सिनेमा में हरियाणा

सहीराम

Related image            यह पहली हरियाणवी फिल्म ‘‘चंद्रावल’’ के आने से पहले की बात है जब हिंदी की एक बड़ी हिट फिल्म आयी थी। नाम था ‘नमक हलाल’। यह हिंदी फिल्मों में अमिताभ बच्चन का जमाना था और अमिताभ बच्चन की उन दिनों थोड़ा आगे-पीछे मिलते-जुलते नामोंवालो दो फिल्में आयी थी – एक ‘नमक हलाल’ और दूसरी ‘नमक हराम’। ‘नमक हलाल’ में मालिक के नमक का हक अदा करने वाले जहां खुद अमिताभ बच्चन थे, वहीं ‘नमक हराम’ में फैक्टरी मालिक बने अमिताभ बच्चन अपने जिगरी दोस्त को इसलिए ‘नमक हराम’ मान लेते हैं क्योंकि खुद उन्होंने ही अपने इस जिगरी दोस्त को मजदूरों के बीच मजदूर बनाकर भेजा तो हड़ताल वगैरह तोड़ने के लिए था, लेकिन मजदूरों के दुख-तकलीफों को देखकर वह उनका हमदर्द बन जाता है। अच्छी बात यह है कि नमक हलाली हरियाणवियों के हिस्से आयी थी।

            जी हां, ‘नमक हलाल’ नामक इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे हरियाणवी युवक अर्जुन सिंह वल्द भीमसिंह वल्द दशरथ सिंह का किरदार निभाया है, जो अपने मालिक पर जान न्यौछावर करने को तैयार रहता है। उसके पिता ने भी इसी तरह नमक का हक अदा करते हुए अपने पुराने मालिक के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया था। जैसा कि हिंदी फिल्मों में होता है अमिताभ बच्चन के पिता का यह मालिक, उसके मौजूदा मालिक का पिता ही था।

            खैर, यह किरदार ज्यादा समय तक हरियाणवी रंग में रह नहीं पाता। शुरूआती कुछ दृश्ष्यों में ही उसका यह हरियाणवी किरदार सामने आता है जो काफी फनी है, कॉमिक है। फिल्म ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है, उसकी यह पहचान खत्म हो जाती है और एक आम मुंबइया हीरो के रूप में ही सामने आता है।

            बहरहाल इन शुरूआती दृश्यों को काफी पसंद किया गया। खासतौर से उन दृश्ष्यों को जब वह सपने में हरियाणवी लहजे में बड़बड़ा रहा होता है या फिर जिसमें वह नौकरी के लिए अपनी काबलियत बताते हुए कहता है कि इंग्लिश इज वैरी फन्नी लैग्वेज। हिंदी फिल्मों में यह शायद पहला हरियाणवी कैरेक्टर था। इससे पहले हिंदी फिल्मों में शायद ही कभी इतनी प्रमुखता से हरियाणवी कैरेक्टर आया हो।

            भारतीय सिनेमा तो नहीं कहना चाहिए, लेकिन हिंदी सिनेमा मेें देश के किसी राज्य, किसी क्षेत्र या इलाके के किरदार को ऐसे ही फनी ढ़ंग से पेश्ष करने का एक चलन रहा है। जैसे दक्षिण भारतीय चरित्र, जिनका ‘अय्यो’ या ‘मुर्गा’ कहे बिना काम नहीं चलता या फिर वह हैदराबादवाली ‘दकनी हिंदी’ बोलता नजर आता है। इन कैरेक्टरों को ज्यादातर पहले महमूद ने और फिर जॉनी लीवर ने निभाया।

            बंगाली या मराठी कैरेक्टरों के साथ भी कुछ ऐसा ही होता रहा है। अवधी या भोजपुरी चरित्र भी कुछ ऐसी ही बंधी-बंधाई छवियों के साथ आते हैं। जैसे पहले भोले भाले नौकर आजकल उन्हें मूर्ख या बदमाश नेताओं के चरित्रों में पेश किया जाता है। इसी तरह जहां हिंदी में अनेकानेक फिल्में ऐसी बनी होंगी जिनमें हीरो के नाम-मल्होत्रा, खन्ना, कपूर, चोपड़ा आदि से ही पता चल जाता था कि उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि पंजाबी है। शायद इसकी वजह यह रही है हो हाल-फिलहाल तक ज्यादातर यही लोग फिल्में बना रहे थे। खैर, ऐसी फिल्मों में भी अगर कोई सिख कैरेक्टर आया तो वह भी कुछ-कुछ संता-बंता की तरह ही आया। मतलब इन फिल्मों में किसी क्षेत्र विशेष के ये चरित्र टुकड़ों-टुकड़ों में और फिलर्स के रूप में चंद बंधी-बंधाई छवियों के साथ आए।

            जबकि दक्षिण का सिनेमा और इसी तरह बंगला तथा मराठी सिनेमा काफी समृद्ध रहा है। और उन फिल्मों में वहां का जन-जीवन अपने पूरे सुख-दुख, सारी जटिलता और पूरी व्यापकता के साथ आता है। कला फिल्मों में तो आता ही है जिसके लिए बंगला, मराठी, मलयालम और काफी हद तक तेलगु तथा तमिल सिनेमा का नाम रहा है, बल्कि पापुलर सिनेमा में भी वह वैसे ही आता है, चाहे वैसी कलात्मकता के साथ ना आता हो और वहां भी छवि चाहे लार्जर दैन लाइफ रहती हो अर्थात जीवन चाहे अपने यथार्थ रूप में ना आता हो। हिंदी सिनेमा में जो हरियाणवी चरित्र आए, चाहे कितने ही सीमित ढंग से आए, वे भी इसी तरह आए-टुकड़ों-टुकड़ों में, फिलर्स के रूप में और कॉमिक कैरेक्टरों के रूप में जिनसे उस क्षेत्र के बारे में कुछ भी नहीं जाना जा सकता। ये कुछ बंधी-बंधाई छवियां ही होती हैं, फिर हरियाणवी चरित्रों के रूप में वह कोई पहलवाननुमा गंुडा हो या फिर पुलिसवाला।

            अब बंगला, मराठी, मलयालम और तेलगु तथा तमिल सिनेमा तो काफी समृद्ध रहे हैं और बाकायदा बॉलीवुड की तरह वह भी उद्योगों की तरह ही चल रहे हैं। ऐसे में हिंदी भाषी क्षेत्र के सिनेमा को देखा जाए तो स्थिति भिन्न है। हिंदी सिनेमा या जिसे बॉलीवुड कहा जाता है, वह वैसा हिंदी सिनेमा नहीं है जैसे बंगला, मराठी या दक्षिणी भाषाओं का सिनेमा है। वास्तव में तो यह हिंदी-उर्दू सिनेमा रहा है। बल्कि पचास-साठ दशक तक तो एक तरह से यह उर्दू सिनेमा ही था। जब हिंदी फिल्मों के ज्यादातर लेखक और गीतकार उर्दू वाले ही थे, निर्माता और निर्देशकों में बड़ी संख्या पंजाबियों और बंगालियों की थी। और यहां तक कि दक्षिण भारतीय निर्माता भी जमकर हिंदी फिल्में बना रहे थे। इस माने में इसकी पैन इंडियन पहचान थी।

            ऐसे में व्यापक हिंदी-उर्दू भाषी क्षेत्र के भीतर कुछ क्षेत्रीय सिनेमा की कोंपलें भी फूटी। इनमें सबसे उल्लेखनीय रहा-भोजपुरी सिनेमा। वैसे तो ‘‘गंगा-जमुना’’ जैसी बॉलीवुडीय फिल्म भी भोजपुरी में ही थी। लेकिन भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत ‘‘गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ाएबे’’ फिल्म से हुई बताते हैं। बताते हैं कि हमारे प्रथम राष्ट्रपति डा0 राजेंद्र प्रसाद की प्रेरणा से नजीर हुसैन ने यह फिल्म बनायी थी।

            लेकिन आज भोजपुरी सिनेमा अपने आपमें एक बड़ा उद्योग है क्योंकि उसका एक बड़ा बाजार है। यहां यह उल्लेखनीय है कि यहां भी मुंबइया फिल्म उद्योग की तरह ही मसाला फिल्में ही बनती हैं – गीत संगीत तथा मारधाड़ से भरपूर और वैसे ही चलती भी खूब हैं। भोजपुरी सिनेमा की पहुंच कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार भी किसी भोजपुरी फिल्म में काम करने का मौका मिले तो छोड़ते नहीं। और भोजपुरी फिल्मों के पापुलर हीरोज को भी राजनीति में खूब सफलता मिल रही है – जैसे मनोज तिवारी दिल्ली से चुनाव जीत गए और रवि किशन भी जीते तो नहीं, पर राजनीति में जरूर आए। हालांकि राजस्थानी भाषा में भी कुछ फिल्में बनी। लेकिन यह भोजपुरी फिल्मों जितनी सफल नहीं हुयी।

            सत्तर-अस्सी के दशक में जब यह क्षेत्रीय सिनेमा कुलबुला रहा था। उसी दौरान हरियाणवी की पहली फिल्म आयी ‘चंद्रावल’। अगर हमारी जानकारी सही है तो उससे पहले हरियाणवी में कोई फिल्म नहीं बनी थी या शायद बनी हो तो ‘हरफूलसिंह जाट जुलाणीवाला’ टाइप की ही बनी हो। हालांकि उस जमाने में यह जरूर सुनने में आता था कि पहलवान मास्टर चंदगीराम फिल्मों में काम करने वाले हैं, वैसे ही जैसे दारासिंह ने फिल्मों में काम किया और कामयाब हुए। पर ऐसा हुआ नहीं।

            खैर ‘चंद्रावल’ शायद पहली हरियाणवी फिल्म थी और इसे ऐसे लोगों ने ��नाया जिनका साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र से थोड़ा-बहुत कुछ लेना-देना था। देवीश्षंकर प्रभाकर और ऊषा शर्मा जैसे लोग इस फिल्म से जुड़े हुए थे। खैर, हरियाणा के जन-जीवन या फिल्म कला से इस फिल्म का कोई खास लेना-देना नहीं था। हरियाणवी फिल्म यह इसी माने में थी कि एक तो इसमें हरियाणवी बोली का इस्तेमाल हुआ था। दूसरे यह एक गाड़िया लुहारों की लड़की की और गांव के एक बड़े चौधरी के बेटे की कुछ-कुछ वैसी ही प्रेमकथा थी, जैसी प्रेमकथाएं रचने पर हरियाणा के अनेक सांगी और भजनी अपने हाथ आजमा चुके थे।

            बहरहाल,अपनी बोली की फिल्म को देखने की दर्शकों की भूख इतनी जबरदस्त थी कि इस फिल्म को भारी सफलता मिली। इसके बाद तो हरियाणवी फिल्मों की जैसी बाढ़-सी ही आ गयी और ‘छैल गैल्यां जांगी’, ‘ले जागा लणिहार’ टाइप की अनेक फिल्में आयी जो ना तो सफल हो पाई और ना ही किसी माने में उल्लेखनीय रही। ‘चंद्रावल’ के बाद जो दो अन्य फिल्में खासतौर से उल्लेखनीय रही, वे हैं  – ‘सांझी’ और ‘लाडो’।

            ‘सांझी’ पारिवारिक शत्रुता और जमीन के झगड़े से संबंधित फिल्म थी। सुमित्रा हुड्डा इसकी हीरोइन थी और इस फिल्म में बॉलीवुड के ओम पुरी, गोगा कपूर तथा सदाशिव अमरापुरकर जैसे कई जाने-माने एक्टरों ने काम किया था। ओम पुरी ने तो पारिवारिक हलवाहे और मजदूर का बहुत जानदार चरित्र निभाया था। यह फिल्म ‘चंद्रावल’ के मुकाबले कथ्य में भी बेहतर थी और कलात्मक रूप से। इस फिल्म को यथार्थवादी कहना तो शायद उचित नहीं होगा, लेकिन हरियाणवी जन-जीवन की एक झलक उसमें जरूर मिलती थी।

          Related image  हरियाणवी फिल्मों में सबसे बोल्ड फिल्म रही-अश्विनी चौधरी की ‘लाडो’। यह फिल्म उस समय आयी, जब हरियाणवी फिल्मों का बुलबुला फूट चुका था। यह फिल्म अपने कथ्य में तो बोल्ड थी ही कलात्मक रूप से भी बेहतर फिल्म थी। अश्विनी ने टी वी के लिए काम करने और एक-दो छोटी फिल्में बनाने के बाद ‘लाडो’ बनायी थी यानी तब तक उनका हाथ काफी हद तक मंज चुका था। अब तो खैर वे एक सफल हिंदी फिल्म निर्देशक हैं।

            बहरहाल ‘लाडो’ एक ऐसी औरत की फिल्म है, जिसका पति बाहर नौकरी करता है और उनके परिवार से काफी करीब से जुड़े एक लड़के से उसका एक्सट्रा मैरिटल अफेयर हो जाता है और वह गर्भवती हो जाती है। गांव के सामने उनके संबंधों की बात खुल भी जाती है। गनीमत यह है कि तब तक खाप पंचायतों का ऐसा बोलबाला नहीं था। पंचायत तो जरूर होती है और यह औरत काफी बोल्ड ढंग से पंचायत के सामने आती है और अपना पक्ष रखती है। इस बीच वह अपने दोनों परिवारों – मायके और ससुरालवालों के सामने भी अपना पक्ष रखती है। इसी प्रक्रिया में जिस लड़के से उसके संबंध बनते हैं, उसकी कायरता भी सामने आती है।

            इसके बावजूद वह पूरी दृढ़ता से स्थिति का सामना करती है – घर, परिवार और पंचायत सब जगह। उसे नैतिकता से जुड़े सवालों से भी जूझना पड़ता है। लेकिन वह अपने इस संबंध को पाप नहीं मानती और दृढ़ता से तमाम हालात से जूझती है। यूं तो यह कहानी कहीं की भी हो सकती है। स्त्राी-पुरूष के विवाहेत्तर संबंध कहीं भी बन सकते है। लेकिन हरियाणवी संदर्भ में इस कहानी को फिल्माना इसलिए खास है कि यहां ऐसे मामलों में गांव और पंचायत आदि का दखल बहुत होता है। वरना यह ऐसा मुद्दा होता है जिसे पति-पत्नी के बीच ही निपटना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा अदालत में। खैर, फिल्म के अंत में उसका पति उसे अपना लेता है और इसके साथ ही फिल्म का सुखद अंत होता है।

            हरियाणवी फिल्मों की लहर की कथ्य के रूप में यह सबसे बोल्ड तथा कलात्मक रूप से सबसे बेहतरीन फिल्म दुर्भाग्य से सबसे अंतिम फिल्म भी साबित हुई। अपने बोल्ड कथ्य के चलते या फिर सरकारी प्रोत्साहन न मिलने के चलते यह फिल्म बॉक्स आफिस पर उतनी सफल भी नहीं हो पायी। इसके बाद हरियाणवी फिल्म एक-आध कोई बनी तो होंगी, पर लोगों को वैसे ही याद नहीं जैसे ‘चंद्रावल’ से पहले की फिल्में याद नहीं।

            इसके बाद हरियाणवी फिल्में भी नहीं बनी और हिंदी फिल्मों में भी न तो हरियाणवी चरित्र और न ही हरियाणवी जन-जीवन के दर्शन हुए। यह गैप काफी लंबा रहा, लेकिन नयी सदी का पहला दशक बीतते-बीतते हिंदी फिल्मों में एक विस्फोट की तरह से हरियाणवी जन-जीवन के विभिन्न रूप सामने आने लगे। अब हरियाणवी जन-जीवन टुकड़ों-टुकड़ों में अपनी बंधी-बंधाई छवि के साथ सामने नहीं आ रहा और हरियाणवी चरित्र सिर्फ फनी और कॉमिक रूप में फिलर्स के तौर नहीं दिखाए जा रहे।

            अब हरियाणवी जन-जीवन और चरित्र अपनी बंधी-बंधाई छवियों से हटकर पूरी धमक के साथ फिल्मी पर्दे पर सामने आ रहे हैं। बेशक जिन फिल्मों में हरियाणवी जन-जीवन और चरित्र प्रमुखता से उपस्थित रहे, वे लीक के हटकर बनी फिल्में तो नहीं थी और कला फिल्में तो बिल्कुल भी नहीं थी, लेकिन इन फिल्मों में हरियाणवी जन-जीवन और हरियाणवी चरित्र जरूर लीक से हटकर रहे। इस दौर की जिन हिंदी फिल्मों में हरियाणवी जन-जीवन के विभिन्न रूप प्रमुखता से सामने आए उनमें ‘मटरू की बिजली का मंडोला’, ‘तेरे नाल लव हो गया’ ‘हाई वे’, ‘एन एच-10’, ‘गुड्डू रंगीला’ और ‘तनु वैड्स मनु रिटर्न’ प्रमुख हैं।

            यह वह दौर था जब भ्रूण हत्याओं और बिगड़ते लिंगानुपात के चलते हरियाणा एक तरह से सभ्य समाज के लिए लानत बना हुआ था, जब हरियाणा जमीन हड़पू नेताओं तथा लुटेरे उद्योगपतियों की चरागाह बना हुआ था, जब हरियाणा की जमीन से निकले क्रिमनल्स दिल्ली के दरवाजे को बुरी तरह खटखटाने लगे थे और खाप पंचायतें राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में अपनी बर्बरता के चलते चर्चा का विषय बनी हुयी थी। इन सभी फिल्मों के कथ्य के आधार मुख्यतः यही रहे।

            ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ में एक उद्योगपति के लालच और लूट की उसकी तिकड़मों और उनके खिलाफ स्थानीय जनता की लड़ाई का चित्रण है। इसमें जहां प्रतिकात्मक रूप से एक गुलाबी भैंस मौजूद है तो जनता के लिए लडने वाला ‘माओ’ भी है। इस फिल्म में पंकज कपूर ने बहुत ही शानदार भूमिका अदा की और अपनी एक्टिंग का करिश्मा दिखाया है।

            ‘तेरे नाल लव हो गया’ फिल्म में एक क्रिमनल गैंग का बॉस एक हरियाणवी चौधरी है, जिसकी भूमिका ओम पुरी ने निभायी है। ‘तेरे नाल लव हो गया’ जहां एक लचर सी फिल्म थी, वहीं ‘हाई वे’ तथा ‘एन एच-10’ का कथ्य काफी इंटेंस ढ़ंग से सामने आता है। यह फिल्में भी अपराध की काली दुनिया से जुड़ी कहानियों की फिल्में ही हैं। ये दोनों फिल्में कुछ-कुछ उस धारा की फिल्म जिसे अनुराग कश्यप का स्कूल कहा जाता है।

            ‘हाई वे’ खासतौर से इसलिए उल्लेखनीय है कि इस फिल्म में रणदीप हुड्डा ने एक ऐसे अपराधी की भूमिका निभाई है, जो समाज की तलछट से निकला अपराधी है, लेकिन धीरे-धीरे जिसका मानवीय रूप सामने आता है। इस फिल्म में रणदीप हुड्डा तथा आलिया भट्ट दोनों ने ही बड़ी अच्छी एक्टिंग की है, जबकि ‘एन एच 10’ राजधानी और उसकी चमक-दमक से दूर एक अंधेरी और बर्बर दुनिया की फिल्म है।

            ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ और ‘गुड्डू रंगीला’ खाप पंचायतों की बर्बरता और उनके खिलाफ लड़ते लोगों की फिल्में हैं। ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न’ में नायिका कुसुम सांगवान का भाई, जो पहलवान है, प्रेम विवाह करके गांव छोड़ता है और दिल्ली में रहकर अपनी बहन को पढ़ता-लिखाता है। यही लड़की फिल्म का मुख्य किरदार है, जो बोल्ड है, प्रेम करती है, उसके लिए लड़ती है, खुद अपने निर्णय लेती है और अंत में अपने प्रेम का बलिदान देती है।

            इस फिल्म में खाप पंचायत का दखल तो दिखाया गया है और एक जगह तो लड़की को जलाकर मारने की कोशिश का दृश्य भी आता है जिसके खिलाफ लड़की का भाई लड़ता है और अपनी बहन के हक में खड़ा होता है, लेकिन ‘गुड्डू रंगीला’ तो पूरी तरह खाप पंचायत की बर्बरता की कहानी कहनेवाली फिल्म ही है। सुभाष कपूर की यह फिल्म उनकी पिछली फिल्मों ‘‘फंस गए रे ओबामा’’ या ‘जॉली एल एल बी’ जैसी व्यंग्य फिल्म नहीं है और खापों की बर्बरता शायद इस फिल्म में पहली बार इतने व्यापक रूप में सामने आयी है।

            वैसे तो इस दौर की सबसे बड़ी हिट फिल्म ‘बजरंगी भाई जान’ की शुरूआत भी हरियाणा की जमीन से ही होती है, लेकिन इस फिल्म का हरियाणवी जन-जीवन से ज्यादा कुछ लेना-देना है नहीं, लेकिन यह जरूर है कि हिंदी फिल्मों में हरियाणवी जन-जीवन के चित्रण की जो प्रक्रिया शुरू हुयी है, वह यहीं रुकने वाली नहीं है।

       Image result for दंगल पोस्टर     बताया जा रहा है कि आमिर खान की आगामी फिल्म, जिसकी चर्चा अभी से शुरू हो गयी है, ‘दंगल’ एक हरियाणवी पहलवान की ही कहानी है कि कैसे वह अपनी बेटी को कुश्ती के क्षेत्र में कामयाब बनाता है। बताते हैं कि आमिर खान ने इस फिल्म के लिए खास तौर से हरियाणवी बोली सीखी है। उम्मीद करनी चाहिए कि आगे भी हिंदी फिल्मों में हरियाणवी जन-जीवन की कुछ यथार्थवादी झलकियां अवश्य ही देखने को मिलेंगी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( नवम्बर-दिसम्बर, 2015) पृ. 58 से 61

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2 COMMENTS

  1. अतिसुन्दर लेख
    मज़ा आ गया पढ़कर
    शुक्रिया इस बेहतर आलेख के लिए।

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