ये कविताएं

उन हाथों के लिए
जो जंजीरों में जकड़े हैं
लेकिन प्रतिरोध में उठते हैं
उन पैरों के लिए
जो महाजन के पास गिरवी हैं
लेकिन जुलूस में शामिल हैं
उन आंखों के लिए
जो फोड़ दी गई हैं
लेकिन सपने देखती हैं
उस जुबान के लिए
जो काट दी गई है
लेकिन बेजुबान नहीं हुई
उन होठों के लिए
जो सिल दिए गए हैं
लेकिन फडफ़ड़ाना नहीं भूले

 

सर्दी आ रही है

सर्दी आ रही है
कहा बूढ़े आदमी ने अपने आप से
एक हवा का झौंका आया
बच्चे ने फटाक से खिड़की बंद कर दी
उधर दादी अम्मा ने दो-तीन बार सन्दूक खोला है
उसे फिर से बंद कर दिया है
नौकर रामदीन इस हपफ्ते कुछ ज्यादा ही खांस गया है
उसने दवा की शीशियां भी सहेज कर रख ली हैं
दुकान के बाहर रखी रजाइयों को मुड़ मुड़कर देखते हुए
दो मजदूर एक दूसरे से टकरा गए
रेस्तरां में बैठे दो रईसजादे सोच रहे थे
इस बार जब सर्दियों में बर्फ गिरेगी
दोस्तों के साथ कुफरी चलेंगे
बड़ा मजा आयेगा।

आधुनिक नगर

जहां गलियां सुनसान
मकान बेजान
दरवाजे बंद
खिड़की परेशान
एक आधुनिक नगर में
कितने श्मशान।

 

कहां मानते हैं बच्चे

बच्चे तो बच्चे होते हैं
कहां मानते हैं बच्चे
सामने वाले घर में जायेंगे तो कूदते हुए
आएंगे तो फुदकते हुए
कभी उनके बच्चों के साथ कुछ खा आएंगे
कभी उनको कुछ खिला आएंगे
वैसे बच्चे उनके भी कम नहीं हैं
जबसे गर्मी की छुट्टियां हुई हैं
हमारे घर को ही नानी का घर समझ रखा है
अब इसमें हम भी क्या करें
वो भी क्या करें
कितना ही समझाओ
कितना ही सिखाओ
कहां मानते हैं बच्चे!
दीवाली पर
हमारे बच्चे उनके घर पटाखे बजा आए
होली पर
उनके बच्चे हमारे घर रंग डाल गए
ना हमारी चली
ना उनकी

बच्चा

तमाशा दिखाता है बच्चा
न सांप से डरता है न नेवले से
न बंदर से न भालू से
न शेर से न हाथी से
रस्सी पर चलता है बच्चा
गिरने से नहीं डरता
आग में कूदता है बच्चा
जलने से नहीं डरता
हवा में उछलता है बच्चा
मरने से नहीं डरता
मालिक की तरफ देखता है बच्चा
सहम जाता है बच्चा

बगुला और मछली

बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
पानी को भी देखता है
कितने पानी में है मछली
बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
साथ घूम रही दूसरी मछलियों को भी देखता है
बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
अपने साथी दूसरे बगुलों को भी देखता है
बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
वह अपने आप को भी देखता है
बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
किनारे खेलते बच्चों को भी देखता है
जिनके हाथों में रोड़े पत्थर हैं
बगुला केवल मछली को ही नहीं देखता
वह और भी देखता है बहुत कुछ
जो शायद मछली नहीं देखती


बहिष्कृत औरत

शहर से बाहर से
एक औरत शहर के अंदर आती है
घरों पर से मिट्टी झाड़ती है
फर्श चमकाती है
गलियों को बुहारती है
पी जाती है नालियों की सारी दुर्गंध
गली-मुहल्लों को सजा देती है अपनी-अपनी जगह
इस तरह –
जब सारा शहर रहने लायक हो जाता है
यह औरत शहर से बाहर चली जाती है

एक चुप्पी


सवेरे-सवेरे
एक हाथ में टोकरी
दूसरे में झाडू
वह निकल पड़ती है घर से
जाती है एक घर से दूसरे घर
एक मोहल्ले से दूसरे मोहल्ले
कुछ दौड़ती है
कुछ भागती है
कुछ हंसती है
कुछ रोती है
करती है मजाक तरह तरह के
सुनाती है किस्से यहां-वहां के
लगता है सब कुछ कह जाती है
लगता है सब कुछ सुन जाती है
फिर भी एक खास तरह की चुप्पी
उसके चारों तरफ हमेशा मौजूद रहती है
इसी चुप्पी में मौजूद रहता है
उसका अतीत, वर्तमान और भविष्य

 

आम्बेडकर और रविदास

अधिकारी महोदय
तुम चाहे जिस भी जाति से हों
हम अपनी बेटी की शादी तुम्हारे बेटे से कर सकते हैं
पर हमारी भी एक प्रार्थना है
सगाई से पूर्व तुम्हें अपने घर से
रविदास और आम्बेडकर के चित्र हटाने होंगे

कल को हम रिश्तेदार बनेंगे
तो आना जाना तो होगा ही
कैसे हम तुम्हारे घर ठहरेंगे
कैसे खाना खाएंगे
और कैसे दो बात करेंगे
जब सामने आम्बेडकर-रविदास होंगे

रात को सोते वक्त आंख खुल गई
तब दोबारा नींद कैसे आएगी
जब सामने आम्बेडकर-रविदास होंगे

अम्बाला में मेरे कई उच्च अधिकारी मित्र हैं
कई रिश्तेदार भी ऊंचे पदों पर हैं
हालांकि ऊंचे पद पर तो आप भी हैं
पर बात तो तब बिगड़ेगी
जब सामने आम्बेडकर-रविदास होंगे

हमारी बेटी अभी नादान है
सारी बातें नहीं समझती
शादी के बाद
दो-चार दिन तो कहीं बाहर भी कट जायेंगे
पर बाकी के दिन कैसे कटेंगे
जब सामने आम्बेडकर-रविदास होंगे

हमारी बेटी पूजा-पाठ करती है
वह भगवान शंकर का ध्यान कैसे लगाएगी
जब सामने आम्बेडकर-रविदास होंगे

बोलो अधिकारी महोदय
कैसे कटेगी यह पहाड़ सी जिंदगी
कैसे निभेगी यह पहाड़ सी रिश्तेदारी

 

उनका सवाल

वे पूछते हैं –
आज भी उनके सिर पर गंदगी का टोकरा क्यों रखा है
उनकी बस्ती शहर या गांवों से बाहर ही क्यों होती है
उनके मंदिरों-गुरुद्वारों में दूसरे लोग क्यों नहीं आते
अनपढ़ता बेकारी और गरीबी उनकी बस्ती में क्यों रहती है
उनकी बहु बेटियों को लोग खाने पीने की चीजें क्यों समझते हैं
उनके महापुरुष दूसरों के लिए उपहास पुरुष क्यों होते हैं
स्कूल में अध्यापक उन्हीं की जाति को क्यों याद रखता है
अन्तर्जातीय विवाह से उनकी जाति अभी तक बाहर क्यों है
उन्हें किराएदार रखने में मालिक-मकान को क्या परेशानी है
अपनी जाति बताना उनकी सबसे बड़ी विकट समस्या क्यों है
उनकी जाति को गाली में क्यों बदल दिया गया है
अंत में वे एक सवाल और पूछते हैं –
उनके सवाल को आखिर सवाल क्यों नहीं माना जाता

पाखण्डी

वे आर्थिक सुधार करेंगे
मरने को मजबूर कर देंगे
वे रोजगार की बात करेंगे
रोटी छीन लेंगे
वे शिक्षा की बात करेंगे
व्यापार के केन्द्र खोल देंगे
वे शान्ति की अपील करेंगे
जंग का ऐलान कर देंगे
वे लोकतंत्र की बात करेंगे
लोगों पर बम बरसा देंगे
इस तरह
वे हमारे आंसू पोछेंगे
और दृष्टि छीन लेंगे।

 

जाले

जाले हर युग के होते हैं
हर युग बुन लेता है अपने जाले
हर युग चुन लेता है अपने जाले
धूल मिट्टी से सने प्राचीन जाले
मोती से चमकते नवीन जाले
समय इन जालों से टकराता है
जाले समय से टकराते हैं
युग परिवर्तन चलता रहता है

 

खाली हाथ

वे दिन भर शहर की सूरत संवारते हैं
और अपनी सूरत बिगाड़ते हैं
दिन ढलने पर
सिर नीचा कर
मुंह लटकाए
चल पड़ते हैं वापिस
अपने घरों की तरफ
हताश-निराश
जैसे शमशान से लौटते हैं लोग
खाली हाथ

 

पत्नी

पत्नी का लौट आता है बचपन
जब दूर पार से मिलने आते हैं पिता जी
पत्नी की आंखों में उतर आता है संमदर
जब अचानक आकर मां सिर पर रखती है हाथ
पत्नी को याद आने लगती है मुट्ठी में बंद तितलियां
जब बहनों के आने का समाचार मिलता है
पत्नी भूल जाती है ससुराल के पाठ
जब भाई आकर घर में कदम रखता है
इस तरह
घर में खुल जाती है एक प्रतिबंधित किताब

मेज, कुर्सी और आदमी

एक जमाने से
एक मेज रखी है साहित्य अकादमी के दफतर में
दूरदर्शन, आकाशवाणी और अखबार के सम्पादकीय विभाग में
स्कूल-कालेज-विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम समिति में
यह मेज न हिलती है, न डुलती है
न देखती है, न सुनती है
एक जमाने से यह मेज एक जगह स्थिर है
इसके आगे एक कुर्सी रखी है
यह कुर्सी भी बेजान है
बड़ी रहस्यपूर्ण और सुनसान है
इस कुर्सी पर एक आदमी बैठा है
उसके आंख और कान सिरे से गायब हैं
शरीर के बाकी अंगों पर लकवे का असर ���ै
एक जमाने से
इस आदमी की यही पहचान है
सरकारें आती हैं
चली जाती हैं
लेकिन इस बात पर सभी सहमत हैं
कि-
मेज, कुर्सी और आदमी
तीनों अपना काम बड़ी जिम्मेवारी से निभा रहे हैं।

पन्द्रह अगस्त की तैयारी

दो दिन बाद पन्द्रह अगस्त है
शहर में झंडा फहराने मंत्री जी आ रहे हैं
मैदान के सामने एक झुग्गी बस्ती है
बस्ती के सामने एक विशाल शामियाना लगा दिया गया है
अब मंच से यह बस्ती दिखाई नहीं देती
मैदान के बांई तरफ एक गंदा नाला है
यहां भूखे-नंगे बच्चे फटेहाल घूमते रहते हैं
नाले को लकड़ी के फट्टों से ढक दिया गया है
बच्चों को कहा गया है कि वे शहर के दूसरी तरफ चले जांए
मैदान के दांई तरफ एक मजदूर-बस्ती है
पिछले दिनों इस बस्ती के एक घर में
एक मजदूर की भूख के कारण मर गया था
उस घर के आगे पुलिस बिठा दी गई है
साहित्यकर्मियों और जन संगठनों को कहा गया है
वे पन्द्रह अगस्त तक इधर से ना गुजरें
संतो-महन्तों, स्थानीय नेताओं और राजकवियों को
निमन्त्रण पत्र भेज दिए गए हैं
शहर के जाने माने प्रतिष्ठित व्यक्तियों को
स्वागत समिति में रखा गया है
आयोजकों का कहना है
पन्द्रह अगस्त की सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

कविता

कविता खोजती है हमारे आकाश के नए रास्ते
कविता तोड़ती है हमारे रास्तों की सीमाएं
कविता सौंपती है हमें हमारे पंख
कविता बोलती है धीरे-धीरे चुपचाप
कविता देख लेती है हमारी आंखों में दूर-दूर तक बिखरे स्वप्न
कविता तलाश लेती है गुमशुदा चीजों के टूटे हुए रिश्ते
कविता सुन लेती है दरवाजे के बाहर खड़े समय की पदचाप
कविता लड़ती है विचारों के अंधकूप से
कविता लड़ती है भावनाओं की बंद गुफाओं से
कविता तोड़ती है बर्बरता की आदिम प्रतिमाएं
कविता चलती है समय के साथ
रहती है समय से आगे


हो सकता है

हो सकता है
आपकी बेटी निकली हो स्कूल
और आपने अभी-अभी पढ़ी हो कोई बलात्कार की खबर

आपकी बहन अभी-अभी बैठी हो डोली में
और अभी-अभी किसी नव ब्याहता ने खा लिया हो जहर

आपके मोहल्ले में पैदा हुई हो एक बेटी
और किसी के घर से उठी हो रोने की आवाज!

हो सकता है
आप जाएं अपने पैतृक गांव
वहां आपको दिख जाए सर्व खाप चबूतरा
पेड़ों पर झूलते रस्सी के फंदे
दलितों की बस्ती से उठता हुआ धुआं
किसान की जेब में रखी सल्फास
नौकर की फटी हुई कमीज
मजदूर की टूटी हुई चप्पल!

हो सकता है
आपकी कविता में हो आम आदमी का दर्द
और आपको मान लिया जाए आतंकवादी
आपके हाथ में हो एमएफ हुसैन की पेंटिंग
भगत सिंह की जेल डायरी या पाश की कविताएं
और आपको समझ लिया जाए देश की सुरक्षा के लिए खतरा!

पंच परमेश्वर

मेरी बेटी को माफ कर देना परमेश्वर जी
दरअसल वह नहीं समझ पा रही
कि प्रेम करने से पहले जाति कैसे पूछे
गोत्र कहां से पता करे
प्रेम की यह अनोखी विधि उसकी समझ से बाहर है
वह नहीं जानती
कि कुछ जातियां बड़ी होती हैं।
कुछ छोटी होती हैं
और कुछ अछूत होती हैं
उसे नहीं पता
कि प्रेम मां-बाप की मर्जी से हो सकता है
अपनी मर्जी से नहीं हो सकता
प्रेम केवल अपनी जाति में हो सकता है
पर अपने गोत्र में नहीं हो सकता
न छोटी जाति में हो सकता है
दलित जाति में तो बिल्कुल नहीं
वह नहीं जानती
कि प्रेम से गांव की नाक कट जाती है
गांव कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहता
लेकिन प्रेम को फांसी पर लटकाने से
गांव की नाक बच जाती है
और सिर ऊंचा हो जाता है

परमेश्वर जी
उसे तुम्हारे हुक्के से निकली
जात-गोत, प्रेम और विवाह की गुडगुडिया परिभाषाएं समझ नहीं आती

वह नहीं जानती
कि हुक्का सुप्रीम कोर्ट का जज होता है
और उसका फैसला अंतिम होता है
उसे नहीं पता
कि पंच परमेश्वर होता है
और परमेश्वर कुछ भी कर सकता है

उसे तुम्हारी मूछों और पगड़ी के साम्राज्य की जरा भी परवाह नहीं
न ही वह तुम्हारी लाठी की ताकत से डरती है
वह तो तुम्हारी लाठी तोड़ देने की बात करती है
और हुक्का फोड़ देने की बात करती है
परमेश्वर का तो उसे पता ही नहीं कि क्या होता है
मेरी बेटी तो मेरे खिलाफ चली गई परमेश्वर जी
देखना कहीं तुम्हारी बेटी भी तुम्हारे खिलाफ न चली जाए।

डर लगता है

उठ रहा है ये बस्ती से धुआं सा कैसा
धुआं देखकर ही अब तो डर लगता है
किसकी लाश मिली है बस्ती के बाहर
यह पता करने में ही अब तो डर लगता है
बस्ती में उग आया है पत्थरों का जंगल
पत्थरों को पत्थर कहने से डर लगता है
हर कोई समझता है यहां फरिश्ता खुद  को
इन फरिश्तों से ही अब तो डर लगता है
किसी ने लिखी है कविता बिना डर के
उस कविता को पढ़ते हुए भी डर लगता है
सदियों से मिल कर रहते थे इस बस्ती के लोग
यह बताते हुए भी अब तो डर लगता है
बस्ती में बसे हैं खुदाओं के खुदा
या खुदा तेरी खुदाई से भी अब तो डर लगता है
अपनी गुजर बसर नहीं इस बस्ती में
बस्ती के नाम से भी अब तो डर लगता है
चलो अब कहीं बस्ती बनाएं आसमान पर
जमीं की आबो हवा से अब तो डर लगता है

ड्राईंग रूम

अपने घर के दरवाजे के पास
मैंने एक ड्राईंग रूम सजा लिया है
और खुद को खुद से छिपा लिया है
जब भी मैं कहीं बाहर जाता हूं
ड्राईंग रूम भी मेरे साथ होता है
मैं ड्राईंग रूम का ख्याल रखता हूं
ड्राईंग रूम मेरा ख्याल रखता है

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