहा था कि अब ‘अ’ से ‘अयोध्या’ क्यों होता है। शास्त्री जी ने बहुत प्यार से उस बच्चे को पास बुलाया और पूछा कि उसको यह कहां से पता है। बच्चे ने बताया कि पिछले इतवार को उसके मामा का बच्चा घर नई किताब लेकर आया था, उसी में यह लिखा था। शास्त्री जी समझ गए कि अन्य सभी स्कूलों में नया पाठ्यक्रम शुरू कर दिया गया है। उनके पास उस बच्चे के इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। परन्तु उन्हे पहली की किताब की तकरीबन सारी वर्णमाला याद आ गई जिसे उन्होंने सरसरी तौर पर देखा था। उसमें तकरीबन सभी चीजें बदल दी गई थीं। जैसे ‘आ’ से ‘आम’ नहीं था, आतंकवाद हो गया था। ‘इ’ से इमली नहीं थी, अब ‘इस्लाम’ कर दिया गया था। ‘क’ से ‘कमल’ ही था परन्तु निर्देशिका में उसके अर्थ बदल दिए गए थे। ‘ग’ से ‘गमले’ की जगह ‘गणेश’ ने ले ली थी। उसी तरह ‘ह’ से न ‘हल’ था, न ही ‘ज’ से ‘जहाज’। ‘ध’ से ‘धनुष’ भी गायब हो गया था। ‘म’ से ‘मछली’ भी नहीं थी। ‘स’ से सपेरे की जगह ‘संगठन’ का नाम हो गया था। ‘ह’ से ‘हिन्दू और हिन्दुत्व’ हो गया था। उसी तरह ‘र’ से ‘रथ’ के स्थान पर अब ‘राम’ अंकित था। वर्णमाला के तकरीबन सभी अक्षरों के पूर्व संकेत परिवर्तित कर के बिल्कुल नए शब्द दे दिए गए थे जिनके अर्थों को उसके साथ अलग मार्गदर्शिका के मुताबिक समझाने के निर्देश थे ताकि बच्चे पहली कक्षा से ही इन चीजों से परिचित हो जाएं। इन्हीं के साथ शास्त्री जी को कुछ और अक्षर स्मरण हो आए जिनके नए अर्थों पर घोर आपत्ति दर्ज हो सकती थी।

शास्त्री जी इन सभी बातों और घटनाओं को अब सीधे-सीधे बदरू और उसके प्रश्न से जोड़ रहे थे। इसलिए असमंजस भी था और कोई अप्रत्याशित भय भीतर ही भीतर उन्हें किसी अनहोनी की तरफ इशारा कर रहा था। उन्हें यह प्रश्न इसलिए भी विचलित कर गया कि वह एक मुस्लिम परिवार के बच्चे ने पूछा था। उनके गांव में अधिकतर परिवार उच्च जाति के ही थे। दलितों के दो तीन और बादिर का केवल एक ही परिवार था।

इस परिवार से शास्त्री जी का बहुत पुराना रिश्ता कई कारणों से जुड़ा था। 1946 में जब बंटवारा हुआ तो हिन्दू-मुस्लिम दंगे गांव-गांव तक फैल चुके थे। उनके दादा ने एक मुस्लिम परिवार जिसमें पति पत्नी और एक बच्चा था, को उपद्रवियों से बचाया था जो अचानक एक रात कहीं से छिपता-छिपाता हुआ उनके दरवाजे पहुंच गया था। उस परिवार को उस समय तक सुरक्षा मिली जब तक माहौल ठीक नहीं हो गया। उसके बाद दादा ने अपनी जमीन का एक टुकड़ा उन्हें दे दिया और एक अस्थायी मकान बनाकर वह परिवार उसी गांव में रहने लगा। वहीं उनके बच्चे हुए और शादियां भी। परिवार के मर्द इधर उधर जाकर मेहनत मजदूरी भी करते और अपनी औरतों के साथ शास्त्री की जमीन का काम भी देखा करते। उन्होंने कई पहाड़ी गायें और बकरियां भी पाली थीं जिसका दूध गांव में कई जगह जाता था। उस गांव, परगने और पंचायत में कभी यह लगा ही नहीं कि वह एक मुस्लिम परिवार है। सभी उनसे अपनों की तरह ही स्नेह किया करते थे।

परन्तु कुछ सालों से उस परिवार के प्रति जो वैमनस्य बहुत से लोगों में पनपने लगा था उसकी भनक शास्त्री जी को पहले से ही थी। कई बार उनके बच्चों को कई कुछ उल्टा सीधा बोला जाता। उनकी लड़कियों और औरतों को तंग करने की भी छुट-पुट घटनाएं सामने आई थी परन्तु शास्त्री जी का जो सम्मान और प्रतिष्ठा पंचायत और परगने से लेकर दूर-दूर तक थी, वही हर बार कहीं न कहीं उस परिवार का कवच बन जाया करती थीं। कुछ ऊसरमति लोगों ने एक दो बार शास्त्री जी को चेता भी दिया था कि इस तरह गांव में मुस्लिम परिवार का रहना अच्छा नहीं है… अब पहले की तरह ज़माना तो नहीं रहा… देश में इतनी घटनाएं हो रही है… शास्त्री को समय रहते कुछ कर देना चाहिए ? वे इन बातों को अनसुना कर देते थे। परन्तु एक डर अवश्य ही उनके भीतर घर कर गया था जिससे वे हमेशा परेशान रहने लगे थे।


शास्त्री जी इस प्रश्न को देश में घटी कई घटनाओं से जोड़कर भी देख रहे थे। कुछ दिनों से जिस तरह कई जगह सांप्रदायिक घटनाएं, भेदभाव और कुछ हत्याओं के समाचार आ रहे थे वे उन्हें विचलित करने लगे थे। उनके मन से अभी तक दाभोलकर, पंसारे और प्रो. कलबुर्गी की हत्याओं के प्रतिबिंब नहीं गए थे कि गाय की तस्करी के आरोप में जैसे पहलू खान और कई अन्य निम्नवर्ग के लोगों को मारा गया और गौरक्षकों ने कई वारदातों को अंजाम दिया, वे घटनाएं उन्हें भीतर ही भीतर कचोट रही थी। गौरक्षा के नाम पर जो कुछ भी देश के कोने-कोने में होने लगा था वह उनके लिए आश्चर्य से कम नहीं था। वे इन घटनाओं को देशहित में नहीं देख रहे थे। वह चाहे असहिष्णुता के नाम पर बुद्धिजीवियों का पुरस्कार लौटाना हो, गाय के नाम पर मार-पिटाई या हत्याएं हों, धर्म और जाति के नाम पर राजनीति या पहले से ज्यादा बढ़ता आतंकवाद। या फिर देश पर सुधार और विकास के नाम पर जबरदस्ती थोंपे गए अनर्गल निर्णय।

परन्तु उनकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि उनके गांव का छोटा सा बच्चा क्यों इस तरह का प्रश्न पूछ रहा है…? उन्होंने यही सोचा था कि पन्द्रह अगस्त का समय इसका उत्तर देने के लिए उपयुक्त रहेगा क्योंकि उस दिन पंचायत के प्रधान और सदस्यों से लेकर स्कूल के बच्चों और मास्टरों सहित दूर-दूर से लोग भी आएंगे और बच्चों के परिवार वाले भी।

 शास्त्री वेदराम हिन्दू शब्द के मूल में जाना चाहते थे। जहां तक उन्हें याद है या जो शिक्षा उन्होंने अपने प्रख्यात विद्वान गुरू आचार्य शिवज्योति से प्राप्त की थी उन्होंने भी हिन्दू को कभी किसी जाति, पंथ या मत से नहीं जोड़ा था। उनकी कुछ पुरानी पुस्तकें उनके पास सुरक्षित थीं। शास्त्री जी का अपना पुस्तकालय भी बहुत समृद्ध था जहां कई बार दूर-दूर से विद्वान और शोध छात्र अध्ययन के लिए आते रहते थे। आज उनका पूजा करने का मन भी नहीं हुआ। उन्होंने झटपट घर के छोटे-मोटे काम निपटाए और अपने पुस्तकालय में चले गए। उस दिन उनका एक शोधछात्र भी अध्ययन के लिए वहां आया हुआ था। शास्त्री जी एक-दो दिनों से इसी बारे में उससे चर्चा भी करते रहते थे। वे पहले अपनी कुर्सी पर बैठे आंखें बंद करके काफी देर कुछ चिंतन करते रहे। फिर पुस्तकों की एक अलमारी खोल कर उसके समक्ष खड़े हो गए। उनकी याद्दाश्त इतनी तीव्र थी कि पुस्तक देखते ही उन्हें विषय या संदर्भ का पृष्ठों की संख्या सहित स्मरण हो जाया करता था।

उन्होंने पुस्तकों के मध्य से ऋग्वेद को निकाला और उसके पृष्ठ पलटने लगे। उन्हें 8, 24 और 27 ऋचाएं याद आईं। इन्हें निकाल कर दोबारा पढऩा शुरू किया। इनमें सप्तसिंधव: शब्द देश के अर्थ में प्रयुक्त हुआ था जबकि अन्यत्र सभी जगह इसका आशय सात नदियों से था। उन्हें इसी के साथ मैक्समूलर याद आए जिन्होंने इस शब्द से पंजाब की पांच नदियों के साथ सिन्धु और सरस्वती की उत्पत्ति को भी जोड़ा। उन्होंने ऋग्वेद को अपने स्थान पर रखा और अपने गुरू की भेंट की एक पुरानी पुस्तक निकाल ली। उसके एक अध्याय को पढ़ा जिसमें ईरान देश की सुपुरातन भाषा अवेस्ता में सिन्धु देश ‘हिन्दु’ के रूप में वर्णित था। उसमें द में छोटे उ की मात्रा थी बड़े ऊ की नहीं। वहां इसका अर्थ भारत था। उन्हें अचानक मुंशी नवलकिशोर प्रैस की एक पुस्तक-मसनवी मौलवी मानवी का पृष्ठ 167ए याद आ गया जिसका जिक्र उन्होंने पिछले दिनों अपने शोधछात्र से किया था। पुस्तक इतनी पुरानी थी कि उसके पृष्ठ हल्की सी हवा से भी बिखर जाएं। उसे निकाल कर वे कुर्सी पर बैठ गए और उसके पृष्ठों को देखने लगे। एक पर उन्हें यह पंक्ति मिलीं-‘चार हिंदू दर यके मस्जिद शुदंद, बहरे ताअत रा के ओ साजिद शुदंद।’ जिसका आशय है कि चार हिन्दू यानी हिन्दुस्तानी मुसलमान एक मस्जिद में गए और इबादत के निमित्त सिजदा करने लगे। शास्त्री जी इन पंक्तियों को बार-बार दोहराते रहे, पढ़ते रहे और अन्य विवरणों के साथ अपनी डायरी में नोट करते चले गए। फिर सोचने लगे कि क्या सप्तसिन्धु क्षेत्र के समस्त लोग प्राचीन काल में हिन्दू कहलाते थे जिसमें मुस्लमान भी शामिल थे…?

            शास्त्री जी विचार करने लगे कि फिर यह कैसे हो गया कि बहुत बाद इस्लाम धर्म की तुलना में भारतीय धर्म हिन्दू धर्म के नाम से संबोधित होने लगा जबकि हिन्दू नाम से कहीं भी किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। प्राचीन ग्रन्थों में तो केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि जातियां ही थीं। वे आश्चर्य में पड़ गए देखा कि पारसियों ने जब मुस्लिम धर्म स्वीकार किया तो अचानक हिन्दू शब्द उनके लिए काफिर, काला, लुटेरा और गुलाम कैसे हो गया…? शायद इसलिए ही प्राचीन भारतवासियों ने अपने को कभी हिन्दू न कह कर वैष्णव, शैव, शाक्त और सिख आदि से सम्बोधित किया होगा…?

उन्होंने उस पुस्तक को बहुत संभाल कर अपनी जगह रख दिया और पुन: अलमारी के समक्ष खड़े हो गए जहां कई पुराण और उपनिषद् थे, गीता, महाभारत, रामायण थीं, गुरू ग्रन्थ साहब, बाइबल और कुरान रखे थे। उन्हें कहीं भी कुछ ऐसा याद नहीं आया जहां हिन्दू धर्म और किसी ‘हिन्दुत्व’ शब्द की व्याख्या की गई हो। साथ-साथ वह उस शोधछात्र से भी बतियाते रहे जो संस्कृत साहित्य में पीएचडी कर रहा था। शास्त्री जी ने गीता को स्मरण किया जिसमें उन्हें जीवन का सार मिला जो मनुष्य को बेहतर जीवन जीने की प्रेरणा देता है। कुरान का सीधा अर्थ सकारात्मक था जिसमें नकारात्मक सोच या किसी कार्य को तवज्जो नहीं दी जाती। वहां कुर्बानी का अर्थ दान से लिया गया था यानी अपनी मेहनत की कमाई का कुछ हिस्सा गरीब को देने से जिसका तात्पर्य था। अल्लाह के नाम पर किसी तरह की जिहाद वहां नहीं थी। इसी मध्य उस शोधछात्र ने उनके विचारों को और पुष्ट करते हुए जोड़ा कि कुरान में जीव हत्या, व्यर्थ आघात पहुंचाना, जल और पेड़ों को क्षति पहुंचाना पाप माना गया है। वहां स्नेह के लिए बड़ा स्थान है आतंक के लिए नहीं। उसने शास्त्री जी को अब बाइबल निकाल कर दे दी थी और वे उसके पन्ने पलटने लगे थे। उन्हें हर पन्ने से अथाह प्रेम की सुगन्ध आती महसूस हुई। भलाई की गंध आती मिलीं। भाईचारे के संदेश और एक दूसरे के प्रति आदर और स्नेह की आवाजें सुनाई देने लगी। उन्होंने किताब को उसी स्नेह से वापिस उसकी जगह रख दिया।

उनकी नजर अब गुरू ग्रन्थ साहिब पर टिक गई थीं। उसमें लिखे उपदेश याद आने लगे थे। कई हिन्दू संत और अलग-अलग धर्मों के मुस्लिम भक्तों की वाणियां स्मरण होने लगी थीं। कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणियां कितनी बार उन्होंने कायक्रमों में गाईं है। और वे हैरान थे जब उन्हें पांचों वक्त नमाज पढऩे वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरू ग्रंथ साहिब में दर्ज मिलने का स्मरण हो आया था। वे पुन: कुर्सी पर आसीन हो गए और आंखें बंद करके मनन करते रहे कि फिर हम से कहां चूक हो गई कि आज हर धर्म में कट्टरता पसर गई है। नफरत घुस गई है। स्वार्थ जहां सर्वोपरि हो गया है। इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं रही है। वे तकरीबन आधे-पौने घण्टे तक इन्हीं विचारों में खोए रहे थे। उन्हें वह मुस्लिम परिवार और उनका बच्चा बदरू बार-बार याद आते रहे और कुछ लोगों की हिदायतें मन में उछालें मारने लगीं कि ‘शास्त्री जी गांव में मुस्लिम परिवार का इस तरह रखना संगत नहीं…… जमाना पहले जैसा नहीं है।’ वे यह सोचते झटके से उठे और मेल पर पड़ा पानी का गिलास खड़े-खड़े गटक गए।

उनकी पत्नी काफी देर से दरवाजा खटखटा रही थी कि देर बहुत हो गई है, अब खाना खा लें। शास्त्री जी अपनी अलमारी खुली छोड़ कर पत्नी के साथ रसोईघर में चले गए थे। साथ उनका शोधछात्र भी था। पत्नी को उनके चेहरे पर चिंताओं की रेखाएं दिख रही थी। उन्होंने जब पूछा कि तबीयत तो ठीक है, शास्त्री जी ने सर हिला कर ही अच्छी होने का संकेत दिया था। आज उनका खाना खाने का मन नहीं था। फिर भी जैसे-कैसे उन्होंने थोड़ा सा भोजन किया और अपने कमरे में लौट आए। इसी बीच उस शोधछात्र ने उन्हें अलमारी से निकाल कर कबीर की एक पुस्तक थमा दी थी। उनका ध्यान अब कबीर के दोहों और उनके समय पर केन्द्रित होने लगा था। उन्हें एकाएक स्मरण हो आया कि कबीर के समय में हिन्दू-मुसलमान का आपसी विरोध चरम पर था। इंसानियत का धर्म त्याग व भूल कर दोनों वर्ग बनावटी विभेदों द्वारा उतेजित होकर अधर्म करने लगे थे। कबीर ने दोनों को आपस में मिलकर रहने के लिए सर्वधर्म की भूमिका निभाई। शास्त्री जी को उनके श्लोक/दोहे याद आने लगे……..

कह हिंदू मोहि राम पियारा, तुरूक कहै रहिमाना।

आपस में दोउ लरि मूए, मरम न काहू जाना।

उन्हें लगा जैसे कबीर बिल्कुल आज ही की बात कर रहे हो। उन्होंने अपने कालखण्ड में भी धर्मों और संप्रदायों के अंतर्विरोधों, हिंदू वर्ण व्यवस्था और मत-मतांतरों की विकृतियों को पुरजोर ढंग से उजागर किया था। उन्हें फिर एक दोहा स्मरण हो आया था,

एक बूंद एक मल मूतर, एक चाम एक गूदा।

एक जोत थैं सब उतपन, कौन ब्राह्मण कौन सूदा।

शास्त्री जी की नजर कबीर के बाद सावरकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय, महात्मा गांधी, नेहरू और जिन्ना से सम्बन्धित कुछ पुस्तकों और उनकी जीवनियों पर गईं। बहुत सी चीजें स्मरण हो आईं। उन्होंने कुछ देर के लिए फिर अपनी आंखें बंद कर लीं। विकट अंधेरे में  भारत विभाजन के समय में चले गए जब काफी बड़ा नरसंहार हुआ। फिर उन्हें महात्मा गांधी की हत्या की याद आई और वे चुपचाप कुर्सी पर बैठ गए। कमरे में उन्हें भारी उमस और घुटन महसूस हुई तो उन्होंने आर-पार की दोनों खिड़कियां खोल दीं। मेज पर रखे पानी के जग से तकरीबन दो-तीन गिलास खड़े खड़े गटक लिए और दिमाग में चल रही असंख्य घटनाओं को शिथिल करने का प्रयास करते रहे। तभी एक जुगनू ने भीतर प्रवेश किया और वे उसे बहुत देर तक देखते रहे। उसी जुगनू ने उन्हें 1947 की याद दिला दी जब देश आजाद हुआ था। कल वे उसी आजादी की 70वीं वर्षगांठ मनाएंगे और उस बच्चे की बातों का भी उत्तर देंगे जिसने उनसे पूछा था कि हिन्दू क्या होता है।

जैसे ही वह जुगनू बाहर गया, उनके आसपास का अंधेरा फिर गहराता चला गया। उन्हें पहले 1951 का वर्ष और श्यामा प्रसाद मुखर्जी याद आए और बाद में अचानक 1992 का वह महीना और तारीख स्मरण हुई जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद को हजारों लोगों की भीड़ ने ढाह दिया था। फिर अनेक घटनाएं शास्त्री जी के मस्तिष्क में कौंधती रही और वे सीधे 2014 में सोहलवीं लोक सभा में पहुंच कर 26 मई, 2014 के दिन में चले गए जब भारत को 15वां प्रधान मंत्री मिला था। शास्त्री जी धीरे-धीरे उठे। घड़ी पर नजर गई तो साढ़े बारह बजे का समय हो रहा था। तमाम घटनाओं को अपने भीतर संजोए उन्होंने सोने का प्रयास किया और बहुत देर बाद उनकी आंख लग गईं।


झंडा फहराने के लिए जहां लोहे की पाइप लगाई गई थी उसके आसपास फूलों की पंखुरियां सजाते कुछ बच्चों के साथ जैसे ही शास्त्री वेदराम की नजर स्कूल के गेट पर गई तो उन्होंन�� देखा कि वहां दो बच्चे सहमे हुए सिसक रहे थे। उनके सिर मुंडे हुए थेे और बीच में चोटियां बना दी गई थी। इस कारण उन्हें पहचान पाना कठिन था। उनकी सिसकियों ने शास्त्री जी को भीतर तक आहत कर दिया। वे काम छोड़ कर उनके पास जैसे ही गए तो स्तब्ध रह गए। बच्चे उनकी कक्षा के बदरू और आलम थे। शास्त्री जी को देख कर दोनों फूट-फूट कर रो दिए। उन्होंने दोनों को बड़े दुलार से अपनी छाती से भींच लिया और कमरे में ले आए। मैदान में और बच्चे और कुछ पंचायत के लोग भी मौजूद थे जो इस दृश्य को देखकर स्तब्ध रह गए। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है ?

 शास्त्री जी ने उन दोनों को पानी पिलाया और बहुत प्यार से अपने पास बिठा लिया ताकि उनका डर कम हो सके। बच्चे अभी भी ऐसे कांप रहे थे मानों बाहर माघ बरस रहा हो। शास्त्री जी ने उन्हें सारी घटना बताने के लिए कहा। पहले तो डर के मारे बच्चे कुछ नहीं बोल पाए परन्तु उनके प्यार और आश्वासनों ने उनके भीतर का डर थोड़ी देर में निकाल दिया था। बच्चों ने बताया कि जैसे ही वे गांव के चौराहे पर आए, अनु और बधीर भैया ने उनको पकड़ लिया और एक गौशाला में ले गए। वहां गांव का टेकराम हाथ में उस्तरा लिए बैठा था। उन्होंने डरा-धमका कर हमारे बाल काट दिए और डराया कि यदि हम उनका नाम लेंगे तो वे उसी उस्तरे से हमारे गले काट देंगे। उन्होंने हमारे गले में ये रंगीन पट्टियां भी बांध दी और कहा कि अब वे हिन्दू हो गए हैं और सीधे स्कूल चले जाएं।

शास्त्री जी यह सुन कर हक्के-बक्के रह गए। अनु और बधीर दोनों उन्हीं के परिवार के थे। एक पल के लिए वे उन दोनों लड़कों के अतीत और वर्तमान में चले गए। अनु जिसका पूरा नाम अनुरथ पंडित था, पिछले साल ही समाजशास्त्र में पीएच.डी. की थी और बधीर पाठक ने एम.बी.ए. की डिग्री ली थी। लेकिन जब से वे दोनों गांव में आए थे, राजनीति में उनकी रूचि बढऩे लगी थी और वर्तमान सरकार के कई नेताओं से उनके अच्छे सम्बन्ध भी बन गए थे। पिछले एक साल से यानी जब से प्रदेश में सत्ता परिर्वतन हुआ था, शास्त्री जी को उनके रंग-ढंग बदले-बदले से लगे थे। कहां तो उन्हें अच्छी नौकरी के लिए प्रयास करने चाहिए थे और कहां वे राजनीति के दलदल में फंंसते चले जा रहे थे। शास्त्री जी ने कई बार उन्हें समझाया भी था परन्तु दोनों उनकी बातें कानों के पीछे डाल देते थे। लेकिन किसी ने सोचा भी नहीं था कि वे गांव में कोई इस तरह की घिनौनी और असंस्कारित हरकत भी कर सकते हैं।

शास्त्री जी इस घटना से आग-बबूला हो गए थे। इस बीच पंचायत प्रधान, अन्य स्कूलों के अध्यापक और बच्चे तथा गांव के कई सेवानिवृत्त और प्रतिष्ठित लोग भी पहुंच गए थे। शास्त्री ने समारोह रोक दिया था। जैसे-जैसे लोगों को इस घटना की भनक लगी, धीरे-धीरे अन्य लोग भी स्कूल में इकट्ठे होते चले गए। बदरू और आलम के परिवार को भी इस घटना की सूचना पहुंच गई थी और वे भी बदहवास से पहुंच गए थे। इससे पहले कि उन बच्चों के परिवार वाले विरोध में कोई प्रतिक्रिया देते, शास्त्री जी ने स्वयं ही यह ऐलान कर दिया था कि इस कृत्य की सजा उन दोनों लड़कों को आज ही इसी मैदान में दी जाएगी ताकि दोबारा कोई इस तरह की हरकतें गांव में न करे। उन्होंने दोनों लड़कों का पता कर लिया था कि वे कहां गए हैं। बधीर के पास गाड़ी थी जिसमें वे दोनों निकल गए थे। इसलिए शास्त्री जी ने उनके रास्ते की पुलिस चौकी को इस घटना की सूचना दे दी थी जिससे पुलिस वालों ने नाका डाल कर उन दोनों को दबोच लिया था और पकड़ कर स्कूल ले आए थे। सिर मूंडने वाले टेकराम को भी कुछ लोगों ने स्कूल पहुंचा दिया था।

अनु और बधीर को पूरा विश्वास था कि अल्पसंख्यक बच्चों के साथ हुए इस कृत्य को उनकी बिरादरी बहादुरी का काम मानेगी लेकिन उन्होंने सोचा भी नहीं था कि उनके अपने ही घर के शास्त्री जी खुद उन्हें पुलिस से पकड़वा देंगे। वे दोनों जैसे ही शास्त्री जी के सामने आए, उन्होंने बिना कुछ पूछे उनकी धुनाई शुरू कर दी। लातों-घूंसों से तो पिटाई हुई ही, उनके हाथ एक डंडा भी लगा जिससे उन्होंने उनको इतना मारा कि वे अधमरे से हो गए। शास्त्री जी को इस तरह आक्रामक और गुस्से में किसी ने कभी भी नहीं देखा था। वे गांव, पंचायत, परगने और स्कूलों में विनम्रता की एक मिसाल समझे जाते थे। यद्यपि ब्राह्मणों और ठाकुरों के लिए यह कोई बड़ी घटना नहीं थी जिन्होंनें इसे महज एक शरारत के रूप में ही लिया था परन्तु शास्त्री जी इसे देश के पूरे परिदृश्य में मजहबी वैमनस्य और धर्मांतर के नजरिए से देख रहे थे।

जिसने उन दोनों लड़कों के बाल काटे थे उससे उस्तरा बरामद कर लिया था और शास्त्री ने पुलिसवालों के सामने ही दो-चार उसे भी धर दिए थे। बाकि की कसर बच्चों के माता-पिता ने पूरी कर ली थी। प्रधान और शास्त्री के परिवार के लोग इस बात को अब यहीं समाप्त करना चाहते थे लेकिन शास्त्री जी इस हक में कतई नहीं थे और उन्होंने स्वयं इसके खिलाफ शिकायत पत्र लिखकर पुलिस वालों को दे दिया था। गांव की बात गांव तक रहे इसी के दृष्टिगत पंचायत प्रधान और अन्य प्रतिष्ठित लोगों ने शास्त्री जी को इस बात पर मना लिया था कि दोनों लड़के और बाल काटने वाले से लिखित माफी पुलिस और प्रधान की मौजूदगी में ले ली जाए। तीनों से माफीनामे ले लिए गए जिसकी तीन प्रतियां बनी और एक-एक प्रति स्कूल, पंचायत तथा पुलिस के पास रखी गई ताकि भविष्य में ऐसी किसी घटना की पुनरावृत्ति न हो सके। शास्त्री जी का यह कहना भी था कि इसके लिए दोनों लड़कों के परिवार बच्चों को बतौर दंड कुछ राशि भी दें जिसे बच्चों के माता-पिता ने लेने से मना कर दिया था। शास्त्री जी ने आज के दिन को एक गांव के काले दिन के रूप में परिभाषित किया था और झंडा लहराने से साफ मना कर दिया था। लोगों ने इसका भी विरोध किया था परन्तु उन्होंने साफ कर दिया कि इस घटना को देखते हुए स्कूल में कोई भी कार्यक्रम नहीं होगा। यदि पंचायत या लोग चाहते हैं तो वे किसी दूसरे स्कूल या जगह पर आयोजित कर सकते हैं। इस निर्णय के आगे किसी का कोई वश नहीं चला था।

धीरे-धीरे स्कूल प्रांगण से लोग जाने लगे थे। बच्चे भी बिना आजादी का जश्न मनाए खाली हाथ घर लौट आए। इस घटना ने जैसे स्कूल और पूरे गांव में मातम का जैसा माहौल बना दिया था। तरह-तरह की बातें और अलग-अलग प्रतिक्रियाएं करते-देते लोग अपने-अपने घरों को निकल लिए थे। किसी का भी मन नहीं था कि किसी पाठशाला में अब पन्द्रह अगस्त का कोई आयोजन हो। …परन्तु कुछ लोग इस मुद्दे को जानबूझकर भड़काने और राजनीतिक लाभ अर्जित करने की फिराक में थे।


स्कूल में अब शास्त्री और बच्चों के परिवार वाले शेष रह गए थे। हालांकि सबकुछ शांतिपूर्वक निपट गया था परन्तु शास्त्री जी का गुस्सा अभी भी शांत नहीं हुआ था। स्कूल से अन्य मास्टर भी निकल लिए थे। केवल चपड़ासी ही रूका हुआ था जो हमेशा उनके बाद स्कूल बंद करके जाता था। शास्त्री जी को पता नहीं क्या सूझा। उन्होंने चपड़ासी को पुकारा और अपने कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा कि नई किताबों के जो बंडल पड़े हैं उन्हें बाहर ले आए। ये किताबें बदले हुए पाठ्यक्रमों की थी। उसकी समझ में कुछ नहीं आया। आदेशों का पालन करते हुए वह उन्हें बाहर ले आया। शास्त्री जी ने उन्हें बीच मैदान में रखने को कहा और उसने वैसा ही किया। शास्त्री जी के दराज में नए सर्कुलरों की एक फाइल भी थी जिसे भी उन्होंने मंगवा कर उसी ढेर के ऊपर रखने को कहा। इसके बाद चपड़ासी से मिट्टी के तेल की गेलन मंगवाई। इस तेल का प्रयोग रसोईया दिन के भोजन के लिए आग जलाने में किया करता था।

किसी की कुछ समझ नहीं आ रहा था कि शास्त्री जी क्या कर रहे हैं ? शास्त्री जी जैसे ही गेलन उठाकर किताबों के बंडलों की ओर बढ़े, दोनों बच्चे बदरू और आलम उनके पीछे-पीछे हो लिए। चपड़ासी और बच्चों के परिवार वाले दूर से इस दृश्य को देख रहे थे। शास्त्री जी ने मिट्टी के तेल की पूरी गेलन बंडलों पर छिड़का कर उसे भी वहीं फैंक दिया। फिर चपड़ासी को आवाज लगाकर माचिस मांगी। उसने जैसे ही माचिस दी शास्त्री ने तिल्ली निकाल कर जलानी चाही तो नजर दोनों बच्चों के मुंडे सिर और चोटी पर ठहर गई। बच्चे एकटक शास्त्री को देख रहे थे और उनकी आंखों में आज भी वही अनुतरित प्रश्न कौंध रहा था जिसे केवल व केवल शास्त्री वेदराम सुन सकते थे।

उन्होंने माचिस की तिल्ली जलाई और किताबों के ढेर पर फैंक दी। आग का भभका काले धुंए के साथ आसमान की ओर ऐसे उठा मानो उसे जला कर भस्म कर देगा। फिर फुर्ती से मुड़े और अपने कमरे से अपना झोला उठा कर जाने लगे। चपड़ासी और बच्चों के परिवार ने जब उनकी तरफ देखा तो लगा कि मैदान से ज्यादा आग तो उनकी आंखों में जल रही है। बच्चे अभी भी उसी प्रश्न के साथ एक किनारे खड़े थे।

‘शास्त्री के कानों में फिर वही प्रश्न गूंजा,

गुरूजी! गुरू जी! हिन्दू क्या होता है…?’

उनके पावं रूक गए। पीछे मुड़े तो देखा बदरू और आलम खड़े थे। एक मन किया कि कमरे से शीशा मंगवा कर उन दोनों को उनकी ही शक्लें दिखाएं और कहें कि ये होता है पर उन्होंने अपने को संयत कर लिया। एक नजर आग की लपटों की ओर दी और सीधी उंगली उस पर तान दी, जैसे कह रहे हो कि यही होता है … और चुपचाप गेट से बाहर निकल लिए।

दोनों बच्चे, उनका परिवार और चपड़ासी स्तब्ध खड़े एकटक भभकती आग को देख रहे थे।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जनवरी-अप्रैल, 2018), पेज- 8  से 13

 

Advertisements