हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियां

विकास साल्याण

हरियाणा सृजन उत्सव में  24 फरवरी 2018 को ‘हरियाणा के दर्शकों की अभिरूचियाँ’ विषय पर परिचर्चा हुई जिसमें फ़िल्म अभिनेता व रंगकर्मी यशपाल शर्मा, सीनियर आईएएस वीएस कुंडू, और गौरव आश्री ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इस परिचर्चा का संचालन  किया संस्कृतिकर्मी प्रो. रमणीक मोहन ने। प्रस्तुत हैं परिचर्चा के मुख्य अंश – सं.

रमणीक मोहन – हम बात करना चाहेंगे दर्शकों की अभिरुचियों की, तो मैं शुरूआत करना चाहूंगा – गौरव आश्री जी से ।

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गौरव आश्री मैं एक टीवी चैनल में काम करता था। नाम था आनन्दंम टीवी। और मैं एक ट्रैवल शो बना रहा था। उस ट्रैवल शो का विषय था राम की ट्रैवलिंग। राम की ट्रैवलिंग जो अयोध्या से लेकर रामेश्वरम तक की है। इसके लिए मैंने रिसर्चिस की, रामायण पढ़ी, रामायण के एक्सपर्टस से मिला और भी बहुत कुछ। यह शो काफी महंगा बना था और  शो पर खर्चा आ गया तकरीबन सात लाख प्रति एपिसोड़। पर जब यह शो बनकर तैयार हो गया और मैंने जब वो शो अपनी टेलीकास्टिंग टीम को दिया उन्होंने इसे देखा और बड़े खुश हुए, और बोले बहुत बढ़िया बना हुआ है, कमाल कर दिया। उसी दौरान मैं अपने घर आया हुआ था और वही शो मैंने अपने रिश्तेदारों व घरवालों को दिखाया तो वो ऊब गए। तब मुझे एहसास हुआ यह शो बिल्कुल ही फ्लॉप है। क्योंकि यह वास्तविक दर्शकों की समझ से बाहर उनकी अभिरुचियों के अनुसार नहीं। ऐसा क्यों हुआ ?

जब फ़िल्म टेलीविजन पर आती हैं उसके पीछे की साईंस क्या है? कौन सी फ़िल्म टेलीविजन पर काम करती है और कौन सी नहीं काम करती है। होता क्या है जब हम टेलीविजन पर कोई फ़िल्म देखते हैं तो उसमें दो-तीन चीजों का ध्यान रखा जाता है पहली बात टेलीविजन का अटेंशन स्पेस बहुत कम होता है। टेलीविजन देखते हैं तो हम चलते फिरते देखते हैं।

‘पाथेर पांचाली’ जैसी गम्भीर फ़िल्म देखेंगे तो उसको आराम से बैठकर पूरे ध्यान से देखना पड़ेगा क्योंकि उसको हम ऐसे चलते फिरते नहीं समझ सकते क्योंकि इमोशन्स हैं, फिलिंग्स हैं, उसके अन्दर लेयरस हैं, उनको ध्यानपूर्वक ही समझा जा सकता है। तो यह फ़िल्म टीवी पर काम नहीं करेगी क्योंकि इस वक्त आपका अटैंशन स्पेम टीवी में नहीं है. क्योंकि आपके किचन में कुछ चल रहा है खाना बन रहा है। उधर से फोन आ गया आदि-आदि। लेकिन ‘टार्जन द वंडर कार’ जैसी फ़िल्म के दर्शक हैं चार से चौदह साल तक के बच्चे और टेलीविजन पर देखने वालों की बात करें तो तीस प्रतिशत दर्शक चार से लेकर चौदह साल तक के बच्चे हैं और घरों में यही बच्चे टीवी का रिमोट छीन कर बैठे रहते हैं और उनको टार्जन द वंडर कार जैसी फ़िल्म देखना बहुत पसंद है। ऐसी फ़िल्में ही टीवी पर सबसे ज्यादा विज्ञापन (टीआरपी) कमाती हैं।

साऊथ इंडियन फ़िल्मों में हाई लैवल का ड्रामा होता है। इनके हर एक सीन में ड्रामा होता है। हीरो-हीरोईन को चैलेंज करता है कि तू मुझे चौबीस घंटे में आई लव यू बोलेगी और उसमें वो बोल देती है क्योंकि उसमे वो नोनसेंस हरकतें करता है जिसमें कोई तर्क नहीं होता मनोविज्ञान नहीं होता, और न ही कोई लेयर होती है। इसको हम चलते फिरते देखते हैं अगर एक शॉट भी हमने देखा या एक मिनट के लिए भी कहीं पर रुके तो हमें हाई लेवल का ड्रामा होते दिखेगा। और ऐसा ही न्यूज चैनल करते हैं एक छोटी सी खबर को इतना तेज और लाउड म्यूजिक के साथ ऐसे पेश करते है मानो कोई युद्ध छिड़ गया हो। और यही छोटी सी खबर भी टीआरपी लेकर आती है।

रमणीक मोहन –   कुंडू साहब से ये पूछना चाहूंगा इन्होंने ‘पाथेर पांचाली’ का ज़िक्र किया मैंने ‘पाथेर पांचाली’ के बारे में एक दर्शक को ये कहते हुए सुना है कि ‘पाथेर पांचाली’ एक फ़िल्म है या डॉक्युमेंट्री। तो डॉक्युमेंट्री के कन्टेक्सट में पूरे मुल्क का तो एक अलग सीन और प्रोस्पैक्टिव होगा हरियाणा के संदर्भ में आप किस तरह से इस विधा को देखते हैं और दर्शकों की अभिरुचियों को देखते हैं और इसके लिए हम क्या कर सकते हैं ऑन स्टेज लाने के लिए लोगों के बीच में लाने के लिए?

वी.एस. कुंडू मैं इस विषय पर मैं उस नजरिये बात करने के बजाय थोड़ा-सा जर्नलाईज तरीके से बात करना चाहूंगा। गौरव जो बात कह रहे थे वो बहुत महत्वपूर्ण बात है वो इस वजह से है महत्वपूर्ण बात कि ऑडियो-वीडियो, फ़िल्म, टीवी एपिसोड, डॉक्युमैंट्री, यू-ट्यब पर वैब-सीरिज या शोर्ट फिल्म बनाने के साथ इन कलाओं के साथ जो व्यवसाय जुड़ा है, उस व्यवसाय के साथ अपनी अलग तरह की चुनौतियां हैं। इसमें कई बार होता क्या है कि आप एक अच्छी सृजना करते हुए भी आप सफल नहीं हो पाते व्यावसायिक तरीके से और बॉक्स-ऑफिस पर भी चल गई और उसके बाद वो टेलीविजन पर नहीं चल रही और उससे अगर आपको रिटर्न नहीं मिल रहा है तो आप शायद थोड़ा हतोत्साहित हो जाएंगे और उस तरह का काम करना बंद कर देंगे। सृजक की सृजना को आकार देने के लिए यह व्यवसाय एक बहुत बड़ा फैक्टर है, चाहे किसी भी प्रकार की फ़िल्म का निर्माण करना हो। एक सृजक की भूमिका में हमें इसको समझना भी होगा जैसा कि यशपाल जी ने बताया। ये जरूरी भी है। इस समाज को इस मीडियम के माध्यम से एक सही तौर पर एक एक्सपोजर देने के लिए।

अब यह हो रहा है इंटरनेट के जरिए, या टेलीविजन के जरिए, मोबाइल के जरिए सब तरह कंटेंट थोपा जा रहा है। उनको कुछ मेहनत नहीं करनी पड़ती, पर जब मुझे अपने स्टुडेंट टाइम में फ़िल्म देखनी होती तो मुझ तीन घंटे लाइन में लगकर टिकट लेनी पड़ती थी। फिर तीन घंटे लाइन में लगकर फिल्म देखता था या किसी फ़िल्म  की सीडी या डीवीडी लेनी पड़ती थी। तब जाकर मैं फ़िल्म देखता था, पर अब जो इतना आसान हो गया।

इस समय जो दर्शकों के पास जो मैटर आ रहा है उसमें से 99 प्रतिशत तो ऐसा है जिसमें क्वालिटी ही नहीं है, जिसमें लेयरिंग नहीं है, उसमें कला नहीं है, और इस कंटेंट का मुख्य कार्य साबुन बेचना है पानी बेचना है या किसी ओर तरह की कहानी बेचना है और इस तरह का कंटेंट लगातार-लगातार हमारे ऊपर थोपा जा रहा है। इसको सही तरीके से बैलेंस करने के लिए हमें दर्शकों को अच्छा मैटर देना पड़ेगा चाहे एक डॉक्युमैंट्री के माध्यम से दिया जाए या फ़ीचर फ़िल्म के माध्यम से। इसके बारे में चिन्तन करना बहुत जरूरी है।

इसलिए जो क्रिएटिव काम में लगे हुए लोग हैं जो ऑडियो-वीडियो बनाते हैं उनको अपने लिए एक तरीके के दर्शकों को तैयार करना पड़ेगा। हरियाणा ही नहीं हिन्दुस्तान का ऑडियंस भी ऑडियो-वीडियो के अनुसार एक मोटे तौर पर कोई एक मैच्योर ऑडियंस नहीं है आज के समय में। वो एक एंटरटेनमेंट का ऑडियंस है क्योंकि उसको कभी भी ट्रेंड नहीं किया गया ।

इंग्लिश में कल्चर शब्द के बहुत सारे मायने हैं एक तो कल्चर जिसके बारे में हम यहां बैठकर बात कर रहे एक दूसरा कल्चर है जो प्रोसेस है जिसको स्थापित करने के लिए एक लम्बा टाइम देना पड़ता है उसको एक माहौल देना पड़ता है तब जाकर वह एक कल्चरल प्रोड़क्ट तैयार होता है। हमने हिन्दोस्तान में और विशेषतौर से हरियाणा में असल में कभी भी ऑडिंयस को कल्चर्ल ऑडिंयस के रूप में डैवलप करने की कोशिश नहीं की। न सरकार ने की है और न ही क्रिएटिव लिट्रेरी ओर्गेनाइजेशन ने की है उसमें एक बाधा ये भी बनी है कि कला के नाम पर हमारे पास बहुत अच्छी चीजें हैं पर हमारे पास लिटरेचर नहीं है। हमारे यहां सारे कल्चरल ट्रेडिशन  मौखिक ट्रैडिशन के रूप हैं और मौखिक ट्रैडिशन की खासियत ये है कि वो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आते हैं और कमी यह है कि एक बार भी कनैक्शन टूट गया तो वहीं पर ही ट्रैडिशन खत्म। आज कि जो युवा पीढ़ी है उनके पास हमारे औरल ट्रैडिशन के एक्सपोजर तक ही नहीं पहुंच पाते तो वो कड़ी टूट रही है उस कड़ी को जोड़ने के लिए हमें अलग अल्टर्नेटिव रास्ते अपनाने होंगे।

हरियाणा का दर्शक है उसकी अभिरूचि क्या हैं? इसकी चिंता हमें न करते हुए, हमें ज्यादा चिंता इस चीज की करनी होगी कि उसकी अभिरूचि अच्छे साहित्य तक, अच्छे सिनेमा की तरफ हम कैसे ला सकते हैं और उसके लिए स्कूल-कॉलेज में, यूनिवर्सिटी में और सामान्य समाज में हम ऐसे प्लेटफॉर्मस क्रिएट करें जहां उनको अच्छा कंटेंट दिखाया जाए। गाईड़ किया जाए कि अच्छे कंटेट को कैसे पढ़ा जाए, सीखा जाए और किस दृष्टिकोण से समझा जाए और इसके लिए अच्छे कंटेंट की स्कुल कॉलेजो की ऑडियो-वीड़ियों की लाईब्रेरी तैयार की जाए और कुछ टीचर ऐसे तैयार किए जाए जो असल में उस कंटेट के बारे में स्टुडेंट को समझा सकें कि इसमें ये अच्छाई क्यो है? उस गहराई में उतरना ऑडियंस को हमें सिखाना पड़ेगा। और तभी ऐसा माहौल तैयार होगा जिससे हरियाणा से एक अच्छी सृजना होगी जिसको वर्ल्ड वाईड लेवल पर अपरिसिएट कर सकते हैं।  इसमें डॉक्युमैट्री, फ़िल्मं, शोर्ट, वैब पर कंटेंट की अच्छाई और उसके बारे में एक समझ पैदा होगी और कैसे इन सब पर चर्चा भी होनी चाहिए इसके बारे में गाईडंस देनी होगी युवाओं को  तभी इस तरफ़ कुछ आगे काम होगा।

रमणीक मोहन यशपाल जी से गुजाऱिश है अभी कुछ समय पहले हिसार में फ़िल्म फ़ेस्टीवल हो रहा था उसमें ‘पंचलाईट’ फ़िल्म दिखाई जा रही थी पर फ़िल्म के बीच में ही जिस कल्चर की मैं बात कर रहा था एक ‘किल्की वाला कल्चर’ देखने को मिला जिसे हम इम्पेशएंस (अधैर्य) वाली ऑडियंस कहते हैं बीच में यशपाल जी को फ़िल्म रोककर बातचीत करनी पड़ी थी। यशपाल जी आप तो बिल्कुल यही के रचे, बसे, पले, बढ़े हुए यहीं आपने नाटक किया फ़िल्में भी की तो आप इस सब को कैसे देखते हैं?

यशपाल शर्मा  – मैं थोड़ा-सा विशाल रूप से सोचकर अब केंद्रित होना चाहता हूँ। बहुत जरूरी है केंद्रित होना क्योंकि जब हम ब्रह्माडं में देखते हैं तो हमें छोटी-सी पृथ्वी दिखाई देती है, पृथ्वी को जब हम देखते हैं तो उसमें महाद्वीप दिखाई देते हैं। महाद्वीपों में हमें छोटा-सा इंडिया दिखाई देता है, इंडिया में हम जब देखते हैं तो छोटा-सा हरियाणा दिखाई देता है और हरियाणा में इस छोटी सी जगह पर हम बैठकर बात कर रहे हैं किसी फ़िल्म की या किसी और क्रिएटिव काम की चर्चा कर रहे होते हैं तो मैं उस बिन्दु की बात कर रहा हूँ।

हम यहां बैठे हैं इस सृजन उत्सव में । यहाँ न तो नाच गाना हो रहा न ही कोई रागनी कम्पटीशन हो रहा न ही कोई आईटम सोंग चल रहा फ़िल्में भी नहीं चल रही तो क्या डॉक्टर ने बताया कि हम इसमें भाग लें और ऐसी बाते सुनें जो चिन्तन की है, मंथन की है। तो वो चीज क्या है जिसकी वजह से हम यहां बैठे हैं?

और जैसे कल सुभाष जी ने बताया था हमने ये कल्चर डेवलप करना है हरियाणा में। क्योंकि हरियाणा के बाहर बहुत अच्छी इमेज नहीं है। हरियाणा के नाम पर उनको लगता है हरियाणा में या तो खाप पंचायत हैं या जाट आरक्षण है या मार कुटाई या रेप ये। सब बातें उनके दिमाग में आती है जबकि ऐसा नहीं है। वो भूल जाते हैं कि स्पोर्टसमैन यहाँ के क्या हैं, आर्मी यहां की क्या है , यहाँ के कलाकार कौन-कौन हैं और  यहाँ कि  माँओं के अन्दर अपने बेटे को आर्मी में भेजने का, पुलिस में भेजने का, देश की सेवा करने का जो जज्बा है।

पहले बोलते थे कि यहां सिर्फ एग्रीकल्चर है पर कल्चर जिस तरीके से डेवलप हो रहा है वो काबिल-ए-तारीफ है। और धीरे-धीरे अब चेंज आ रहा है जैसे फ़िल्म फ़ेस्टीवल हो रहे हैं या जैसे ये सृजन उत्सव हो रहा है या कई और भी ऐसे कार्यक्रम हो रहे हैं जिनमे मंथन चिन्तन हो रहे हैं तो मुझे लगता है कि इसी तरीके ऑडियंस चाहिए । क्योंकि  इसमें हम भी जिम्मेवार हैं क्योंकि जब कोई आदमी  बात कर रहा है तो सब ध्यान से सुनेंगे तो बात पहुंचेगी ।

अच्छे सिनेमा की लिस्ट निकालो देखो बहुत सारी अच्छी फ़िल्में हैं माजिद मजिदी ईरानी डायरेक्टर की फ़िल्में देखें, अपने हिन्दी स़िनेमा की पुरानी फ़िल्में देखें। गाइड देखिए, मदर इंडिया देखिए आदि बहुत सारा भण्डार है पर हमारी लाईफ बहुत तेज हो गई है पर हमारे पास टाइम नहीं है सब भागदौड़ में लगे हुए हैं। क्या हमारे पास थोड़ा सा भी टाइम नहीं है ।

मैं इसी दर्शकों की अभिरूचियों की बात कर रहा था कि हमने अच्छी  हरियाणवी फ़िल्म लास्ट टाइम कब देखी थी, हरियाणवी सिनेमा को हम कितना स्पोर्ट कर रहे हैं, थियेटर में हमने लास्ट हरियाणवी फ़िल्म कौन सी देखी थी?

रमणीक मोहन आपका हरियाणवी फ़िल्मों और सिनेमा के साथ खास लगाव रहा है और हमने देखा अभी दो-तीन हरियाणवी फ़िल्में ऐसी रही हैं जिन्हें नेशनल लेवल के अवार्ड मिले हैं जैसे ‘पगड़ी’ और ‘सतरंगी’ ।  जैसे ही ये फ़िल्में सिनेमा तक पहुंची तो ऑडियंस वहाँ से गायब थी। तो उसकी वजह आपको क्या लगती है एक तो जो कुंडू साहब कह रहे थे कि हम वो टेस्ट डेवलप नहीं कर पाए या वो मार्किट वाली बात कि हरियाणवी फ़िल्मों की मार्केटिंग नहीं हो पाती है। तो आपको क्या लगता है कि क्या दिक्कत हो सकती है? और इस दिक्कत से बाहर निकलने के लिए फ़िल्म मेकर्स और आप जैसे लोग क्या नए रस्ते तलाश करने की सोचते हैं और इन फ़िल्मों को दर्शकों तक पंहुचाने के लिए क्या और रास्ता हो सकता है । जैसे मैं हरियाणवी फ़िल्मों पर कुछ काम करने की सोच रहा था मुझे सतरंगी और पगड़ी की कहीं डीवीडी नहीं मिली बाद में पता चला, इन फिल्मों की डीवीडी भी नहीं बनी क्योंकि डीवीडी को अब कोई खरीदता नहीं। तो इस पर आप प्रकाश डालिए कि हरियाणवी फ़िल्मों के एंगल से हमारा दर्शक कहाँ खड़ा है और उसे कहाँ जाना चाहिए ?

यशपाल शर्मा हमारे दर्शक जो इस तरीके से ड़ेवलप हो रहे हैं यही दर्शक हॉल तक भी जाएं। यही अपनी जेब से पैसे निकालें। पगड़ी-सतरंगी बहुत अच्छी फ़िल्में थी  दोनों को नेशनल अवार्ड़ मिला है मैंने दोनों में काम किया है। पर जब वो ही फ़िल्में सिनेमा में गई तो सात दर्शक पहुचे थे मैंने कॉल करके फिल्म चलवाई है।

हम बाते तो बड़ी-बड़ी करते हैं पर हम बात करते हरियाणवी संस्कृति हरियाणावी सिनेमा को बचाने की और पता नी क्या बातें करते हैं । हम सौ रुपया खर्च करके हरियाणवी फिल्में देखने नहीं जाते पर कसूर हमारा भी है कि हम उनको अच्छा सिनेमा नहीं दे पा रहा जैसा कि कुंडू जी ने बताया कि अच्छा सिनेमा जब आएगा तभी तो हिट होगा । तो मेरा भी सोचना भी वही है कि दर्शक  हरियाणवी सिनेमा तक कैसे पहुचे ?

 वी.एस.कुड़ु –  जो रमणीक जी ने कहा पिछले एक साल से लगभग हरियाणा में फ़िल्म पॉलिसी बनने कि जो प्रोसेस चल रही इस सरकार में, वो अभी फाईनल नहीं हुई है। वैसे उसकी मोटी स्कीम बन चुकी है क्योंकि उसमें मैं भी शामिल था। उसमे काफी चीजों पर विचार हुआ था । क्योंकि पूरे हरियाणा में 65 फ़िल्म स्क्रीन हैं और उसमे गुडगांव व फरीदाबाद की स्क्रीन निकाल दें  तो हर एक जिले में एक या दो ही स्क्रीन हैं। इसका हिसाब लगाए तो फिल्म स्क्रीन के बारे में हमारी हालत दयनीय है और जितने पुराने सिंगल स्क्रीन है वो बंद हो गए क्योंकि मल्टीपलैक्�� का एक कल्चर शुरू हो गया है जिसके करके सिंगल स्क्रीन का गुजारा मुश्किल में आ गया था। अब डिस्ट्रिब्युशन सिस्टम बदल गया है तो हरियाणवी फ़िल्में निश्चित तौर पर छोटे बजट की फिल्में होंगी । अगर वो बड़ी फिल्मों के साथ कम्पीट करेंगी जैसे शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान या करण जौहर प्रोडक्शन के साथ मुकाबला करेंगी तो वह निश्चित तौर पर कहीं भी नहीं जा सकती। क्योंकि पच्चीस-तीस करोड़ का बजट तो खाली पब्लिसिटी का होता है हमारी फ़िल्मों का बजट इसका दसवाँ हिस्सा भी नहीं होता तो उस स्पेस के लिए हम कम्पीट नहीं कर सकते । इसलिए  हमें छोटे-छोटे स्पेस क्रिएट करके इन फ़िल्मों की लगातार स्क्रीनिंग कर सकते हैं इनको दर्शकों तक लगातार पहुंचा सकते हैं अगर हम मल्टीप्लैक्स के लिए कम्पीट की बात करेंगें तो हम बिना बात के बहुत बड़ी लड़ाई मोल ले रहे हैं। मैं डॉक्युमैंट्री फ़िल्म मैकर्स को भी यही सलाह देता हूँ कि आप पन्द्रह लाख की फ़िल्म बनाकर कैसे सोच सकते हो कि दो सौ करोड़ कि फ़िल्म के साथ स्पेस के लिए कम्पीट कर लोगे। उसके स्पेस के लिए कम्पीट मत करो। अपने लिए एक खुद की ऑडिंयस तैयार करो और उसके लिए एक रास्ता तैयार करो कि कैसे आप ऑडिंयस तक पहुँच सकते हो आप एक बार अपने प्रोडक्ट को ऑडियंस तक पहुँचोगे तो ऑडिंयस आपकी फ़िल्म के साथ जुड़ेगा तो उसके साथ वह आपकी अगली फ़िल्म के लिए उम्मीद लेकर बैठेगा आपके साथ वो जुड़ना शुरू होगा । इसके लिए आप एक अलग चैनल तैयार कर सकते हो ।

अविनाश सैनी आप दर्शक पैदा कर रहे हैं या कोशिश कर रहे हैं दिक्कत ये है कि उन फैक्टरियों का क्या करें जो दूसरे तरह के दर्शक पैदा कर रहे हैं जो स्टेज शो के नाम पर हमारे गायक व कलाकार कहते हैं मारो किल्की जो यूथ फेस्टीवल में भी और दूसरी जगह पर भी है। मुझे समझ नहीं आ रहा इनका क्या करे आप कुछ बताए?

अश्वनी दहिया पहले तो मैं ‘देस हरियाणा’  का जो मंच है उसका धन्यवाद करना चाहुँगा जिसने आप जैसे प्रबुद्ध जनों से रू-ब-रू होने का मौका दिया। और इतनी विस्तृत चर्चा में शामिल होने का मौका दिया ।मेरा सवाल यह है यशपाल शर्मा जी से जो आपने ऑडियस की बात की इसमें विशेषतौर पर युवाओं और बुजुर्गों  को डिफाइन कर दिया कि बुजुर्ग तो लख्मीचंद के सांग सुनने के लिए बेताब हैं और यूथ में हम देखते हैं युनीवर्सिटी में, कि जब यूथ फैस्टीवल होता है एक लड़की हॉल में एंट्री करती है तो हुटिंग शुरू हो जाती है यह हुटिंग उसके लिए नहीं होती जो प्रफ्रोम कर रहा है यह हुटिंग उस लड़की के लिए हो रही है जो हॉल में एंट्री कर रही है और तब तक होगी जब तक वह अपनी सीट पर बैठ न जाए, उसके बाद फिर दूसरी लड़की के लिए फिर तीसरी लड़की के लिए ऐसे ही चलता रहता है ।

बलदेव सिंह महरोक आप उन दर्शकों की बात कर रहे हैं जो मल्टीप्लैक्स में जाकर तीन-चार सौ रुपये खर्च करके फ़िल्म देखते रहते हैं पर हरियाणा का दर्शक जो असली दर्शक हैं किसान व मजदूर के रूप में वह तीन चार सौ रुपये खर्च करके फ़िल्म नहीं देख सकता । उनके लिए बीस-तीस रुपये की टिकट चाहिए। मजदूर आदमी को शाम को मनोरंजन के लिए चाहिए सिनेमा उनके लिए कोई उपाय बताओ ?

राजीव सान्याल मुंबई में रहकर एक पूरा अहम हो जाता है कि हम एक कॉर्पोरेट वर्ल्ड के है आपने उस मानसिकता को तोड़ा है और थोड़ा समय लगेगा थोड़ी कठोर धरती है हरियाणा की निश्चिंत रहिए जो काम आप करना चाहते हैं उसमें आपको सफलता जरूर मिलेगी।

दर्शक मेरा सवाल यह है कि आप लोग बोल रहे कि दर्शक पैदा करना चाहिए जिसकी रुचि बेहतर हो, गम्भीर हो। तो मेरा पूछना है कि इसमें सिर्फ हमारी ही जिम्मेवारी बनती है कि जो कलाकार वल्गर है उनका विरोध किया जाए क्या सरकार कि जिम्मेवारी नहीं बनती ?

यशपाल शर्मा एक आम नागरिक होने के नाते मैं यह कहता हूँ कि मैं यशपाल शर्मा सरकार के भरोसे नहीं बैठने वाला क्योंकि आज तक संसार में जितने भी महान और क्रिएटिव काम हुए हैं वो सरकार के भरोसे नहीं हुए । कोई भी क्रिएटिव आदमी न रूके सरकार के भरोसे। क्या आप अपनी क्रिएटिविटी रोक देंगे सरकार के भरोसे? क्या सृजन उत्सव रुक जाएंगे सरकार अगर मदद नहीं करेगी तो?

वी.एस.कुंडु सरकार सही तरीके से काम करे तो उसके लिए हमें समझना होगा कि हम लोकतंत्र की बुनियादी युनिट हैं, इसमें हम वोटर के रूप में हैं उनको रास्ते पर लाकर सही तरीके से काम कराना भी समाज का ही काम है यानी वोटर का ही काम है, और किसी भी परिस्थिति में अपने समाज की कुरीतियों को सरकार पर नहीं लाद सकते और यह मैं एक आम नागरिक की हैसियत से बोल रहा हूं मैं एक सरकारी अधिकारी के रूप में नहीं बोल रहा हूँ। हम जैसे ही अपनी बुराइयों को सरकार पर लाद रहे तो हम अपनी जिम्मेवारी से भाग रहे होते हैं। हम अपने बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं, हम उन्हें क्या शिक्षा दे रहे हैं। हम किस तरह के साहित्य को बढ़ावा दें रहे हैं, किस तरह की फ़िल्मों को बढ़ावा दे रहे हैं। ये हम तो जानते हैं न । हमारे बच्चे अपनी एज ग्रुप से क्या सीखेंगे उस बात पर हमारा कोई कंट्रोल नहीं है पर हम घर में क्या शिक्षा देंगे इस पर तो हमारा कंट्रोल है। हम अपने बच्चों को सूझ यही दे कि अच्छा क्या है बुरा क्या है?

समाज में एक बात हो रही कि किल्की-किल्की।  किल्की का जो कल्चर है उस कल्चर को बढ़ावा देने के लिए भी तो हम जिम्मेवार हैं। एक नाटक हो रहा है जिसमें पच्चीस-तीस लोगों ने चार-पाँच महीने का एक समय लगा दिया अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा न्योछावर कर दिया। उसको देखने के लिए पचास लोग भी मुश्किल से आते हैं और फूहड़ नाच-गानों के प्रोग्रामों में पाँच हजार लोग आ रहे हैं। क्या इसके बारे में हमें सोचना नहीं चाहिए कि ये क्या हो रहा है। और इसको बदलने के लिए कोई बाहर से नहीं आएगा । इसको हमें खुद ही बदलना पड़ेगा यहां पर जो अढ़ाई सौ-तीन सौ लोग बैठे हैं तो कम से कम वही यह समझ लें कि हम सभी एक ही सोच के लोग हैं जो समाज के अंदर कुछ क्रिएटिव चीजें करना चाहते हैं। इन लोगों को इकट्ठा होकर ही कोई न कोई काम करना पड़ेगा। ये जिम्मेदारी लेकर समाज में बदलाव की शुरूआत करनी पड़ेगी। जहां तक प्रश्न व्यावसायिक तरीके से समाज में कुरीतियाँ आने का तो इसका मूल कारण पैसा है। फ़िल्म बनानी है, थियेटर बनाना है या कोई वीडियो बनानी है तो उसमें पैसा शामिल है और पैसा एक बहुत बड़ी ताकत है। उस ताकत से हमें फाईट करना होगा क्रिएटिव लोगों को अपने हथियारों से इससे लड़ना होगा। हमारे हथियार हैं आपसी संबंध। हमारे हथियार हैं यही व्हाटसएप्प और फेसबुक यही सोशल मीडिया जिसको हजार तरह की कुरीतियों के लिए प्रयोग किया जाता है। हम इसे अपने काम के लिए क्यों नहीं प्रयोग करते? ये सब लोग जो यहाँ बैठे हैं इसी चर्चा को जो, आज यहां हो रही है इसको सारा साल एक ग्रुप के माध्यम से क्यों नहीं करते। एक अच्छाई की चेन हम भी शुरू कर सकते हैं और इन सभी कुरीतियों को हम एक समाज का हिस्सा बनकर दूर कर सकते हैं एक सरकार का हिस्सा बनकर नहीं कर सकते ।

यशपाल  शर्मा – ये जो फैक्टरी की बात हुई थी । जो आज फैक्टरी  चल रही है आज । ये हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम फूहड़ डांस में जाकर हजार-हजार रुपये लुटाएं या एक अपनी कल्चर की एक फ़िल्म में स्पोर्ट करे । हमारा ही कसूर है कि हम ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ और ‘क्या कूल हैं हम’ जैसा फिल्मों को हिट करवाए । अगर आप थोड़ी देर मंथन चिन्तन करेंगे तो आपको आपके सवालों के जवाब अपने आप ही मिल जाएंगे। मुझे ऐसा लगता है । अब धीरे-धीरे समय बदल रहा है की एक दिन में ही परिवर्तन नहीं आता । और महाराष्ट्र, केरल, बांग्ला सिनेमा की तरह हरियाणा सिनेमा भी एक दिन अच्छा होगा। हमारा सिनेमा पैसे से नहीं पैशन से बनेगा और एक मौके की तलाश है अगर एक सुपरहिट फ़िल्म हरियाणा से निकली तो यहाँ की दिशा ही बदल जाएगी ।

गौरव आश्री हर फ़िल्म कहीं न कहीं अपनी ऑडियंस ढूंढ ही लेती है। और ऑडियंस को मैं दोष नहीं देना चाहता । मैं हर तरह के दर्शक का स्वागत करता हूँ एक आर्टिस्ट के नाते मैं वो कर सकता हूँ जिस पर मेरी पकड़ मजबूत है। मैं सोच कर एक हिट फ़िल्म नहीं बना सकता। मैं एक ईमानदारी से फ़िल्म बना सकता हूँ वो अगर हिट हो गई तो किस्मत वरना कहीं न कही वो अभी अपनी ऑड़ियंश ढूंढ़ ही लेगी।

रमणीक मोहन मैं इस सारी परिचर्चा का निष्कर्ष निकालते हुए दो ही बातें कहना चाहूँगा कि ये बातें हमारी परिचर्चा के संदर्भ में प्रासंगिक है। ये रोज के अनुभवों से निकला हुआ एक अनुभव है। देखिए हम लोग रोज बसों में भी ट्रैवल करते हैं ट्रैन में भी ट्रैवल करते हैं और मैट्रो में भी ट्रैवल करते हैं। मैट्रो में ट्रेवल करने की कुछ खास कंडिशनस आदि  हैं, हम उन कंडिशन को पूरा करते हैं, मानते हैं बड़े ही आराम से हम अब उसमें ट्रैवल कर लेते हैं जबकि हम उसके आदी नहीं थे। जब ऐसा एक कल्चर डवैल्प होगा तो उस कल्चर में ढलने का काम भी धीरे-धीरे होगा जैसे मैट्रो के कल्चर में ढल जाते हैं औवर ऑल अब हम ढल चुके हैं और अब हमें पता चल चुका है कि मैट्रो में कैसे सफर करना है और जो वो स्वचालित सीढ़ियाँ हैं शुरूआत में हम घबराते थे कि कैसे पैर रखना है, अब धीरे-धीरे उसकी आदत हो गई है और पैर रखते हैं और चढ़ने लग गए। इस प्रकार कल्चर के बनने की प्रक्रिया और ढलने की प्रक्रिया साथ-साथ चलेगी। लगातार बिना हार माने, जब तक जुटे नहीं रहते उस चीज को बनाने में, तब तक किल्की के साथ भी रहना पड़ेगा और सीटी के साथ भी रहना पड़ेगा। लेकिन उसको टोकते रहना और सुधारते रहना हमारी भी जिम्मेवारी है और एजुकेशन इंस्टीटयूटंस की जिम्मेवारी रहेगी। लोक रंगकर्मियों का भी काम है, साहित्यकारों का भी काम है, यह सब का साझा काम है और साझा काम सब के संयुक्त प्रयास से होगा।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (मई-जून 2018), पेज – 31-35

 

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