मुकेश यादव

संतोष कुमारी उर्फ मुकेश यादव का जन्म झज्जर जिले के सिसरौली गांव में 2 जून, 1967 को। साक्षरता अभियान तथा सामाजिक-परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय भागीदारी। महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में कहानी व लेख प्रकाशित। रागनी लेखन व गायन में विशेष रुचि। हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ की राज्य उप-प्रधान। वर्तमान में सोनीपत जिले के सिसाणा गांव में संस्कृत प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत।

1

हे जी हे जी बदन म्हं गहरी बेदन छाई
आधी जिन्दगी बीत गई, मेरै ईब समझ म्हं आई

देश नै आजाद बतावैं, या जिन्दगी मेरी गुलाम क्यूं
दसवीं तक पहल नम्बर थी, कटग्या मेरा नाम क्यूं
कुरड़ी का धन कहैं छोरी नै, यू जीणा मेरा हराम क्यूं-2
गोबर गेरूं धार काढ़ लूं, फेर पाणी के ल्यावूं मैं
झाड़ू पोचा करकै नै, रोटी टूका निपटाऊं मैं
दाती पल्ली ठाकै नै, फेर न्यार नै जाऊं  मैं-2
मेरी मेहनत का कोए खात्ता ना, या कित जा मेरी कमाई

पढ़-लिखकै के काढ़नी, तू सूह्र सीख ले घर का हे
सारी जिन्दगी कहण पुगाणा हो सै, ब्याहे बर का हे
जो लिख राख्या वो मिल ज्यागा, ताज तेरा वो सिर का हे-2
टूम-ठेकरी दान-दहेज दे, सासरै खंदावण लागे
डोळी अर्थी की एक देहळ हो, चलती नै समझावण लागे
पतिव्रता का धर्म निभाइये, खोलकै बतावण लागे-2
हे उड़ै किसा मेरा होवै था स्वागत, घूंघट म्हं लिपटाई

सासरे म्हं जाकै नै, बड़ी मुश्किल पैर जमाणे हो
बड़े-छोटे घर कुणबे के, सारे फर्ज पुगाणे हो
दान-दहेज और लेण-देण के, सौ-सौ ताने खाणे हो-2
ताना-बाना इसा कसूता, समझ मेरी ना आई हे
किसै की भाभी किसै की काकी, किसै की बणगी ताई हे
पहचान मेरी तै गुम होगी, कितै मैं ना ढूंढी पाई हे-2
अड़ै जात-गोत और नाम बदल दें, कहैं मरदां गेल लुगाई

कोथली संदारे देकै, अपणा फर्ज पुगाण लागे
दूसर-तीसर छुछक देकै, स्यान सा जताण लागे
भात तक आते-आते, आंख-सी दिखाण लागे – 2
छोरी धरती देती ना, ये कर रे रोज मुनादी हे
कई करोड़ की धरती थी, भाईयां कै नाम करा दी हे
उस दिन भी दोनूवां ना मिलकै, एक-ऐ तीळ सिमादी हे- 2
कित-कित मारैं रोज रोळ ये, ‘मुकेश’ करै कविताई

2

पैंसठ साल की आजादी म्हं, पूछे नहीं सवाल सुणो
तेरे टूटे लीतर पाट्या कुड़ता, क्यूं होग्या फटे हाल सुणो

भरी दोपहरी म्हं खेत कमाया, भरकै पेट कदे खाया ना
दिन-रात तन्नै मील चलाया, तन पै कपड़ा पाया ना
भट्ठे पै लाखां ईंट काढ़ दी, घरां खोरिया लाया ना
कमा-कमा कै हाड गाळ दिये, कदे जुड़ी धन-माया ना
ठाली बैठ्यां का सैंसक्स चढऱ्या, होर्या किसा कमाल सुणो

अनपढ़ सादा माणस था, थारी चाल समझ म्हं आई ना
भेड़ा के म्हं मिले भेडिय़े, या खाल समझ म्हं आई ना
थारे चाल-चरित्र कई ढाळ के, या ढाळ समझ म्हं आई ना
गिणता-गिणता लहर भूलग्या, या झाल समझ म्हं आई ना
महंगाई बेरोजगारी का, आया किसा भूचाल सुणो

धोळपोश अड़ै कई तरहां के, चूसैं खून गरीबां का
मन्दिर म्हं जाकै टाल बजावै, कहरे खेल नसीबां का
जग बीती ना कहर्या सूं, यो कहर्या हाल करीबां का
जात-धरम और गोत-नात के, बुणरे जाळ फरेबां का
तेरे एक ठर्रे म्हं ढूंढ उजड़ज्या, वे व्हिस्की पी मालामाल सुणो

गरीब अमीर की यारी ना हो, कहती दुनिया सारी रै
करमां का यो लेख बता कै, म्हारी अक्कल मारी रै
कट्ठेहोकै सोच जरा, ओ दुनिया के नर-नारी रै
अपणे हक म्हं लडऩे का, एलान करो तुम जारी रै
कह ‘मुकेश’ तू चेत साथिया, माच्चै फेर धमाल सुणो

3

मेहनतकश क्यूं पड्या भ्रम म्हं, गया बख्त कदे ना आया
धरती बिकज्या बाळक रूळज्यां, लुट ज्यागी तेरी धन माया

सेज-सेज के रूक्के पडऱ्ये, यो नम्बर वन हरियाणा रै
‘एजुकेशन हब’ के नाम पर, राई कुण्डली जाणा रै
परमाणु संयंत्र घणा जरूरी, गोरखपुर म्हं लाणा रै
थर्मल पावर बणा झाड़ली म्हं, खुसग्या मेरा ठिकाणा रै
सौ तै ऊपर सेज बणा दिए, तेरे बांटै के आया

नई-नई कम्पनी आवैं रोज ये, तेरी धरती हथियावण नै
सनसिटी ओमेक्स पाश्र्वनाथ ये, सुन्दर नगर बसावण नै
धरती गई तै रोजगार रह्वै ना, टूक म्यलै ना खावण नै
रिश्तेदारी बिखरैगी रै कितै जगहां रहवै ना जावण नै
इनके बढ़ते रोज करोड़ां, तेरै टोटा क्यूं आया

चौर-चौर मौसेरे भाई, या जाणै दुनियां सारी रै
अम्बानी बन्धु टाटा बिड़ला, ये माणस सैं सरकारी रै
धरती खोसण का कानून, या उनके हक म्हं ल्यारी रै
सस्ती लें और महंगी बेचैं, सरकार दलाली खारी रै
जात-धर्म पै वोट दे दिए रै, झूठा जयकारा लाया

किसकै भरोसै बैठ्या बावळे, या बाड़ खेत नै खाण लगी
पुरख्यां की धरती तेरी विरासत, आज हाथ तै जाण लगी
फूट डाल कै राज करो, या अंग्रेजां आळी बाण लगी
कट्ठेहोकै लडऩा होगा, या सर करड़ाई आण लगी
कह ‘मुकेश’ बर्बादी होज्या, जै आज होश म्हं ना आया

4

कर दिया कत्ले आम तन्नै क्यूं कुणबा घाणी करदी
जार्ज बुश बेइमान तन्नै या बुरी कहाणी करदी

सारी दुनिया जाणै सै रै या, लोकतन्त्र की जंग कोन्या
तेल के कुएं चाह्वै हड़पना सद्दाम तै बिल्कुल तंग कोन्या
तेरी नीयत नै जाण गए ये घणे देश तेरै संग कोन्या
ले कै तलाशी हमला कर दिया, बात निमाणी करदी

टोनी बलेयर लिया साथ में, फिर-फिर कै तू चरण लग्या
जनमत की तन्नै परवाह कोन्या, दोष बिराणै धरण लग्या
सद्दाम हुसैन के ढूंढ बहाने, चीर इराकी हरण लग्या
यू.एन.ओ. की मानी ना रै वा तै आणी-जाणी करदी

टैंक चला कै गोळे दागे, कती शर्म आयी ना
बाळक बूढ़े औरत मारे, कती तेरै स्याही ना
विरोध-प्रदर्शन खूब हुये, पर तेरी समझ आई ना,
अमेरिकी जनता भी रूक्के मारै, या तै मोटी हाणी करदी

फियादीनी दस्ते बण पत्थर, तेरी छाती ऊपर चढ़ग्ये
आत्मघाती बणे इराकी, घणे कसूते अड़ग्ये
छाती के म्हं बम बांध, तेरे टैंक कै नीचै बड़ग्ये
कह ‘मुकेश’ ईब कट्ठेहोल्यो, क्यूं बात बिराणी करदी

5

हे सखी कट्ठीहोल्यो, बदल दिखाद्यो हरियाणा

जात-पात की बुरी बीमारी, दिल तै काढ़ बगादयो हे
माणस-माणस होवे बराबर, सबनै या समझादयो हे
ना कोए ऊंचा ना कोए नीचा, खोलकै बतादयो हे-2
वोटां खातर जात राखर्ये, करर्ये सै धिंगताणा

गाम-गाम म्हं ठेके खुलग्ये, घर-घर नशाखोर होगे
सुलफा गांजा चरस स्मैकी, नसेड़ी पुरजोर होगे
कुछ महंगाई घरां शराबी, संकट चारों ओर होगे-2
नशामुक्त हो हरियाणा, हो दूध-दही का खाणा

छोरियां की संख्या घटगी, चिंता बढग़ी भारी हे
पढ़ण-लिखण खेलकूद म्हं, ये सबतै आग्गै आरी हे
भ्रूण हत्या नै रोकण की थम, मिलकै करल्यो त्यारी हे-2
दोयम दरजा खत्म करो और आग्गै कदम बढ़ाणा

मात-पिता की संपति म्हं, अपणे हिस्से लेणे चहिएं
दान-दहेज और सिद्धेे कौथळी, नहीं किसै नै देणे चहिएं
कह ‘मुकेश’ ये लारे लप्पे, नहीं किसै नै खेणे चाहिए-2
अपणे हक की खातिर बोलो, इसमैं कै शरमाणा

6

नींद रात नै आई कोन्या, गात उचाटी छाई
हे डंग-डंग पै बैरी, मान्नै सैं मन्नै हे पराई

गर्भ पड़ी ज्यब रोणा पड़ग्या, अल्ट्रासाउंड कराया हे
क्यूकर पीछा छूटैगा, यो घर म्हं मातम छाया हे
इस कुणबे नै मिलकै नै, मेरा नाम मिटाणा चाह्या हे-2
मात मेरी नै जिद्द लाली-2 मैं पैदा करणी चाही

हांसण-बोळण पै पाबंदी, के जीणे म्हं जीणा हो
बात-बात पै टोका-टाकी, घूंट सबर का पीणा हो
ऊपर तैं फेर न्यू कह दें ये, बेटी का धन हीणा हो-2
म्हारे बिना ना दुनिया चाल्लै- 2, ये नाम धरैं अणचाही

बलात्कार और छेड़छाड़ की, दिन-दिन घटना बढ़ती जां
जहर खा कोए आग लगा कै, भेंट दहेज की चढ़ती जां
इज्जत की खातर कितणी मारी, इसकी कोए गिणती ना-2
घर की बात सै माटी गेरो – 2, न्यू कह पंचायत बैठाई

सबतै ज्यादा बोझ म्हारे पै, सबतै पाछै खाणा हे
गात तोड़ कै काम करां और फिर भी मिलै उलाहणा हे
अपणी मुक्ति खातर बेबे, एक्का पड़ै बणाणा हे
कह ‘मुकेश’ या जिसी-जिसी होरी, बात उसी मन्नै गाई

7

आज कोए राज नहीं न्यायकारी
जनता फिर री मारी मारी
झूठा ढोंग रचा राख्या,
न्यारे-न्यारे पाड़ै, फूट का फायदा ठा राख्या

शहीदां नै दी थी कुर्बानी, देश बचावण नै
हँस कै फांसी टूट गये, आजादी ल्यावण नै
रोवैं थी उनकी महतारी
जिन्दगी लागै थी बड़ी प्यारी
कती ना धोखा खा राख्या
बिल्कुल ना सै चूक सोच कै कदम उठा राख्या

मिली आजादी गरीबां के तै सपने टूट ग्ये
टाटा-बिड़ला अम्बानी अड़ै चांदी कूटग्ये
कोए तै रकम बणाग्या भारी
किसै की मजदूर गई मारी
खाली हाथ घरां आग्या
सोग्या भूखै पेट अन्धेरा आख्या म्हं छाग्या

सत्ताधारी खाग्ये देश नै, लूट-लूट कै
विदेशी कम्पनी आगी, खांगी चूट-चूट कै
अफसर नेता और व्यापारी
कट्ठेहोर्ये भ्रष्टाचारी
किसा गठजोड़ बणा राख्या
अरबां दौलत जोड़ देश कै चूना ला राख्या

जात-धरम और गोत नात पै, हम सारे बांटे
मुकेश कह हम लड़ा-भिड़ा कै, अलग-अलग छांटे
कट्ठेहोल्यो रै नर-नारी
सब कुछ बेचण की तैयारी
कमीशन मोटा खा राख्या
साची सै या बात, यो असली भेद छुपा राख्या

8

मेहनतकश तू सोच ठहर कै, तेरी कमाई कित जासै
हाड तोड़ कै काम करै, तेरी पाई-पाई कित जासै

तेरी समझ म्हं आया कोन्या कितणा तनै कमाया रै
लूट-लूट कै कितणे खाग्ये, तू घर नै के ल्याया रै
इस सिस्टम की बदमाशी का, भेद तनै ना पाया रै
करमां का यो खेल बताकै, ठग्गां नै भरमाया रै
तेरे बाळकां नै चा भी पतळी, दूध मळाई कित जासै

सारी जिन्दगी बीत गई, कदे रज कै खेल्या खाया ना
काम करण म्हं कसर ना छोडी, धोरै धेला पाया ना
न्यू ए कट-कट म्हं कटगी, कदे जीवन सहेला थ्याया ना
एक दिन भी इसा ना बीता, कदे नया झमेला आया ना
तेरे दोपायां नै साइकिल ना, ये जहाज हवाई कित जासै

लगै उचाटी नींद आवै ना, ज्यब बालक स्याणे होज्यां सै
किस-किस आग्गै हो हाथ फैलाणा, ज्यब बाळक ब्याहणे होज्यां सै
लेण-देण दुनियादारी के सब, फर्ज पुगाणे होज्यां सै
सारी उम्र कसक-कसक फेर, कर्ज चुकाणे होज्यां सै
घोट-घोट के छोह न पीग्या, तेरी समाई कित जासै

संकट दिन-दिन बढऱ्या सै, पर इसका हल भी टोहणा हो
कट्ठेहोकै ढूंढी राही बेशक झगड़ा झोणा हो
न्यू बैठे के काम चलै से, यो तै रोज-रोज का रोणा हो
सबनै मिलै बराबर का हक, फेर चैन सै सोणा हो
कह ‘मुकेश’ तू देख पलट कै, ओ भोळे भाई कित जासै

9

कोए किसै का ना गोती नाती, या दुनिया कहती आई
चाल, चरित्र, चेहरा बदलै, सत्ता गैल्यां भाई

फूल्या-फूल्या हाडें जा भाई, चौधर थ्यागी भारी
जूण से जूण से खटकै सैं ईब, रड़क मेटद्यूं सारी
कुड़ते म्हं तैं ल्यकडऩ नै होर्या, हुई नेता गैल्यां यारी
सत्ता किसै की ना होती, तेरी क्यूं गई अक्कल मारी
ऊपर-ऊपर रहे नजर, ना धरती देवै दिखाई

चुपड़ चौधरी गैल्यां बैठ, कुछ कान भरणिये हो ज्यां सै
कुछ काम कढ़ाऊ होक्का पाड़ू, बात घड़णिये हो ज्यां सै
बाबू जी की शान देख कुछ, सहम डरणिये हो ज्यां सै
पांच, सात, संग हांडण नै, गैल फिरणिये हो ज्यां सै
मनै इसै-इसै कई दिखै सैं, ज्यब चौगरदे नजर घुमाई

कोठी बंगला गाड़ी लेली, जुडग़ी दौलत भारी
कान्धे ऊपर पिस्टल झूलै, बणग्या कब्जेधारी
हलके का एम.एल.ए. बणनै की, मन मन म्हं तैयारी
भाईचारे की पड़ै मानणी, या जनता हांगा लारी
पीस्सा हांगा दोनूं होगे, होग्ये ख्याल हवाई

जै लूटखोर तै बचणा सै तो लेणी पड़ै संभाळ तन्नै
भूंडे माणस के हुंकारे भरण की, करणी होगी टाळ तन्नै
अंग्रेजां सी सियासत का यो, पड़ै काटना जाळ तन्नै
‘मुकेश’ चूकगी मौके नै तो, जिन्दगी भर मिलै गाळ तन्नै
म्हारी मेहनत पै पळरे सैं ये, खूनी जोंक कसाई

10

कुदरती खेती

खेती चौपट कर्जे भारी, दिखै घोर अन्धेरा रै
मुफ्त म्हं खेती होण लागरी, ध्यान कड़ै सै तेरा रै।

बिना खाद और बिना दवाई, जंगल खूब खड़े थे रै
हरियाली थी घणी गजब की, पेड़ तै पेड़ अड़े थे रै
सब जीवां का साझा था, ना पहरे कितै कड़े थे रै
ओजोन परत भी साबत थी, ना उसमैं छेद पड़े थे रै
कुदरत गैल्या खसिये लाकै, बिगड़या ढंग भतेरा रै

ज्यादा अन्न उपजावण खातर, होड़ कसूती लागी रै
डी.ए.पी. यूरिया जिंक खाद, तन्नै कर्जे बीच ध्यकागी रै
जहरीली दवाई छिड़क-छिड़क, या मित्रा कीट नै खागी रै
जहरी खाणा-पीणा होग्या, नई-नई बीमारी आगी रै
भोळेपण म्हं आफत लेली, पाट्या कोन्या बेरा रै

घणी कसूती जंग म्हं घिरग्या, अन्नदाता का हाल सुणो
लागत बढ़गी खेती घटग्यी, स्याम्ही दिखै काळ सुणो
हरित क्रान्ति के चक्कर म्हं, लुटग्या सारा माल सुणो
धरती बंजर पाणी खार्या, कम्पनियां का जाळ सुणो
एक ओड़ नै कुअां दिखै, एक ओड़ नै झेरा रै

उठ बावळे क्यूं पड़या सोच म्हं, बख्त बीतता जार्या रै
कुदरती खेती करणी होगी, और नहीं कोए चारा रै
आप्पा मरै सुरग दिखै सै, यो जग जाणै सै सारा रै
आच्छी सेहत सबकी होगी, यो जीवन सुधरै म्हारा रै
कहै ‘मुकेश’ ओ भोळे माणस, कह्या मान ले मेरा रै

11

भगत सिंह

भगत सिंह तनै जो सोच्या था, वो रहग्या बीच बिचाळे म्हं
राज बदलग्या ना हालत बदली, कसर रही ना चाळे म्हं

मिली आजादी तो गरीब आदमी के मन म्हं रंग चा छाये थे
भगतसिंह तेरे इंकलाब के सबनै नारे लाए थे
जात-पात मिट ज्यागी वतन तै ये सपने खूब सजाए थे
सबनै मिलै बराबर का हक, गीत खुशी के गाए थे
राज बणाणा चाह्या था तनै, मेहनतकश के पाळे म्हं

दिन रात कमावूं रै भूखा सोवूं, ना मेरी समझ म्हं आरी
बाळक भूखे ना तन पै कपड़ा, या कर्री काय्ल बीमारी
टाटा बिड़ला लक्ष्मी मित्तल, पूंजी बढ़री भारी
गोळी खाग्या कर्जे म्हं रै रोवै मेरी महतारी
प्रेमचन्द का ‘होरी’ आज भी जकड़्या कर्जे के जाळे म्हं

गाय तैं सस्ती ज्यान मेरी दुळीणे की याद द्यवाऊँ मैं
बान्ध गोहाना किला जफरगढ़ के-के ब्यखान सुणाऊँ मैं
मिल चलाऊं, सड़क बणाऊँ, ऊंचे भवन उठाऊँ मैं
अपणा कुणबा दाबण नै एक कच्ची छांद बणाऊँ मैं
आग लाग मेरे बाळक जळगे, रंधगे धूमे काळे म्हं

सपने हो लिए तार-तार, ना राम भरोसे सोवो
आधी तै लई बीत उम्र या बाकी नै क्यूं खोवो
करम बणाया आप बणै सै, क्यूं किस्मत नै रोवो
कह ‘मुकेश’ यो भगत सिंह ज्यूं, नया रास्ता टोह्वो
दुःख की रात अन्धेरी ढळ ज्या, चालो ईब उजाळे म्हं

स्रोतः (यहां सकंलित 1 से 9 तक ) सं. सुभाष चंद्र,  हरियाणवी लोकधारा – प्रतिनिधि रागनियां, आधार प्रकाशन पंचकुला, पेज 252-261

(यहां सकंलित 10-11) सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पेज -69

 

 

 

 

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