खबर मिली मुझे, सृजन उत्सव की

नफीस अहमद  मुबारक

खबर मिली मुझे, और मैं उत्सव में चला आया।
सैनी जी ने कॉल कर, उत्सव से अवगत कराया।।
सृजन से कराया अवगत, मैंने राह मेवात से पकरी।
गुरु सिद्दीक मेव संग, जा पंहुचा धर्मनगरी।।

पंहुचा धर्मंनगरी, मैंने पिछले उत्सव से बेहतर पाया।
देख साज–सज्जा प्रांगण की, मन फूला न समाया।।
हम फुले ने समाये, देखी पेंटिंग और चित्रकारी।
हर पहलू ध्यान से देखा, तब सुन्दरता निहारी।।

हर सजावट निहार कर, ज्यों हि आगे कदम बढाया।
कैहरबा जी ने मधुर वाणी से, स्वागत कराया।।
मधुर वाणी से स्वागत कराया, फिर पंजीकरण की राह दिखाई।
प्रपत्र भरकर हमने अपनी, उपस्थिति दर्ज कराई।।

उपस्थिति दर्ज कराकर, पंजीकरण समूह ने ख़ुशी जताई।
फिर पुस्तक प्रदर्शनी पर, अपनी नजर घुमाई।।
हमने नजर घुमाई, देखा प्रकाशन ज्ञान-विज्ञान।
गार्गी दिल्ली के नये अंक देखे, वही मौजूद था अभियान।।

प्रदर्शनी से फारिग होकर, देखा, हैं चका-चोंध सभागार।
जन उपस्थिति अनुसार, विशाल व भव्य था आकार।।
विशाल था आकार, अच्छा था बैठने का इंतजाम।
देखी टीम की कार्यशैली, सुनियोजित थे सभी काम।।

जन सैलाब उमड़ पड़ा, लेखक, रंगकर्मी, कवि और छात्र।
सृजन उत्सव का उद्घाटन, करते मिले सुरजीत पातर।।
मिले सुरजीत पातर, हमने अपना स्थान ग्रहण किया।
उनके वक्तव्य ने, सब का मन मोह लिया।।

मन मोह लिया, और साहित्य से परिचित कराये।
पातर जी ने सृजन उत्सव को, चार चाँद लगाये।।
चार चाँद लगाये, यशपाल जी ने शोभा बढ़ाई।
मंच संचालन में अविनाश सैनी ने, अपनी भूमिका बढ़ाई।।

सायंकाल में आरम्भ हुआ, जिसका था बेसब्री से इंतजार।
कवि सम्मलेन में था जोश, ठहाको से गूंज पड़ा सभागार।।
गूंज पड़ा सभागार अचानक, पसर गया सन्नाटा।
शैतानी कर बिजली भागी, कर गयी सबको टाटा-टाटा।।

कवि जनों का उत्साह न घटा, दर्जनों ने कविता सुनाई।
ज्वलंत मुद्दों पर लगभग, सभी ने अपनी कलम चलाई।।
अपनी कलम चलाई, कलम को हथियार बनाया।
‘बिकी हुई कलम’ का, मतलब आज समझ आया।।

आज समझ आया, स्त्री-पीड़ा का समाधान।
बेबाक कवयित्री देखी, कलाम उनका था महान।।
शोचनीय कविता उनकी, सीधा किया प्रहार।
पाखंड, जुनैद, घोटालों पर भी, बेबाक थे विचार।।

कवि सम्मलेन से फारिग होकर, कार्यक्रम आगे बढाया।
भारत विभाजन का सजीव दृश्य, कलाकारों ने कराया।।
कलाकारों ने समां बांधी, अनसुनी-अनदेखी घटना दिखाई।
‘रजिया की डायरी’ से, आँखे मेरी भर आई।।

विभाजन नहीं कयामत थी, गोरों ने जहर ये घोला।
‘रजिया की डायरी’ ने, त्रासदी का राज ये खोला।।
बेबाक राज ये खोला, रजिया की टीम थी धांसू।
देख त्रासदी विभाजन की, मेरे उमड़ पड़े आंसू।।

प्रस्तुति उपरांत महोदय ने, मण्डली का कराया परिचय।
देश को योगदान देने हेतु, किया ‘मुबारक’ ने निश्चय।।
किया मैंने निश्चय, कुछ कर गुजरने की ठानी।
करू अर्जित ज्ञान सुभाष जी से, गुरु सुभाष मेरे ज्ञानी।।

गुरु सुभाष मेरे ज्ञानी, संभाली उत्सव की बागडोर।
उनके कुशल नेतृत्व से, खुशहाली थी चारों और।।
उल्लास था चारों और, अच्छा किया प्रबंधन।
चाय नाश्ता संग खाकर, स्वादिष्ट लगा भोजन।।

नए गुरुजन मिले, उत्सव बना पाठशाला।
शयन – स्नान की बढ़िया सुविधा, ऐसी सैनी धर्मशाला।।
अच्छी लगी धर्मशाला , बतियाते कैहरबा संग बीती रात।
खुली आँखें ब्रह्मसरोवर चले, बजे सुबह के सात।।

समय पर कार्यक्रम आरंभ हुआ, नोनीहालों ने नब्ज टटोली।
‘छोटा पैकेट बड़ा धमाका’, ये थी अभिनव टोली।।
ये थी अभिनव टोली, ज्ञान की गंगा बहाई।
‘बचपन एक खोज’ ने, अपनी धूम मचाई।।

प्रस्तुति निरंतर थी, बिजली ने आंख दिखाई।
नन्हे कलाकरों ने, अपनी आवाज बढाई।।
अपनी आवाज बढाई, पूरा दिया संदेश।
‘गुड टच – बेड टच’ और, 1098 किया पेश।।

अभिनव टोली उपरान्त, कैहरबा ने मंच संभाला।
बाईज्जत कासनी जी, सिद्दीक मेव को दिया बुलावा।।
दिया अपना बुलावा, कासनी जी ने गंगा-जमुनी तहजीब बताया।
सिद्दीक मेव ने, मेवाती संस्कृति और उसका इतिहास बताया।।

‘संस्कृति के विविध रंग’ बाद, मंचासीन थे दुष्यंत कुमार।
मंजुल भरद्वाज के सवांद से, बदले मेरे विचार।।
बदले मेरे विचार, और 25 वर्षों का अनुभव बताया।
“क्या रहा तेरी नाटक-वाटक का”, ने मंजुल को आगे बढने को उकसाया।।

सुरेन्द्रपाल की अगुवाई में, सृजन की चुनौतियों को उठा लिया।
सदस्य थे योगेन्द्र यादव, टी आर कुण्डू, आर आर फुलिया।।
आर आर फुलिया और यादव जी ने, महत्वपूर्ण बातें बताई।
सभी ने अपने वक्तव्य में, सृजन की चिंताएं जताई।।

मीठी-मीठी हवा के साथ,मिली रिमझिम बूंदों की फुहार।
प्रदर्शनी की बढ़ी मुश्किलें, सभागार में पहुंचे जाकर।।
सभागार में पहुंची स्टालें, वहीं अपनी जगह बनाई।
खुशमिजाजी मौसम ने, अब थोड़ी ली अंगड़ाई।।

ज्यों-ज्यों वक्त बीता कार्यक्रम भी, बढ़ता चला गया।
युवा दिलों की धड़कन, यशपाल जी मंच पर पहुँच गया।।
मंच पर पहुँच गया, सुनाये मीठे बोल।
श्रोता मंत्रमुग्ध हो गए, कानों में दी मिश्री घोल।।

मलखान सिंह के संवाद ने, विषय पर चिंता जताई।
‘दलित जब लिखता हैं’ पर, जयसिंह ने की अगुवाई।।
जयसिंह ने की अगुवाई, सभी ने रखे अपने विचार।
सब का एक ही मंथन, कैसे बेहतर हो यह संसार।।

गलत लिखे की क्षमा चाहूँ, चाहूँ सब भला की आस।
स्वर्ण अक्षरों में लिखा जायेगा, नाम डॉ. सुभाष।।
नाम डॉ. सुभाष और अपनी ‘देस हरियाणा’।
‘मुबारक’ धर्मनगरी पर रहेगा, तेरा आना-जाना।।

कुछ भूला कुछ कर दिया, सृजन उत्सव तेरा बखान।
भ्रांतियां दूर हुई, ताजा कर दिया मेरा ज्ञान।।
बढ़ा दिया मेरा ज्ञान, ‘मुबारक’ कलम कू देवे विराम।
जग में अमिट रहेगा, ‘देस हरियाणा’ तेरा नाम।।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज -59-60

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