हमें लिखो

स्याह न हो
आने वाले दिन
कवि ! इन दिनों के बारे में जरूर लिखो

सबको मिले न्याय
और सब हो अलहादकारी
भेदभाव मिटे, कवि कुछ ऐसा लिखो

कुछ इस तरह गुनगुनाओ
कि होठों में ही दबी न रह जाए
मजलूमों की आवाज

गाओ अब इनके झमेले
कवि अब ऐसे गीत सुनाओ
तुफां उठे दिलों में हमारे
आंखों से खूं के आसूं बरसाओ
ये जुल्म करने वाले बदलें
न रहे इस धरा पर
मनुष्यता का ऐसा गीत सुनाओ

कवि कुछ ऐसा लिखो
कि आंख हमारी खुल जाएं।

गाम के पान्ने

गांव-मुहल्ले, कस्बे-शहर
अगड़-बगड़ में बसी मरोड़
पड़ोस के तान्ने, पास के पान्ने
बसे सरिक्के-कुणबे होड़
जलण में फुकते, राख फांकते
धूल उड़ाते, गोहर टेढ़े
घास-फूंस न्यार ने जारी
घर की रोणक नारी
सब कुछ सहती
यह घर का गहना
गम आए तो दुखों में बहना
दोष मढ़ें हम उस पे भारी
कस्बे शहर, गाम-मुहल्ले
उजले होते इनसे सारे।

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