सुरेखा की कविताएं

मुस्कराहट

वो जो मुस्कराती है

सर्फ और साबुन के पैकेट पर

कपड़ों, बल्ब, ट्यूबलाईट और

बीमा के विज्ञापनों में

वो जो मुस्कुराती है

हमारे कलेंडर और

मोबाईल फोन के होर्डिंग्स में

काश मुझे मिल जाए

सड़क या किसी गली के मुहाने पर

अपनी जीवन्त मुस्कान के साथ

काम करते हुए।

बागी लड़कियां

मैं जानती हूं

बहुत सारी बागी लड़कियों की पहचान

यहां तक कि उनके

नाम व पते भी

परन्तु आपको नहीं बताउंगी,

वरना हो सकता है

आप उन्हें ढूंढ निकाले

अपने घर के उस अन्दर वाले कमरे में

जिसकी कोई खिड़की बाहर नहीं खुलती।

 

लड़ाईयां

जो लड़ाइयों में शहीद हो गई

उन औरतों के नाम

शहीदों की सूची में कौन लिखेगा?

समाज के ठेकेदारों ने

इज्जत के नाम पर,

समाज की रक्षा के नाम पर,

समाज को चलाने के लिए

उन्हीं के द्वारा बनाए गए नियम-कायदे-कानूनों

की रक्षा के नाम पर

जारी किए औरतों के खिलाफ फतवे,

लेकिन औरतें ने

स्वयं को बचाए रखने की

इस लड़ाई को लड़ा

सपनों को जिन्दा रखने के नाम पर,

प्रेम करने और

मानवीय गरिमा की रक्षा के नाम पर

इस लड़ाई का इतिहास लिखने

इस लड़ाई में हिस्सेदारी के लिए

तुम कब आओगी

एक अधूरी इच्छा

मैं खेलूं अपने गांव के गोरे में,

घर से कोई बुलावा ना आए,

रात हो तो छुप जाऊं

रेहड़ू के पहिए के नीचे,

और सो जाऊं चैन से,

कोई मुझे ना कहे काम के लिए,

मुझे याद ना आए

दादा जी को खाना खिलाना,

अपनी छोटी सी टोकनी से

ढेर सारा पानी ढोना,

मुझे याद ना आए

गोबर के उपले बनाना,

मैं नहाऊं अपने गांव के पोखर में,

मैं कुदूं पूरा दिन नहर में,

मैं खाऊं बरगद के बरबण्टे,

कोई मुझे ना पहचाने

मेरा कोई बुलावा ना आए।

महिलाओं के काम

बचपन में गुड्डे गुडिया खेल में ही

सीख लिया था हमने

रसोई का रसायन शास्त्र

और

कपड़े पर फलकारी का गणित

इसमें हम कभी फेल नहीं हुई

ऐसा नहीं था कि

हम सीख सकते थे केवल

रसोई का रसायन शास्त्र और

फलकारी का गणित

बल्कि जालसाजी के साथ

हमारा परिचय करवाया गया

रसायन शास्त्र और गणित से

यह कहते हुए कि यही कला

हमारे लिए सार्थक है

एक दिन हमारा परिचय

हमारे गांव की टेड़ी-मेड़ी गलियों

से दूर

शहर की चौड़ी सड़कों के भूगोल

के साथ हुआ

फिर उसके समाजशास्त्र और

उसके अर्थशास्त्र से हुआ

ऐसा नहीं था कि हम इनमें

ठीक-ठीक फेल या पास थी

परन्तु निपुण नहीं थी

क्योंकि हमने नहीं पढ़ी थी

अब तक इसकी पोथियां

परन्तु एक परिचय में हमारे लिए

फतवा जारी किया गया कि

भूगोल, राजनीति शास्त्रा और अर्थशास्त्रा

हमारे बूते से बाहर हैं।

परत दर परत

परत दर परत हैं हमारे ऊपर

मैं नहीं जानती कितनी परत हैं मुझ पर

कब किस खोल से बोलती हूं

कब उतार फेंकती हूं अपना कौन सा खोल,

कब कितना नंगा नजर आती हूं,

कब कितनी घृणा पैदा करती हूं,

कितनी घृणा को छुपाकर

कब दिखाती हूं कितना प्यार,

सब परत दर परत

उतरता चढ़ता रहता है?

इसलिए अब कुछ याद नहीं आता

अब मैं

न ही अपने कहे पर यकीन करती हूं,

और न ही आपके कहे पर।

समय

कुछ लोग चर्बी के नीचे दबे हैं

बाकी पुर्जे की तरह घिसते जा रहें हैं

दोनों कहते हैं

समय मुश्किल बीतता है

एक चिलचिलाती धूप में

खून की तरह टपकते

पसीने से मापता है समय

और दूसरा

खाते रहने और

खाकर सो जाने की ऊब से।

महिलाओं की नजर में राजनीति –1

तानाशाहों के प्रति

हाशिए पर गए

लोगों का विरोध

उतना ही स्वाभाविक है

जितना फूल का खिलना

तितली का उड़ना

और

रात के सन्नाटे में

किसी झिंगुर की आवाज।

महिलाओं की नजर में राजनीति-2

दुनिया के सारे असलहे की ताकत

इतनी नहीं है कि

वो कत्ल कर सके

एक परिन्दे की उड़ने की इच्छा

दुनिया में मौजूद

तमाम ताकतें मिलकर भी

पहरा नहीं दे सकती

मनुष्य की कल्पना पर

महिलाओं की नजर में राजनीति –3

उनके पास ताकत है,

असलाह है,

वे चाहें तो

बोलते मनुष्य की जीभ कतर लें,

वे चाहें तो उड़ते परिन्दे के पर कतर लें,

फिर भी

सारा असलाह नाकाफी

हमारी आंखों से टपकती घृणा को

प्यार में बदलने के लिए,

हमारी कल्पनाओं में

रोज कई बार जलती है इनकी दुनिया।

दुनियादारी-1

सखी दुनियादारों के बीच

कैसी चल रही है तुम्हारी दुनियादारी

सखी

उम्र ढलने के साथ ��ी

हमें नहीं आई दुनियादारी

सखी

हम अभी भी चीखतें हैं

अभी भी लगाते हैं नारे

अभी भी जिन्दा है

हमारा दुनिया को बदलने का सपना

सखी अभी भी जिन्दा हैं हमारी मूर्खताएं

सखी हम अभी भी हैं चंचल चित

सखी जब हम मिलेंगे

किसी बस स्टॉप, बाजार या सड़क पर तो

अपनी दुनियादारी के बोझ के साथ

वही हिरनी जैसी कुदाक भरकर

क्या अब भी लिपटोगी मेरे गले से

वैसे ही जैसे लिपटती थी पहले।

दुनियादारी-2

सखी तुम्हारा प्रेमी

जो तुमसे कहता था

कि असम्भव है

तुम्हारे बिना मेरा जीवन

आजकल वह जीता है

ठीक-ठीक वैसे ही

जैसे जीता था तुम्हारे साथ।

स्वर्ग-1

जवान लड़कियां सर्वशक्तिमान के स्वर्ग से

खौफ लपेटकर निकलती हैं

तो शोहदों से सावधान और आतंकित रहती हैं

किसी मनचले से कभी-कभी

कुछ बतिया भी लेती हैं

यह एक राज है

यह जब-जब भी खुलता है या

अपने स्वतन्त्र निर्णय की तरह

खोल दिया जाता है

तो अगले दिन

पास-पड़ोस गांव-शहर

में फैली होती है

खबर इनकी आत्महत्या की।

 

स्वर्ग-2

जब-जब भी हम सब मिलकर

गुपचुप बतियायी

तभी परमेश्वर व साकार परन्तु सर्वशक्तिमान

के स्वर्गों का जिक्र हमेशा आया

साकार परन्तु सर्वशक्तिमान यानी पिता

के स्वर्ग की सच्चाइयां मैं जानती थी

मैं जानती थी कि

इस स्वर्ग में इच्छाएं गढ़ने,

अपने जीवन के युटोपिया बनाने,

अपने लिए एकान्त तलाश करने के साथ-साथ

हंसना और ज्यादा बोलना भी वर्जित है

वह सब भी यह जानती थी कि

हमारे जीवन का सौंदर्यशास्त्र

फल-फूल सकता था उन वर्जनाओं के बाहर

हम सब यह भी जानती थी कि

साकार सर्वशक्तिमान का सौंदर्यशास्त्र

स्वयं के बारे में, अपने जवान होते बेटों

और स्वर्ग के मालिकों के लिए

यौन वासनाओं का औजार बनती

बेटियों के बारे में अलग-अलग है,

उनका सौंदर्य और उनके बेटों का सौंदर्य ताकत में है

तो उनकी इच्छाओं में रहस्य रोमांच भरती

बेटियों का सौंदर्य

न्यायिक चेतना से बेदाग दिमाग

लम्बे लहराते गेसुओं

मोटी आंखों और उन पतले होठों में है

जो अन्याय के खिलाफ फड़फड़ाते नहीं,

इस सौंदर्यशास्त्र को हमने

अपनी शिक्षा ग्रहण करते समय

और ज्यादा आत्मसात किया

नखशिख खण्ड पढ़ते समय

हमने हाथ मसले कि

हमारी आंखों में लाल डोरे क्यों नहीं हैं?

हमारे कुल्हे क्यों ज्यादा बाहर हैं,

हमारे स्तन क्यों नहीं सही अनुपात में उभरे

हमारी भौहें क्यों नहीं घनुषाकार हैं,

यह मलाल स्वर्ग के मालिकों के जहन में भी था

इसलिए सभी गैर अनुपातिक चीजों को

अनुपातिक बनाने के लिए

नई-नई टैक्नोलोजी विकसित हुई

गली-गली ब्यूटीपार्लर खुले।

 

स्वर्ग-3

हे स्वर्ग के मालिको

मेरी सहेलियों के दिलों में रोष सही

फिर भी तुम्हारी सत्ता

अभी उन्हें स्वीकार्य है,

तुमने एक होकर

उन सबको संचालित किया

परन्तु अभी वह सब मिलकर

विद्रोह की तैयारी में नहीं,

इसलिए घबराओं मत

अभी हमारे देश के

सभी स्वर्ग सुरक्षित हैं

और पूरी दुनिया तुम्हारी।

स्वर्ग-4

मुक्ता स्वर्गवासी होना चाहती थी,

बचपन से अब तक उसने जाना था कि

स्वर्गवास को जाते समय

बड़ा जश्न होता है,

जिसका मनोरम दृश्य

ताउम्र मन मे बसा रहता है

स्वर्गवास को जाते समय नई-नई पोशाकें और जेवर मिलते हैं

हसीन रातें और खुशहाल दिन मिलते हैं,

उसे सजने संवरने का बहुत शौक था

इसलिए वह स्वर्गवासी होना चाहती थी

वह भी मेरी दूसरी सहेलियों की तरह

हमारे देश के स्वर्गों की नारकीयता से परीचित नहीं थी

और अब जब वह

परमेश्वर यानी पति के

स्वर्ग की नारकीयता से परिचित है

तब भी वह उस स्वर्ग में

उस तरफ सेंध लगाने में सक्षम नहीं है

जहां से उन्मुक्त जीवन का रास्ता निकलता है।

दीवारें

दीवारें इनमें छिद्र नहीं

जो दिखा सकें बाहर की दुनिया

नजर भेदी क्षमता से ऊपर

की दीवारों के बाहर

हम नहीं जानते क्या है?

बस सुना है कि दीवारों के बाहर

भेड़िये रहतें हैं,

जो औरतों को देखते ही लपक लेते हैं

सुना है कि

बाहर खून-खराबा

और गुंडागर्दी है,

बाहर अन्याय है

बाहर इन्साफ नहीं मिलता

इसके साथ कहा गया

बाहर की हवा लगते ही

औरतें बिगड़ जाती हैं

परन्तु हमें नहीं बताया गया कि

बाहर बड़े-बड़े पोखर और नदियां हैं

बाहर झरने कल-कल करके बहतें हैं

बाहर नीला खुला आसमान है

बाहर ऐसी जमीन है

जिसका कोई ओर-छोर नहीं

बाहर बड़ी-बड़ी सड़कें हैं

जिन पर दौड़ती गाड़ियों के साथ

दुनिया की गति समझ में आती है

हमसे छुपाया गया कि

बाहर जमीन और आसमान मिलते हैं

यानी कि बाहर सब कुछ संभव है।

स्रोतः  सं. देस हरियाणा (नवम्बर-दिसम्बर, 2015), पृ. 24 से 26

 

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